ज्ञानार्जन भारत की परंपराः आरिफ मोहम्मद खान

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भारतीय संस्कृति में पत्रकारिता के मूल्य विषय पर राष्ट्रीय संविमर्श

भोपाल 22 फरवरी। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान का कहना है कि भारत की परंपरा, ज्ञान की परंपरा है, प्रज्ञा की परंपरा है। भारतीय संस्कृति का सारा जोर ज्ञानार्जन पर है। वे यहां “भारतीय संस्कृति में पत्रकारिता के मूल्य” विषय पर माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संविमर्श में मुख्य वक्ता की आसंदी से बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि प्राचीनकाल से ही भारत में ज्ञान का संचय होता रहा है और यहां ज्ञान से ही लक्ष्मी को प्राप्त किया जाता है। परंतु आज हम लक्ष्मी को सर्वोपरि मानकर अज्ञानता को थोप रहे हैं। उन्होंने कहा की आज भारतीय मीडिया में महाभारत के संजय जैसे पत्रकारों की भारी जरूरत है ,जो बिना किसी लगाव व अलगाव के निष्पक्षता पूर्वक अपने काम को अंजाम दे सकें। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की पहली कसौटी निष्पक्षता है किंतु वह अपने इस धर्म से विचलित हुयी है।

श्री खान ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज पेड न्यूज जैसी विकृति भारतीय मीडिया में पश्चिम से नहीं बल्कि स्वतः आई है, हमें ऐसी विकृतियों के समाधान भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं में ही तलाशने होंगें। उनका कहना था कि कोई भी पत्रकारिता शून्य में नहीं हो सकती। उसे देश की समस्याओं आतंकवाद, माओवादी आतंकवाद, गरीबी, अशिक्षा और विकास के सवालों को संबोधित ही करना पड़ेगा। तभी वह प्रासंगिक हो सकती है और उसे जनता का आदर प्राप्त हो सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से ही किसी भी दुर्बल वर्ग का को शक्तिशाली बनाया जा सकता है। क्योंकि शिक्षा ही एक मात्र ऐसा विषय है जिस पर कोई विवाद नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति विविधताओं का आदर करने वाली है।

राष्ट्रीय संविमर्श के मुख्य अतिथि मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा एवं जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने अपने उदबोधन में कहा कि आज मीडिया द्वारा किसी नकारात्मक समाचार को बार-बार दिखाना काफी खेदजनक है। मीडिया को इससे बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि हालांकि आज के लोग बहुत जागरूक हैं इसलिए चिंता करने की जरूरत नहीं है। किंतु सकारात्मक चिंतन से समाज को शक्ति मिलती है और उसे हर संकट के समाधान का संबल भी मिलता है। उन्होंने कहा भारतीय संस्कृति ने सभी संस्कृतियों के श्रेष्ठ गुणों को आत्मसात किया है और सबको स्वीकार किया है। हमारी संस्कृति कुछ थोपने की संस्कृति नहीं है, वरन श्रेष्ठता का आदर करने वाली संस्कृति है। उन्होंने मीडिया के विद्यार्थियों का आह्ववान किया वे समाज जीवन में सकारात्मक मूल्यों की स्थापना करते हुए सुसंवाद का वातावरण बनाने में सहयोगी बनें। श्री शर्मा ने कहा कि अगर नई पीढ़ी बेहतर करेगी तो आने वाले समय में समाज जीवन में एक जीवंत वातावरण बनेगा तथा भारत को महाशक्ति बनने से कोई रोक नहीं सकता।

संविमर्श की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने अपने अध्यक्षीय उदबोधन में कहा कि मीडिया के आधारभूत तत्वों में कहीं न कहीं कमी दिखती है। पूरी दुनिया में स्थापित व्यवस्थाओं में परिर्वतन और विकल्पों की तलाश हो रही है। मीडिया का वैकल्पिक माडल खड़ा करने और उसके विकल्प प्रस्तुत करने के लिए हमें तत्पर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज यह सोचने का समय है कि एक पत्रकार कैसा होना चाहिए और मीडिया का भावी स्वरूप क्या हो। शुभारंभ सत्र का संचालन प्रो. आशीष जोशी ने किया।

सेमीनार का दूसरा सत्र भारतीय संस्कृति पर केंद्रित था जिसमें सर्वश्री रामेश्वर मिश्र पंकज, रमेश शर्मा, डा. नंदकिशोर त्रिखा अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन डा.श्रीकांत सिंह ने किया। यह दो दिवसीय आयोजन 23 फरवरी को भी चलेगा। जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पत्रकार पद्मश्री मुजफ्फर हुसैन, बलदेव भाई शर्मा, साधना न्यूज के संपादक एनके सिंह, प्रो.अजहर हाशमी हिस्सा लेगें।

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