लेखक परिचय

डब्बू मिश्रा

डब्बू मिश्रा

इस्पात की धडकन का संपादक, सरकुलर मार्केट भिलाई का अध्यक्ष और अंर्तराष्ट्रीय ब्राह्मण का छत्तीसगढ राज्य प्रदेश सचिव । जनाधार बढाने का अटूट प्रयास ताकि कोई तो अपनो सा मिल जाये ताकि एक संघर्ष शुरू किया जा सके ।

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अर्जुन सिंह भी मर गये  ?  अब आप कहेंगे कि मै बजाय निधन या पंचतत्व में विलिन जैसी सभ्य बोली को छोडकर मर गये जैसी भाषा में क्यों पूछ रहा हूँ … इसका कारण है मेरा अब भारतीय कुप्रथाओं का विरोध .. हमारी एक बहुत बडी कुप्रथा है कि मरने वाले के बारे में हम कोई चर्चा नही करते हैं उसकी सारी बुराईयों को छोडकर केवल अच्छाईयों की बातें करते हैं । चलो उस परंपरा का निर्वहन करते हुये सबसे पहले उनकी तारिफ करता हूँ … ये एक ऐसे व्यक्ति रहे है जिन्होने देश के लगभग हर बडे पद पर कार्य किये हैं । इनकी सबसे बडी उपलब्धी पंजाब से आतंकवाद को खत्म करना था । १४ मार्च १९८५ को उन्होंने पंजाब के राज्यपाल के पद का दायित्व सभांला। २५ जुलाई १९८५ को अर्जुन सिंह जी उस दायित्व को पूरा करने में सफल हो गये जिसके लिये उन्हें पंजाब भेजा गया था। उस दिन हरचरण सिंह लोगोंवाल ने प्रधानमत्री श्री राजीव गांधी से मुलाकात की और पंजाब समझौते पर हस्ताक्षर किया।  ….. और यदि इन्होने गर्वनर के पद पर रहते हुये गिल को खुली छूट नही दिये होते तो आज भी हम पंजाब को जलता देखते रहते । … चलो हो गये खुश … अब बतायें इन्होने क्या किये …. चुरहट लाटरी कांड याद है कि भूल गये कि किस तरह से मुख्यमंत्री पद न्यायालय के आदेश पर इन्हे छोडना पडा था । … चलो जाने दो यार मर गये को अब क्या उखाडना
लेकिन अब मरने के बाद क्या होगा । अर्जुन के काले करोडों रूपयों का क्या होगा (अब ये मत कहना कि उनके पास कुछ नही होगा या वे इमानदार थे  , भाई जैन हवाला कांड की डायरी के नामों को याद करो)  एंडरसन के साथ हुए मौत के सौदों का क्या होगा,   आरक्षण जैसे बेतुके और देशद्रोह पूर्ण निर्णयों पर सहमती देकर इन्हे क्या मिलेगा …. जानते हैं क्या मिलेगा केवल एक तमगा मेरी ओर से … ये कि इन्होने केवल स्वार्थ की राजनीती किये इन्हे देश की कभी कोई परवाह नही रही और ना ही मान सम्मान की .. ये उन मोटी चमडी वालों में से एक हैं जिन्हे आप कुछ भी कह दो कोई फर्क नही पडता क्योकि उनका जवाब होता है .. क्या हुआ .. गाली ही तो दिया ना .. पैसे ले गया क्या …….
लेकिन उनके मरने के बाद क्य होगा ये इस देश के नेताओं को बताना चाहूंगा कि देखो किस तरह से इनकी  मौत अमावस को हुई है ,, अमावस को प्रेत लोक के अलावा हर लोक के दरवाजे बंद रहते हैं और प्रेतात्माएं घुमती रहती है …… अब जबकि अर्जुन मरे हैं तो उनकी आत्मा तो निकली ही होगी और इस समय गैस कांड में अकाल मौत मरे सारे लोग उन्हे बडे आराम से अपने पास बैठा कर सेंक रहे होंगे । उन्हे अपने कर्मों को भुगतने के लिये रोज एक नया जन्म लेना पडेगा कभी वो चींटी बन कर पैदा होंगे तो कभी बिल्ली के घर … हर जन्म में वो अपने पापों को याद किया करेंगे कि मैने अपने दुर्लभ मानव शरीर का किस तरह से दुरूपयोग किया था .. मैने अपने जिन नाती पोतों को ध्यान में रखकर पाप से पैसा कमाया वो सब अब गलत संगत में पडकर उन पैसों को उडा दिये हैं और किस तरह से एक एक कर बदनाम मौत मर रहे हैं ।
हे इस लेख को पढने वालों जरा गौर से पढो सोचो और समझो इस कथा को  …….. एक राजा था । उसका देश पूरे दुनिया का तीसरा सबसे बडा देश था और वहां की प्रजा बडी धार्मिक और कर्मठ थी । जनता ईमानदारी से अपना काम करती थी किंतु वह अपनी प्रजा पर कैसे भी करके टैक्स वसूली जारी रखता था जिन पैसों से जनता का भला हो सकता था उनसे वह अपना गुप्त धन बढाता था । वह अपने पैसों को दुसरे देशों में भी जमा करके रखता जाता था ताकि विपत्ति आने पर वह उस धन का उपयोग कर सके । एक दिन उसके अत्याचारों से त्रस्त जनता नें विद्रोह कर दिया और राजा के संभलने के पहले ही उसे उसके पूरे परिवार सहित मार डाला ।
राजा नें अपना जो धन दुसरे देशों में रखा था उन्हे मुफ्त में पाकर दुसरे देश समृद्ध होते गये ।  जिस धन को परिवार के लिये गडा कर रखा था वह सारा धन मिट्टी में दबता चला गया लेकिन राजा की आत्मा अपने धन को पाने के लिये भटकते रही । वह आज भी  कैसे भी करके अपने धन को वापिस पाना चाहता है … अब वो चाहता है तो चाहे लेकिन आप सोचकर देखें कि अगर उसे धन मिल भी जाता है तो क्या वह अपनी आत्मा के साथ ले जा सकता है . …. नही…. क्योकि धन का उपयोग आत्मा के लिये नगण्य है …. आत्मा केवल कर्म के आधार पर ही दिव्यात्मा बन सकती है । धन का लोभ हर बार आपकी आत्मा को प्रेतलोक में लेकर जाता है । इसलिये पापों को छोडो और देश धर्म की ओर लौटो । और हां ये बातें  केवल भारतीय विचारधारा वालों के लिये है इटालियन विचारधारा के लिये ही तो कहानी लिखा हूँ ।

8 Responses to “अर्जुन सिंह मर गये?”

  1. sunil patel

    हर व्यक्ति को सच्चाई का पता तो होना ही चैये. व्यक्ति के जीवित रहते पता चले तो अच्छा है. मरणोपरांत पता चले तो भी कोई बुराई तो नहीं है आखिर उनके कार्यो से समाज को फर्क तो पड़ता है. जब स्वर्गीय श्री अर्जुन सिंह जी मानव संसाधन विकाश मंत्री थे तब इनके द्वारा केंद्रीय विद्यालय संगठन के लोगो में कमल के फूल को यह कहकर बदलवा दिया गया की यह भाजपा का लोगो है.

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  2. Insaan

    मैं यहाँ आर सिंह की टिप्पणी से बिलकुल सहमत हूं| मेरे विचार से मृतक जैसे लोक प्रसिद्ध व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जीवन काल ही में सार्वजनिक रूप से हो जाना चाहिए था ताकि उसे लोकसेवा में लगे अपने दोष दूर करने का अवसर मिल जाता| दुर्भाग्यवश ऐसा संभव नहीं था क्योंकि किसी के ऐसा दुस्साहस करने पर वह अपने युवा कार्यकर्ताओं के संग स्वयं समीक्षक को मिलने आ धमकते और फिर भगवान ही जाने गुमशुदा लोगों की सूची में निरर्थक बढ़ोत्तरी हो जाती| मैं समझता हूं कि पत्रकारिता में निरपक्ष सच्चाई प्रस्तुत करना सम्पन्न लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है और इस कारण मैं डब्बू मिश्रा की व्यवसायिक दक्षता की सराहना करता हूं| में यह भी समझता हूं कि ऐसे लेख औरों को चुनौती देते उन्हें अच्छे जीवन मार्ग पर चलने की राह दिखाएंगे| समाचार पत्रों में पढ़ने को मिला है कि सयुक्त राष्ट्र अमरीका से वारेन बफ्फिट और बिल गेटस भारत आ “Giving Pledge” अभियान के अंतर्गत देश के समृद्ध लोगों को अपनी पूंजी का आधा भाग दान में देने को प्रोत्साहित करेंगे| मुझे संदेह है कि यहां मृतक के पुत्र के नाम से प्रस्तुत पहली दो टिप्पणियाँ उसके पुत्र ने लिखी हैं| फिर भी कितना अच्छा होगा कि सचमुच में अजय सिंह (राहुल भय्या) डब्बू मिश्रा से मिल अपने पिता की संपत्ति दान में देने का प्रस्ताव रखें| भारत कृतार्थ हो जायेगा| कौन जाने मृतक की आगामी आत्मकथा में देश अथवा देशवासियों के हित लिए क्या क्या कहा गया है|

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    बात जातिवाद के गंध की नहीं और न इसकी कि किसका किससे क्या सम्बन्ध है?अब सचमुच समय आ गया है इस पर विचार हो कि हम मृतक के बारे में कुछ गलत कहें या नहीं. अभी तक हमारी परम्परा अवश्य रही है कि हम किसी भी मनुष्य के मरने पर उसे स्वर्ग वासी ही कहते है भले ही वह अपने कर्मफल के अनुसार तथाकथित घोर नर्क का अधिकारी क्यों न हो. पर यह भी नेताओंपर लागू नहीं होना चाहिए.. इसीलिए यहाँ मैं केवल यह कहना चाहूँगा कि श्री मिश्र ने जो तर्क दिए हैं उनके आधार पर ही उनकी आलोचना कि जाये न कि इस आधार पर कि अर्जुन सिंह से किसका क्या सम्बन्ध था.अगर श्री मिश्र के उदाहरण गलत हैं तो उन्हें बताया जाये और अगर वे सही हैं तो उन्हें सही ही कहा जाये.अगर अर्जुन सिंह एक साधारण नागरिक होते तो बात कुछ और होती पर नेताओं का पूर्ण मूल्यांकन उनके मरने बाद ही हो सकता है.वे चाहे गाँधी हों,नेहरू हों या अर्जुन सिंह ही क्यों नहो. नेता जब गलती करता है तो जीवित रहते उसके सुधारने क़ी भी संभावना हो सकती है,पर जब वह मर गया तब तो उसका सही मूल्यांकन होना ही है.इतिहास गवाह है कि ऐसा हमेशा होता आया है और होता रहेगा.किसी एक क़ी जुबान आप बंद कर सकते हैं पर हर एक जब गलतियां सामने लाने लगेगा तो कौन किसको रोक पायेगा?

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  4. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    Akhil

    बहुत अच्छा भाई साहब, आप जैसे नीर-छीर विवेकियो और दूध का दूध, पानी का पानी करने वालो से ही थोडा बहुत ऐसे भ्रस्ट नेता और उनके नाती-पोते, कुल- सम्बन्धी कुछ हयादार बने रहते हैं ……. कोटिशः धन्यवाद्. एक बात और आपको पागल कहने वाले उनसे लाभान्वित और उन्ही के पंथी होंगे. आपको घबराने की जरुरत नहीं. सत्ता से लाभ पाने वालो को ऐसे खुलासों पर मिर्च लगती ही रहती है….. आप बेबाक लिखना जरी रखे…ऐसे राक्षसों के खिलाफ…..

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  5. Insaan

    यदि आप की बात में वास्विकता है तो मृतक की आत्मा अवश्य अपने धन को सदा के लिए अपने हाथों में पकडे रहने की अभिलाषा में घर से दूर न जा पाएगी और इस कारण परमात्मा से उसका मिलन न होगा| फिर भटकती आत्मा च्यूंटी या बिल्ली के शरीर में कैसे प्रवेश करेगी? मुझे प्रतीत होता है कि आप इसमें भी अपने कर्मों के फल से बचे रहने की मृतक में कोई चतुराई ही देखेंगे| उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनकी कन्या भी राजनीति में आ जाए और फिर सब राजनीतिक धमाचोकडी मिल “विदेश से काला धन वापिस लाओ” जैसा कोई कानून ही नहीं बनने दे| मुझे शंका बनी रहेगी कि कहीं बाबा रामदेव के डर से तो नहीं…
    अगर यह बात है तो सामने जिन्दा बैठे बाबा को अपने पेट को फुलाने और पिचकाने की क्रिया देख लालू की भांति उन्हें अपने कर्म याद आ जायेंगे| उनके दुःख निवारण को स्वयं परमात्मा भटकती आत्मा से मिलने आ पहुंचेगी और इस प्रकार प्रभु जी की श्रृष्टि अनुसार च्यूंटी और बिल्ली का दौर बराबर शुरू हो जायेगा| इन्हीं पन्नों पर एक लेख में वसिष्ठ जी का ब्रह्मदंड याद आ गया| परलोक की बातें हैं, कोई भारतीय राजनीति नहीं जो हमारी समझ में न आये|

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  6. ajay singh rahul

    आप दुबारा ऐसा मत लिखना थोडा अपने दीमाग को डॉक्टर को दिखाओ वैसे कहा के हो तुम तुम्हारे अन्दर जातिवाद की गंध आती है तुम्हारे जैसे पत्रकार बहुत देखे है

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  7. ajay singh rahul

    आप ने बहुत ही गंदे shabdo का प्रयोग किया है आप कुछ पढ़े लिखे है की नहीं मै अजय सिंह राहुल आप से मिलना चाहूगा आप के पिता के बारे ऐसा कोई कहे तो आप को कैसा लगेगा आप बहुत ही पागल hai

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