लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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शंकर शरण 

प्रसिद्ध चित्रकार हुसैन के देहांत पर हमारे अधिकांश अंग्रेजी अखबारों में चर्चा राजनीति, हिन्दुत्वा, कलाकार की अभिव्यक्ति स्वाधीनता और भारत की कथित छवि की हुई। अजीब है कि वहाँ ठीक कला पर कोई विचार नहीं हुआ। दूसरी ओर, हुसैन की कुरुचिपूर्ण प्रवृत्तियों, राजनीतिक रुख और देश-बदल आदि पर आलोचनात्मक लेखों पर कहा जाता है कि भइया, उसकी कला को देखो। उसकी कला पर लिखो! निस्संदेह, हुसैन की कला क्या, कैसी थी, किनके लिए थी और उनकी कलात्मक मूल्यवत्ता क्या थी – विचारणीय यह भी है। पर यह अनायास नहीं कि हुसैन विवाद में सदैव गौण विन्दुओं पर चर्चा होती रही है, और कला-चर्चा प्रायः लुप्त रही। क्या यह इसलिए क्योंकि हुसैन की कला पर कहने-सुनने के लिए कुछ खास नहीं? अथवा जो है, वह सुरुचिपूर्ण नहीं? क्या जंक फूड की तरह जंक कला भी होती है जो दृष्टि-रंजक होने के बावजूद स्वास्थय्कर नहीं होती?

ऐसे प्रश्न मूल प्रश्न की ओर ले जाते हैं, कि कला क्या है, तथा क्या इसे भी अच्छे-बुरे में वर्गीकृत किया जा सकता है। यह सच है कि हमारे समय में सच्ची कला पहचान सकना कठिन हो गया है। नकली, सस्ती चीजें थोक में दिखती हैं जिनके बीच असली दुर्लभ हो रही है। किन्तु यह भी सच है कि कला की पहचान पर लंबे समय से भ्रम चल रहा है। कम से कम पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों से पश्चिमी विमर्श में कला की कोई सर्वामान्य परिभाषा भी खोज पाना कठिन है।

महान लेखक और चिंतक लेव टॉल्सटॉय ने पंद्रह वर्षों तक परिश्रम करके कला क्या है (1898) शीर्षक पुस्तक लिखी थी। यह उनके जीवन की अंतिम कृतियों में से एक है। इसके तीसरे अध्याय में वे विश्व के सभी जाने-माने कला-मर्मज्ञों द्वारा दी गई कला की परिभाषा एकत्र करते हैं। टॉल्सटॉय ने लगभग चालीस कला पारखियों, विशेषज्ञों के विस्तृत उद्धरण दिए हैं। सबको पढ़कर स्पष्ट दीखेगा कि कुल मिला कर सभी एक-दूसरे को खारिज करते हैं, जिनसे अंततः कोई समझ नहीं बनेगी।

इसका अर्थ यह नहीं कि कला की पहचान नहीं हो सकती। कला मानव की भावनाओं से जुड़ी हुई है। अतः यह मानव जाति जितनी ही पुरानी है, जिसका ठोस और अनिवार्य अस्तित्व रहा है। यह भाषा से अधिक ध्वनि, रेखाओं, भंगिमाओं से व्यक्त होती है, इसलिए सार्वभौमिक अपील रखती है। यदि आधुनिक मानव अपनी तेज प्रगति के क्रम में कला की पहचान खो बैठा है तो यह उसकी समस्या है, कला की नहीं। वस्तुतः हुसैन विवाद में कला के प्रश्न पर चर्चा का लोप भी दिखाता है कि विवादियों में कला की समझ इतनी धुँधली है कि वे इस पर कुछ कहने में समर्थ नहीं।

 

जबकि कला मानव की एक अनिवार्य आश्यकता है। इसके माध्यम से लोग एक दूसरे से जुड़ते हैं। शब्दों से मनुष्य अपने विचार दूसरे तक पहुँचाता है, तो कला द्वारा वह अपनी भावनाएं, अनुभूतियाँ एक-दूसरे तक पहुँचाता है। मनुष्यों की एक-दूसरे की अनुभूति से प्रभावित हो सकने की क्षमता पर ही संपूर्ण कला कर्म आधारित है।

कला का आरंभ तब होता है जब एक मनुष्य अपनी किसी अनुभूति को दूसरों तक पहुँचाने के उद्देश्य से उस अनुभूति का अपने मन में पुनः ध्यान करता है और उसे किन्हीं संकेत-चिन्हों द्वारा व्यक्त करता है। पहले अनुभूत किसी अनुभूति का पुनः स्मरण करना, और स्मरण करके उसे किसी हरकत, रेखाओं, रंगों, ध्वनियों, शब्द-चित्रों आदि के माध्यम से दूसरों तक पहुँचाना, ताकि दूसरे भी उसका अनुभव कर सकें – इसी चीज में कला कर्म निहित है।

इस तरह कला मनुष्य को सामाजिक, सभ्य और सुसंस्कृत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि मनुष्य में कला से प्रभावित होने की यह क्षमता न होती तो वह और बर्बर होता, और भी विभाजित, और भी शत्रुता से भरा होता। इसलिए, कला ऐसी महत्वपूर्ण चीज है, जो सबके लिए आवश्यक है। इस का अर्थ यह भी है कि यदि कोई कला सभी लोगों के लिए कला नहीं बन पाती, तब या तो कला इतनी महत्वपूर्ण चीज नहीं जितना बताया जा रहा है, या वह कला है ही नहीं। कोई नकली चीज है।

सच्ची कला वही है जो किसी ऐसी अनुभूति को संप्रेषित करती हो जिसका लोगों ने पहले अनुभव नहीं किया है। जिस तरह मौलिक चिंतन उसी को कहते हैं जिसमें नई बातें और नया अवलोकन रहता है, न कि किसी पहले से मालूम बातों का दुहराव; उसी तरह कोई कला-कृति तभी सचमुच कला-कृति है जब वह मनुष्यों के सामान्य जीवन में किसी नई अनुभूति को संप्रेषित कर उसका समावेश करती है। चाहे वह कितनी ही छोटी अनुभूति क्यों न हो। बच्चे और किशोर कथा, चित्र और संगीत से, कला-कृतियों से इसीलिए अत्यधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि वह उन तक वैसी अनुभूतियाँ संप्रेषित करती हैं जिन का उन्होंने अभी तक अनुभव नहीं किया था।

लेकिन आधुनिक समय के साथ कला भी वर्गों में विभक्त हो गई है। उच्च वर्गीय लोगों की माँग पर कला मनोरंजन की तथा बाजारू वस्तु भी बन गई। उनके लिए कलाकार सीमित विषयों की चीजें बनाने लगे, जिसमें उत्तेजना, विकृति, बोरियत और अस्पष्टता अधिक रहती है। उनकी माँग पूरी करने के लिए वास्तविक कलाकृतियों की जगह आभासी कृतियाँ भी बनने लगीं। जो सतही तौर पर कला दिखती है किन्तु वास्तव में है नहीं। बाजार में मिलने वाली अधिकांश चीजें यही हैं। इनमें खूब मँहगी पेंटिंगें भी हैं जिन्हें धनी-मानी लोग इसलिए खरीदते हैं क्योंकि यह अबूझ लगती हैं, तथा उसे अपनी संपत्ति बनाकर वह अपनी हैसियत का दंभ तुष्ट करते हैं। ऐसी कलाकृतियाँ मात्र दिखने में कला लगती है। वह प्रायः कुछ संप्रेषित नहीं करतीं। उनमें नकल, दुहराव, किसी तरह की चमक या प्रभावशीलता और ध्यान बँटा सकने की क्षमता भर होती है। धनिकों के लिए चीजें बनाने वाले कलाकार इसका ध्यान भी रखते हैं। यही कारण है कि सामान्यतः लोग ऐसी कला से आकर्षित नहीं होते, क्योंकि उनकी अनुभूतियाँ विकृत या ठस नहीं हुई हैं। कला प्रदर्शनियों के प्रति लोगों की अरुचि के पीछे यही मुख्य बात है।

जो कलाकार संपूर्ण जनता का होता है, वह स्वभाविक रूप से अपनी बात इस तरह कहने का प्रयत्न करता है जिसे सभी लोग समझ सकें। टॉल्सटॉय ने सच कहा था कि यह धारणा पूर्णतः गलत है कि कोई कला अच्छी कला होते हुए भी बड़ी संख्या में लोगों की समझ में न आए। ऐसी मिथ्या धारणा के अत्यंत हानिकारक परिणाम होते हैं। फिर भी यह धारणा बहुप्रचलित है, और असंख्य प्रबुद्ध जनों ने यही स्वीकार कर रखा है।

प्रायः कहा जाता है कि अमुक कला-कृति बड़ी उत्कृष्ट है, पर उसे समझना कठिन है। किंतु यह ठीक वैसी ही बात है जैसे किसी भोजन के बारे में कहना कि यह भोजन तो बहुत उत्तम है, पर लोग उसे खा नहीं सकेंगे। पर यदि लोगों की बहुसंख्या किन्हीं सर्वश्रेष्ठ कही जाने वाली कला को नहीं समझती तो इस की कोई व्याख्या तो दी जानी चाहिए। ऐसी व्याख्या अथवा जानकारी जो उस कला-कृति को समझने के लिए आवश्यक हो। लेकिन ऐसी कोई व्याख्या मिलती ही नहीं। वस्तुतः वैसी कथित कलाकृतियों को समझाया ही नहीं जा सकता, और इसीलिए अंततः मात्र यही कहा जाता है कि लोग अच्छी कला-कृतियाँ नहीं समझते। बिना कोई स्पष्टीकरण दिए, बस दुहराया जाता है कि उसे समझने के लिए हमें उसे फिर पढ़ना चाहिए (साहित्य), देखना चाहिए (चित्र, नाटक), सुनना चाहिए (संगीत) और बार-बार यही करना चाहिए।

मगर यह कोई व्याख्या नहीं हुई। यह तो बस आदमी को किसी चीज का अभ्यस्त बनाना भर हुआ। और अभ्यस्त तो किसी भी चीज का हुआ जा सकता है। सड़े हुए भोजन, शराब, अफीम, तम्बाकू, जंक फूड जैसी हानिकारक चीजों का भी। सो यह तो संभव है कि लोगों को बुरी कला का अभ्यस्त बना दिया जाए, जो कि प्रायः हो रहा है। किंतु यह संभव नहीं कि कोई कला श्रेष्ठ भी हो और लोगों की समझ में भी न आए। वस्तुतः महान कला-कृतियाँ इसीलिए महान होती हैं क्योंकि वह सबकी पहुँच में होती हैं और सबकी समझ में आती हैं।

कला का तो संपूर्ण व्यापार इसी में निहित है कि जो चीज बुद्धि और तर्क से समझना कठिन या असंभव हो, उसे समझ में आने लायक बना दे। ऐसा प्रायः होता है कि जब किसी व्यक्ति पर कोई सच्चा कलात्मक प्रभाव पड़ता है, तो वह महसूस करता है कि यह भाव तो वह सदैव जानता था, केवल उसे व्यक्त करने में असमर्थ था। यही कारण है कि सदियों पुराना महान साहित्य, चाहे वह महाभारत हो या डॉन किहोटे, हमें अपनी ही अनुभूति असंख्य भावनाओं की अभिव्यक्ति लगता है। उत्कृष्ट अभिव्यक्ति। इसीलिए मानव-जाति बार-बार उसके पास जाती है, बिना किसी विज्ञापन या प्रोत्साहन के।

अतः यदि कोई कला हमें नहीं छूती, तो यह नहीं कहना चाहिए कि दोष पाठक, दर्शक या श्रोता में है। उस का कारण केवल यह है कि या तो वह बुरी कला है (जो बुरी, गंदी अनुभूतियाँ संप्रेषित कर रही है) या फिर वह कला है ही नहीं। हुसैन हों या पिकासो, तुलसीदास हों या विक्रम सेठ, सभी इस आधार पर परखे जा सकते हैं। टॉल्सटॉय ने कठोर परिश्रम, गंभीर अवलोकन और चिंतन-मनन से वह सार्वभौमिक कसौटी दी है, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता।

कलात्मक प्रभाव सदैव मन को छूता है। किंतु तभी जब कलाकार ने स्वयं उस का अनुभव किया हो और उसे अपने ही तरीके से संप्रेषित करने का यत्न किया हो। न कि किसी उधार की अनुभूति को संप्रेषित करने लगे जो उस तक पहुँचाई गई है। इस तरह की कविता या पेंटिंग जो किसी कविता या पेंटिंग से उधार लेकर बनाई गई हो, हमें नहीं छूती। वह कला का आभास देती है, पर होती नहीं। कला का सर्वप्रधान गुण है उसकी संपूर्णता, अविभाज्यता, जिस में रूप और सार अभिन्न रूप से संबद्ध होते हैं और संयुक्त ही वह अनुभूति व्यक्त करते हैं जो कलाकार ने महसूस की है।

इस आधार पर हम स्वयं हुसैन की कला परख सकते हैं। दिल्ली ललित कला अकादमी में इस माह के अंत तक उनकी कुछ कृतियों की प्रदर्शनी लगी हुई है। तुलना के लिए वहाँ से मात्र एक-डेढ़ किलोमीटर पर राष्ट्रीय कला संग्रहालय में लगी स्थाई प्रदर्शनी भी है जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर निकोलाई रोरिख तक, अनेकों महान कलाकारों की पेंटिंगे उपलब्ध हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या! सबको देखें, आपकी भावना स्वयं गवाही देगी कि आपने क्या महसूस किया और पाया।

One Response to “कला की कसौटी पर हुसैन”

  1. AR

    शंकर शरणजी, अच्छी बात है कि आप ने हुसैन कि कला के प्रति ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है, लेकिन मैं समझता हूँ कि उनकी कला का सर्वश्रेष्ठ विश्लेषण श्रीमान सर्वेश तिवारी जी ने यहाँ किया है:

    http://bharatendu.com/2011/06/17/m-f-husain-in-a-new-light-a-hindu-art-perspective/

    उपरोक्त लेखमाला अवश्य पड़ें।

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