भारत का आधुनिक चेहरा थे अरूण जेटली

  • योगेश कुमार गोयल

काफी समय से अस्वस्थ चल रहे देश के वित्तमंत्री रहते भ्रष्टाचार, काले धन, नकली मुद्रा
तथा आतंकवाद पर अंकुश लगाने के मजबूत इरादों वाले राजनेता के रूप में अपनी एक अलग
पहचान बनाने में सफल रहे भारत के प्रसिद्ध अधिवक्ता एवं वरिष्ठ राजनीतिज्ञ अरूण जेटली
का नई दिल्ली स्थित एम्स में 24 अगस्त को निधन हो गया। वे बहुत लंबे समय से अस्वस्थ
थे। पहली बार उनकी अस्वस्थता का पता तब चला था, जब उन्होंने वर्ष 2014 में वित्त मंत्री
रहते बजटीय भाषण देते समय लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन से बैठकर भाषण पढ़ने की
अनुमति मांगी क्योंकि नियमानुसार वित्त मंत्री सदैव खड़े होकर ही बजट भाषण पढ़ते हैं। 2014
में उनकी गैस्ट्रिक बाइपास सर्जरी हुई थी। इसके अलावा वे डायबिटीज के भी मरीज थे तथा
2018 में किडनी की बीमारी व संक्रमण से भी जूझते रहे, जिसके बाद उनकी किडनी ट्रांसप्लांट
हुई थी। पिछले कुछ समय से वे कैंसर से भी जंग लड़ रहे थे और आखिरकार यह जंग हारकर
दुनिया से विदा हो गए।
वकालत से राजनीति में आए अरूण जेटली जीवन पर्यन्त बीजेपी के दिग्गज नेताओं में
शुमार रहे। वे दिल्ली तथा जिला क्रिकेट संघ डीडीसीए के अध्यक्ष भी रहे। एनडीए सरकार के
पिछले कार्यकाल में केन्द्रीय न्याय मंत्री सहित कई वरिष्ठ पदों पर आसीन रहे जेटली वर्ष 1991
से ही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे और 1999 के आम चुनाव से पहले भाजपा
के प्रवक्ता बन गए थे। वैसे तो राजनीति में उनका पदार्पण उसी दौरान हो गया था, जब वे
अपने कॉलेज जीवन में दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष बने थे। उन्होंने 1973 में
दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से कॉमर्स में स्नातक किया और 1974 में दिल्ली
विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष चुने गए लेकिन सही मायनों में उनका राजनीतिक
पदार्पण आपातकाल के उस दौर में हुआ था, जब उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में अटल बिहारी

वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, के. आर. मलकानी सहित 11 राजनीतिक बंदियों के साथ रखा
गया था। तिहाड़ जेल की इसी कोठरी से अरूण जेटली का राजनीतिक कैरियर परवान चढ़ा। इन
दिग्गज नेताओं के साथ जेल की काल कोठरी में बंदी रखे जाने का उन्हें कितना लाभ हुआ,
इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 1977 में जब जनता पार्टी का गठन हुआ, तब
जेटली को उसकी राष्ट्रीय कार्यसमिति में रखा गया और बताया जाता है कि आपातकाल का बुरा
दौर खत्म होने के बाद उस साल होने जा रहे चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि
जेटली जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ें लेकिन उस वक्त दुविधा यह रही कि जेटली की उम्र
चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु सीमा से एक वर्ष कम थी। चूंकि आपातकाल के दौरान कुछ
समय जेल में बंदी रहने के कारण जेटली का कॉलेज में पढ़ाई का एक वर्ष खराब हो गया था,
अतः चुनाव न लड़ पाने के कारण इस समय का सदुपयोग उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के
विधि संकाय से अपनी कानून की डिग्री पूरी करने में किया।
1989 में वी पी सिंह की सरकार में वह भारत का अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बनाए
गए। 1991 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र नई दिल्ली
संसदीय सीट से चुनाव एजेंट की जिम्मेदारी सौंपी और जेटली बड़ी मेहनत के बाद आडवाणी को
प्रख्यात फिल्म स्टार राजेश खन्ना के खिलाफ मामूली अंतर से जीत दिलवाने में सफल रहे।
आडवाणी के ही पक्ष में उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस का केस और जैन हवाला केस अदालतों
में लड़ा और आडवाणी को बरी कराने में सफल रहे। अरूण जेटली एक बेहद अच्छे वक्ता थे और
संसद में उनका प्रदर्शन इतना अच्छा था कि कुछ वर्षों पहले उन्हें भाजपा के अंदरूनी हल्कों में
भावी प्रधानमंत्री तक कहा जाता था किन्तु उनकी सबसे बड़ी कमी यही रही कि वे अपना स्वयं
का बड़ा जनाधार न होने के कारण उन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाए, जिनकी उनसे अपेक्षा थी।
वे सदैव राज्यसभा से चुनकर ही संसद में पहुंचे।
1999 में केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी राजग सरकार में अरूण
जेटली पहली बार केन्द्रीय मंत्री बने। उन्होंने 13 अक्तूबर 1999 को सूचना एवं प्रसारण राज्य
मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, साथ ही विनिवेश राज्यमंत्री भी नियुक्त किए गए। कानून,
न्याय और कम्पनी मामलों के केन्द्रीय मंत्री के रूप में कार्यरत राम जेठमलानी के इस्तीफे के
बाद जेटली ने 23 जुलाई 2000 को इस मंत्रालय का भी अतिरिक्त प्रभार संभाला। नवम्बर
2000 में इस मंत्रालय के साथ वे केन्द्रीय जहाजरानी मंत्री भी बनाए गए। वर्ष 2000 में जेटली
राज्यसभा सदस्य चुने गए और वर्ष 2002 में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी नियुक्त किए गए
और जनवरी 2003 तक यह जिम्मेदारी बखूबी निभाते रहे। 29 जनवरी 2003 को वे केन्द्रीय

वाणिज्य एवं उद्योग तथा कानून और न्याय मंत्री नियुक्त हुए। मई 2004 में लोकसभा चुनाव
में राजग की हार के बाद अरूण जेटली भाजपा में बतौर महासचिव पार्टी की सेवा करते रहे और
साथ ही उन्होंने कानूनी प्रैक्टिस भी पुनः शुरू कर दी। 3 जून 2009 को भाजपा के दिग्गज नेता
लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में जेटली का ही चयन किया
गया और यह अहम जिम्मेदारी संभालने के बाद जेटली ने पार्टी के ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के
सिद्धांत के आधार पर 16 जून 2009 को पार्टी महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया।
अरूण जेटली 1980 से ही भाजपा का अहम हिस्सा रहे लेकिन इतने वर्षों तक पार्टी और
केन्द्रीय राजनीति के मजबूत स्तंभ रहने के बावजूद उन्होंने 2014 तक कभी कोई प्रत्यक्ष चुनाव
नहीं लड़ा। 2012 में वे तीसरी बार गुजरात से राज्यसभा सदस्य चुने गए और राज्यसभा सांसद
रहते उन्होंने 2014 में अमृतसर लोकसभा सीट से अपना पहला आम चुनाव कांग्रेस प्रत्याशी
कैप्टन अमरिन्दर सिंह के खिलाफ लड़ा किन्तु हार गए। मार्च 2018 में वे चौथी बार उत्तर प्रदेश
से राज्यसभा के लिए चुने गए। वे भले ही 2014 का लोकसभा चुनाव हार गए किन्तु 26 मई
2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी वरिष्ठता तथा अनुभवों पर भरोसा जताते हुए उन्हें
अपनी सरकार में वित्त मंत्री के रूप में चुना। इसके अलावा उन्हें कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय
तथा रक्षा मंत्रालय का प्रभार भी दिया गया। वैसे जेटली वाजपेयी के जमाने में सदैव लालकृष्ण
आडवाणी के विश्वस्त सिपहसालारों में शामिल माने जाते रहे लेकिन 2013 तक हालात काफी
बदल गए और जेटली आडवाणी के बजाय मोदी के घनिष्ठों में शामिल हो गए। वैसे 2002 में
गुजरात दंगों के बाद मोदी को जब वाजपेयी ने ‘राजधर्म’ की नसीहत दी थी, तब भी जेटली ने
मोदी का नैतिक समर्थन करते हुए उनके गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर बने रहने में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाई थी और गुजरात दंगा केस में भी अदालत में उन्होंने मोदी की ओर से वकालत
की थी। यही वजह रही कि 2014 में अमृतसर से लोकसभा का चुनाव हार जाने के बाद भी
मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी।
वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार द्वारा 9 नवम्बर 2016 को
नोटबंदी के रूप में बहुत बड़ा कदम उठाया गया, जिसे भ्रष्टाचार, काले धन, नकली मुद्रा और
आतंकवाद पर अंकुश लगाने के इरादे से उठाया गया मजबूत कदम माना गया। इसी प्रकार
जेटली ने ही अपने कार्यकाल में जीएसटी को अमलीजामा पहनाया। संसदीय चर्चा में उनका
योगदान सदैव अनुकरणीय माना जाता रहा। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी
चाहते थे कि अरूण जेटली चुनाव लड़ें किन्तु उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए स्पष्ट
कर दिया था कि वे नई सरकार में कोई जिम्मेदारी नहीं चाहते। मोदी को लिखे पत्र में उन्होंने

स्पष्ट किया था कि विगत डेढ़ वर्षों से उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जिनके कारण वे कोई पद
नहीं लेना चाहते हैं।
जेटली के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री ने लगातार चार ट्वीट किए और
लिखा कि एक तेजस्वी छात्र नेता के तौर पर जेटली ने आपातकाल के समय लोकतंत्र की सबसे
आगे होकर रक्षा की। वह भाजपा का लोकप्रिय चेहरा थे, जिन्होंने समाज के अलग-अलग वर्गों
तक पार्टी के कार्यकर्मों और विचारों को स्पष्ट रूप से पहुंचाया। प्रधानमंत्री ने अपने शोक संदेश
में लिखा कि भाजपा और जेटली के बीच एक कभी न टूटने वाला बंधन था। राष्ट्रपति रामनाथ
कोविंद के अनुसार जेटली ने एक प्रतिभाशाली वकील, अनुभवी सांसद तथा प्रतिष्ठित मंत्री के
रूप में राष्ट्र के निर्माण में बड़ा योगदान दिया और साहस एवं गरिमा के साथ लंबी बीमारी से
जंग लड़ी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक जेटली को सदा देश की अर्थव्यवस्था को संकट
से निकालने और पटरी पर लाने के लिए याद किया जाएगा। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का
कहना है कि जेटली की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, निपुणता का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
उनके अनुसार अरूण जेटली हममें से कईयों के मेंटर, मार्गदर्शक और एक नैतिक सहयोग व
ताकत देने वाले शख्स के रूप में बड़े दिल वाले ऐसे उम्दा इंसान थे, जो हर वक्त किसी की भी
मदद के लिए तैयार रहते थे। वर्ष 2000 में एशिया वीक नामक पत्रिका ने जेटली को भारत के
उभरते हुए युवा नेताओं की सूची में रखते हुए उन्हें भारत का ऐसा आधुनिक चेहरा बताया था,
जिसकी छवि बिल्कुल साफ-सुथरी थी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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