लेखक परिचय

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान युवा पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हरिभूमि में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन भी जारी है. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसे काफ़ी सराहा गया है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी कर रही हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए आपको कई पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है. आप कई भाषों में लिखती हैं. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में ख़ास दिलचस्पी रखती हैं. फ़िलहाल एक न्यूज़ और फ़ीचर्स एजेंसी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं.

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-फ़िरदौस ख़ान

भौतिकवादी संस्कृति ने जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है, वहीं मनुष्य का स्वास्थ्य भी इससे न अछूता रहा हो तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। दौलत कमाने की चाह ने इंसान को बहुत ज़्यादा व्यस्त कर दिया है। समय के अभाव के कारण व्यक्ति अपनी सेहत की सही देखभाल नहीं कर पाता। बीमार होने की हालत में वह दवाओं का सेवन करके जल्द से जल्द ठीक होना चाहता है, लेकिन कुछ स्वस्थ व्यक्ति भी ख़ुद को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए नियमित रूप से दवाओं का सेवन करते हैं। इंसान का स्वस्थ रहना उसके खान-पान व उसके रहन-सहन पर निर्भर करता है, जबकि वे इसे दवाओं का लाभ समझता है।

अनेक दवाएं ऐसी हैं जो लाभ की बजाय नुक़सान ज़्यादा पहुंचाती हैं। कुछ दवाएं रिएक्शन करने पर जानलेवा तक साबित हो जाती हैं, जबकि कुछ दवाएं मीठे ज़हर का काम करती हैं। कब्ज़ की दवा से पाचन तंत्र प्रभावित होता है। सर्दी, खांसी, ज़ुकाम, सरदर्द और नींद न आने के लिए ली जाने वाली एस्प्रीन सालि सिलेट नामक रसायन होता है, जो श्रवण केंद्रीय के ज्ञान तंतु पर विपरीत प्रभाव डालता है। कुनेन का अधिक सेवन कर लेने पर व्यक्ति बहरा हो सका है। ये दवाएं एक तरह से नशे का काम करती हैं। नियमित रूप से एक ही दवा का इस्तेमाल करते रहने से दवा का असर कम होता जाता है और व्यक्ति दवा की मात्रा में बढ़ोतरी करने लगता है। दवाओं में अल्कोहल का भी अधिक प्रयोग किया जाता है जो कि फेफड़ों को हानि पहुंचाती है।

अधिकांश दवाएं शरीर के अनुकूल नहीं होतीं जिससे ये शरीर में घुलमिल कर खाद्य पदार्थों की भांति पच नहीं पाती हैं। नतीजतन, ये शरीर में एकत्रित होकर स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। दवाओं में जड़ी-बूटियों के अलावा खनिज लोहा, चांदी, सोना, हीरा, पारा, गंधक, अभ्रक, मूंगा, मोती व संखिया आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही कई दवाओं में अफ़ीम, अनेक जानवरों का रक्त व चर्बी आदि का भी इस्तेमाल किया जाता है। सल्फ़ा तथा एंटीबायोटिक दवाओं के लंबे समय तक सेवन से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों का कहना है कि मेक्साफार्म, प्लेक्वान, एमीक्लीन, क्लोरोक्लीन व नियोक्लीन आदि दवाएं बहुत ख़तरनाक हैं। इनके अधिक सेवन से जिगर व तिल्ली बढ़ जाती है, स्नायु दर्द होता है, आंखों की रोशनी कम हो सकती है, लकवा मार सकता है और कभी-कभी मौत भी हो सकती है। दर्द, जलन व बुख़ार के लिए दी जाने वाली ऑक्सीफ़ेन, बूटाजोन, एंटीजेसिक, एमीडीजोन, प्लेयर, बूटा प्राक्सीवोन, जेक्रिल, मायगेसिक, ऑसलजीन, हैडरिल, जोलांडिन व प्लेसीडीन आदि दवाएं भी ख़तरनाक हैं। ये ख़ून में कई क़िस्म के विकार उत्पन्न करती हैं। ये दवाएं सफ़ेद रक्त कणों को ख़त्म कर देती हैं। इनसे अल्सर हो जाता है तथा साथ ही जिगर व गुर्दे ख़राब हो जाते हैं।

एक फ़ार्मास्टि के मुताबिक़ स्टीरॉयड तथा एनाबॉलिक्स जैसे डेकाडयराबोलिन, ट्राइएनर्जिक आदि दवाएं पौष्टिक आहार कहकर बेची जाती हैं, जबकि प्रयोगों ने यह साबित कर दिया है कि इनसे बच्चों की हड्डियों का विकास रुक जाता है। इनके सेवन लड़कियों में मर्दानापन आ जाता है।

जलनशोथ आदि से बचने के लिए दी जाने वाली चाइमारोल तथा खांसी रोकने के लिए दी जाने वाली बेनाड्रिल, एविल, केडिस्टिन, साइनोरिल, कोरेक्स, डाइलोसिन व एस्कोल्ड आदि दवाएं स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। इसी तरह एंसिफैड्रिल आदि का मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। एक चिकित्सक के मुताबिक़ दवाओं के दुष्प्रभाव का सबसे बड़ा कारण बिना शारीरिक परीक्षण किए हुए दी जाने वाली दवाओं की निर्धारित मात्रा से अधिक ख़ुराक है। अनेक चिकित्सक अपनी दवाओं का जल्दी प्रभाव दिखाने के लिए प्राइमरी की बजाय थर्ड जेनेरेशन दे देते हैं, जो अक्सर कामयाब तो हो जाती हैं, लेकिन दूसरे असर छोड़ जाती हैं। दवाओं के साइड इफ़ेक्ट भी होते हैं, जिनसे अन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल का कहना है कि स्वस्थ्य रहने के लिए ज़रूरी है कि लोग अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखें जैसे अपना ब्लड कोलेस्ट्रॉल 160 एमजी प्रतिशत से कम रखें। कोलेस्ट्रॉल में एक प्रतिशत की भी कमी करने से हृदयाघात में 2 फ़ीसदी की कमी होती है। अनियंत्रित मधुमेह और रक्त चाप से हृदयाघात का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए इन पर काबू रखें। कम खाएं, ज्यादा चलें। नियमित व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। वॉगिंग सबसे बढ़िया व्यायाम है जो तेज गति से भी अधिक तेज चलने को कहा जाता है। सोया के उत्पाद स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होते हैं। खुराक में इन्हें ज़रूर लिया जाना चाहिए। जूस की जगह साबुत फल लेना बेहतर होता है। ब्राउन राइस पॉलिश्ड राइस से और सफ़ेद चीनी की जगह गुड़ लेना कहीं अच्छा माना जाता है। फाइबर से भरपूर खुराक लें। शराब पीकर कभी भी गाड़ी न चलाएं। गर्भवती महिलाएं तो शराब बिल्कुल न पिएं। इससे होने वाले बच्चे को नुकसान होता है। साल में एक बार अपने स्वास्थ्य की जांच करवाएं। ज़्यादा नमक से परहेज़ करें।

लोगों को अपने स्वास्थ्य के संबंध में काफ़ी सचेत एवं जागरूक रहने की ज़रूरत है, वरना रोग का इलाज कराते-कराते वे किसी दूसरे रोग का शिकार हो जाएंगे। शरीर में स्वयं रोगों से मुक्ति पाने की क्षमता है। बीमारी प्रकृति के साधारण नियमों के उल्लंघन की सूचना मात्र है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने से बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम करने तथा पौष्टिक भोजन लेने से मानसिक व शारीरिक संतुलन बना रहता है।

3 Responses to “मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    Ham dwaon ka sevan hi kyon kare? Kyon na ham apne life style ko aisa banaaye ki hame kam se kam dawaon ka sevan karnaa pade?Aaj to internet par aapko simple way mein swasth rahne ke liye bahut se scientific sujhao mil jayenge.Jarurat hai unpar amal karne ki.Yah subhisa aapko kuch varson pahle uplabdh nahi tha.Do links to main yahi de sakta hoon.1.reallife.com2.ezinearticles.com.
    Saadaa jindagi bitaiye,swasth rahiye..

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  2. Agyaani

    आदरणीय फिरदौस जी!
    आपके द्वारा लिखे गये दवाइयों पर इस लेख में आँखे खोल देने वाली बातें हैं! बहुत से पढ़े लिखे और अनपढ़ लोगों को ये भ्रम होता है कि इन दवाइयों से उनकी समस्या का हल हो जायेगा! उनको सुबह उठकर सैर करने प्रणायाम करने और व्यायाम करने से बेहतर २ डिस्प्रिन कि गोलियां ले लेना अच्छा लगता है!
    पारम्परिक इलाज़ के तौर तरीके पुराने कह कर छोड़े जा रहे हैं! सरकार भी कहीं न कहीं इस मामले में जिम्मेदार है! नकली दवाइयों से बाजार पटे पड़े हैं! सब लोग पैसे कमाने कि होड़ में लगे हैं किसको चिंता है …………………………..!!!!

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  3. VIJAY SONI ADVOCATE

    हाँ,ये बिलकुल सत्य है आपके लेख में आपने जितनी भी दवाइयां और उनके होने वाले कुप्रभाव बताएं है वे तो हैं ही ,इसके अलवा भी आदमी ने स्वम अपने मौत का सामन दवा के अनधिकृत प्रयोग और अत्यधिक प्रयोग के रूप में तैयार कर लिया है ,खान-पान ,रहन-सहन ,साजो-आराम ने हमको बीमार बना दिया है,गर्भावस्था के दिन से शिशु जन्म तक माता दवाइयाँ खाती हैं,फिर इसके दुस्प्रभाव के कारण स्तनपान के अभाव में नवजात जन्म से ही दवाइयों का आदि हो जाता है ,ये क्रम लगातार जारी है,उपर से कुदरत के दिए पेड़ पौधे वन स्वास्थ्य हवाएं सब कुछ आधुनिकता की बलि चढ़ रहें हैं ,खेती आज खाद वो भी दवा आधारित हो गई हैं ,अनाज,सब्जी फल सब कुछ दवाई आधारित हैं ,फलों को पकाने कार्बेट का खुला इस्तेमाल हो रहा है ,सब्जी रंगी जा रही है,दूध के लिए गाय-भैंस को इंजेक्सन लगाये बिना नहीं दुया जाता अब कहाँ क्या करें क्या खाएं क्या पचायें,सब कुछ पैसे सिर्फ पैसे के लिए हो रहा है लेकिन पैसा किस प्रकार खाएं ,इस प्रकार कैसे जियें क्या करें , सब कुछ भगवन भरोसे है …विजय सोनी अधिवक्ता दुर्ग छत्तीसगढ़

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