संतोष कुमार तिवारी
भारत की खूबसूरती उसकी विविधता में है। यहां अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं को मानने वाले लोग एक ही राष्ट्रीय पहचान के साथ रहते हैं। उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड, बिहार हो या महाराष्ट्र, पंजाब हो या दक्षिण भारत का कोई राज्य, हर प्रदेश का नागरिक समान रूप से भारतीय है। ऐसे में जब किसी बड़े राजनीतिक दल के प्रमुख नेता के बयान में एक प्रदेश के लोगों को ‘घुसपैठिया’ कहे जाने का अर्थ निकलता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक विरोध की भाषा सामाजिक विभाजन की ओर बढ़ रही है? इसलिए सभी नेताओं को अपने बयानबाजी में यह ध्यान रखना है कि उनके राजनीतिक विरोध में राष्ट्रीय एकता पर ‘प्रहार’ न हो .यदि ऐसा होता है तो यह देश के लिए चिंताजनक है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के उत्तराखंड के संदर्भ में दिए गए बयान ने इसी बहस को जन्म दिया है। इस टिप्पणी पर उत्तराखंड में विरोध हुआ और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी आपत्ति जताई। वहीं, समाजवादी पार्टी की ओर से यह सफाई दी गई कि टिप्पणी पूरे उत्तराखंड के लोगों के लिए नहीं बल्कि एक व्यक्ति के संदर्भ में थी। ऐसे में पूरे बयान और उसके संदर्भ को समझना जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाले शब्दों के संभावित प्रभाव को गंभीरता से लिया जाए।
‘घुसपैठिया’ शब्द सामान्य राजनीतिक आलोचना का पर्याय नहीं है। इसका संबंध किसी क्षेत्र में अवैध प्रवेश से जुड़ा है। किसी भारतीय नागरिक को केवल उसके मूल प्रदेश, निवास या दूसरे राज्य में काम करने के आधार पर इस शब्द से जोड़ना उसकी पहचान और सम्मान पर सवाल खड़े कर सकता है। उत्तराखंड के लोग उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में रहते हैं, नौकरी करते हैं और कारोबार चलाते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के लाखों लोग भी दूसरे राज्यों में रहकर देश के विकास में योगदान देते हैं। भारत का संविधान नागरिकों को पूरे देश में आने-जाने और कानून के दायरे में रहकर निवास करने तथा काम करने का अधिकार देता है। इसलिए किसी व्यक्ति के दूसरे राज्य में रहने को अपने आप में घुसपैठ कहना उचित नहीं है।
इस विवाद में अखिलेश यादव की पत्नी और समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव का उत्तराखंड से पारिवारिक संबंध भी चर्चा का विषय बना है। डिंपल यादव का जन्म पुणे में हुआ था और उनका पैतृक संबंध उत्तराखंड से बताया जाता है। इस तथ्य के संदर्भ में अखिलेश यादव के बयान पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, किसी नेता के बयान का मूल्यांकन केवल उसके पारिवारिक संबंधों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक शब्दों, संदर्भ और प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए। फिर भी, विभिन्न प्रदेशों से जुड़े पारिवारिक रिश्ते इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत का सामाजिक ताना-बाना राज्यों की सीमाओं से कहीं व्यापक है। ऐसे में राजनीतिक नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी भाषा में इस विविधता और आपसी संबंधों का सम्मान करें।
लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार की नीतियों की आलोचना करने, प्रशासन से जवाब मांगने और व्यवस्था की कमियों को सामने लाने का पूरा अधिकार है। लेकिन आलोचना का आधार किसी व्यक्ति का आचरण, किसी नीति की विफलता या किसी व्यवस्था में मौजूद कमी होनी चाहिए न कि उसकी क्षेत्रीय पहचान। यदि किसी विशेष व्यक्ति की भूमिका पर आपत्ति है तो उससे जुड़े तथ्यों को सामने रखा जाना चाहिए। किसी एक व्यक्ति के व्यवहार के आधार पर पूरे प्रदेश के लोगों को एक श्रेणी में रखना स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद की भावना के अनुरूप नहीं है।
उत्तराखंड का अपना विशिष्ट इतिहास, संस्कृति और राज्य निर्माण का संघर्ष है। लंबे आंदोलन के बाद नौ नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर यह देश का 27वां राज्य बना। यहां के लोगों का सेना, अर्धसैनिक बलों, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में योगदान रहा है लेकिन किसी प्रदेश के नागरिकों का सम्मान केवल उनके योगदान के आधार पर ही निर्धारित नहीं होता; प्रत्येक नागरिक समान गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का अधिकारी है। इसलिए उत्तराखंड के लोगों की पहचान को किसी अपमानजनक अर्थ वाले शब्द से जोड़ने के बजाय उनके अधिकारों और सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए।
भारत जैसे विशाल देश में क्षेत्रीय पहचान को लेकर की गई बयानबाजी का असर राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहता। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक और आर्थिक संबंध हैं। दोनों राज्यों के लोग एक-दूसरे के यहां रहते हैं, काम करते हैं और सामाजिक संबंध निभाते हैं। यदि राजनीतिक विमर्श में एक प्रदेश के लोगों को दूसरे प्रदेश के लिए बाहरी या घुसपैठिया बताने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो इससे आपसी अविश्वास पैदा होने का खतरा रहता है। हालांकि, किसी एक बयान को देश की एकता तोड़ने की साजिश घोषित करने के लिए भी ठोस प्रमाण जरूरी हैं। आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक आरोपों पर।
इस मामले में समाजवादी पार्टी की सफाई को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि टिप्पणी किसी विशेष व्यक्ति के संदर्भ में की गई थी, तो उसका आशय स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि पूरे प्रदेश के लोगों के प्रति अपमान का संदेश न जाए। दूसरी ओर, यदि शब्दों से उत्तराखंड के लोगों को ठेस पहुंची है, तो उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए विवाद दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी केवल बयान देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके प्रभाव को समझने और आवश्यकता पड़ने पर स्पष्टीकरण देने में भी दिखाई देती है।
यह अपेक्षा किसी एक दल तक सीमित नहीं है। समाजवादी पार्टी हो, भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस हो या कोई अन्य राजनीतिक संगठन, सभी नेताओं को अपनी भाषा में मर्यादा और जिम्मेदारी का ध्यान रखना चाहिए। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं लेकिन उन्हें क्षेत्रीय वैमनस्य का कारण नहीं बनने देना चाहिए। नेताओं के शब्द समाज में संवाद को मजबूत भी कर सकते हैं और अनावश्यक दूरी भी पैदा कर सकते हैं। इसलिए राजनीतिक आलोचना ऐसी होनी चाहिए जो सवाल उठाए, जवाबदेही तय करे और तथ्यों को सामने लाए, न कि नागरिकों के बीच विभाजन को बढ़ावा दे।
अखिलेश यादव के उत्तराखंड संबंधी बयान से उपजा विवाद राजनीतिक भाषा की मर्यादा पर विचार करने का अवसर है। डिंपल यादव का उत्तराखंड से पारिवारिक संबंध इस चर्चा का एक पहलू जरूर है, लेकिन मूल प्रश्न इससे बड़ा है कि क्या किसी भारतीय नागरिक को दूसरे राज्य में रहने या काम करने के कारण ‘घुसपैठिया’ कहा जा सकता है? इसका उत्तर संवैधानिक अधिकारों, समानता और आपसी सम्मान के सिद्धांतों में तलाशना चाहिए। किसी व्यक्ति के आचरण पर सवाल उठाने और पूरे प्रदेश के लोगों को निशाना बनाने के बीच स्पष्ट अंतर है।
देश की एकता केवल नारों से नहीं, बल्कि नागरिकों के परस्पर सम्मान से मजबूत होती है। उत्तराखंड का नागरिक हो या उत्तर प्रदेश का, सभी की राष्ट्रीय पहचान समान है। राजनीति में दल बदल सकते हैं, सरकारें बदल सकती हैं और विचारों में मतभेद हो सकते हैं लेकिन इन मतभेदों के कारण देश के नागरिकों के बीच भाईचारा कमजोर नहीं होना चाहिए। अखिलेश यादव सहित सभी राजनीतिक नेताओं को यह समझना होगा कि शब्दों की ताकत केवल राजनीतिक संदेश देने में नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने या बांटने में भी होती है। इसलिए राजनीति में विरोध हो, सवाल हों और तीखी बहस भी हो, लेकिन राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द और प्रत्येक नागरिक की गरिमा का सम्मान सर्वोपरि रहना चाहिए।
संतोष कुमार तिवारी