राजनीति

औद्योगिक विकास की दहलीज पर बिहार: निवेश और रोजगार की कसौटी

कुमार कृष्णन

बिहार में औद्योगिक विकास की चर्चा कोई नई नहीं है। दशकों से राज्य के सामने सवाल रहा है कि कृषि और श्रमशक्ति की प्रचुरता के बावजूद यहां बड़े उद्योग क्यों नहीं विकसित हो सके और रोजगार की तलाश में युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर क्यों जाना पड़ता है। गया के डोभी में प्रस्तावित इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग सिटी इसी चुनौती का जवाब बनने की उम्मीद जगाती है। बोधगया में बिहार इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग सिटी गया लिमिटेड (बीआईएमसीजीएल) की शुरुआत और बिहार बिजनेस कनेक्ट 2027 के प्रारंभिक कार्यक्रम ने राज्य के औद्योगिक भविष्य को लेकर नई संभावनाएं सामने रखी हैं। लेकिन असली सवाल है कि क्या निवेश की घोषणाएं बिहार की अर्थव्यवस्था और रोजगार की तस्वीर बदल पाएंगी?

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बीआईएमसीजीएल का औपचारिक शुभारंभ किया। इस अवसर पर आईएमसी गया में लगभग 300 एकड़ औद्योगिक भूमि के लिए संभावित निवेशकों के साथ 12 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इनके तहत करीब 4,200 करोड़ रुपये के निवेश और 16,095 रोजगार के अवसरों का अनुमान है। प्रस्तावित निवेश खाद्य प्रसंस्करण, ऑटोमोबाइल कलपुर्जों, औषधीय उत्पादों, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य विनिर्माण गतिविधियों से जुड़ा है। इससे पहले लगभग 2,586 एकड़ भूमि के लिए 31,750 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव और 52,050 रोजगार के अवसरों का अनुमान सामने आया था।

ये आंकड़े उत्साहजनक हैं लेकिन निवेश की घोषणा और वास्तविक औद्योगिक उत्पादन के बीच का अंतर समझना जरूरी है। समझौता ज्ञापन निवेश की मंशा का संकेत है, निवेश की पूर्णता का प्रमाण नहीं। प्रस्तावित पूंजी का कितना हिस्सा वास्तव में आएगा, कितनी इकाइयां स्थापित होंगी और कितने लोगों को स्थायी रोजगार मिलेगा, इसका जवाब परियोजना की प्रगति से ही मिलेगा। इसलिए सफलता का आकलन निवेश के दावों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से होना चाहिए।

गया जिले के डोभी प्रखंड में 1,670 एकड़ में विकसित की जा रही इस औद्योगिक नगरी को केंद्र सरकार ने 28 अगस्त 2024 को मंजूरी दी थी। भूमि की लागत सहित परियोजना की अनुमानित लागत 1,339 करोड़ रुपये है। इससे लगभग 16,500 करोड़ रुपये के निवेश और करीब 1.10 लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। यह परियोजना राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम के तहत अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक गलियारे का हिस्सा है।

परियोजना की लागत, संभावित निजी निवेश और रोजगार के अनुमान अलग-अलग मानक हैं। सरकारी खर्च से सड़क, बिजली और जलापूर्ति जैसी सुविधाएं विकसित करना जरूरी है, लेकिन इनका निर्माण अपने आप कारखानों को चालू नहीं कर देता। निवेशकों को भरोसेमंद बुनियादी ढांचे, कुशल श्रमिकों, बाजार तक पहुंच, वित्तीय सहायता और समयबद्ध प्रशासनिक मंजूरियों की भी जरूरत होगी। सरकार को नियमित रूप से बताना चाहिए कि कितनी जमीन आवंटित हुई, कितने निवेशकों ने अंतिम निर्णय लिया, कितनी इकाइयों का निर्माण शुरू हुआ और कितनी उत्पादन करने लगीं। पारदर्शिता से घोषणाओं और उपलब्धियों के बीच का अंतर स्पष्ट होगा।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने औद्योगिक विकास में तेजी लाने, निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन के लिए राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई है। इस प्रतिबद्धता की सबसे बड़ी कसौटी बिहार के युवाओं को मिलने वाले अवसर होंगे। राज्य से बड़ी संख्या में श्रमिक और शिक्षित युवा आजीविका की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। उनके लिए रोजगार का अर्थ केवल नौकरी नहीं, बल्कि नियमित आय, सुरक्षित कार्यस्थल, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन भी है। यदि घोषित रोजगार का बड़ा हिस्सा अस्थायी या ठेका आधारित होता है और स्थानीय युवाओं को कम वेतन वाले काम तक सीमित रहना पड़ता है तो औद्योगिक विकास का सामाजिक लाभ अधूरा रहेगा।

इसलिए उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकास, तकनीकी शिक्षण संस्थानों के साथ साझेदारी और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सहायता की व्यवस्था जरूरी है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सुरक्षित परिवहन, कार्यस्थल पर आवश्यक सुविधाएं और समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे। रोजगार की संख्या के साथ उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना ही औद्योगिक नीति को सामाजिक विकास से जोड़ सकता है।

कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने आईएमसी गया की योजना और विकास में राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम (एनआईसीडीसी) की भूमिका को रेखांकित किया। केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री जीतन राम मांझी ने बिहार में औद्योगीकरण को मजबूत करने और विनिर्माण, एमएसएमई तथा रोजगार सृजन को बढ़ावा देने में केंद्र सरकार के सहयोग पर जोर दिया। उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव, बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार और उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

केंद्र और राज्य के बीच सहयोग इस परियोजना के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन सफलता विभागीय समन्वय और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। बिजली, जल संसाधन, सड़क, परिवहन, कौशल विकास, पर्यावरण और स्थानीय प्रशासन से जुड़े विभागों को साझा कार्ययोजना के तहत काम करना होगा। बीआईएमसीजीएल को बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण और राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास एवं कार्यान्वयन ट्रस्ट के संयुक्त उद्यम के रूप में गठित किया गया है। दोनों की इसमें बराबर हिस्सेदारी है। इसका उद्देश्य परियोजना की योजना, बुनियादी ढांचे, वैधानिक मंजूरियों और निवेशकों को सुविधाएं देने के काम में समन्वय स्थापित करना है।

मुख्यमंत्री ने बीआईएमसीजीएल के लोगो का अनावरण करने के साथ इसकी आधिकारिक वेबसाइट और एकीकृत भूमि आवंटन पोर्टल भी शुरू किया। यह भूमि आवंटन को सरल और पारदर्शी बनाने की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है। लेकिन निवेशकों को सुविधा देने के साथ सार्वजनिक जवाबदेही भी जरूरी है। भूमि आवंटन के मानदंड, निवेश की प्रगति, सार्वजनिक धन के उपयोग और रोजगार के वास्तविक आंकड़े नागरिकों के लिए उपलब्ध होने चाहिए। पारदर्शिता निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के साथ आम लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।

आईएमसी गया में कृषि आधारित उद्योगों, कपड़ा, रेडीमेड परिधान, फर्नीचर, हस्तशिल्प, हथकरघा, इंजीनियरिंग और फैब्रिकेशन जैसे क्षेत्रों पर ध्यान देने की योजना है। बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए यह दिशा स्थानीय विकास के लिए उपयोगी हो सकती है। खाद्य प्रसंस्करण की इकाइयां किसानों को उनकी उपज के लिए नए बाजार दे सकती हैं। भंडारण, पैकेजिंग, परिवहन और विपणन से जुड़ी गतिविधियों में भी रोजगार पैदा हो सकता है। लेकिन इसका लाभ तभी व्यापक होगा, जब किसानों को उचित मूल्य मिले और छोटे उत्पादकों को औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ा जाए। किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय उद्यमियों को अवसर देना भी जरूरी है।

गया और आसपास के क्षेत्रों के हस्तशिल्प तथा हथकरघा को बाजार, वित्त, प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक से जोड़कर स्थानीय कौशल को आर्थिक अवसरों में बदला जा सकता है। इससे औद्योगिक विकास का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रहने के बजाय छोटे उद्यमियों और कारीगरों तक पहुंच सकता है।

परियोजना की सफलता पर्यावरणीय संतुलन पर भी निर्भर करेगी। औद्योगिक नगरी में आंतरिक सड़कें, बिजली वितरण, जलापूर्ति, सीवरेज, अपशिष्ट जल उपचार, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और अग्नि सुरक्षा जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। परियोजना स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग-22 और राष्ट्रीय राजमार्ग-19 के निकट है तथा गया हवाई अड्डे से लगभग 39 किलोमीटर दूर है। बेहतर संपर्क निवेश आकर्षित करने में मदद कर सकता है, लेकिन भरोसेमंद जलापूर्ति, अपशिष्ट का सुरक्षित निस्तारण और प्रदूषण नियंत्रण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

औद्योगिक इकाइयों की जल जरूरतों का आकलन करते समय स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं और जल स्रोतों की दीर्घकालिक उपलब्धता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी तरह, जमीन से जुड़े मामलों में प्रभावित परिवारों के अधिकार, उचित मुआवजा और पुनर्वास सुनिश्चित करना होगा। विकास की सफलता तभी व्यापक होगी, जब औद्योगिक विस्तार के साथ स्थानीय आबादी की आजीविका और पर्यावरण भी सुरक्षित रहें।

बिहार बिजनेस कनेक्ट 2027 के प्रारंभिक कार्यक्रम में लगभग 250 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें जापान, थाईलैंड और लाओस के राजनयिक प्रतिनिधि, उद्योग संगठनों के सदस्य, संभावित निवेशक और एनआईसीडीसी के अधिकारी शामिल थे। बिहार फाउंडेशन के 55 देशों में स्थित अध्यायों के प्रतिनिधियों ने भी वर्चुअल माध्यम से भागीदारी की। यह आयोजन राज्य की औद्योगिक संभावनाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के सामने रखने का अवसर बना। लेकिन इस संवाद को वास्तविक निवेश में बदलने के लिए नीतिगत स्थिरता, कुशल श्रमशक्ति, भरोसेमंद बुनियादी ढांचे और समयबद्ध प्रशासनिक निर्णयों की जरूरत होगी।

बिहार को उद्योग चाहिए, लेकिन ऐसे उद्योग भी चाहिए जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करें और रोजगार के लिए होने वाले पलायन को कम करने में योगदान दें। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उनकी सरकार के सामने चुनौती केवल निवेश आकर्षित करने की नहीं, बल्कि उसे जमीन पर उतारने की है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी द्वारा रेखांकित केंद्र सरकार के सहयोग और राज्य सरकार की पहल को ठोस परिणामों में बदलना महत्वपूर्ण होगा।

गया की औद्योगिक नगरी बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, लेकिन इसकी सफलता का आकलन केवल निवेश और रोजगार के अनुमानों से नहीं किया जाना चाहिए। असली कसौटी यह होगी कि कितनी इकाइयां उत्पादन शुरू करती हैं, कितने स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार मिलता है, किसानों की आय में कितना सुधार होता है और छोटे उद्यमियों के लिए कितने नए अवसर पैदा होते हैं। विकसित भारत का लक्ष्य तभी व्यापक अर्थ हासिल करेगा, जब बिहार जैसे राज्यों में भी आर्थिक अवसर बढ़ेंगे। गया का औद्योगिक सपना इसी संभावना को सामने रखता है, लेकिन इसे वास्तविक उपलब्धि बनाने के लिए घोषणाओं से आगे बढ़कर पारदर्शी और जवाबदेह क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।

कुमार कृष्णन