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    सावधान! बिटॅक्वाइन – एक काल्पनिक मायावी मुद्रा ?


    आर्थिक जगत में आजकल बिटॅक्वाइन बहुत ही चर्चित है, आखिर बिटॅक्वाइन है क्या? बिटॅक्वाइन को समझने से पहले यहां यह समझ लेना जरूरी है कि किसी भी देश की मुद्रा का चलन और उसकी कुल कीमत उस देश के पास कितना स्वर्ण भण्डार है इस पर निश्चित होता है। अधिकतर देश इसी परिपाटी को अपनाते रहे हैं लेकिन आज जिस प्रकार बिटॅक्वाइन नामक मुद्रा का चलन शुरू हुआ है जिसमें न किसी संस्था की जवाबदेही है न ही यह मान्यता प्राप्त है और न ही उसमें मुद्रा नियमों के चलन का अनुशरण किया गया है इसीलिए यह मुद्रा एक मायाव।ी काल्पनिक मुद्रा बनकर रह गयी है। यह कहने से पहले या इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें निम्नलिखित कुछ बातों को ध्यान में लाना होगा।
    बिटॅक्वाइन सन् 2008 में विश्व भर में मंदी के बाद श्री नाकामोटो द्वारा इजाद की गयी परिकल्पना के आधार पर किया गया एक विचार है जिसका कि आज के समय में या इसके चलन में कोई हस्तक्षेप नहीं है। बिटॅक्वाइन मुद्रा की संख्या केवल 2 करोड़ 10 लाख तक हो सकती है, यह भी निश्चित है क्योंकि जिस कंप्यूटर प्रणाली से एक-एक बिटॅक्वाइन की उत्पत्ति हुई है यह उस सीमा की संख्या के बराबर है। एक आंकलन के अनुसार अब तक मात्रा विश्व में एक करोड़ 60 लाख बिटॅक्वाइन चलन में आ चुके हैं अभी लगभग 50 लाख बिटॅक्वाइन की उत्पत्ति होनी बाकी है।
    बिटॅक्वाइन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग इसको अपने पास रखने की चाहत रखते हैं और अपना पंजीकरण बिटॅक्वाइन एक्सचंेजों में कराया हुआ है और भारत में केवल 5 लाख लोगों के पास या तो बिटॅक्वाइन हैं या उन्होेंने इस मुद्रा को पाने के लिए पंजीकरण कराया हुआ है। बिटॅक्वाइन ठीक इसी प्रकार से अपनी कीमतों में उतार-चढ़ाव देखता है जिस प्रकार किसी कंपनी का कोई शेयर जिससे उसकी कीमत की निर्धारण मांग और आपूर्ति के हिसाब से हो जाता है।
    बिटॅक्वाइन की देखा-देखी दुनिया में रिप्पल, इथेरियम, लाइट कॉइन, डेश, निओ जैसी दूसरी मुद्रायें भी अन्य कम्प्यूटरों की टैक्नोलोजी के माध्यम से प्रचलन में हैं किंतु बिटॅक्वाइन के भागीदार और प्रशंसक अधिक होने के कारण बाकी इन सभी ई-करंसियों को पछाड़ा हुआ है।
    बिटॅक्वाइन की दुनिया भर में खनन हो रही है जिनके लिए मशीन भी बाजार में उपलब्ध है और दुनियाभर के काफी संख्या में लोग बिटॅक्वाइन बनाने में लगे हुए हैं। खासकर जो लोग कंप्यूटर्स में महारत हासिल किए हुए हैं। हिन्दुस्तान में नोटबंदी के बाद आए रियल एस्टेट की मंदी का कारण इस उद्योग के काफी लोग इस व्यवसाय से जुड़ गए हैं।
    बिटॅक्वाइन की बढ़ती हुई लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कई वर्ष पहले एक बिटॅक्वाइन की कीमत लगभग 7,000 रुपये हुआ करती थी जो आज लगभग 11 लाख रुपये प्रति बिटॅक्वाइन पर पहुंच चुकी है। भारत के एक गणमान्य व्यक्ति व उनके परिवार ने लगभग ढाई वर्ष पहले 16 हजार रुपये प्रति बिटॅक्वाइन के हिसाब से 1,000 बिटॅक्वाइन के स्टॉक लगभग 1.6 करोड़ रुपये के खरीदे थे जिनकी कीमत आज 110 करोड़ रुपये हो चुकी है और अगले वर्ष यह कभी भी 550 करोड़ तक पहुंच जायेगी, ऐसा दुनिया के जाने-माने कई अर्थ विश्लेषकों का कहना है और बिटॅक्वाइन के अंतिम चरण में पहुंचने से पहले प्रत्येक बिटॅक्वाइन की कीमत 1.8 करोड़ रुपये से 2.4 रुपये करोड़ के बीच हो सकती है। इन्हीं सब कारणें से दुनिया भर के लोग इसकी ओर आकर्षित होकर खरीद-फरोख्त करते हैं और रातों-रात करोड़पति बनने का ख्वाब देख रहे हैं किंतु यह करंसी मायावी, काल्पनिक मुद्रा है और कंप्यूटरों के द्वारा इसकी उत्पत्ति हुई है तो दुनिया भर के हैकर्स, जालसाज, सब इसमें निगाहे रखे हुए हैं। अगर सच मानें तो कुछ दिन पहले यह खबर आई थी कि बिटॅक्वाइन की संख्या अगर किसी भी व्यक्ति के पास बड़ी हो जाती है तो वह हैकर्स के टारगेट पर जल्दी आ जाती है। खासकर नार्थ कोरिया के बड़े-बड़े हैकर्स, इंजीनियर्स इसको हैक करने में लगे हुए हैं क्योंकि न तो बिटॅक्वाइन की लिखा-पढ़ी है, न ही यह मान्यता प्राप्त है। यह तो मात्रा एक सुविधा है जिसके माध्यम से अधिकतर गैरकानूनी मुद्रा सैकड़ों-करोड़ों में आदान-प्रदान की जा सकती है और की जा रही है। यही कारण है कि गैर कानूनी कार्यों में, ड्रग्स माफियाओं में, सोने के तस्करों में बड़ी-बड़ी रिश्वत इत्यादि में इसका चलन अविश्वसनीय तरीके से बेलगाम विश्व भर में चल रहा है और बढ़ रहा है।
    इसी बात का संज्ञान लेते हुए भारत सरकार के आयकर विभाग ने ऐसी ही कानूनी-गैर कानूनी लेन-देन की खोज करने के लिए 5 लाख लोगों को नोटिस जारी किये हैं जिन्होंने पिछले कई वर्षों में बिटॅक्वाइन का लेन-देन किया है और बहुत पैसा कमाया है, जिस पर टैक्स वसूला जा सके और अब तो भारत सरकार ने ऐसी मायावी, काल्पनिक मुद्रा में आदान-प्रदान करने वाले लोगों को इनकम टैक्स का नोटिस देने के पश्चात भारत में चल रहे नौ बड़े बिटॅक्वाइन एक्सचेंजों पर इनकम टैक्स विभाग ने रेड कर छानबीन शुरू कर दी है। भारत में हुई नोटबंदी के कारण देश भर के मध्यम वर्गीय लोगों ने म्युचुअल फंड्स के माध्यम से अपना पैसा लगाना शुरू कर दिया है जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है लेकिन शायद जिन लोगों ने किन्हीं भी तरीकों से अपने नोटों को तो बदलवा लिया मगर उनको ठिकाने वह शायद बिटॅक्वाइन के माध्यम से ही लगाकर अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं यह भी एक बड़ा कारण है।
    दुनिया भर के निवेश सलाहकार बिटॅक्वाइन को बब्बल करेंसी, चमड़े के सिक्के जैसा, ‘हवा में किले सामान बनाना’ जैसे मृग तृष्णामयी भ्रम मुद्रा कहते हैं और इसमें निवेश करने वालों को लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यह कभी भी फट सकता है, फूट सकता है और भारत का रिजर्व बैंक भी इस निमित्त इस शंका की समय-समय पर चेतावनियां देता रहा है। ऐसे षड़यंत्रों से भारत को और भारतवासियों को बचाकर रखना होगा क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि मेहनत से कमाई गयी पूंजी विश्व के दूसरे बाजारों में जाकर स्थांतरित होकर डूब जाये और देश के नागरिकों पर आघात हो जाये। बिटॅक्वाइन की अस्थिरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक ही दिन दिनांक 20 दिसंबर 2017 को बिटॅक्वाइन का रेट 13 लाख से गिरकर 10.5 लाख प्रति हुआ और अंत में संभलकर 12.45 लाख पर बंद हुआ। एक वर्ष में 20 गुना होने वाली मुद्रा ने 23 दिसंबर 2017 को 30 से 40 प्रतिशत मात्रा 24 घंटे में गिरकर अपना इतिहास बनाया।
    बिटॅक्वाइन की उत्पत्ति वैसे तो एक ही प्रकार की कंप्यूटर टैक्नोलोजी और बड़े लोगों के हस्तक्षेप के बाद ही हुई है परंतु ऐसा भी महसूस होता है इसकी बचाने और चलाने में समय-समय पर इन बिटॅक्वाइन का अपहरण करना या हो जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि कई बड़े सरमायेदार और कई बड़ी आतंकवादी संस्थाएं बिटॅक्वाइन एक्सचेंज के माध्यम से आदान-प्रदान कर रहे हैं, खेल रहे हैं, खिला रहे हैं या खेलने के लिए हालात बना रहे हैं क्यांेकि अभी हाल ही में ऐसी जानकारी मिली है कि उत्तर कोरिया की अपहरणकर्ताओं की टीम ने दक्षिण कोरिया की बिटॅक्वाइन एक्सचेंज को बंद होने पर मजबूर कर दिया है क्योंकि उस एक्सचेंज की 17 प्रतिशत बिटॅक्वाइन पंूजी लगभग अपहर्त हो गयी थी। यह सब नार्थ कोरिया की तरफ से अपने ऊपर अन्य देशों द्वारा लगाये गये आर्थिक प्रतिबंधों के हुए नुकसान की भरपाई और आपूर्ति करने के लिए किया गया एक कदम है।
    बिटॅक्वाइन को खरीदने, आदान-प्रदान करने में या यूं कहिए इसमें फंसने से इंसान पर मनौवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता रहता है वह लालचवश या यह कहिए कि उसका यह भाव कि मैं इस अवसर से छूट न जाऊं उसको मजबूर कर देता है और वह फिर फैलता चला जाता है। इतिहास साक्षी है कि हर 50-100 साल में बिटॅक्वाइन जैसे प्रकार के स्कैंडल होते रहते हैं जिसमें चंद पैसे वाले लोग कमाते हैं और अन्य सभी डूब जाते हैं या दिवालिया हो जाते हैं। बिटॅक्वाइन प्रकार के होने वाले स्कैंडल में प्रमुखता ज्नसपच डंदपं, म्डन् कांड, हर्षद मेहता कांड, छंेकंु प्दकमग कांड, र्क्वू वदमेए ॅंसस ैजतममज कांड इत्यादि रहे हैं।
    बिटॅक्वाइन उसी प्रकार की मुद्रा है जैसे किसी जमाने में विश्वसनीयता व विश्वास पर आधारित हंुडियां, रुक्का, प्रोनोट इत्यादि बगैर किसी मुद्रा के चलन में हुआ करते थे उसी प्रकार से यह बिटॅक्वाइन भी सिर्फ अपनी छद्म विश्वसनीयता को बनाते और बढ़ाते हुए योजनाबद्ध षड़यंत्रा के तहत चलन में चल रहे हैं जिसका अंततः गिरना और मटियामेट होना लगभग तय है। अतः लालचवश या रातोरात अमीर बनने का स्वप्न देखने वालों को ऐसे मायाजालों से बचना चाहिए और औरों को भी बचाना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार की घटनाएं योजनाबद्ध षड्यंत्रा के अलावा अन्ततः और कुछ नहीं होतीं, वैसे भी एक पुरानी प्रचलित कहावत है कि लालच बुरी बला है। यानी कि लालच बहुत ही बुरी बला समस्या है।

    अरूण कुमार जैन
    अरूण कुमार जैन
    इंजीनियर लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के ट्रस्टी हैं

    2 COMMENTS

    1. मैं लेखक के सभी विचारो से पूर्णतः सहमत हूँ। इसका हश्र ऐसा ही होना तय है ।
      ये केवल कुछ खास लोगों द्वारा चलाया गया षड्यंत्र है ।

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