“अंग्रेज सरकार की गुरुकुल कांगड़ी पर तिरछी नजर का प्रामाणिक विवरण”

मनमोहन कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द जी के प्रमुख शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द, पूर्व नाम महात्मा मुंशीराम जी, की एक जीवनी गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के ही एक वरिष्ठ स्नातक, यशस्वी पत्रकार एवं स्वतन्त्रता सेनानी पं. सत्यदेव विद्यालंकार ने लिखी है। इस पुस्तक का पहला संस्करण स्वामी श्रद्धानन्द जी के बलिदान के 7 वर्ष बाद सन् 1933 में प्रकाशित हुआ था। इसकी अनुपलब्धता और महत्ता के कारण इसका नया संस्करण आर्य साहित्य के प्रमुख प्रकाशक ‘हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डोन सिटी’ की ओर से ऋषि भक्त श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने प्रकाशित किया है। इसी पुस्तक से हम उपर्युक्त विषयक कुछ सामग्री इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। पं. सत्यदेव विद्यालंकार जी लिखते हैं ‘‘समाज के गुरुकुल की प्रगति में अनेक बाधाओं में से एक बाधा गुरुकुल के मार्ग में सरकार की सन्देहास्पद दृष्टि थी। गुरुकुल का सरकार से बिल्कुल स्वतन्त्र होना भी उसके सन्देह के लिए पर्याप्त था। आर्यसमाज पर राजद्रोही होने का जो सन्देह था, उसमें भी गुरुकुल के सम्बन्ध में इस सन्देह को विशेष पुष्टि मिली। उस सन्देह की उत्पत्ति के इतिहास में न जाकर यहां एक गुप्त सरकारी लेख की पंक्तियां इसलिए दी जाती हैं, जिससे उस सन्देह का रूप पाठकों के सामने आ जाये। उस लेख में लिखा गया था- ‘‘आर्यसमाज के संगठन में अभी जो महत्वपूर्ण विकास हुआ है, वह वास्तव में सरकार के लिए बहुत बड़े संकट का स्रोत है। वह विकास है गुरुकुलशिक्षाप्रणाली। इस प्रणाली में चाहे कितने ही दोष क्यों हों, किन्तु भक्तिभाव और बलिदान की उच्च भावना से प्रेरित जोशीले धर्मपरायण व्यक्तियों का दल तैयार करने का यह सबसे सुगम और उपयुक्त साधन है, क्योंकि यहीं आठ बरस की ही आयु में बालकों को मातापिता के प्रभाव से बिल्कुल दूर रखकर त्याग, तपस्या और भक्तिभाव के वायुमण्डल में उनके जीवन को कुछ निश्चित सिद्धान्तों के अनुसार ढाला जाता है, जिससे उनके रगरग में श्रद्धा और आत्मोत्सर्ग की भावना घर कर जाती है। यदि इस प्रकार की शिक्षा का क्रम आर्यसमाज के सुयोग्य और उत्साही नेताओं की सीधी देखरेख में बालकों की उस सत्रह वर्ष की आयु तक बराबर जारी रहा, जो कि मनुष्य के जीवन में सबसे अधिक प्रभावग्राही समय है, तो इस पद्धति से जो युवक तैयार होंगे, वे सरकार के लिए अत्यन्त भयानक होगे। उनमें वह शक्ति होगी जो इस समय के आर्यसमाजी उपदेशकों में नहीं है। उनमें पैदा हुआ व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास और अपने सिद्धान्त के लिए कष्टसहन करने की भावना, अपितु समय आने पर प्राणों तक को न्यौछावर कर देना, साधारण जनता पर बहुत गहरा प्रभाव डालेगा। इससे उनको अनायास ही ऐसे अनगिनत साक्षी मिल जायेंगे जो उनके मार्ग का अवलम्बन करेंगे और उनसे भी अधिक उत्साह से काम करेंगे। यह याद रखना चाहिये कि उनका उद्देश्य सारे भारत में एक ऐसे जातिधर्म की स्थापना करना होगा, जिससे सारे हिन्दू एक भातृभाव की श्रृंखला में बन्ध जायेंगे। वे सब दयानन्द केसत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास की इस आज्ञा का पालन करेंगे कि श्रद्धा और प्रेम से अपने तन, मनधनसर्वस्व को देश हित के लिए अर्पण कर दो।इस लेख की अगली पंक्तियों का सीधा सम्बन्ध गुरुकुल कांगड़ी के साथ है। ये पंक्तियां हैं-‘‘सरकार के लिए सबसे अधिक विचारणीय प्रश्न यह है कि इस समय आर्यसमाज के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने वाले उपदेशकों (ब्रह्मचारियों) का शिक्षा समाप्त करने के बाद सरकार के प्रति क्या रुख होगा? इस समय के उपदेशकों की अपेक्षा वे किसी और ही ढांचे में ढले हुए होंगे। जिस धर्म का वे प्रचार करेंगे, उसका आधार व्यक्तिगत विश्वास एवं श्रद्धा होगी, जिसका जनता पर सहज में बहुत प्रभाव पड़ेगा। उनके प्रचार में मक्कारी, सन्देह, समझौता और भय की गन्ध भी होगी और सर्वसाधारण के हृदय पर उसका सीधा असर पड़ेगा। गुरुकुल के सम्बन्ध में पैदा हुए सन्देह को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए इस लेख का लेखक कहॉं तक पहुंचा था, इसका पता अगली पंक्तियों से लगता है, जिनमें उस दौरे का उल्लेख किया गया है, जिसमें महात्मा जी ने गुरुकुल के लिए तीस हजार रुपया जमा किया था। लेखक लिखता है-‘‘पंजाब की पुलिस की रिपोर्टों में यह दर्ज है कि सन् 1896 में जब लाला मुंशीराम जी अमृतसर के पंडित रामभजदत्त के साथ गुजरात, सियालकोट और गुजरांवाला का दौरा करते हुए धन संग्रह कर रहे थे तब उन्होंने सरकार की निन्दा शरारत से भरे हुए शब्दों में अन्य बातों के साथ यह कहते हुए की थी कि सिपाही कितने मूर्ख हैं जो सत्रहअठारह रुपयों पर (अंग्रेज सेना में) भर्ती होकर अपना सिर कटवाते हैं। गुरुकुल में शिक्षित होने के बाद ऐसा करने वाले आदमी सरकार को नही मिलेंगे। गुरुकुल के जिन उत्सवों का पीछे (स्वामी श्रद्धानन्द जी की जीवनी की पुस्तक में) कुछ वर्णन किया गया है, उनके सम्बन्ध में इस लेख में लिखा गया है-‘‘कांगड़ी में मनाये जाने वाले गुरुकुल के वार्षिकोत्सव पर कोई साठसत्तर हजार आदमी प्रति वर्ष इकट्ठा होते हैं। कई दिनों तक यह उत्सव होता है। पुलिस, स्वास्थ्यरक्षा आदि का सब प्रबन्ध गुरुकुल के अधिकारी स्वयं करते हैं। बंगाल में मेलों पर जिस प्रकार स्वयं सेवक सब प्रबन्ध करते हैं, वैसे ही यहां ब्रह्मचारी स्वयंसेवकों का सब काम करते हैं। संगठन की दृष्टि से यह काम बिल्कुल त्रुटिरहित है। उत्सव पर इकट्ठा होने वाले लोगों का उत्साह भी आश्चर्यजनक होता है। बड़ीबड़ी रकमें दान में दी जाती हैं और अच्छी संख्या में उपस्थित होने वाली स्त्रियां आभूषण तक देती हैं। गुरुकुल के उद्देश्य की मीमांसा करते हुए उसके तपस्वी, कठोर, संयमी और निर्भीक जीवन का रोना रोते हुए फिर लिखा गया है-‘‘विचारणीय प्रश्न यह है कि गुरुकुल से निकले हुए इन संन्यासियों (ब्रह्मचारियों) का राजनीति के साथ क्या सम्बन्ध रहेगा? इस सम्बन्ध में गुरुकुल की महाशय रामदेव की लिखी हुई एक रिर्पोट की भूमिका बहुत रोचक है। उसके अन्त में लिखा है कि गुरुकुल में दी जाने वाली शिक्षा सर्वांश में राष्ट्रीय है। आर्यसमाजियों का बाइबिल सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ है, जो देशभक्ति के भावों से ओतप्रोत है। गुरुकुल में इतिहास इस प्रकार पढ़ाया जाता है, जिससे ब्रह्मचारियों में देशभक्ति की भावना उद्दीप्त हो। उनमें उपदेश और उदाहरण दोनों में देश के लिए उत्कट प्रेम पैदा किया जाता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि गुरुकुल में यत्नपूर्वक ऐसे राजनीतिक संन्यासियों (ब्रह्मचारियों) का दल तैयार किया जा रहा है, जिसका मिशन सरकार के अस्तित्व के लिए भयानक संकट पैदा कर देगा। इसी प्रकार एक गुप्तचर ने अपनी डायरी में गुरुकुल के सम्बन्ध में ये पंक्तियां लिखी थीं-‘‘गुरुकुल की दीवारों पर ऐसे चित्र लगे हुए हैं, जिनमें अंग्रेजीराज से पहले की भारत की अवस्था और अंग्रेजों के कलकत्ता आने की अवस्था दिखाई गयी है। लखनऊ के सन् 1857 के राजविद्रोह के चित्र भी लगाये गये हैं। बिजनौर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मि. ऐफ. फोर्ड ने जोन ऑफ आर्क का भी वह बड़ा चित्र गुरुकुल में लगा हुआ देखा था, जिसमें वह अंग्रेजों के विरुद्ध सेना का संचालन कर रही है।  इस प्रकार गुरुकुल की हर एक दीवार के पीछे से सरकारी लोगों को राजद्रोह की गंध आती थी। यज्ञशाला के नीचे उनकी दृष्टि में एक तहखाना बना हुआ था, जिसमें उनकी समझ के अनुसार गोला-बारुद बनाने की ब्रह्मचारियों को शिक्षा दी जाती थी। सरकारी गुप्तचरों का गुरुकुल में तांता बंधा रहता था। वे संन्यासी, साधु, बाबू आदि के वेश में छिपे हुए भेद लेने की कोशिश किया करते थे। जब ब्रह्मचारी सरस्वती-यात्रा पर गुरुकुल से बाहर जाते थे, तब भी गुप्तचरों की एक सेना उनके पीछे चक्कर काटा करती थी। साधारण गुप्तचरों की बात ही क्या है, बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी भी लुक-छिप कर गुरुकुल का भेद लेने की बराबर चेष्टा करते रहे। एक डिपुटी कलेक्टर गुरुकुल में अपने को वकील बताकर इसी नीयत से आये थे। महात्मा जी को उनके इस प्रकार आने का पहले ही पता लग गया था और उनके पीछे गुरुकुल के गुप्तचर छोड़ दिये गये थे। आधी रात को वे छद्मवेशी वकील उस घिरे हुए अहाते में जा पहुंचे जहां ब्रह्मचारियों को गतका-फरी आदि के खेल सिखाये जाते थे। महात्मा जी भी पता लगते ही उनके पीछे वहां पहुंच गये और वहां पहुंच कर आपने उनसे पूछा क्या आपने हमारे सब भेदों का पता लगा लिया? बेचारे डिपुटी कलेक्टर पानी-पानी हो गये। उन्होंने स्वीकार किया कि गुरुकुल में सन्देह की कोई बात नहीं है। बिजनौर के डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट की कहानी भी बहुत रोचक है। उन्होंने गुरुकुल आकर ब्रह्मचारियों के कुरते उतरवा कर छाती और भुजाओं के पुट्ठों की परीक्षा की। इस परीक्षा के बाद उनके चेहरे के भाव देखने ही लायक थे। उनसे यह कहे बिना न रहा गया कि मुझको बताया गया था कि आप के ब्रह्मचारी धनुर्विद्या में प्रवीण हैं और आपका मुख्य उद्देश्य उनको पहलवान बनाना है। मुझको पता लग गया है कि यह सब झूठ है। निस्सन्देह खुली वायु में रहने के कारण उनका डीलडौल बाहर के स्कूलों के लड़कों की अपेक्षा अच्छा है। मुझको यह भी बताया गया था कि वे बहुत कुशल घुड़सवार हैं और आकाश में ऊंचे उड़ते हुए पक्षी को अचूक निशाना मारकर नीचे गिरा देते हैं। इंग्लैण्ड के वर्तमान प्रधानमंत्री और समस्त संसार के राजनीतिज्ञों के अग्रणी समझे जाने वाले मि. रैम्जे मेकडॉनल्ड (यह पुस्तक सन् 1933 में लिखी गई थी) का इस सम्बन्ध का यह लेख बहुत ही सुन्दर है, जो उन्होंने सन् 1914 में गुरुकुल देखने के बाद भारत से विलायत लौट कर वहां के डेली क्रानिकल में लिखा था। लेख को उन्होंने इन पंक्तियों से ही प्रारम्भ किया था-‘‘भारत के राजद्रोह के सम्बन्ध में जिन्होंने कुछ थोड़ासा भी पढ़ा है, उन्होंने गुरुकुल का नाम अवश्य सुना होगा, जहां कि आर्यसमाजियों के बालक शिक्षा ग्रहण करते हैं। आर्यों की भावना और सिद्धान्तों का यह अत्यन्त उत्कृष्ट मूर्त्त रूप है। इस उन्नतिशील धार्मिक संस्था आर्यसमाज के सम्बन्ध में जितने भी सन्देह किये जाते हैं, वे सब इस गुरुकुल पर लाद दिये गये हैं। इसीलिए सरकार की इस पर तिरछी नजर है, पुलिस अफसरों ने इसके सम्बन्ध में गुप्त रिपोर्टें दी हैं और अधिकांश एंग्लोइंडियन लोगों ने इसकी निन्दा की है। सरकार की तिरछी नजर के कारणों की मीमांसा करते हुए उस लेख में गुरुकुल का बहुत ही सुन्दर चित्र अंकित किया गया है। उसमें लिखा गया हैसरकारी लोगों के लिए गुरुकुल एक पहेली है। अध्यापकों में एक भी अंग्रेज नहीं है। अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई ओर उच्च शिक्षा के लिये पंजाब यूनिवर्सिटी द्वारा नियुक्त पुस्तकें भी यहां काम में नहीं लाई जातीं, सरकारी विश्वविद्यालय की परीक्षा के लिए यहां से किसी भी विद्यार्थी को नहीं भेजा जाता और विद्यार्थियों को विद्यालय से अपनी ही उपाधियां दी जाती हैं। सचमुच यह सरकार की अवज्ञा है। घबराये हुए सरकारी अधिकारी के मुंह से इसके लिए पहली बात यही निकलेगी कि यह स्पष्ट राजद्रोह है। परन्तु गुरुकुल के विषय में यह अन्तिम राय नहीं हो सकती। सन् 1835 के प्रसिद्ध लेख में भारत की शिक्षा के सम्बन्ध में मैकाले के सम्मति प्रकट करने के बाद भारत की शिक्षा के क्षेत्र में यह पहिला ही प्रशस्त यत्न किया गया है। उस लेख के परिणामों से प्रायः संस्थापकों के सिवाय किसी और ने इस असन्तोष को कार्य में परिणत करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में नया परीक्षण नहीं किया है। लेख के अन्त में उन्होंने लिखा था-‘‘मैं स्वप्न में किसी को यह कहते हुए सुन रहा हूं कि हम केवल यह चाहते हैं कि शान्ति से हमको ईश्वर का भजन करने दो। क्या यही राजद्रोह है। मि. मेकडॉनल्ड का यह लेख संभवतः गुरुकुल के सम्बन्ध में लिखे गये लेखों में सर्वोत्तम है।यह भी बता दें कि श्री रैम्जे मेकडॉनल्ड ने गुरुकुल की यात्रा व यहां अपने प्रवास विषयक संस्मरणों में यह भी कहा है कि यदि कोई चित्रकार ईसामसीह का चित्र बनाने के लिये जीवित माडल देखना चाहे तो मैं उसे महात्मा मुंशीराम जी को देखने की सलाह दूंगा। इसके बाद कुछ और घटनायें घटीं जिनसे गुरुकुल के प्रति अंग्रेज सरकार के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ। पं. सत्यदेव विद्यालंकार लिखते हैं कि इसके बाद सरकारी अधिकारियों का रुख गुरुकुल के सम्बन्ध में बदलता है। उसके बदलने में दीनबन्धु ऐण्ड्रयूज का बहुत अधिक हाथ था। उस समय के संयुक्त प्रांत के लेफ्टिनेंट-गर्वनर सर जोन ह्यूवेट ने महात्मा जी को मिलने के लिये देहरादून बुला कर कहा कि गुरुकुल के सम्बन्ध में उनका सब सन्देह दूर हो गया है। उनके बाद में लेफ्टिनेंट-गर्वनर (इस समय के लॉर्ड) सर  जेम्स मेस्टन 1913, 1914 और 1919 में चार बार गुरुकुल आये। सन् 1913 में गुरुकुल की ओर से दिये गये मान-पत्र के उत्तर में आपने कहा था-‘‘ केवल इस प्रान्त में किन्तु समस्त भारत में गुरुकुल एक बिल्कुल मौलिक और कुतूहलपूर्ण परीक्षण है। मैं यहां आकर उन लोगों से भी मिलना चाहता था, जिनको सरकारी रिपोर्टों में निस्सीम, अज्ञात और भयानक आपत्ति का स्रोत बताया गया है। इसके बाद कर्मचारियों के त्याग तथा सेवा की भावना, प्रबन्ध तथा शिक्षा की व्यवस्था और ब्रह्मचारियों के स्वास्थ्य की प्रशंसा करते हुए आपने कहा था-‘‘एक आदर्श विश्वविद्यालय के लिए मेरा आदर्श गुरुकुल है।हम यह अनुभव करते हैं कि यदि स्वामी श्रद्धानन्द आर्यसमाज को न मिले होते तो आर्यसमाज में गुरुकुल कांगड़ी न खुलता और आर्यसमाज का इतिहास भी इतना उज्जवल न होता जो उनके आर्यसमाज के लिये किये गये कार्यों के कारण से है। आर्य मुसाफिर पं. लेखराम जी ने जिस उत्साह से स्वामी दयानन्द जी के जीवन चरित की सामग्री संग्रहीत कर उसके लेखन का कार्य किया और उसका सम्पादन व प्रकाशन हुआ, सम्भवतः वह भी वैसा न होता, जैसा आज हमें प्राप्त है। हम स्वामी श्रद्धानन्द जी को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं और उनकी ऋषि भक्ति और समस्त कार्यों को नमन करते हैं।

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