अतुल तारे

सहज-सरल स्वभाव व्यक्तित्व रखने वाले अतुल तारे 24 वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। आपके राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और समसामायिक विषयों पर अभी भी 1000 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से अनुप्रमाणित श्री तारे की पत्रकारिता का प्रारंभ दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से सन् 1988 में हुई। वर्तमान मे आप स्वदेश ग्वालियर समूह के समूह संपादक हैं। आपके द्वारा लिखित पुस्तक "विमर्श" प्रकाशित हो चुकी है। हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी व मराठी भाषा पर समान अधिकार, जर्नालिस्ट यूनियन ऑफ मध्यप्रदेश के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, महाराजा मानसिंह तोमर संगीत महाविद्यालय के पूर्व कार्यकारी परिषद् सदस्य रहे श्री तारे को गत वर्ष मध्यप्रदेश शासन ने प्रदेशस्तरीय पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया है। इसी तरह श्री तारे के पत्रकारिता क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उत्तरप्रदेश के राज्यपाल ने भी सम्मानित किया है।

एकता मंचन में भी ‘एकल प्रस्तुति’

अत: कांग्रेस को वह शांति से खामोशी से देख रही है। वह देख रही है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एकता सम्मेलन में भी कटाक्ष करने से बाज नहीं आए। यही नहीं मंच पर बैठे सभी को अगला मुख्यमंत्री बताकर और खुद को रेस से बाहर कर वे इस आंतरिक संघर्ष को और हवा दे गए। लिखना प्रासंगिक होगा कि मध्यप्रदेश के चुनाव के संदर्भ में दिग्विजय सिंह महत्वपूर्ण कारक फिर होने वाले हैं। जनता की निगाह में वे पहले से ही खारिज हैं। कांग्रेस भी उनसे कहीं-कहीं किनारा करती है पर यह भी एक सच है कि उनके बगैर कांग्रेस का पार लगना भी मुश्किल है।

किसान आंदोलन : घबराहट नहीं, समाधान दे सरकार

पर यह भी एक सच है तथ्य है कि शिवराज सरकार ने किसानों की बेहतरी के लिए जमीनी प्रयास किए। कांग्रेस शासन में किसानों को कर्जे पर 18 फीसदी ब्याज लिया जाता था, तो आज यह शून्य फीसदी है। दिग्विजय शासन में गांवों से बिजली गायब थी तो आज यह 15-16 घंटें तो है ही। फसल खरीदी पर 150 फीसदी बोनस है जो पहले था ही नहीं। यही कारण है कि कृषि विकास दर 4 से 7 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हुई। निश्चित रूप से शिवराज सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है।

असाधारण जनादेश के नैतिक दायित्व

प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में। उत्तर है देश को लंबे समय बाद ऐसा नेतृत्व मिला है जिसकी प्रामाणिकता, परिश्रम एवं निष्ठा पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं है। उत्तर है कि प्रधानमंत्री मोदी उस पार्टी के कार्यकर्ता हैं जिसका अधिष्ठान राष्ट सर्वोपरि है। उत्तर है, भाजपा के पीछे उन हजारों, लाखों, करोड़ों कार्यकर्ताओं एवं जन सामान्य का विश्वास है जो भाजपा के सदस्य नहीं हैं पर यह मानते हैं कि देश के लिए आज भाजपा आवश्यक है। उत्तर है, कि आज भाजपा को उनका भी समर्थन प्राप्त है जो परंपरागत रूप से भाजपा के साथ नहीं रहे हैं।

यह कैसा ‘राष्ट्रधर्म’ है?

माचार पत्र एवं दृश्य मीडिया इसमें एक कारगर हथियार है। विगत इतिहास में सरकारी पैसों से वामपंथियों ने इसकी दम पर जहर घोला है घोल रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में मूल्य आधारित पत्रकारिता राष्ट्रीय विचारों की पत्रकारिता के टिमटिमाते ही सही दीए कौन कौन से हैं यह सरकार को सरकारी चश्मा हटाकर देखना होगा, समझना होगा। ध्ांधे के लिए पत्रकारिता एवं विचार के लिए पत्रकारिता इसमें सरकार को भेद करना होगा।

यह एक क्रांति की शुरूआत है।

:संदेह महाविजय के महानायक देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। बेशक जीत का सेहरा, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सिर पर बंधना चाहिए। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि लगभग निष्प्राण हो चुके प्रदेश भाजपा संगठन में पार्टी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य एवं उनकी पूरी टीम और एक-एक कार्यकर्ता ने परिश्रम की पराकाष्ठा की। परिणाम सामने हैं।

लाल आतंक का क्रूर चेहरा

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की इस बात से सौ फीसदी सहमत हुआ जा सकता है कि उनके खिलाफ मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुए विरोध प्रदर्शन के पीछे ‘संघ संस्कृति’ है। नि:संदेह यह संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ही संस्कृति है, जो विचारों में घोर असहमति के बावजूद सामने वाले पक्ष को अपना मानती है।