चरखा फिचर्स

अव्यवस्थित आंगनबाड़ी व्यवस्था

आंगनबाड़ी में आने वाले कुछ बच्चों से बात हुई जिनके अनुसार “यहां पर बैठने की जगह अच्छी नही है। और रोज-रोज खिचड़ी या दाल चावल ही मिलता है। 26 जनवरी, 15 अगस्त के समय जलेबी, हलवा मिलता है”।

3 शिक्षक और 616 बच्चे

। सबसे पहले मेरी मुलाकात विद्धालय की प्रधान अध्यापक श्रीमती मंजू कुमारी से हुई। विद्धालय की जानकारी लेते हुए मैंने पुछा विद्धालय की हालत ऐसी क्यों दिख रही है। क्या आप लोगो को इससे परेशानी नहीं होती? थोड़े गुस्से और थोड़ी विनम्रता के साथ उन्होने जवाब दिया “वो तो होगी ही आप ही देखिये विद्धालय के चारो ओर दीवार नही है। इसका अपना रास्ता भी नही है जिससे बारिश के मौसम में हमलोगों को आने जाने में बहुत दिक्कत होती है। 616 बच्चों पर सिर्फ दो चापाकल लगा हैं जिसमें से एक खराब है। 7 कमरे हैं एक कमरे को हम ऑफिस की तरह इस्तेमाल करते हैं”।

शौच के लिए बाहर जाते शर्म आती है

“हमारे जमाने की बात कुछ और थी हम भी शौच के लिए बाहर जाते थे लेकिन तब का जमाना कुछ और था गांव में बहू बेटियों को इज्जत की नजर से देखा जाता था। जब हम शौच के लिए बाहर जाते थें तो पुरुष हमें देखते ही खुद ही किनारे हो जाते थे लेकिन अब के जमाने मे शहर तो दूर गांव मे लड़कियों के साथ शौच को जाते हुए बहुत सारे हादसे हो जाते हैं इसलिए बहु बेटियों को बाहर भेजने मे डर लगता है।

कुपोषण से मुक्त होगा झारखंड

राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में लड़की की कम उम्र में शादी और मां बनने से बच्चे कुपोषित जन्म ले रहे हैं। कम उम्र की मां ने गर्भधारण के मानकों का पालन नहीं किया और 6 माह तक बच्चे को स्तनपान भी नहीं कराया, इस कारण बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे है। इंडियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का कहना है कि 65 ग्राम दाल बच्चों को दिया जाना चाहिए लेकिन राज्य में 30 ग्राम दाल भी उन्हें नहीं मिल रहा है।

महिलाओं के लिए बकरियां एटीएम से कम नही

मालुम हो कि बदायूं में बकरी चराने की कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि ज्यादातर परिवारों के पास अपनी कृषि भूमि हैं, वह अपनी बकरियों को गेहूं, मक्का और अन्य फसलों के अपशिष्ट खिलाकर उनका पालन पोषण करते हैं। बिस्मिल्लाह समूह की सभी दस महिला सदस्य इस समय बकरियां-पालन कर रही हैं, पुरुष भी महिलाओं के साथ इस काम को बढ़ावा देकर अच्छा मूल्य प्राप्त कर रहे हैं।