मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

आगामी चुनाव जीतने के लिये समाजवादियों का सबसे बड़ा दांव

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनावों से ठीक पहले बसपा , भाजपा और कांग्रेस को परेशान करने के लिये 17 अति पिछड़ी जातियों कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निशाद, कुम्हार,प्रजापति,धीवर, बिंद,भर,राजभर,धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिंया, मांझी व मछुआ को एस सी का दर्जा देने का ऐलान किया है। अब यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन भेजा जायेगा। सपा सरकार ने यह फैसला करके एक तीर से कई निशाने लगाने का अनोखा प्रयास किया है।

#नोटबंदी के एक माह बाद देश के हालात

500 व एक हजार का #नोटबंद होने के बाद एक महीना बीत चुका है। पीएम मोदी ने देशवासियों के सहयोग से #कालेधन और #भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की ऐतिहासिक शुरूआत कर दी है। पीएम मोदी जनसभाओं व कार्यक्रमों में #नोटबंदी को अब तक का सबसे ऐतिहासक कदम बता रहे हैं और विपक्ष नोटबंदी को लेकर लगातार आक्रामक बना हुआ है।

भारतरत्न संविधान निर्माता :-  डा. अंबेेडकर 

भारतीय समाज में सामाजिक समता, सामाजिक न्याय, सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुददों को उठाने वाले भारतीय संविधान के निर्माता व सामाजिक समरसता के प्रेरक भारतरत्न डा.भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू मध्यप्रदेश में हुआ था। इनके पिता रामजी सकपाल व माता भीमाबाई धर्मप्रेमी दम्पति थे।

राम मंदिर निर्माण : आखिर कब तक देश का जनमानस करे इंतजार

भारत के इतिहास में 6 दिसम्बर की तारीख का बड़ा ही ऐतिहासिक महत्व है। इस दिन भारत के संविधान निर्माता डा. अम्बेडकर का निधन हुआ था और इसी दिन 6 दिसम्बर 1992 को विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर के निर्माण के उददेश्य हेतु अयोध्या में कारसेवा का आयोजन किया गया था।

नोटबंदी पर विपक्ष हो गया फ्लाप ?

देश के राजनैतिक परिदृश्य व सामाजिक परिवेश में एक बहुत बड़ा बदलाव महसूस किया जा रहा है। घोर वामपंथी राज्यों में भी बंद फ्लाप हो गया । एक समय था जब वामदलों की एक आवाज से ही पूरा दक्षिण भारत व बंगाल पूरी तरह से बंद हो जाता था। तब मीडिया बिलकुल अगल तरह से भारत बंद आदि को पेश करता था। लेकिन इस बार तो सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि स्वयं वामपंथी दलों के कार्यालयों के बाहर लगने वाली दुकानें व व्यापारिक प्रतिष्ठान भी पूरी तरह से खुले रहे।

कौन सुनेगा बांग्लादेशी हिंदुओं की आवाज ?

भारत की राजनीति अल्पंख्यकवाद पर टिकी हुई है। लोकसभा व विधानसभा चुनाव आते ही सभी दल अल्पसंख्यकों के हितों को पूरे जोर शोर से उठाने लग जाते हैं। अल्पंसख्यकों के मुददे उठाते समय इन सभी दलों को देशहित व समाजहित की कतई चिंता नहीं रहती है। लेकिन जब हमारे ही पड़ोसी देश बांग्लादेश वा पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू अल्पंसख्यकों पर अत्याचार होते हैं तब कोई अल्पसंख्यकवादी नेता, बुद्धिजीवी व मानवाधिकारी उनके हितों की रक्षा करने के लिए आगे नहीं आता।