लेख नसीब हों ‘एकदेश, एकजैसी’ हेल्थ सुविधाएं? April 7, 2025 / April 7, 2025 | Leave a Comment विश्व स्वास्थ्य दिवस (7अप्रैल) : डॉ. रमेश ठाकुर दुनिया सालाना 7 अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ इसलिए मनाती है ताकि लोग स्वास्थ्य के प्रति सतर्क और गंभीर हो सकें। बदलते लाइफस्टाइल में लोगों का शरीर नाना प्रकार के खतरनाक वायरसों और अजन्मी बीमारियां से घिर चुका है। इसके अलावा पारिवारिक जिम्मेदारियां का बोझ, भविष्य की चिंताएं और बच्चों के कैरियर को संभालने की आपाधापी में इंसानों ने अपने स्वास्थ्य की देखरेख को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इसे लापरवाही का नतीजा कहें या कुछ और? नौजवानों का हंसते, खेलते नाचते-गाते के दौरान स्टेजों पर दम तोड़ने वाली तस्वीरे सोशल मीडिया पर लगातार देख ही रहे हैं। असमय मौतों का डब्ल्यूएचओ का मौजूदा आंकड़ा रोंगटे खड़े करता है। 25-55 के उम्र के बीच असमय मरने वालों की संख्या पूरी कर चुके बुजुर्गों से कहीं ज्यादा आंकी गई है। इसपर विभिन्न वैश्विक चिकित्सीय रिपोर्ट ‘एक ही बात, एक सुर’ में कहती हैं कि लोग अपने शरीर की देखरेख को लेकर भंयकर लापरवाह हुए हैं। अपने पर ध्यान देना होगा, वरना इन आंकड़ों में यूं ही बढोतरी होती रहेगी। इन गंभीर स्थितियों को देखकर ही ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ जनमानस को स्वास्थ्य को लेकर सतर्क करता है। इतना तय है, अगर इंसान अपनी हेल्थ को बेहतर करने के लिए अच्छी दैनिक आदतें डाल लें, तो अजन्मी बीमारी से काफी हद तक खुद को बचा सकता है। क्योंकि इस तरह की जागरूकता के लिए तमाम देशी और विदेशी स्वास्थ्य संस्था हमारे आसपास सक्रिय हैं। यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ के अलावा ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ संसार के देशों के लिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग एवं मानक विकसित करने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। स्वास्थ्य संगठन में 193 देश मेंबर और दो संबद्ध सदस्य हैं। ये संयुक्त राष्ट्र संघ की एक अनुषांगिक स्वास्थ्य इकाई है जिसकी स्थापना 7 अप्रैल 1948 में हुई थी। इसके अलावा भारत मेडिकल टूरिज्म के लिहाज से समूची दुनिया में हमेशा से विख्यात ही रहा है? फिर बात चाहें, उच्च गुणवत्ता युक्त देशी-दवाओं की हो, ऋषि-मुनियों की फार्मेसी, प्राचीन चिकित्सा प्रद्वति, सस्ती वैक्सीन व जड़ी-बूटियों का हिमालीय भंडार? सब कुछ हमारे यहां मौजूद है। संसार वाकिफ है, भारत से तमाम गरीब देशों की चिकित्सा जरूरतें पूरी होती रही हैं। हालांकि दुख की बात ये है कि विगत कुछ दशकों से प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति और दवाओं का प्रचार-प्रसार कुछ धीमा पड़ा है, जिसका खामियाजा भुगत भी रहे हैं। आधुनिक दौर में चिकित्सा के तौर-तरीके, रंग-रूप और मायने कैसे और किस तरह से बदले हैं। सभी जानते हैं, बताने की जरूरत नहीं? इन बदलावों के सभी भुक्तभोगी हैं। कोई ऐसा नहीं जिसका चिकित्सा चुनौतियों से कभी ना कभी सामना न पड़ा हो? महंगी दवाईयों और चिकित्सा सुविधाओं से कितनों को अपनी जाने गवानी पड़ती है, ये भी सब जानते हैं। दवाइयों की कीमत आसमान छूती हैं जो एक गरीब इंसान के लिए किसी सपने से कम नहीं? दरअसल इसी असमानता को मिटाने की अब जरूरत है। फ्री चिकित्सा-सुविधाओं की कागजी बातें खूब होती हैं। पर, सच्चाई हकीकत से कोसों दूर रहती हैं। फ्री-इलाज के नाम पर तो हेल्थ कार्ड धारक अस्पतालों से रपटा तक दिए जाते हैं। गौरतलब है, स्वास्थ्य मामलों की समीक्षा और संपूर्ण चिकित्सा तंत्र को ऑडिट करने की अब सख्त जरूरत है। गगनचुंबी इमारत वाले फाइव स्टार होटल नुमा अस्पताल हेल्थ के नाम पर व्यवसायी बने हुए है। लेकिन इंसानियत कहती है कि इस पेशे को धंधा न समझा जाए। क्योंकि जनमानस आज भी डॉक्टर को भगवान का दर्जा देते हैं। ये दर्जा सदियों से बना है और आगे भी यथावत रहे। इसी में सभी की भलाई है। स्वास्थ्य सेवाओं में बदलाव और सुधार की दरकार बहुत पहले से महसूस हो रही है। केंद्र व राज्य हुकूमतों को प्रत्येक स्तर पर स्वास्थ्य को प्राथमिकताओं में शुमार करना चाहिए और सबसे जरूरी बात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में रिक्त पदों को भरना चाहिए। नए अस्पताल खोलने की जरूरत तो है ही। जहां प्रिवेंटिव व प्रोमोटिवे हेल्थ सुविधाएं आसानी से जरूरतमंद मरीजों को मिले। बिडंवना देखिए, छोटे से छोटे ऑपरेशन भी ग्रामीण अस्पतालों में नहीं किए जाते, जिसके लिए मरीजों को दूर शहरों में भागना पड़ता है। हेल्थ सिस्टम में भारतीय चिकित्सकों, शोधकर्ताओं व इससे जुड़ी वैज्ञानिक नामचीन हस्तियों ने अभूतपुर्व उपलब्धियां प्राप्त की हैं। आजादी के बाद तो जैसे क्रांति ही आई। दो दशक पहले तक इस क्रांति ने सीमित हारी-बीमारियों पर चौतरफा नियंत्रण रखा। पोलियो से लेकर, खसरा, रैबीज, दिमागी बुखार तक हर तरह के मौसमी वायरसों पर काबू रखा। लेकिन मौजूदा समय में जितनी चुनौतियां स्वास्थ्य तंत्र के समझ मुंह खोले खड़ी हैं, उतनी पहले कभी नहीं रहीं। नित पनपती नई-नई किस्म की बीमारियां और जानलेवा वायरस ने ना सिर्फ हिंदुस्तान में, बल्कि समूचे संसार को हिलाया हुआ है। कोरोना महामारी का डरावना सच हमेशा हमेशा परेशान करता रहेगा। ये ऐसा दौर था, जहां स्वास्थ्य सिस्टम ने भी घुटने टेक दिए थे। स्वास्थ्य विस्तार को शहरी क्षेत्रों की तरह ग्रामीण अंचलों में भी फैलाना होगा। वहां, चिकित्सा, दवाओं, अस्पतालों, नर्स, स्टाफ आदि का आज भी अभाव है। आदिवासी व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के दूरदराज गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। वहां मोबाइल की रोशनी में इलाज करते हैं डॉक्टर। स्वास्थ्य पर केंद्र के आंकड़ों पर गौर करें तो हिंदुस्तान में करीब ढाई लाख सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जिनमें 750 जिला अस्पताल और 550 मेहिडकल कॉलेजों का नेटवर्क है। बावजूद इसके भारी कमी महसूस होती है। आजादी का अमृतकाल चल रहा है, जिसमें इस नेटवर्क को और मजबूत करने की दरकार हैं। रूटीन व रेफरल कंसल्टेशन के लिए डिजिटल टेक्नोलाजी व टेली कंसल्टेशन के प्रयोगशालाओं को बढ़ाना होगा। आयुर्वेद को सबसे श्रेष्ठ चिकित्सा प्रणाली की संज्ञा दी है जिसकी जड़ें भी हमारे प्राचीनतम उपमहाद्वीप में ही हैं। हिंदुस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, पाकिस्तान व श्रीलंका में आयुर्वेद का अत्यधिक प्रचलन आज भी है, जहां आज भी तकरीबन एक तिहाई जनसंख्या इसका उपयोग करती है। इसी के देखा देख अन्य मुल्क भी आयुर्वेद को अपनाते हैं। आयुर्वेद न सिर्फ भारत में, बल्कि संसार की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में अग्रणी है। आज ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ जैसे दिन पर ऐसे ही संकल्पों को लेने की आवश्यकता है । डॉ. रमेश ठाकुर Read more » one same' health facilities? Should we get 'one country विश्व स्वास्थ्य दिवस
लेख समाज स्वास्थ्य-योग ‘ऑटिज्म’ से बच्चों को बचाने की गंभीर चुनौती? April 2, 2025 / April 2, 2025 | Leave a Comment डा0 रमेश ठाकुर ‘ऑटिज्म बीमारी’ को हल्के में लेने की भूल कतई न की जाए, ये नवजात बच्चों के संग जन्म से ही उत्पन्न होती है। ऑटिज्म से बचा कैसे जाए, जिसके संबंध में प्रत्येक वर्ष 2 अप्रैल को पूरे संसार में ‘विश्व ऑटिज्म दिवस’ जागरूकता के मकसद से मनाया जाता है। मौजूदा वक्त में […] Read more » A serious challenge to save children from 'autism'?
खान-पान खेत-खलिहान ‘मखाना खेती’ को केंद्र की सौगात April 1, 2025 / April 1, 2025 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर ‘मखाना उत्पादक’ देशों में हिंदुस्तान का स्थान विश्व में अव्वल पायदान पर पहले से है ही, केंद्र की नई पहल ने अब और पंख लगा दिए हैं। दशकों से वैश्विक पटल पर भारतीय मखानो का समूचे संसार में निर्यात होता आया है। डिमांग में अब और बढ़ोतरी हुई है। ताल, तालाबों व जलाशयों में की जाने वाली मखाने की खेती बिहार में सर्वाधित होती है। ये खेती पूरे बिहार में नहीं, बल्कि मात्र 10 जिलों तक ही सीमित हैं जिनमें दरभंगा, सहरसा, मधुबनी, सुपौल, कटिहार, अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा, किशनगंज, और खगड़िया जिले प्रमुख हैं। एक वक्त था जब मात्र दो जिले अररिया और मधुबनी में ही मखाना उगाया जाता था। पर, बढ़ती आमदनी को देखते हुए अब 10 जिलों में मखाने की खेती होने लगी है। मखाने की खेती में बूस्टर डोज के लिए अब केंद्र सरकार ने भी अपने दरवाजे खोले हैं। ‘मखाना बोर्ड’ स्थापित करने का निर्णय हुआ है। बीते महीने आम बजट-2025-26 में केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने बकायदा संसद में ‘मखाना बोर्ड’ स्थापित करने की घोषणा की। मखाने की खेती में वृद्धि हो, बीज-खाद में सरकारी सब्सिडी मिले और फसल में भरपूर आमदनी हो, जैसी तमाम मांगों को लेकर किसान लंबे समय से सरकार से डिमांड कर रहे थे, जिसे अब पूरा किया गया। पहले क्या था? जब मखाने की फसल पककर तैयार होती थी, तो बिचौलिए और ठेकेदार औने-पौने दामों में मखाना खरीदकर विदेशी बाजारों में उच्च भाव में बेचते थे। ऐसी हरकतों पर निगरानी की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं थी? किसानों की मेहनत को बिचौलिए खुलेआम लूटते थे। इन सभी से छुटकारा पाने के लिए केंद्र व राज्य सरकार से किसान ‘मखाना बोर्ड’ बनाने की मांग लंबे समय से कर रहे थे, जिसे केंद्रीय स्तर पर अब जाकर स्वीकार किया गया है। बिहार के अलावा मखाने की खेती हल्की-फुल्की उत्तर प्रदेश, झारखंड व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी की जाती है। पर, वहां किसान ज्यादा रूचि नहीं लेते। विदेशों में भारतीय मखाने की ब़ढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने अपने मौजूदा बजट में मखाना बोर्ड बनाने का निर्णय लिया। भारत में अमूमन एक किलो मखाने की कीमत 25 सौ से लेकर 4 हजार रुपए तक है। जबकि, विदेशों में पहुंचते-पहुंचते मखाना की कीमत दोगुनी हो जाती है। किसानों के अलावा केंद्र सरकार को भी परस्तर फायदा होने लगा है। मखाने का तकरीबन उत्पादन भारत में होती है, यूं कहें इस खेती पर एकछत्र राज्य है। यूरोप के कुछ निचले भागों में मखाना उगाया जाने लगा है। लेकिन वो स्वादिष्ट नहीं होता, स्वाद वाला मखाना सिर्फ भारत का होता है। बिहार में अब करीब 4000 गांवों, जिनमें 870 ग्राम पंचायतों और 70 प्रखंड़ों में मखाने की खेती होने लगी है। मखाने की खेती से करीब 10 हजार से ज्यादा किसान अब जुड़ चुके हैं। मखाने के लिए ‘उत्तम तालाब प्रणाली’ की आवश्यकता होती है, जो सिर्फ बिहार के तराई इलाकों में ही मिलती है। केंद्र सरकार मखाने की खेती पर इसलिए भी ज्यादा फोकस करके चल रही है क्योंकि इससे देश को सालाना 25 से 30 करोड़ की विदेशी मुद्रा जो प्राप्त होने लगी है। विदेशों से मांग में बेहताशा बढ़ोतरी हुई है। चिकित्सा रिपोर्ट के मुताबिक मखाना सेहत के लिए बेहद लाभदायक बताया गया है जिसमें प्रोटीन की 9.7 फीसदी, कार्बोहाइड्रेट 76 फीसदी, नमी 12.8 प्रतिशत, वसा 0.1 फीसदी, खनिज लवण 0.5 फीसदी, फॉस्फोरस 0.9 और लौह के मात्रा 1.4 मिली ग्राम तक होती है। मखाने के इस्तेमाल से हार्ट-अटैक जैसे गंभीर बीमारी से भी बच जा सकता है। मखाने की उन्नती के लिए केंद्र सरकार द्वारा ‘बोर्ड’ बनाने का निर्णय निश्चित रूप से बूस्टर डोज जैसा है इससे मखाना किसानों की आमदनी में न सिर्फ इजाफा होगा, बल्कि उनके उधोग से जुड़े हिताकारों और उपभोक्ता कानून के संरक्षण में उत्साहवर्धक सुखद परिणाम भी देखने को मिलेंगे। मौजूदा आंकड़ों पर नजर डाले तो भारत मखाना की वैश्विक मांग का तकरीबन 90 से 95 फीसदी भरपाई करता है। बजकि, मखाने का उत्पादन सिंगापुर, यूएसए,कनाडा,जर्मनी, मलेशिया और एशियाई देशों में भी होता है। लेकिन डिमांड भारतीय मखानो की सर्वाधिक होती है। अकेला अमेरिका ही भारत से करीब 25 फीसदी मखानस खरीदता है। ग्लोबल स्तरीय स्वास्थ्य की एक सर्वे रिपोर्ट की माने तो अमेरिकी नागरिक सब्जियों में भी मखाने का इस्तेमाल करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मखाना सर्वाधिक अमेरिकी लोग खाते हैं। उन्हें सिर्फ भारतीय मखाने चाहिए होते हैं। यही कारण है कि भारत में पिछले एक दशक में मखाने का उत्पादन 180 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। खेती में लगातार किसान विस्तार कर रहे हैं। निश्चित रूप से ‘मखाना बोर्ड’ बनने के बाद और इस फसल में और पंख लगेंगे। नई पहल के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की टीमें भी लगातार मखाना खेती का दौरा कर रही हैं। मखाना को वह वैज्ञानिक ढंग से कराने लगे हैं। किसानों के लिए मखाने का उत्पादन अब अन्य फसलों के मुकाबले फायदे का सौदा बन गया है। एक एकड़ मखाने की खेती में किसान कम से कम 3 से 4 लाख रूपए प्रत्येक फसल में कमा लेते हैं। मखाने की नर्सरी नवंबर माह में लगती है। बिहार में मखाने की खेती को ‘पानी की फसल’ भी कहते हैं। क्योंकि ये शुरू से अंत तक जलमग्न रहती है। मखाने की करीब 4 महीने बाद, फ़रवरी-मार्च में रोपाई होती है। रोपाई के बाद पौधों में फूल लगने लगते हैं। अक्टूबर-नवंबर में फसल पक जाती है और उसकी कटाई शुरू होती है। मखाने की खेती में तीन से चार फ़ीट पानी हमेशा भरा रहता है। मखाने के फल कांटेदार होते हैं। उन्हें कीटनाशकों से बचाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। अच्छी बात ये है कुदरती आपदाएं जैसे औले पड़ना, बेमौसम बारिश का होना, मखाने की फसल का कुछ नहीं बिगाड़ पाती। कुलमिलाकर मखाना बोर्ड बनने के बाद भारतीय किसानों का ध्यान इस मुनाफे की खेती की ओर तेजी से आर्कर्षित जरूर हुआ है। डॉ. रमेश ठाकुर Read more » Centre's gift to 'Makhana farming' Makhana farming मखाना खेती
लेख इंसानों की दुनिया में सुनीता ने रखा कदम? March 24, 2025 / March 24, 2025 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर इंसानों की दुनिया में तुम्हारा फिर से स्वागत है सुनीता। तुम्हारी इस शानदार उपलब्धि ने नारी शक्ति की गाथा को नए सिरे से लिख दिया है। धरा पर सकुशल लौटी सुनीता के लिए बस यही कहा जाएगा,…. ‘नारी तू नारायणी’। बीते 9 महीनों से अंतरिक्ष में फंसी सुनीता विलियम्स की आकाश से […] Read more » बुच विल्मोर सुनीता विलियम्स सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर
राजनीति ‘आप’ का दिल्ली में अपराजेय होने का टूटा भ्रम February 10, 2025 / February 10, 2025 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में जनता जर्नादन ही सर्वोपरि होती है पर ये बात एकाध बंपर जीत करने के बाद सियासी दल भूल जाते हैं। आम आदमी पार्टी का जब से जन्म हुआ, उसके बाद दिल्ली में तकरीबन चुनावों में अप्रत्याशित जीत दर्ज कर अपने भीतर ये भ्रम पाल लिया कि उन्हें […] Read more » ‘आप’ का दिल्ली में अपराजेय होने का टूटा भ्रम
राजनीति दिल्ली चुनाव में महिला वोटरों की उदासीनता January 29, 2025 / January 29, 2025 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनावी घोषणापत्र में एक बार फिर फ्रीबीज की झड़ी लगाई है। कितने सफल होंगे, ये तो आने वाला समय ही तय करेगा पर अब इतना जरूर है, लोग फ्री की सौगातों से ऊबने लगे है। श्रमबल को तरजीह देने वाली आधी आबादी, भी अब मुफ्त की चुनावी रेबड़ियों […] Read more » Indifference of women voters in Delhi elections दिल्ली चुनाव में महिला वोटरों की उदासीनता
लेख स्वास्थ्य-योग नए वायरस पर सतर्कता और जागरूकता जरूरी? January 9, 2025 / January 9, 2025 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर चाइना की धरती से निकलकर दुनिया में कोहराम मचाने वाले जानलेवा वायरस बेकसूर इंसानों का पीछा करना कभी छोड़ेंगे या नहीं? क्योंकि प्रत्येक खतरनाक वायरसों का केंद्र चीन ही होता है? कोविड-19 के बाद एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसे न डब्ल्यूएचओ सुलझा पाया और न ही दुनिया की तमाम चिकित्सा रिसर्च […] Read more » वायरस पर सतर्कता और जागरूकता
लेख विविधा डरावनी हवाई यात्राएं कैसे बनें सुगम January 6, 2025 / January 6, 2025 | Leave a Comment डॉ0 रमेश ठाकुर एविएशन इंडस्ट्री के लिए वर्ष-2024 का गुजरा अंतिम महीना दिसंबर किसी बड़े सदमें से कम नहीं रहा। ऐसा जख्म देकर विदा हुआ, जो शायद कभी भर न पाए। दिसंबर की पहली तारीख से लेकर 29 तारीख के दरम्यान दुनिया के विभिन्न हिस्सों में 6 बड़े विमान हादसे हुए जिनमें 234 यात्रियों की […] Read more » How to make scary air travel easier डरावनी हवाई यात्राएं कैसे बनें सुगम
राजनीति विश्ववार्ता ऑस्ट्रेलिया में ‘पंजाबी भाषा’ को सरकारी मान्यता December 13, 2024 / December 13, 2024 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर पंजाबी भाषा को ऑस्ट्रेलियाई हुकूमत ने सरकारी मान्यता प्रदान कर दी है। अपने स्कूली पाठ्यक्रमों में भी जोड़ लिया है। जोड़ना इसलिए पड़ा क्योंकि पंजाबी भाषा वहां तेज़ी से बढ़ रही है। ऑस्ट्रेलिया की 13वीं आम भाषा पंजाबी जुबान बन गई है। पंजाबी बोलने-लिखने वालों की तादाद वहां दिनों-दिन बढ़ रही है। […] Read more » Government recognition of 'Punjabi language' in Australia ऑस्ट्रेलिया में 'पंजाबी भाषा'
राजनीति दिल्ली सल्तनत पर किसानों का मार्च एक बार फिर December 3, 2024 / December 3, 2024 | Leave a Comment डॉ0 रमेश ठाकुर अन्नदाताओं की समस्याओं का समाधान आखिर कब होगा? क्या उनकी मांगे भविष्य में कभी पूरी हो भी पाएंगी या नहीं? केंद्र में सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, हर दौर में यही सब कुछ देखने को मिलता है। कमोबेश सरकारों का रवैया सदैव एक जैसा ही रहता है। इसलिए एकाएक […] Read more » Farmers march on Delhi Sultanate दिल्ली सल्तनत पर किसानों का मार्च
टेक्नोलॉजी लेख डिजिटल ठगी से कंप्यूटर की सुरक्षा बनी चुनौती November 30, 2024 / December 2, 2024 | Leave a Comment राष्ट्रीय कंप्यूटर सुरक्षा दिवस (30 नवंबर) ‘राष्ट्रीय कंप्यूटर सुरक्षा दिवस’ सालाना 30 नवंबर को पूरे भारत में मनाया जाता है जिसकी शुरुआत साल-1988 से हुई थी। आज इस दिवस का ये 36 वां संस्करण है। आज विभिन्न कार्यक्रमों में साइबर एक्सपर्ट बताएंगे कि कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता कैसे अपने कंप्यूटर, डाटा, डिवाइस आदि की रक्षा करें। देश का प्रत्येक […] Read more » राष्ट्रीय कंप्यूटर सुरक्षा दिवस
राजनीति महाराष्ट्र में भाजपा के अव्वल होने के निहितार्थ November 29, 2024 / November 29, 2024 | Leave a Comment डॉ रमेश ठाकुर संगठन सर्वोपरि होता है। संगठन की एकता किसी भी सियासी दल को शून्य से शिखर तक पहुंचा सकती है। महाराष्ट्र में भाजपा का स्थानीय दलों को पछाड़कर अव्वल पायदान पर काबिज होने के पीछे उसका मजबूत संगठन ही है। दशक पूर्व तक पार्टी अपना पैर जमा रही थी, अन्य दलों के सहारे […] Read more » Implications of BJP being on top in Maharashtra महाराष्ट्र में भाजपा