5 जून : विश्व पर्यावरण दिवस विशेष
उमेश कुमार साहू
हर साल 5 जून को दुनिया भर में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ का उत्सव मनाया जाता है। बड़े-बड़े मंचों से लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं, अख़बारों के पन्ने विज्ञापनों और हरी-भरी तस्वीरों से पट जाते हैं, और सोशल मीडिया पर ‘सेव द प्लैनेट’ के हैशटैग की बाढ़ आ जाती है। लेकिन जैसे ही 6 जून की सुबह होती है, यह सारा पर्यावरण प्रेम कागजों और स्क्रीन पर ही दम तोड़ देता है। हकीकत आज हम सबके सामने है – जागरूकता सिर्फ एक रस्म बनकर रह गई है, जिसे निभाकर हम अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। हकीकत में, चिल्लाने वाले लाखों हैं, पर धरातल पर इस धरती को बचाने वाला लाखों में शायद कोई एक ही है।
हम विकास की एक ऐसी अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं, जहाँ हर कदम पर ‘विकास’ की आड़ में महाविनाश की इबारत लिखी जा रही है। हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं और इसे प्रगति का नाम दे रहे हैं।
- विकास का भ्रम और प्रकृति का क्रूर दोहन
कंक्रीट की कैद में दम तोड़ती धरती
औद्योगीकरण और शहरीकरण के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की जा रही है। शहर सुंदर दिखें, इसके लिए सड़कों के किनारे और कॉलोनियों में ‘पेवर ब्लॉक’ (Paver Blocks) बिछाने का एक नया फैशन चल पड़ा है। नतीजा? धरती का सीना पूरी तरह लॉक हो चुका है। बारिश की एक-एक बूंद जो कभी मिट्टी में समाकर भूजल स्तर (Groundwater) को बढ़ाती थी, अब बहकर नालियों और गटर में बर्बाद हो जाती है। धरती के भीतर पानी जा नहीं पा रहा है, जिससे जलस्तर रसातल में पहुँच गया है और ऊपरी सतह इतनी गर्म हो चुकी है कि शहरों में ‘हीट आइलैंड’ (Heat Island) बन रहे हैं।
पर्यटन या पहाड़ों का मरण?
सर्दियों और गर्मियों की छुट्टियों में हमारे पहाड़ों की जो दुर्दशा होती है, वह किसी तमाशे से कम नहीं है। सैलानियों का ऐसा हुजूम उमड़ता है जैसे पहाड़ कोई मनोरंजन पार्क हों। जिन वादियों में कभी शांति और ताजी हवा हुआ करती थी, वहाँ आज गाड़ियों का मील लंबा जाम, हॉर्न का शोर और प्लास्टिक के कचरे का पहाड़ दिखाई देता है। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के साथ यह खिलवाड़ सिर्फ एक मजाक बनकर रह गया है, जिसका खामियाजा प्रकृति भुगत रही है।
प्लास्टिक का जहर और सिसकती नदियाँ
हमारी सुबह की चाय की थैली से लेकर रात के सामान तक, बात-बात पर प्लास्टिक का उपयोग हमारी आदत बन चुका है। चारों तरफ गंदगी और सड़ते हुए कूड़े के ढेर हैं। हमारी जीवनदायिनी नदियाँ आज नालों में तब्दील हो चुकी हैं, जिनमें फैक्ट्रियों का जहरीला रसायन और शहरों का मल-मूत्र खुलेआम बहाया जा रहा है। यही नदियाँ जब समुद्र में मिलती हैं, तो समंदर का पेट भी प्लास्टिक से भर जाता है। आज समुद्री जीवों के पेट से किलो के भाव में प्लास्टिक निकल रहा है।
बेजुबानों की मूक चीख और प्रकृति का प्रतिशोध
इंसान की स्वार्थी फितरत देखिए – वह प्रदूषण फैलाता है, प्रकृति को बीमार करता है, लेकिन जब खुद पर आंच आती है, तो अपने इलाज और साफ पानी (RO) की व्यवस्था पैसों के दम पर कर लेता है। लेकिन जरा सोचिए, उन बेजुबान जानवरों का क्या?
· जंगल कट गए, तो जंगली जानवर शहरों की तरफ भाग रहे हैं और इंसानों के हाथों मारे जा रहे हैं।
· सड़कों और कचरे के ढेरों पर मुंह मारती गायें और अन्य मवेशी रोज किलो के हिसाब से प्लास्टिक खाकर तड़प-तड़प कर मर रहे हैं।
· नदियों और तालाबों का पानी जहरीला होने से लाखों जलीय जीव बिना किसी कसूर के रोज दम तोड़ रहे हैं।
इन बेजुबानों के पास न तो कोई अस्पताल है और न ही कोई शिकायत दर्ज कराने का मंच। वे सिर्फ हमारी क्रूरता का मूक शिकार बन रहे हैं।
लेकिन याद रखिए, प्रकृति किसी का कर्ज उधार नहीं रखती। जब उसका सब्र टूटता है, तो वह ऐसा प्रतिशोध लेती है जिसका कोई इलाज इंसान के विज्ञान के पास नहीं होता।
आज मौसम का जो असंतुलन हम देख रहे हैं, वह इसी का नतीजा है। दिसम्बर के महीने में जुलाई जैसी बारिश होना, या फिर मई में 50 डिग्री सेल्सियस के करीब तापमान का पहुँच जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। विनाशकारी बाढ़, खौफनाक सूखा, असमय आते भूकंप, पहाड़ों का दरकना और बादलों का फटना (Cloudburst)—ये सब प्रकृति की चेतावनियाँ हैं। प्रकृति चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि अब भी सुधर जाओ, वरना तुम्हारा अस्तित्व ही मिटा दिया जाएगा।
वर्तमान उपाय: कागज़ से आगे, हकीकत की ओर
अब समय केवल रोने या चिंता जताने का नहीं है। अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक जिंदा धरती सौंपनी है, तो हमें तात्कालिक और दीर्घकालिक स्तर पर सख्त कदम उठाने ही होंगे। वर्तमान में दुनिया भर में कई वैज्ञानिक और व्यावहारिक उपाय अपनाए जा रहे हैं, जिन्हें हमें अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा:
1. स्पंज सिटी (Sponge City) की अवधारणा
पेवर ब्लॉक और डामर की सड़कों के विकल्प के रूप में ‘स्पंज सिटी’ का मॉडल तेजी से उभर रहा है। इसमें शहरों में ऐसी पारगम्य कंक्रीट (Pervious Concrete) और हरित पट्टियों (Green Belts) का निर्माण किया जाता है, जो बारिश के पानी को सीधे जमीन के अंदर सोख लेती हैं। इससे बाढ़ का खतरा भी कम होता है और भूजल स्तर भी बढ़ता है।
2. सर्कुलर इकोनॉमी और जीरो वेस्ट लाइफस्टाइल
प्लास्टिक और कचरे के संकट से निपटने का एकमात्र तरीका ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (Circular Economy) है, जहाँ हर बेकार वस्तु को रीसायकल (Recycle) करके दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है। एकल-उपयोग प्लास्टिक (Single-use Plastic) पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाकर हमें ‘बायो-प्लास्टिक’ (जो पौधों से बनता है और आसानी से सड़ जाता है) को अपनाना होगा।
3. मियावाकी पद्धति (Miyawaki Method) से शहरी वनीकरण
कम जगह में तेजी से जंगल उगाने की जापानी तकनीक ‘मियावाकी’ आज वरदान साबित हो रही है। इसके तहत शहरों के खाली पड़े छोटे-छोटे भूखंडों में स्थानीय प्रजातियों के पौधे बहुत पास-पास लगाए जाते हैं, जो साधारण जंगलों की तुलना में 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और 30 गुना अधिक घने होते हैं। इससे शहरी प्रदूषण और तापमान में भारी कमी आती है।
4. हरित ऊर्जा (Green Energy) की ओर पूर्ण रूपांतरण
कोयले और तेल पर अपनी निर्भरता को खत्म करते हुए सौर ऊर्जा (Solar Energy), पवन ऊर्जा और हाइड्रोजन ईंधन को युद्ध स्तर पर अपनाना होगा। घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य जरूरत होना चाहिए।
5. जिम्मेदार और नियंत्रित पर्यटन (Eco-Tourism)
पहाड़ों और संवेदनशील पर्यावरण वाले क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या की एक सीमा (Carrying Capacity) तय होनी चाहिए। वाहनों के प्रवेश पर कड़े नियम और कचरा फैलाने पर भारी जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। पर्यटन ऐसा हो जो प्रकृति को समृद्ध करे, न कि उसे तबाह।
सोचने का वक्त खत्म, अब करने की बारी है
हम अक्सर सोचते हैं कि “अकेले मेरे बदलने से क्या होगा?” बस यही सोच सबसे आत्मघाती है। जब तक हर व्यक्ति खुद को इस तबाही का जिम्मेदार नहीं मानेगा, तब तक कोई भी कानून या सरकारी योजना इस धरती को नहीं बचा सकती।
इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें खुद से कुछ कड़े सवाल करने होंगे:
· क्या हम बाजार जाते समय अपने साथ कपड़े का थैला ले जा रहे हैं?
· क्या हम अपने घर के आस-पास की मिट्टी को कंक्रीट से मुक्त रख रहे हैं?
· क्या हम पानी की एक-एक बूंद की कीमत समझ रहे हैं?
यह सुलगती हुई धरती, यह जहरीली हवा और प्यासी मिट्टी हमारे ही कर्मों का रिफ्लेक्शन (प्रतिबिंब) हैं। अगर आज इंसान नहीं झकझोरा, आज उसने अपनी जीवनशैली नहीं बदली, तो याद रखिए कि प्रकृति इंसान के बिना भी वैसी ही चलती रहेगी जैसी वह करोड़ों साल पहले चलती थी। विनाश प्रकृति का नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का होगा।
कागजी जागरूकता का चश्मा उतारिए, पौधे लगाने के बाद सिर्फ फोटो खिंचवाने की आदत बदलिए, और सच में इस धरती के प्रति वफादार बनिए। क्योंकि हमारे पास रहने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा घर नहीं है।