लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा

भारत के बारे में हमेशा यह कहा जाता है कि यहां की जनता काफी परिपक्व एवं झगडों से दूर रहने वाली है. यह तो नेता लोग हैं जो अपने फायदे के लिए अवाम को लड़ा अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं. हालाकि हर मामले में यह दृष्टिकोण सही नहीं है. नताओं द्वारा शुरू किये गए कई आंदोलन भविष्य में मील के पत्थर भी साबित हुए हैं. जनता को जगा कर रखना, उनको मुद्दों के बारे में जागरूक करते रहना भी अगुओं का दायित्व है. लेकिन बहुधा ऐसा लगता है कि हमारे नेताओं के लिए उनका व्यक्तिगत हित ही सबसे अहम होता है.

अभी राम-जन्मभूमि विवाद का उदाहरण देखें. जब नब्बे के शुरुआती दशक में लाल कृष्ण आडवानी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा कर इस आंदोलन को हवा दी थी तो मोटे तौर पर उसके सकारात्मक परिणाम भी हुए थे. निश्चय ही उस आंदोलन का यह साफल्य था कि दशकों बाद देश, सांस्कृतिक एक्य महसूस करने लगा था. लोगों में अपनी सनातन परंपरा के प्रति आदर का भाव पैदा हुआ था.

लेकिन अफ़सोस….आज फ़िर से इस आंदोलन को हवा दे कर, इसकी आग से अपनी रोटी सेंकने वाले नुमाइंदों के बारे में वैसा नहीं कहा जा सकता है. अयोध्या मामले पर ईलाहाबाद हाईकोर्ट का हालिया फैसला इस मायने में भी ऐतिहासिक कहा जा सकता है कि इसने देश में शांति और सद्भाव की बहार ला दी थी. विशेषज्ञों द्वारा यह फैसला कानूनी कम लेकिन पंचायती अधिक घोषित किये जाने के बावजूद इसे लोगों ने सर आँखों पर लिया था. ईमानदार प्रेक्षकों का मत था कि भले ही न्याय की देवी ने गांधारी की तरह इस बार अपने आँख की पट्टी खोल कर फैसला दी हो, लेकिन इस फैसले के सरोकार व्यापक थे. अंततः प्रणाली कोई भी हो अंतिम लक्ष्य किसी भी पालिका का जिस सद्भाव की रक्षा करना होता है उसमें वह सफल रहा था.

लेकिन अफ़सोस यह कि दोनों में से किसी भी पक्ष के ठेकेदारों को यह रास नहीं आ रहा है. शायद ये लोग अपनी दूकान बंद हो जाने की आशंका से मामले को लटकाना, उलझा कर रखना चाह रहे हैं. पता नहीं इन दुकानदारों को यह सामान्य चीज़ समझ क्यू नहीं आती कि जनता अब इनके बहकावे में नहीं आने वाली है. काठ की हांडी कभी भी एक से अधिक बार चढ़ने के लिए नहीं होती. हालिया खबर यह है कि अब इस मामले में सुलह की संभावना खत्म हो गयी है. जहां आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने पन्द्रह दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है वही हिंदू महासभा ने ने भी यह फतवा दे दिया है कि फैसला अब सुप्रीम कोर्ट में ही होगा.

तो माचिस ले कर खड़े विनय कटियार आखिर कैसे पीछे रहने वाले थे. उन्होंने भी मौके को गवाना उचित नहीं समझा और तुरत उकसाने वाला बयान दे कर, ये कह कर कि पहले मुस्लिम पक्ष ज़मीन पर से अपना दावा छोड़े अपनी डूबती राजनीतिक नैया को पार लगाने की आखिरी कोशिश जैसे कर ली. गोया मुस्लिम समाज उनका जर-खरीद गुलाम हो कि इधर इन्होने आदेश दिया और उधर मुस्लिम शरणागत.

आखिर जब असली पक्षकारगण अपने-अपने हिसाब से सुलह में लगे ही हैं, आम जन का मत भी सद्भाव के पक्ष में दिख ही रहा है तो इन्हे इस फटे में टांग अड़ाने की क्या ज़रूरत थी. बल्कि यूं कहें कि टांग अडाने के लिए मामले को फाड़ने की क्या ज़रूरत थी? नेताओं को जनता के नब्ज़ का इतना पता होना चाहिए कि वह जान पाएं कि कम से कम अब आग लगाने वाले किसी भी तत्व को अपनी दुर्गति के ही लिए तैयार रहना होगा. ऐसे ही एक मुल्ला साहब हैं. एक पत्रकार द्वारा पूछे गए माकूल सवाल पर ही इतना तैस खा गए कि उन्होंने रिपोर्टर के गला दबा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपने बाप की जायदाद समझ उसका गला घोटने पर उतारू हो गए.

लेकिन इन सभी उचक्कों की फौज के बावजूद कुछ लोग ऐसे हैं जो जनमत को पहचानते हैं, उसका आदर भी करना चाहते हैं और अधिकतम संभाव्य इमानदारी का परिचय दे कर मसले का हल बातचीत द्वारा कर, इतिहास द्वारा प्रदत्त इस अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं. ऐसे लोगों में आप महंत ज्ञान दास और मुस्लिम पक्षकार हाशिम भाई का नाम ले सकते हैं. थोडा बहुत इस लेखक को भी जितना ज्ञान दास के बारे में जानने का अवसर मिला था, उस बिना पर यह लेखक यह कहने की स्थिति में हैं कि उन दोनों का प्रयास वास्तव में मसले के हल की दिशा में सार्थक कदम हो सकता है अगर राजनेताओं को, और मज़हब के ठेकेदारों को इसमें नाक घुसेड़ने की इजाज़त अड़ाने की इजाज़त न दी जाय तो.

अभी तक जैसे संकेत मिल रहे थे उसमें यह उम्मीद कर लेना कोई बड़ी बात नहीं थी कि शायद मुस्लिम समाज प्यार से अपना तीसरा हिस्सा वहां पर छोड़ देंगे और अयोध्या में ही कहीं या सरयू से उत्तर किसी अच्छी जगह पर अपने हिंदू भाइयों के सहयोग से एक भव्य मस्जिद के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ेंगे. अगर ऐसा होना संभव होता तो ऐसा कहा जा सकता है कि 1857 के बाद से ही अंग्रेजों द्वारा जिस तरह संप्रदायों के मध्य विभेद पैदा कर देश को गुलाम रखने की चाल चली गयी थी, जिस तरह उसके पश्चातवर्ती शासकों द्वारा भी उन्ही का अनुकरण कर विभेद को और बढ़ाया गया वह एक झटके में खतम क़र देश वास्तव में एक नए युग में प्रवेश कर सकता था. केवल हाई कोर्ट के फैसले के बाद ही देश ने जिस तरह से भाईचारे का रस चखा है वह यह भरोसा करने का पर्याप्त कारण है कि अब लड़ाई कोई नही चाहता सिवा कुछ टुच्चे नेताओं, मुट्ठी भर कठमुल्लाओं और वामपंथियों के.

बस इन दुकानदारों से आग्रह कि जितनी जल्दी वे यह समझ लें उतना बेहतर होगा कि देश की वर्तमान पीढ़ी, अपने पहले की पीढ़ी से पीढ़ियों आगे है. देश ने पिछले बीस सालों में सदियों का सफर तय कर लिया है. अब के नए लोग, नए ज़रूर हैं लेकिन सावधान हैं. इनको बहकाना अब आसां नहीं है. सभी तत्वों से विनम्र निवेदन की इमानदारी को अपनी सबसे अच्छी नीति बनाए-मानें. मसले में ज्यादा टांग भी न अड़ाए और हर उस समूह या व्यक्ति का उत्साहवर्द्धन करें जो अयोध्या को अब अयोध्या ही बने रहने देने में प्रयासरत है. वास्तव में अयोध्या को लंका बना दिया जाना तो रामलला को भी नागवार ही गुजरेगा.

13 Responses to “अयोध्या: इतिहास माफ नहीं करेगा इन लोगों को”

  1. sunil patel

    अयोध्या: इतिहास माफ नहीं करेगा इन लोगों को – सत्य कहा है. धन्यवाद पंकज जी.
    श्री कपूर जी सत्य कह रहे है – कोंग्रेस का विकल्प तो केवल भाजपा है.
    आशा की किरण तो केवल स्वामी रामदेव जी के भारत स्वाभिमान से दिखती है.

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  2. पंकज झा

    पंकज झा.

    आर्यन जी ….आपने एक बात भी ऐसी नहीं कही है जिसमें असहमति की कोई गुंजाइश हो. सवाल भाजपा के दोषी होने का नहीं है. मैंने तो लेख के शुरुआत में ही आडवानी जी के रथयात्रा की तारीफ़ की है. आपका निष्कर्ष भी बिलकुल सही है की अगर ‘बहुत अच्छे’ का विकल्प नहीं हो तो सबसे कम बुरे का चयन कर लेना चाहिए. और निश्चय ही बीजेपी आज के राजनीति की सबसे कम बुरी पार्टी है.
    बस अपना केवल यह कहना है की अब देश किसी भी तरह के टकराव के लिए तैयार नहीं है. मस्जिद के लिए अयोध्या में ही कोई अलग जगह का चयन हो यह भी बिलकुल सही विकल्प है. लेकिन इस मुद्दे पर किसी को राजनीति करने का अधिकार अब जनता नहीं देना चाहती है. मेरा आशय महज़ इतना था/है.
    आपको याद होगा मुलायम सिंह को कैसे मुस्लिम समाज द्वारा दुत्कारा गया था जब वह न्यायालय के फैसले पर सवाल उठा रहे रहे थे. विनय कटियार का मेरे द्वारा नाम लेकर आलोचना किया जाना भी उसी तरह का प्रयास है.धमकी या अलगाव की भाषा आज कोई भी बोले उसका सामाजिक बहिष्कार कीजिये. ये मत देखिये की वह हिंदू पक्ष से बोल रहा है ये मुस्लिम पक्ष से. बस यही निवेदन.धन्यवाद.

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  3. Aryan

    आदरणीय पंकज जी के लेख से कुछ प्रश्न मेरे मन में उठ गए..
    हम विवाद किस बात पर कर रहे हें…?
    उस जमीन पर मालिकाना हक़ किस का…?
    और वहां मस्जिद क्यों बने ?
    इन सब प्रश्नों का उत्तर में अपने आप में ही ढूंढ़ रहा था… सोचने की बात ये हे की वो जो गुम्बद बनी हे वो एक ढांचा हे मस्जिद में तो हमेश नमाज अता की जाती हे और ठीक हे वहां मस्जिद बने भी तो उस आतंकी शाशक की जो इस देश की दुर्दशा का जिम्मेदार हे l क्या कोई देश भक्त या इश्वर भक्त मुसलमान महापुरुष के नाम से नहीं…? दूसरा जब इतहास गवाह हे की मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनाई गयी पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई… लेकिन जब अपने अस्तित्व की इमारतों की बात आई तो उस ढांचे को तोड़कर राम मंदिर ही बनना चाहिए इसका मतलब ये नहीं की भारत की सभी मस्जिदें तोड़ कर वापस मंदिर बना दी जाये.. लेकिन जिनको अपना पूर्वज मानते हें कमसे कम उन पूर्वजों के अस्तित्व की रक्षा की जाये… और हम क्यों सहें इन आतंकी जिन्होंने देश को लुटा उनके नाम का बोझा …. ये भी उस समय के कसlब और अफजल से भी ज्यादा देश द्रोही हें…अगर इसको भी स्वीकार किया तो यहाँ राम नहीं, भगत सिंह नहीं विवेकानंद नहीं …. बाबर, अकबर, अफजल, कसाब आदि महापुरुष या शहीद घोषित होकर महान हो जायेंगे …. अब सोचना देशभक्ति के नाते हे…..l. रही राजनीतिक पार्टियों की बात तो हर बार नया दल बना कर देश की एक और समस्या को बढ़ाना हे क्या यहाँ दो दलीय व्यवस्था नहीं हो सकती… और में कहता हूँ लोगों को भाजपा ही दोषी क्यों दिखाई देती हे क्यों वो दोषी नहीं जो मोन होकर ये सब देख रही हें या मुस्लिम वोट बैंक के लालच में विरोध कर रही हें…. और जब चोरों से ही दोस्ती करनी हे तो मेरा मत हे जो सबसे कम चोर प्रवति का होगा उसी का चुनाव में करना चाहूँगा…

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  4. पंकज झा

    पंकज झा.

    शिशिर जी..सवाल किसी को बड़ा या छोटा बनाने का नहीं है. बात केवल इतनी है कि अब इस मामले पर किसी को भी रोटी नहीं सेंकनी चाहिए. अब केवल सद्भाव चाहिए. सवाल बीजेपी और कांग्रेस का भी नहीं है.विनय जी वास्तव में बड़े नेता रहे हैं लेकिन अब वे अपना ‘दिल’ बड़ा करें इसकी ज़रूरत है.
    डॉ जमाल बिलकुल ठीक कहा आपने. हमें समय रहते ही सोचने की ज़रूरत है. शायद सम्बंधित लोग कुछ अच्छी बात सोच रहे हैं ऐसा लग तो रहा है.
    डॉ. कपूर साहब भी सही कह रहे हैं, बस उनकी बातों में इतना जोड़ना चाहूँगा कि बाबा रामदेव जैसे राष्ट्रवादी महापुरुषों का योगदान भी अगर बीजेपी को ही परिमार्जित करने में मिलता, कुछ ऐसा हो पाता कि उनकी ताकत भी बीजेपी के साथ मिलकर राष्ट्र उन्नयन की दिशा में बढते, भली ताकतों का बंटवारा नहीं हो पाता तो शायद बेहतर होता.
    तिवारी साहब, असहमति तो लोकतंत्र का सौंदर्य, विमर्श का श्रृंगार, संवाद का सेतु होता है. सहमति और असहमति दोनों स्वागतेय. बस उपेक्षा नहीं हो, यही अपेक्षा-यही निवेदन. शिबली जी, शैलेन्द्र जी, दिनेश जी समेत आप सभी का ह्रदय से आभार, बहुत धन्यवाद.

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  5. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरनीय कपूर साहब से मै भी पूर्णत: सहमत हूँ| शैलेन्द्र कुमार जी के कथन से भी सहमत हूँ| आने वाले समय में स्वामी रामदेव भारत स्वाभिमान जैसे राष्ट्रवादी संगठन के साथ हमारे सामने होंगे, उस समय यह हमारे लिए सबसे उत्तम विकल्प होगा|

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  6. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    डॉ. राजेश जी से पूर्णतः सहमत मुझे उम्मीद है की स्वामी रामदेव जी हमे बीजेपी से लाखों गुना अच्छा विकल्प देंगे

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  7. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    pankaj jha ki smjh bilkul sahi hai .halanki men kai martwa anek maukon pr asahmat bhi raha hun or aainda bhi asahmat ho sakta hun .kintu bahrhal is aalekh se sahmati vykt karta hun .badhai ..vijayadashmi ki shubhkaamnaayen…

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  8. A N Shibli

    शानदार लेख जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। असल में हिन्दू और मुसलमान दोनों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस पूरे मामले में सिर्फ आओनी राजनीती चमकाना चाहते हैं। हिंदुओं की भांति मुसलमानों में भी हर कोई बाबरी मस्जिद के इशू को ज़िंदा रख कर इस पर सियासत करना चाहता है। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो नहीं चाहते की इसका कोई हल निकले। जब मामला खत्म ही हो जाएगा तो राजनीती कैसे होगी।

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  9. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    pankaj ke aalekh vaastv men kuchh leek se hatkar or rachnaatmk hua karte hain …is aalekh ki taareef ke liye shbd nahin hain ….halanki ye jaruri nahin ki men unke har aalekh se shmati vykt karun….vijyadashmi ki shubh kaamnaayen …

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  10. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    कटियार जी अछे ही होंगे पर जब राम भक्तों पर गोलियां चल रही थीं तो ये सब लोग गायब हो गए थे, ढूंढे भी नहीं मिले थे. पूरा अगला दिन भी न जाने कहाँ भूमिगत रहे थे. तभी प्रकट हुए जब खतरा टल जाने का विश्वास हो गया. ऐसे ही लोग तो सत्ता के सौदागर व स्वामी बने बैठे हैं. वरना देश की ये दुर्दशा क्यों कर होती ? अतः पंकज झा जी जो कह रहे हैं वह निराधार नहीं.
    – भाजपा यदि राम मंदिर मुद्दे पर इमानदार रही होती तो क्या उसकी वर्तमान दुर्दशा हुई होती ? सच बात तो यह है कि भाजपा के अनेक नेता और कार्यकर्ता राम व राम मंदिर के मुद्दे को लेकर इमानदार नहीं हैं, केवल इसे सत्ता पाने का साधन बन सके तो बनाना चाहते हैं.
    – सबसे कीमते बात यह है कि भाजपाई कितने भी भ्रष्ट हो जाएँ पर अभी तक विदेशी ताकतों, पोप, इटली, अमेरीका के एजेंट तो नहीं हैं. देश के हितों के सौदे थोक में करने वाले तो नहीं हैं. अतः मुझ जैसों को जब भी कांग्रेस और भाजपा में से किसी को चुनना होगा तो हम निश्चित रूप से भाजपा को ही तब तक के लिए चुनेंगे जब तक इससे अछा कोई देशभक्त विकल्प हमको मिल नहीं जाता.
    – यह भी निश्चित है कि जब भी कोई उत्तम देशभक्त विकल्प खडा होने लगेगा तो उसका कांग्रेस या किसी भी और दल से बढ़ कर विरोध भाजपा ही करेगी. क्योंकि ऐसा दल भाजपा के जानाधार को ही सबसे अधिक खिसकाएगा. सवामी राम देव के साथ यही तो हो रहा है. भारत के राजनैतिक दलों का विकल्प देने के स्वामी जी के प्रयासों को सारे दलों के इलावा भाजपा भी पलीता लगाने में कोई कसर न छोड़ रही है और न छोड़ने वाली है. पर देशभक्तों को तो भाजपा का कोई श्रेष्ठ विकल्प चाहिए. तबतक भाजपा हमारी मजबूरी है. निकृष्ट में से जो औरों से अछा है, उसे चुनने की समझदारी तो हमें करनी ही होगी.
    – देश के दुश्मनों, विदेशी ताकतों के एजेंटों या भ्रस्टों में से एक को चुनने का विकल्प आज हमारे सामने है.

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  11. Dr. Anwer Jamal

    अदालत के फ़ैसले के बाद भी तो हिन्दू-मुस्लिम आज मिलकर ही सोच रहे हैं।
    जनता चाहती है कि मिलकर सोचो।
    मालिक भी चाहता है कि मिलकर सोचो।
    मिलकर सोचो, मिलाकर सोचो।
    अपने अपने ग्रंथ लाकर सोचो।
    आज नहीं सोचोगे तो बाद में सोचना पड़ेगा।
    दुनिया में नहीं सोचोगे तो परलोक में सोचना पड़ेगा।
    बस अन्तर केवल यह है कि आज का सोचा हुआ काम आएगा और उस दिन का सोचना सिर्फ़ अफ़सोस करने के लिए होगा।

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  12. shishir chandra

    विनय कटियार के लिए कहे गए शब्द आपको शोभा नहीं देते. यदि समरसता ही चाहिए था तो हिन्दुओं को दावा छोड़ देना था. विनय कटियार जैसे राष्ट्रवादी व्यक्ति को बहुत छोटा बताने की कोशिश की गई है. गोया किसी नेता का जनाधार कमजोर हो गया तो उसको कुछ भी कहा जाये? बीजेपी जब पॉवर में थी तो समूचा उ प राममंदिर के पक्ष में था तो फिर राममंदिर क्यों नहीं बना दिया गया? जो व्यक्ति जातिवाद, सेकुलरवाद, भ्रष्टाचार में सही तालमेल नहीं बिठा पता वो उत्तरप्रदेश की राजनीती से बाहर हो जाता है और ऐसा ही कुछ विनय जी के साथ है. कटियार जी अच्छे व्यक्ति हैं और बेदाग़ छवि है यही उनका गुनाह है?

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