आयुष्मान खुराना बेबाक फिल्मों का नायक

विवेक कुमार पाठक
नायक नायिका की परंपरागत छवि को तोड़ने का साहस फिल्मकार के लिए खतरों से खेलने जैसा है। फिल्मों पर आज जितना पैसा लगाया जा रहा है उससे रिस्क लेकर फिल्म बनाना आत्मघाती भी हो सकता है मगर प्रयोगधर्मी आगे बढ़कर खेलने के लिए शुरु से जाने जाते रहे हैं। सबसे अच्छी बात है कि वर्तमान में व्यावसायिक सिनेमा के अग्रणी फिल्मकारों नए नए विषयों पर एकदम अजब गजब फिल्में बना रहे हैं। 
ये फिल्में तभी बन सकती हैं जब इनके लिए वैसे नायक और नायिका भी मिल सकें। वे अदाकार जो किसी भी विषय की गहराई में डूब सकें और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें।
मौजूदा मुंबइया सिनेमा में आयुष्मान खुराना ऐसे ही एक युवा नायक हैं। आयुष्मान की फिल्में परंपरागत नायक की छवि को ध्वस्त करती हैं। वे दिन हवा हुए जब नायक अपनी फिल्मी जिंदगी में सक्सेस का दूसरा नाम होता था, वो पर्दे का सनातन सुर्दशन चेहरा था और हरदिल अजीज रहता था। वो तीन घंटे तक सिनेमा के पर्दे पर नायिका के साथ रोमांस करता था तो मौका आने पर मारधाड़ में भी वह पीछे नहीं। हिन्दी सिनेमा में दशकों तक ऐसे नायकों की धूम रही जो प्रेम, संघर्ष, बलिदान हर जगह हर मोर्चे सफल जहां हाथ डाले सोना उनका यही अंदाज रहा मगर अब सबकुछ पहले जैसा नहीं रहा है।
फिल्मों के नायक अब पर्दे पर रोजमर्रा की जिदंगी जीते नजर आ रहे हैं। वे अब सबसे आदर्श कतई नहीं हैं।
विक्की डोनर फिल्म के युवा विक्की का किरदार भी बहुत चुनौतीपूर्ण था। फिल्म में अपने काम के कारण समाज में हिकारत की नजर से देखा गया विक्की अपनी अदाकारी के कारण चर्चा में रहा। एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण विषय पर लोगों को हंसाते हुए बहस का मुद्दा बनाने वाली ये फिल्म आयुष्मान को पहचान दिलाने वाली रही।
आयुष्मान ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा वे अपनी आगे की फिल्मों में और भी अनूठे अंदाज में नजर आए। एक बहुत ही मोटी लड़की के साथ बेमेल कहानी करियर की शुरुआती दिनों में आत्मघाती हो सकती है मगर आयुष्मान खुराना ने वही किया जो यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने किया।
यशराज बैनर के कर्ताधर्ता आदित्य भी अब लीक से हटकर फिल्में बना रहे हैं। दशकों तक स्विटजरलैण्ड की हसीन वादियों में पगी प्रेम कहानियों से आगे जाना आदित्य चोपड़ा की दूरदर्शिता है। बेशक मनोरंजन के लिए टॉकीज और मॉल में पहुंचा दर्शक दिमाग पर गंभीर सिनेमा का बोझ नहीं चाहता और स्मिता पाटिल शबाना आदमी ओमपुरी और पंकज कपूर टाइप फिल्मों को अपने लिए नहीं मानता मगर उसे अच्छे विषयों से कतई परहेज नहीं है। स्विटजरलैण्ड की वादियों और सीफोन की साड़ियां भी उसे पसंद हैं मगर फिल्मों वे वह हर बार यही देखने नहीं जाता है।
नए और अजब गजब विषय भी अब खूब पसंद किए जा रहे हैं। यशराज की दम लगा के हइशा फिल्म की जबर्दस्त सफलता इसी बात का दस्तावेज है।
यह फिल्म करोड़ों सामान्य भारतीय घर परिवारों के बीच की फिल्म नजर आती है। आयुष्मान की यह फिल्म रोजगार का मुद्दा भी उठाती है। आम निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों में किस कदर आमदनी की असुरक्षा किस कदर अनचाहे फैसले भी कराती है। फिल्म में कम पढे़ लिखे आयुष्मान कैसिट्स और रिकार्डिंग का पुराना काम करते हैं मगर वक्त के बदलाव में उनकी कैसिट्स की दुकान पर सीडी की धमक ने ग्रहण लगा दिया है। कम उमर में काम में लगने के बाद नायक 10वी की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाता और कैसिटस और गानों में ही अपना रोजगार ढूंढने लगता है। ये फिल्म एक प्रेरक कहानी के साथ यह भी संदेश देती है कि नॉलेज अपडेट होना जरुरी है। बाजारवाद की आंधी में आपका पुस्तैनी रोजगार एक ही फ्रेम में हमेशा फायदे का सौदा नहीं रहेगा। देश दुनिया और कारोबार में आ रहे बदलावों पर हर छोटे बड़े कारोबारी को नजर रखना ही चाहिए।
दम लगा के हइशा फिल्म यह तथ्य भी स्थापित करती है कि बच्चों पर जोर डालकर तय किए उनके विवाह संबंध भविष्य के फसाद की जड़ बनते हैं।
दो लोगों के जीवन भर साथ रहने का फैसला पूरी तरह आपसी सहमति और खुशी से होना चाहिए। आमदनी के लिए पढ़ी लिखी मोटी बहू जैसा बेमेल ब्याह कराने से किस कदर दोनों का वैवाहिक जीवन डगमगाता है दम लगा के हइशा फिल्म माध्यान्तर में ये भी बताती है।
फिल्म में नायिका को पति से जिस उपेक्षा का शिकार होना पड़ा था वो समाज में बच्चों पर थोपे जाने वाले शादी ब्याहांं के बाद आम बात हैं। आयुष्मान खुराना ने इस बिल्कुल घरेलू समस्या में दुविधाग्रस्त पति का किरदार बखूबी जिया है।
फिल्म की सबसे खास बात यह रही कि तमाम विसंगतियों के बाबजूद भारतीय समाज के विवाह आत्मीयता का सिंचन पाते हैं और मुरझाने के कगार पर आकर भी फिर पल्लिवित होने का दम रखते हैं। लड़ाई झगड़ों के बाद अंतत हृदयपूर्ण प्रेम बंधन फिल्म में सबको अच्छा लगा।
आयुष्मान की ही शुभमंगल सावधान फिल्म एक बिल्कुल ही खतरनाक टाइप विषय पर रही। संतान के अभाव में शताब्दियों से ताने महिला शक्ति ने खाए होंगे मगर यह फिल्म इस मामले में पुरुषों पर तीर छोड़ते नजर आती है। कॉमेडी से भरपूर फिल्म में खुद को कमतर नायक के रुप में पर्दे पर जीना सिर्फ आयुष्मान के बस में था और ये उन्होंने जीकर भी दिखाया। नायक फिल्म में ठीक उसी स्थिति का सामना करते दिखा जो बिना संतान वाली महिलाएं चुपचाप झेलती रही हैं सदियों से। फिल्म की खास बात ये रही कि गंभीर सामाजिक मु्द्दे पर हल्के संवादों ने फिल्म को रोचक बनाए रखा। बिना अश्लीलता दिखाए पौरुष की कमी पर फिल्म बन सकती है और पसंद आ सकती है ये शुभमंगल सावधान साबित करने वाली रही। आयुष्मान की इन फिल्मों के बाद उन्हें पुरुषों की गृहशोभा अभिनेता तक बुलाया जा रहा है। सबसे अच्छी बात ये है कि ये बात उन्हीं आयुष्मान खुराना ने अपने साक्षात्कार में प्रशंसकों के सामने जाहिर की है। सत्य और साफगोई में बड़ी ताकत है और यही ताकत आयुष्मान की फिल्मों और उनके इन किरदारों में सिनेप्रेमियों को पसंद आ रही है।

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