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    Homeसाहित्‍यकविताबैठक है वीरान !!

    बैठक है वीरान !!

    चूस रहे मजलूम को, मिलकर पुलिस-वकील !
    हाकिम भी सुनते नहीं, सच की सही अपील !!

    जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार !
    खतरे में सौरभ दिखे, जाना सागर पार !!

    थोड़ा-सा जो कद बढ़ा, भूल गए वो जात !
    झुग्गी कहती महल से, तेरी क्या औकात !!

    बूढ़े घर में कैद हैं, पूछ रहे न हाल !
    बचा-खुचा खाना मिले, जीवन हैं बेहाल !!

    हत्या-चोरी लूट से, कांपे रोज समाज !
    रक्त रंगे अखबार हम, देख रहे है आज !!

    किसे सुनाएँ वेदना, जोड़े किस से आस !
    नहीं खून को खून का, सौरभ जब अहसास !!

    आकर बसे पड़ोस में, ये कैसे अनजान !
    दरवाजे सब बंद है, बैठक है वीरान !!

    डॉ. सत्यवान सौरभ
    डॉ. सत्यवान सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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