बैठक है वीरान !!

चूस रहे मजलूम को, मिलकर पुलिस-वकील !
हाकिम भी सुनते नहीं, सच की सही अपील !!

जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार !
खतरे में सौरभ दिखे, जाना सागर पार !!

थोड़ा-सा जो कद बढ़ा, भूल गए वो जात !
झुग्गी कहती महल से, तेरी क्या औकात !!

बूढ़े घर में कैद हैं, पूछ रहे न हाल !
बचा-खुचा खाना मिले, जीवन हैं बेहाल !!

हत्या-चोरी लूट से, कांपे रोज समाज !
रक्त रंगे अखबार हम, देख रहे है आज !!

किसे सुनाएँ वेदना, जोड़े किस से आस !
नहीं खून को खून का, सौरभ जब अहसास !!

आकर बसे पड़ोस में, ये कैसे अनजान !
दरवाजे सब बंद है, बैठक है वीरान !!

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