लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः- सर्वोच्च न्यायालय का राष्ट्रीय और राज्य के राजमार्गों पर शराब की दुकानों पर प्रतिबंध

प्रमोद भार्गव

 

सड़क दुर्घटना में मौतें रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने अहम् फैसला सुनाया है। अब 31 मार्च 2017 के बाद राष्ट्रीय व प्रांतकीय राजमार्गों के किनारे शराब की बिक्री 500 मीटर के दायरे में प्रतिबंधित रहेगी। सड़क सुरक्षा और लोककल्याण की दृष्टिसे इस पाबंदी को बहुत पहले लगा देने की जरूरत थी। ऐसा अब तक नहीं हो पाया तो इसके लिए केंद्र व राज्य सरकारें दोशी हैं। वे हरसाल सड़क सुरक्षा सप्ताह और नशाबंदी के लिए जागरुकता के अडंबर तो रचती है, लेकिन शराब की बिक्री से आने वाले राजस्व के चलते जानबूझकर मानवीय सुरक्षा के लक्ष्य की अनदेखी करती है। जबकि किसी भी लोककल्याणकारी सरकार का उद्देश्य मानव जीवन और स्वास्थ्य का सरंक्षण होना चाहिए। इस नजरिए से बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के पूर्ण शराबबंदी के फैसले को एक आदर्श मानकर प्रेरणा ली जा सकती है, लेकिन इसका अनुकरण किसी अन्य राज्य ने नहीं किया। जबकि अब इस शराबबंदी के सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं और घरों में गृहकलह की जगह खुशहाली देखने को मिल रही है। हालांकि अभी यह संदेह बदस्तूर है कि कहीं कार्यपालिका इस ऐतिहासिक फैसले पर आधे-अधूरे ढंग से अमल करके इसकी इतिश्री न कर दे।

राजमार्ग लंबे व तेजगति के सफर के लिए होते है। इसलिए अकसर वाहनों की गति तेज रहती है। भारी मालवाहक वाहन राजमार्गों से ही गुजरते है। ऐसे में यदि वाहन चालकों को आसानी से शराब की उपलब्धता दिखाई दे तो उसके प्रति स्वाभाविक लालच और फिर खतरे की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है। राजमार्गों पर हर पांच किलोमीटर की दूरी ने औसतन शराब की तीन दुकानें हैं। इस बावत प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शराब लाॅबी के दबाव में अंधाधुंध परमिट बांटने की प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि, शराब के भयावह सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं पर खूब चर्चा की जाती है, लेकिन संवैधानिक निर्देश के बावजूद सरकारें शराब पर अंकुष लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाती हैं। शराब कारोबारी भी धन के बूते ऐसी पहलों को व्यर्थ कर देते है और सरकारें राजस्व कमाई की दुहाई देकर शराब बिक्री जारी रखती हैं।   स्वयं सड़क परिवहन मंत्रालय ने स्वीकारा है कि 2014 में देशभर में सड़क दुर्घटनाओं में 1.46 लाख लोग मारे गए थे। घायलों की संख्या तीन गुना अधिक थी। इनमें कई लोग तो स्थाई रूप से विकलांग होकर लाचारी का जीवन जीने को विवश हो जाते हैं। इस आंकड़े से पता चलता है कि देश में हर घंटे 57 सड़क हादसे होते है और 400 लोग रोजाना काल के गाल में समा जाते है। ऐसे में मानव जीवन की सुरक्षा की दृष्टिसे यह फैसला बेहद अहम् है। यही नहीं सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत को हर साल करीब 3985 अरब रुपए की हानि भी उठानी पड़ती है, जो हमारी जीडीपी का 3 प्रतिशत है, यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अध्ययन से सामने आई है।

हालांकि शराब पीकर वाहन चलाने के अलावा सड़क हादसों के अन्य भी कई कारण हैं। इन कारणों में राष्ट्रीय राजमार्गों का दोषपूर्ण निर्माण यातायात का राजमार्गों पर क्षमता से अधिक दबाव, चालक लाइसेंस में त्रुटि और लापरवाही से गाड़ी चलाना शामिल हैं। दरअसल देश में हरेक साल जो डेढ़ लाख लोग मारे जाते हैं और चार से पांच लाख घायल होते हैं, उनमें ज्यादातर राष्ट्रीय राजमार्गों पर हुई दुर्घटनाओं का कारण हैं। इसलिए इन मार्गों पर ऐसे स्थल तलाशे जा रहे हैं, जहां अधिकतम दुर्घटनाएं होती हैं। इसके बाद इन स्थलों पर ऐसे सुधार किए जाएंगे, जिससे घटनाएं कम से कम हों। पिछले साल सड़क हादसों में मारे जा रहे युवाओं की दिल दहलाने वाली रिपोर्ट आई थी। सड़क परिवहन और राजमार्ग द्वारा सड़क हादसों से जुड़ी इस रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 34 आयु वर्ग के 75,048 युवा 2014 में सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए थे। युवाओं के मरने का यह आंकड़ा 53.8 फीसदी है। इसी तरह 35 से 65 आयु वर्ग के लोगों में 49,840 लोग दुर्घटनाओं में मरे थे। यह प्रतिशत कुल मरने वालों की संख्या में 35.7 बैठता है। मसलन देशभर में जितने लोग बीमारियों व प्राकृतिक आपदाओं से नहीं मरते, उससे कहीं ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में मौतों का छठा सबसे बड़ा कारण सड़क हादसे हैं। आम धारणा है कि बढ़ती आबादी, अनियंत्रित षहरीकरण, नशे में वाहन चलाना और दो व चार पहिया वाहनों की सड़कों पर बढ़ती संख्या इसके प्रमुख कारण हैं।

पिछले डेढ़ दषक में देशभर की सड़कों पर क्षमता से अधिक वाहन सड़कों पर आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दर्ज की गई एक याचिका में दिए आंकड़ों से पता चलता है कि 2010 में भारत में करीब 46.89 लाख किलोमीटर सड़कें और 11.49 करोड़ वाहन थे। नतीजतन 4.97 लाख सड़क हादसे हुए। इन हादसों में ज्यादातर मरने वाले लोगों में 40 फीसदी, 26 से 45 आयु वर्ग के होते हैं। यही वह महत्वपूर्ण समय होता है, जब इन पर परिवार के उत्तरदायित्व के निर्वहन का सबसे ज्यादा दबाव होता है। ऐसे में दुर्घटना में प्राण गवां चुके व्यक्ति के परिजनों पर सामाजिक, आर्थिक और आवासीय समस्याओं का संकट एक साथ टूट पड़ता है। इन हादसों में 19 से 25 साल के इतने युवा मारे जाते हैं, जितने लोग कैंसर और मलेरिया से भी नहीं मरते। ये हादसे मानवजन्य विसंगतियों को भी बढ़ावा दे रहे हैं। आबादी में पीढ़ी व आयुवर्ग के अनुसार जो अंतर होना चाहिए, उसका संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। यदि सड़क पर गति को नियंत्रित नहीं किया गया तो 2020 तक भारत में 700000 और दुनिया में प्रति वर्ष 84 लाख से भी ज्यादा मौतें सड़क हादसों में होगी। नतीजतन संबंधित देशों को 235 अरब रुपए की आर्थिक क्षति झेलनी होगी। ऐसे में शायद आबादी नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन की जरुरत ही नहीं रह जाएगी ?

यातायात सुचारु रूप से संचालित हो, इसके लिए जापान, अमेरिका और सिंगापुर के यातायात कानून से भी सीख लेने की बात कही जा रही है। खासतौर से यूरोपीय देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक आचार संहिता लागू है, जिसका ज्यादातर देश पालन करते हैं। ‘ब्राजीलिया घोशणा-पत्र‘ नामक इस संहिता पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हुए है, लेकिन इसका पालन दिखाई नहीं देता है। इस संहिता के मुताबिक यदि किसी कार की गति 35 किमी प्रति घंटा है, तो दो कारों के बीच की दूरी 74 फीट होनी चाहिए। 40 मील प्रतिघंटा की रफ्तार होने पर यह अंतर 104 फीट और 45 फीट की गति पर यह अंतर 132 फीट होना चाहिए। संहिता में चालकों के नियम भी तय किए गए हैं। यदि चालक की मुट्ठी बंद करने की ताकत पौने सोलह किलोग्राम से कम निकलती है तो माना जाना चाहिए कि यह व्यक्ति वाहन चलाने लायक नहीं है। संहिता की षर्त के मुताबिक वाहन चलाने लायक उस व्यक्ति को माना जाएगा जो 20 मीटर आगे चल रहे वाहन का नंबर आसानी से पढ़ ले। हमारे यहां तो 80 साल के षक्ति और दृष्टिसे कमजोर हो चुके बुजुर्ग भी सड़कों पर वाहन चलाते खूब देखे जाते हैं। फिर वाहनों के अनुपात में हमारी सड़कों पर जगह भी नहीं है। 74 फीट दूरी बनाएं रखने की बात तो छोड़िए, देश के महानगरों में 2 से 5 फीट की दूरी वाहनों के बीच बनाए रखना मुष्किल हो रहा है। जाहिर है, हम लायसेंस प्रणाली को श्रेश्ठ बनाने के लिए बात भले ही दुनिया के देशों का अनुकरण करने की करें, लेकिन नतीजे कारगर निकलें ऐसा नामुमकिन है ? लिहाजा सुरक्षित सफर के लिए सड़कों से वाहन कम करना भी जरूरी है। किंतु कार लाॅबी हमारे यहां इतनी मजबूत है कि वह कारों के उत्पादन में कमी लाने नहीं देगी, बल्कि उसकी तो कोषिष है कि कारें सड़कांे पर निर्बाध चलें। इसके लिए पदयात्री, साइकिल और साइकिल रिक्शा को ही सड़कों से हटा दिया जाए ? इस परिप्रेक्ष्य में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता आदर्श मुनि त्रिवेदी ने पैदल चलने का अधिकार सुनिश्चित किए जाने की दृष्टिसे जनहित याचिका दायर की हुई है। इसका फैसला आने में तो अभी वक्त लगेगा, लेकिन सड़क हादसों में निकट भविष्य में अकल्पनीय कमी आए, इस दृष्टिसे शीर्ष न्यायालय ने राजमार्गों पर शराबबंदी कर अहम् फैसला ले लिया है।

 

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