बन सौरभ तू बुद्ध !!



मतलबी संसार का, कैसा मुख विकराल !
अपने पाँवों मारते, सौरभ आज कुदाल !!

सिमटा धागा हो सही, अच्छे है कम बोल !
सौरभ दोनों उलझते, अगर रखे ना तोल !!

काँप रहे रिश्ते बहुत, सौरभ हैं बेचैन !
बेरूखी की मार को, झेल रहें दिन-रैन !!

जहर आज भी पी रहा, बनता जो सुकरात !
कौन कहे है सत्य के, बदल गए हालात !!

दिला गयी है ठोकरें, अपनों का अहसास !
सौरभ कितने साथ है, कितने खासमखास !!

होते कविवर कब भला, वंचित और उदास !
शब्दों में रस गंध भर, संजोते उल्लास !!

विचलित करते है सदा,मन मस्तिक के युद्ध !
अगर जीतना स्वयं को, बन सौरभ तू बुद्ध !!

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