लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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dबीते सालों में बैंकों ने बिजनेस बढ़ाने के लिए गोल्ड लोन को अपना हथियार बनाया था। मोटे तौर पर माना जाये तो वित्तीय वर्ष 2010-2011 से बैंकों ने गोल्ड लोन बाँटने के मामले में तत्परता दिखानी शुरु की, जो वित्तीय वर्ष 2012-13 के अंत आते-आते अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया। जानकारों के अनुसार वर्ष, 2009 में बैंकों द्वारा बाँटे गये लोन में से गोल्ड लोन का हिस्सा तकरीबन 1 प्रतिषत था, जो वर्ष, 2012 तक बढ़कर 2.4 प्रतिषत हो गया। बैंकों द्वारा अरबों-खरबों रुपये के गोल्ड लोन शहरों में तो वितरित किये ही गये। कुछ बैंकों ने इसके लिए गाँवों का भी रुख किया, क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि ग्रामीण महिलाओं की सोने की प्रति ललक शहरी महिलाओं की अपेक्षा अधिक रहती है। गाँवों एवं कस्बानुमा शहरों में गोल्ड लोन के नाम को परिवर्तित कर कृशि गोल्ड लोन रखा गया। बड़े अधिकारियों की निगरानी में  बकायदा कैम्प और मेला लगाकर बैंकों द्वारा कृशि गोल्ड लोन बाँटे गये।

हाल के दिनों में सोने की कीमत में तकरीबन 26 प्रतिषत की गिरावट दर्ज की गई है। इस गिरावट की वजह से बैंकों के होष फाख्ता हो गये हैं, क्योंकि सरकारी बैंक गोल्ड लोन देने में औसतन 30 प्रतिषत का मार्जिन रखते हैं। निजी और विदेशी बैंकों का इस मामले में मार्जिन और भी कम होता है। कहने के लिए तो सरकारी बैंकों के कुछ प्रमुख अभी भी कह रहे हैं कि सोने की कीमत में आई कमी अभी भी 30 प्रतिषत से कम है, जिससे बैंकों के पास थोड़ा सा (मार्जिन) बचा हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों का सीधा संबंध अमेरिका की अर्थव्यवस्था से है। विशेषज्ञों के मुताबिक जब भी अमेरिका की अर्थव्यवस्था में सुधार होता है, तो सोने की कीमत में गिरावट दर्ज की जाती है। दरअसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमेशा से सोना के मुकाबले डाॅलर को तरजीह दी जाती रही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार आने से लोगों की ललक सोने के प्रति घटी है, वहीं डाॅलर के प्रति बढ़ी है। दूसरा कारण साइप्रस में आर्थिक मंदी से बचने के लिए बड़े पैमाने पर सोना का बेचा जाना है। माना जा रहा है कि उपरोक्त कारणों से सोने की कीमत में भारी गिरावट आई है।

माना यह भी जा रहा है कि आर्थिक संकट से उबरने के लिए इटली भी अपना सोना बेच सकता है। एक अनुमान के अनुसार इटली के पास 2500 टन सोना है। भारत के संदर्भ में सोने की कीमत के लुढ़कने से उसके चालू खाते के घाटे में कमी आने की संभावना है, क्योंकि भारत में होने वाले आयात में सोने का उल्लेखनीय हिस्सा है। बता दें कि आयात और निर्यात के बीच जो अंतर होता है उसे चालू खाते का घाटा या फायदा कहते हैं। निर्यात के मुकाबले आयात अधिक होने पर घाटा होता है और निर्यात अधिक होने के मामले में फायदा होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो सोने की कीमत में कमी आने से चालू खाते के घाटे में सुधार आ सकता है, लेकिन ध्यान देने वाली बात यहाँ यह है कि इससे बैंकों के अरबों-खरबों रुपये गैर निष्पादित आस्ति या परिसंपत्ति (एनपीए) में भी तब्दील हो सकते हैं। पुनष्चः ध्यातव्य है कि सोने के आयात को हतोत्साहित करने के लिए पूर्व में सरकार ने आयात पर कर लगाया था, पर उसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। सोने के  अंतरराष्ट्रीय बाजार में मची घमासान एवं अमेरिकी अर्थव्यवस्था में होने वाले सुधारों के आलोक में कहा जा सकता है कि भारत में फिलहाल सोना के सस्ता होने का दौर जारी रहेगा। अगर आगे आने वाले दिनों में सोने की कीमत में फिर से गिरावट दर्ज की जाती है, तो बैंकों में एनपीए का स्तर कहाँ पहुँचेगा, इसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। विदित हो कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए स्तर मार्च, 2011 में 71080 करोड़ रुपया था, जो दिसबंर, 2012 में बढ़कर 1.55 लाख करोड़ रुपया हो गया था। ध्यान रहे कि इस आँकड़ें में निजी बैंक और विदेशी बैंकों का एनपीए स्तर शामिल नहीं है। हालतानुसार कहा जा सकता है कि बैंकों के अरबो-खरबों रुपये फिर से एनपीए के जाल में फँसने वाले हैं।

बिजनेस बढ़ाने के लिए बिजनेसमैन या व्यापारी तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं, लेकिन बैंकों द्वारा बाँटे गये गोल्ड लोन को हम उस नजरिए से नहीं देख सकते हैं। बैंक में ऋण वितरित करने का एक सिद्धांत होता है। इस सिद्धांत के तहत एक बास्केट या सेगमेंट में एक सीमा से अधिक ऋण कभी भी नहीं बाँटा जाता है। इस सिद्धांत को भूल कर बैंकों ने गोल्ड लोन के रुप में जमकर एडवांस (ऋण बाँटा) किया। यहाँ दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गोल्ड लोन दक्षिण भारत में देना कुछ हद तक सुरक्षित माना जा सकता है, लेकिन उत्तर भारत में नहीं, क्योंकि दक्षिण भारत का सामाजिक ताना-बाना इस तरह का है कि वहाँ का आम आदमी भी सोने की परख कर सकता है, किन्तु उत्तर भारत में नहीं। बैकों में अधिकांशत सोनार से सोने की शुद्धता की जाँच करवाकर गोल्ड लोन दिया जाता है। बैंकों के दूर-दराज की शाखाओं में इस तरह की सुविधा नहीं होती है, तो स्वंय बैंककर्मी सोने की शुद्धता की जाँचकर गोल्ड लोन वितरित करते हैं। चूँकि सोनार कोई बैंक का कर्मचारी नहीं होता है, इसलिए इस मामले में घपला होने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। इसके अलावा सभी बैंककर्मी भी सोने की परख करने में कुशल नहीं होते हैं, जिसके कारण गोल्ड लोन देने में जोखिम सर्वदा बरकरार रहता है।

माना जा रहा है कि विगत 4 वर्षों में बैंकों द्वारा कुल कर्ज राशि के वितरण में औसतन 16 से 17 प्रतिषत की वृद्धि हुई, जबकि गोल्ड लोन के मामले में वृद्धि दर 70 से 80 प्रतिषत रहा। यह भी माना जा रहा है कि अगर इसी गति से बैंक गोल्ड लोन करते रहे तो वर्ष, 2016 तक गोल्ड लोन का हिस्सा कुल कर्ज का 7 प्रतिषत हो जाएगा। जानकारों की मानें तो बैंकों की मुश्किल वर्ष, 2011 एवं वर्ष, 2012 में बाँटे गये गोल्ड लोन से बढ़ सकती है, क्योंकि उस दौरान सोने की कीमत प्रति 10 ग्राम 30000 से 32000 रुपये रही थी।

इसके बरक्स मजेदार बात यह है कि जब पानी सिर से ऊपर निकल गया तो रिजर्व बैंक ने बैंकों को गोल्ड लोन बाँटने में 40 प्रतिषत का मार्जिन रखने का निर्देष दिया है। बता दें कि पूर्व में रिजर्व बैंक ने इस तरह का कोई दिशा-निर्देश बैंकों के लिए जारी नहीं किया था। यधपि भारतीय स्टेट बैंक ने इस मामले में 70 प्रतिषत लोन टू वैल्यू (एलटीवी) का मानक रखा था, जिसे कालांतर में बेंचमार्क मानकर अन्य सरकारी बैंकों ने भी अपनाया। एलटीवी उस सीमा को कहते हैं, जिसे ऋण के जोखिम के अनुसार तय किया जाता है। यहाँ बताना जरुरी है कि सोने का स्कै्रप वैल्यू 75 प्रतिषत माना गया है। स्कै्रप वैल्यू 24 कैरट सोने की कीमत होती है और इसे निर्धारित करते समय जेवर में से उसके बनाने की कीमत को घटा दिया जाता है। गोल्ड लोन देने के क्रम में बैंक इस पहलू को भी ध्यान में रखते हैं।

गौरतलब है कि 26 नवंबर के उच्चतम भाव 32500 रुपये के मुकाबले अब सोना की कीमत 26 प्रतिषत घटकर महज 25900 रुपये प्रति दस ग्राम हो गया है।  सूत्रों के अनुसार गोल्ड लोन का बाजार लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का है। इसमें से 60 प्रतिषत बाजार संगठित क्षेत्र में है, जिसमें गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ और बैंक दोनों शामिल हैं।

यहाँ यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि इसमें से गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) मसलन, मुथूट फाइनेंस, मण्णपुरम फाइनेंस, मुथूट फिनकार्प आदि की हिस्सेदारी 75 से 80 प्रतिषत तक है। ऐसी कंपनियाँ मौजूदा समय में भी अमूमन 25 से 30 प्रतिषत ब्याज दर पर गोल्ड लोन मुहैया करवाती हैं। मामले की गंभीरता को भांपकर गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ने अपना रिकवरी प्रोसेस  शुरु कर दिया है। इस बाबत जो कर्जदार सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं, उनका सोना नीलाम भी किया जा रहा है। कुछ मामलों में कर्जदारों से अतिरिक्त प्रतिभूति भी मांगे जा रहे हैं, लेकिन गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की तरह बैंकों के लिए इस तरह की रणनीति को अमलीजामा पहनाना आसान नहीं होगा।

स्थिति की नजाकत को देखते हुए रेटिंग एजेंसी इक्रा ने मण्णपुरम और मुथूट की दीर्धावधि रेटिंग स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया है। हालत में यदि सुधार नहीं होता है तो रेटिंग एजेंसियों की गाज बैंकों पर भी गिर सकती है। पड़ताल से स्पष्ट है कि बैंकों द्वारा प्रदत्त गोल्ड लोन के वर्तमान परिस्थितियों में एनपीए होने के प्रबल आसार हैं। इस आधार पर आकलन किया जा सकता है कि पहले से ही एनपीए से निजात पाने में फिसड्डी रही बैंकों के लिए दिल खोलकर बाँटे गये गोल्ड लोन गले में फंसी हड्डी बन सकते हैं।

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