वरूण ने बिछाया श्वेत जाल

डॉ. मधुसूदन

बाहर था हिमपात निरंतर,
उदास मन,बैठा था घरपर,
पढी आप की काव्य पंक्तियाँ।
उडा ले गयींं कहीं पंखों पर।

अचरज अचरज अपलक अपलक
पल में हिम भी रुई बन गया।
और रुई का फूल हो गया।
श्वेत पँखुडियाँ होती झर-झर॥

अब,श्वेत पँखुडियाँ झरती बाहर।
शीतकाल,बसंत बन गया॥
“आ गया ऋतुराज बसन्त
मधुऋतु लाई सुख अनंत॥”

“कष्ट शीत का दूर हो गया
मधु-ऋतु लाई सुख अनन्त॥
आ गया ऋतुराज बसन्त।
छा गया ऋतुराज बसन्त॥”

7 thoughts on “वरूण ने बिछाया श्वेत जाल

  1. शकुन जी की वासन्ती कविता ने आपके कवि मन में वसन्त की सुषमा का संचार कर दिया,और बाहर झरते हिमपुष्पों के बीच मधुऋतु का आभास मुग्ध कर गया.

    1. विद्वद्वर मधुसूदन जी को मेरी कविता पढ़कर प्रतिक्रिया स्वरूप जो अनुभूति हुई और हिमपात के दृश्य में भी उनकी एक नूतन भावपूर्ण कविता उभर करआई , ये उनके सहृदय कवि-हृदय की मनोरम अभिव्यक्ति है । मन मुग्ध हो गया ।
      मेरी कविता में सौन्दर्य-वृद्धि एवं मेरा उत्साहवर्धन करने के लिये मैं उनके प्रति आभारी हूँ।

      कवयित्री प्रतिभा जी एवं श्री सुब्रमनियन जी के सहृदयतापूर्ण शब्दों से मन उत्साहित भी हुआ और प्रफुल्लित भी । आभार स्वीकार करें ।

  2. Dr.Madhusudhanji, aap jaise vidwanon ke madhya apne aap ko “hansa madhye bakoriva” mehasoos karta hoom kyonki hum anpad hai

    1. सुब्रमनियन जी , ईश्वर करे भारत के सभी निरक्षर आप जैसे अनपढ़ बन जाएँ ,तो देश का नक़्शा ही बदल जाए । वह दिन हमारे लिये बहुत ही शुभ होगा ।

    2. आ. सुब्रह्मण्यन जी आपकी विनयवाणी ही *विद्या ददाति विनयं॥* की सच्चाई प्रमाणित करती है। साथ आप की हिन्दी भी हर्षित करती है।
      कविता पढने के लिए और टिप्पणी देने के लिए धन्यवाद।

      डॉ. मधुसूदन

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