लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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– डॉ. दीपक आचार्य

जो लोग आए हैं उन्हें कभी न कभी तो जाना ही है। अपने पूरे जीवनकाल में ढेरों अवसर ऐसे आते हैं जब हमें कुछ न कुछ नया सोचने और करने को मिलता है।

जो लोग नित नूतनता को जीवन की सारी चुनौतियों से ऊपर मानकर नए-नए प्रयोगों को अपने जीवन में अपनाते रहते हैं वे ऐसा बहुत कुछ हासिल कर लेते हैं जिसके लिए जमाना उन्हें अग्रणी पंक्ति में स्वीकारने लग जाता है। लेकिन जो लोग इन अवसरों को समझ नहीं पाते या कि लाभ नहीं ले पाते वे ठहरे हुए पानी की तरह ही बने रहते हैं।

अधिकतर लोगों की मनोवृत्ति यथास्थितिवादी हुआ करती है और ये लोग जहां हैं, जैसे हैं वैसे ही हरदम बने रहना चाहते हैं। इसी ठहराव की वजह से उनके पूरे जीवन में जड़ता अपना गहरा स्थान बना लेती है और ये लोग जीवनयात्रा के अन्त तक यथास्थितिवादी बने रहते हैं।

ऐसे लोगों के लिए जमाने के परिवर्तन और नई सोच कोई मायने नहीं रखती। वे जीवित ही इसलिये हैं कि उन्हें बने रहना है और जैसे-तैसे जीवन की गाड़ी को धक्के दे देकर आगे खिसकाते रहना है उस दिन के लिए जब तक ऊपर वाला उन्हें यहां से आकस्मिक खिसका न दे।

समाज-जीवन और कर्म के किसी भी क्षेत्र में कर्मयोग और व्यक्तित्व की सुगंध पाने के लिए निरन्तर प्रयोगधर्मा और सृजनशील व्यक्तित्व का होना जरूरी है। इसके लिए जड़ता व यथास्थितिवादी सोच और व्यवहार को त्यागना जरूरी है। इसके बगैर जीवन में विकास और गंध की कल्पना कदापि नहीं की जा सकती।

जो लोग जड़ता और ‘जैसा हो रहा है चलने दो ’ जैसे विचारों को अपने जीवन में अपना चुके होते हैं उनकी वजह से उन्हें कोई नुकसान हो या न हो, लेकिन ऐसे स्थिर लोगों की वजह से समाज और देश को जरूर नुकसान पहुंचने लगता है क्योंकि ये जहाँ होते हैं वहां किसी भी नई सोच और नवीन प्रयोगों का होना ये कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते और न नवाचारों और नवीन प्रयोगों में कभी कोई दिलचस्पी लेते हैं।

ऐसे लोग सृजनशीलता को प्रोत्साहन देने की बजाय हर नयी सोच और गतिविधि को हतोत्साहित करने में अपनी ऊर्जा खपा देते हैं। कई बड़ी-बड़ी उपलब्धियां सिर्फ इसी वजह से हासिल नहीं हो पाती हैं क्योंकि यथास्थितिवादी और जड़-बुद्धि लोगों का जमावड़ा आड़े आता रहता है।

आक्षितिज पसरी हुई दुनिया आज रोजाना नवीन आविष्कारों के साथ आसमान में छलाँगे लगाने लगी है और ऐसे में दुनिया में हो रहे परिवर्तनों को स्वीकारने के सिवाय हमारे पास कोई चारा नहीं है। इन परिवर्तनों का विश्लेषण करें और अपने तथा समाज एवं राष्ट्र के लिए उपयोगी बदलावों को हृदय से स्वीकारें। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखें कि कहीं हम अपनी जड़ों से न कट जाएं या दूर न हो जाएँ।

हालांकि दुनिया में जिन परिवर्तन और नित नवीन प्रयोगों का बोलबाला है वह हिन्दुस्तान के लिए कोई नई बात नहीं। लेकिन दासत्व और आत्महीनता के हम इतने शिकार हो चले हैं कि हमें अपनांे के द्वारा कही गई कोई भी बात अच्छी नहीं लगती।

इसी बात, वस्तु या प्रयोग को कोई विदेशी कह दे तो हम उसका उद्धरण दे देकर उसे श्रेष्ठता की कसौटी पर खरा उतरवा देते हैं। आज हमारा अपना कोई आत्मीय देश के चारों धामों की यात्रा करके आ जाए तो उसका उतना सम्मान नहीं करते, जितना विदेश यात्रा से लौटे हुए देशजों का।

हमको लगता है कि ये लोग स्वर्ग से लौट कर आए हैं तभी तो उनके स्वागत में उत्सव करते हैं, बड़े-बड़े विज्ञापन देते हैं और उनकी कही जाने वाली बातों को ब्रह्म वाक्य मानकर गले उतारते हैं।

आज जो कुछ विदेशों में हो रहा है उसे हमारे ऋषि-मुनियों ने सदियों और युगों पहले कर दिखाया है लेकिन उनकी ओर कोई ध्यान नहीं। आज हमें अच्छे कामों के लिए भी विदेशियों से सर्टीफिकेट्स पाने को मोहताज होना पड़ रहा है। निज देश का गौरव भुला बैठे हम लोगों के लिए भारतमाता का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है।

हम जहाँ हैं वहाँ जड़ता को छोड़कर उन सारे प्रयोगों को तहे दिल से अपनाना चाहिए जिनसे व्यवसायिक और सेवाभावी हुनर को नई दिशा मिले और समाज तथा देश के लिए हमारी स्पष्ट भागीदारी सामने आए।

यथास्थितिवादी बने रहकर हम महान और विकसित भारत तथा आत्मनिर्भर समुदाय की रचना कभी नहीं कर सकते। रोजाना कुछ न कुछ नया होना चाहिए। यह तभी संभव हो पाएगा जब हम अंधेरे कोनों और परंपरागत सोच से भरे हुए बौद्धिक परिसरों या कि दिमागी दिवालियेपन से बाहर निकलें। हमारी जड़ता समाप्त होगी, सृजनात्मक प्रयोगधर्मिता का विकास होगा तो समाज और देश का विकास अपने आप हो जाएगा। हम अपनी संस्कृति से जुड़े रहकर जो भी कुछ करेंगे वह दुनिया में प्रतिष्ठित होगा ही।

 

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