कुमार कृष्णन
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं बल्कि भारतीय समाज के नैतिक पुनर्जागरण की विराट गाथा है। यदि इस संघर्ष को केवल आंदोलनों, जेल यात्राओं और राजनीतिक समझौतों तक सीमित कर दिया जाए, तो उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती है। महात्मा गांधी ने स्वराज को केवल अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति नहीं माना; उन्होंने उसे आत्मसम्मान, सत्य, सामाजिक न्याय, भाषा, शिक्षा और मानवीय मूल्यों से जोड़कर देखा। उनके लिए राष्ट्र का निर्माण संसदों में नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र और समाज की चेतना में होता है। इसलिए उनकी यात्राएँ केवल राजनीतिक अभियान नहीं थीं, बल्कि भारत की आत्मा से संवाद की यात्राएँ थीं।
बिहार का भागलपुर इस दृष्टि से गांधी के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। वे यहाँ चार बार—1917, 1920, 1925 और 1934—आए। प्रत्येक यात्रा का उद्देश्य अलग था, परंतु लक्ष्य एक ही था—भारतीय समाज को भीतर से बदलना। पहली यात्रा में उन्होंने मातृभाषा और शिक्षा को स्वराज का आधार बनाया, दूसरी में असहयोग आंदोलन को नैतिक जनआंदोलन का स्वर दिया, तीसरी यात्रा में सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक विश्वास का संदेश दिया तथा चौथी बार भूकंप राहत और हरिजन सेवा के माध्यम से करुणा को राष्ट्रनिर्माण का आधार बताया। इन चार यात्राओं को एक साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि भागलपुर गांधी के लिए केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत के नैतिक मानचित्र का एक जीवंत केंद्र था।
*कटहलबाड़ी : जहाँ भाषा बनी स्वराज की पहली शर्त*
15 अक्टूबर 1917 को भागलपुर के कटहलबाड़ी में बिहारी छात्रों का ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता स्वयं महात्मा गांधी ने की। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित बिहार के अनेक शिक्षाविद, समाजसेवी और सार्वजनिक जीवन के प्रतिनिधि उसमें उपस्थित थे। गांधी ने अपने अध्यक्षीय भाषण की शुरुआत हिंदी में करते हुए कहा—
“मुझे अध्यक्ष का पद देकर, हिंदी में व्याख्यान देने और सम्मेलन का कार्य हिंदी में चलाने की अनुमति देकर आपने मेरे प्रति अपने प्रेम का परिचय दिया है।”
यह केवल औपचारिक धन्यवाद नहीं था। यह उस मानसिक दासता के विरुद्ध उद्घोष था जिसने भारतीयों को यह विश्वास दिला दिया था कि आधुनिक ज्ञान, प्रतिष्ठा और प्रगति का माध्यम केवल अंग्रेज़ी ही हो सकती है। गांधी ने विद्यार्थियों से कहा कि जिस राष्ट्र को अपनी भाषा पर विश्वास नहीं होता, वह अपनी आत्मा पर भी विश्वास नहीं कर सकता। शिक्षा तभी लोकतांत्रिक होगी जब वह जनता की भाषा में उपलब्ध होगी।
इसी अवसर पर उन्होंने वह ऐतिहासिक वाक्य कहा, जो आज भी भारतीय शिक्षा-दर्शन की आधारशिला माना जाता है—
“मातृभाषा का अनादर, माँ के अनादर के बराबर है।”
गांधी का आशय किसी एक भाषा का वर्चस्व स्थापित करना नहीं था। वे भारत की सभी मातृभाषाओं के समान सम्मान के पक्षधर थे। बंगला, तमिल, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, मैथिली अथवा हिंदी—हर भाषा उनके लिए भारत की सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग थी। साथ ही वे यह भी मानते थे कि इतने विशाल देश को जोड़ने के लिए एक ऐसी संपर्क भाषा आवश्यक है जिसे अधिकांश भारतीय सहजता से समझ सकें। इसलिए उन्होंने हिंदी अथवा व्यापक अर्थ में हिंदुस्तानी का समर्थन किया।
गांधी अंग्रेज़ी के विरोधी नहीं थे। वे स्वयं अंग्रेज़ी के गहरे अध्येता थे। उनका विरोध उस व्यवस्था से था जिसमें ज्ञान और अवसर केवल अंग्रेज़ी जानने वाले सीमित वर्ग तक सिमट जाएँ। उनका विश्वास था कि यदि शिक्षा जनता की भाषाओं में उपलब्ध नहीं होगी तो लोकतंत्र भी अधूरा रह जाएगा।
आज, जब भारतीय भाषाओं में चिकित्सा, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में नए प्रयास हो रहे हैं, तब भागलपुर में एक शताब्दी पहले व्यक्त गांधी की यह दृष्टि आश्चर्यजनक रूप से समकालीन प्रतीत होती है। उन्होंने विद्यार्थियों को केवल भाषा का सम्मान करना नहीं सिखाया, बल्कि आत्मविश्वास का पहला पाठ पढ़ाया। उनके लिए स्वराज की शुरुआत राजनीतिक स्वतंत्रता से पहले सांस्कृतिक स्वाभिमान से होती थी।
कटहलबाड़ी का वह सम्मेलन इसलिए केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का वैचारिक मोड़ था। यहीं गांधी ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र भारत की नींव केवल राजनीतिक आज़ादी पर नहीं, बल्कि भाषा, शिक्षा और आत्मसम्मान के लोकतंत्रीकरण पर रखी जाएगी।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस समाज में जाति और अस्पृश्यता जीवित रहेगी, वह वास्तविक स्वराज का अधिकारी नहीं बन सकता।
इसी क्रम में उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता का वह संदेश दिया जो आज भी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है—
“राम और रहीम एक ही सत्य के दो नाम हैं।”
गांधी के लिए धर्म मनुष्य को जोड़ने का माध्यम था, विभाजन का नहीं। उनका मानना था कि यदि किसी धर्म के नाम पर घृणा फैलती है, तो दोष धर्म का नहीं, मनुष्य के अहंकार का है।
आज जब समाज वैचारिक ध्रुवीकरण, डिजिटल अफवाहों और अविश्वास की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भागलपुर में गांधी द्वारा दिया गया यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को सम्मानपूर्वक साथ लेकर चलने की क्षमता में निहित है।
*‘यंग इंडिया’ की चेतावनी और आज का भारत : गांधी अब भी क्यों प्रासंगिक हैं?*
1934 की यात्रा गांधी के भागलपुर प्रवास का अंतिम, किंतु अत्यंत मार्मिक अध्याय थी। 15 जनवरी 1934 के विनाशकारी बिहार भूकंप ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया था। अप्रैल 1934 में गांधी राहत और पुनर्निर्माण के उद्देश्य से भागलपुर पहुँचे। वे सहरसा से बिहपुर आए और वहाँ से स्टीमर द्वारा गंगा पार कर भागलपुर पहुँचे। उनका ठहराव स्वतंत्रता सेनानी दीप नारायण सिंह के निवास पर हुआ।
लाजपत पार्क की विशाल सभा में उन्होंने भूकंप पीड़ितों की सहायता के लिए लोगों से उदारतापूर्वक सहयोग का आह्वान किया। स्वयंसेवक झोली लेकर लोगों के बीच घूमते रहे और गांधी अपने हस्ताक्षर के बदले प्राप्त होने वाली राशि भी राहत कोष में समर्पित कर देते थे। यह केवल धन-संग्रह नहीं था; यह करुणा को सार्वजनिक जीवन का मूल्य बनाने का प्रयास था।
किन्तु इस यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश राहत कार्यों से भी आगे था। गांधी ने कहा कि यदि कोई आपदा मनुष्य के भीतर करुणा और संवेदना नहीं जगा पाती, तो उससे मिली सबसे बड़ी शिक्षा व्यर्थ चली जाती है। उन्होंने हरिजन सेवा को अपने अभियान का केंद्र बनाया और अस्पृश्यता को भारतीय समाज की सबसे बड़ी नैतिक विफलताओं में एक बताया। उनके लिए पुनर्निर्माण का अर्थ केवल ढही हुई इमारतों को खड़ा करना नहीं, बल्कि समाज के भीतर टूटे विश्वास, समानता और मानवता का पुनर्निर्माण भी था।
इस प्रकार भागलपुर में गांधी की चारों यात्राएँ एक-दूसरे से जुड़ती चली जाती हैं—1917 में भाषा का स्वाभिमान, 1920 में सत्याग्रह और स्वराज, 1925 में सामाजिक समरसता तथा 1934 में करुणा और सामाजिक न्याय। यह केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि भारत के नैतिक निर्माण की क्रमिक यात्रा थी।
भागलपुर की तीसरी यात्रा के कुछ ही दिनों बाद, 22 अक्टूबर 1925 को गांधी ने अपने साप्ताहिक पत्र यंग इंडिया में वह संक्षिप्त लेख लिखा, जिसे पूरी दुनिया आज “सात सामाजिक पाप” के नाम से जानती है। उन्होंने चेताया कि किसी राष्ट्र का पतन अचानक नहीं होता; वह तब आरम्भ होता है जब सार्वजनिक जीवन से सिद्धांत, श्रम, विवेक, चरित्र, नैतिकता, मानवता और त्याग धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। उन्होंने जिन सात सामाजिक पापों का उल्लेख किया, वे थे—सिद्धांतों के बिना राजनीति, मेहनत के बिना धन, विवेक के बिना आनंद, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवता के बिना विज्ञान तथा बलिदान के बिना उपासना।
यदि भागलपुर में गांधी की चारों यात्राओं को एक साथ पढ़ा जाए, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि उन्होंने जिन प्रश्नों को यहाँ उठाया—मातृभाषा का सम्मान, सत्याग्रह, सामाजिक समानता, सांप्रदायिक सद्भाव, अस्पृश्यता का उन्मूलन और करुणा—वे वस्तुतः इन्हीं सात सामाजिक पापों के प्रतिरोध का व्यावहारिक कार्यक्रम थे। इस दृष्टि से भागलपुर गांधी के विचारों का केवल ऐतिहासिक पड़ाव नहीं, बल्कि उनकी नैतिक प्रयोगशाला था।
आज भारत विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है। फिर भी गांधी के प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। क्या राजनीति सिद्धांतों के बिना टिक सकती है? क्या आर्थिक विकास नैतिकता के बिना समाज का विश्वास अर्जित कर सकता है? क्या शिक्षा चरित्र के बिना पूर्ण है? क्या विज्ञान मानवता से अलग होकर सभ्यता को सुरक्षित रख सकता है? ये प्रश्न किसी एक दल या सरकार के नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समाज के हैं।
इस वर्ष भागलपुर गांधी की 1925 की ऐतिहासिक यात्रा का शताब्दी वर्ष मना रहा है। 7, 8 और 9 अगस्त को महात्मा गांधी भागलपुर आगमन शताब्दी समारोह तथा गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र, भागलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान से संवाद का अवसर हैं। यह आयोजन हमें स्मारकों से आगे बढ़कर गांधी के विचारों को अपने सार्वजनिक जीवन में पुनः पढ़ने और समझने का निमंत्रण देता है।
इतिहास में कुछ यात्राएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। वे समय के साथ निरंतर चलती रहती हैं। भागलपुर में गांधी की चार यात्राएँ भी ऐसी ही यात्राएँ हैं। उन्होंने यहाँ भाषा को आत्मसम्मान का आधार, सत्याग्रह को जनशक्ति का स्वर, सामाजिक समरसता को राष्ट्र की अनिवार्य शर्त और करुणा को राजनीति का सर्वोच्च मूल्य बनाया।
आज भागलपुर केवल गांधी की यात्राओं का नगर नहीं, बल्कि भारत की नैतिक चेतना का जीवित दस्तावेज़ है। यह नगर हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल संसदों, न्यायालयों और सरकारों से नहीं बनते; वे विद्यालयों, भाषाओं, समाज की संवेदनाओं और नागरिकों के चरित्र से बनते हैं।
शायद इसलिए भागलपुर की धरती आज भी गांधी की वही शांत, किंतु अडिग आवाज़ सुनाती प्रतीत होती है—”स्वराज केवल सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की स्वतंत्रता है।” यदि राजनीति में सिद्धांत, शिक्षा में चरित्र, विज्ञान में मानवता, व्यापार में नैतिकता और समाज में करुणा जीवित रहे, तभी स्वतंत्रता अपने वास्तविक अर्थों में जीवित रहेगी।
भागलपुर की विरासत हमें यह भी सिखाती है कि इतिहास का सम्मान केवल स्मारकों के निर्माण से नहीं होता, बल्कि उन मूल्यों को अपने समय में जीवित रखने से होता है जिनके लिए महात्मा गांधी ने अपना जीवन समर्पित किया। शताब्दी वर्ष का सबसे बड़ा संदेश यही है कि गांधी को स्मरण करने का सर्वोत्तम तरीका उनके विचारों को सार्वजनिक जीवन, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक व्यवहार में पुनर्स्थापित करना है। जब तक भारत अपने नैतिक विवेक को सुरक्षित रखेगा, तब तक गांधी की भागलपुर यात्राएँ इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य का पथ-प्रदर्शन करती रहेंगी।
कुमार कृष्णन