राजनीति

क्या बिहार से बदलती राजनीति का नया अध्याय शुरू हो चुका है?

बांकीपुर उपचुनाव का संदेश:

अशोक कुमार झा

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम केवल एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित घटना नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में उपचुनाव अक्सर जनता के तत्कालीन राजनीतिक मनोभावों का आईना माने जाते हैं। यही कारण है कि बांकीपुर के इस चुनाव परिणाम ने बिहार ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस चुनाव में प्रशांत किशोर की जीत ने कई राजनीतिक संदेश दिए हैं और यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। जनता जब चाहती है तो किसी भी स्थापित राजनीतिक दल को सत्ता के शिखर तक पहुंचा सकती है और जब उसके विश्वास को ठेस पहुंचती है तो वही जनता उसे कठोर संदेश देने में भी पीछे नहीं हटती।

बांकीपुर की यह सीट संख्या की दृष्टि से भले ही बिहार विधानसभा की सत्ता का समीकरण बदलने वाली सीट नहीं थी क्योंकि एक सीट के परिणाम से राज्य सरकार के बहुमत पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ना था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने पूरी ताकत इस सीट पर झोंक दी। चुनाव प्रचार में संसाधनों की कोई कमी नहीं छोड़ी गई। इसके बावजूद यदि जनता ने एक अलग निर्णय दिया, तो स्वाभाविक रूप से यह परिणाम केवल हार-जीत तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि इसके राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी दूरगामी होते हैं।

प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा भी इस चुनाव के संदर्भ में उल्लेखनीय है। लंबे समय तक चुनावी रणनीतिकार के रूप में कार्य करने वाले प्रशांत किशोर ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने के बाद बिहार में अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयास किया। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें एक भी सीट नहीं मिली थी और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उनकी राजनीतिक संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। ऐसे समय में बांकीपुर उपचुनाव में मिली जीत केवल उनकी पहली विधानसभा सीट नहीं है बल्कि यह उनके राजनीतिक अभियान के लिए मनोबल बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। यह जीत उनके समर्थकों को यह विश्वास दिलाती है कि यदि संगठन मजबूत हो और जनता का भरोसा मिले तो नई राजनीतिक शक्तियां भी स्थापित दलों को चुनौती दे सकती हैं।

यह परिणाम भारतीय जनता पार्टी के लिए आत्ममंथन का विषय भी माना जा सकता है। लोकतंत्र में चुनावी हार को केवल विरोधियों की सफलता मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होता। प्रत्येक हार अपने भीतर कुछ संदेश लेकर आती है। यदि कोई दल उन संदेशों को समझने का प्रयास करता है तो वह भविष्य में स्वयं को और अधिक मजबूत बना सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि भाजपा इस परिणाम का गंभीर विश्लेषण करे और यह समझने का प्रयास करे कि आखिर कुछ ही समय पहले जिस जनता ने उसे व्यापक समर्थन दिया था, उसी जनता के एक हिस्से ने इस उपचुनाव में अलग निर्णय क्यों लिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद जनता के बीच कई प्रकार की चर्चाएं हुई हैं। कुछ लोगों की राय है कि मुख्यमंत्री के चयन को लेकर भाजपा के पारंपरिक समर्थकों के एक हिस्से में असंतोष दिखाई दिया। दूसरी ओर भाजपा समर्थकों का एक वर्ग इस निर्णय को संगठनात्मक आवश्यकता और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानता है। लोकतंत्र में दोनों प्रकार की राय स्वाभाविक हैं। किसी भी राजनीतिक निर्णय का अंतिम मूल्यांकन अंततः जनता ही चुनाव के माध्यम से करती है।

इसी प्रकार विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों ने भी जनता के बीच चर्चाओं को जन्म दिया। उच्च शिक्षा से जुड़े यूजीसी से संबंधित प्रस्तावों, आरक्षण, सामाजिक न्याय, युवाओं की रोजगार संबंधी अपेक्षाओं, महंगाई, स्थानीय विकास तथा कानून-व्यवस्था जैसे अनेक विषय चुनावी विमर्श का हिस्सा बने। इनके अतिरिक्त चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण को लेकर भी विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा अनेक प्रश्न उठाए गए। इन सभी विषयों ने मिलकर मतदाताओं के मनोविज्ञान को प्रभावित किया या नहीं, इसका अंतिम और प्रमाणिक निष्कर्ष तो विस्तृत चुनावी अध्ययन के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन इतना अवश्य है कि चुनाव केवल एक मुद्दे पर नहीं, बल्कि अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव से प्रभावित होते हैं।

बिहार की राजनीति का इतिहास भी इस परिणाम को विशेष महत्व देता है। यही वह भूमि है जहां से स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा मिली, जहां लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति का आंदोलन प्रारंभ हुआ और जहां सामाजिक न्याय की राजनीति ने राष्ट्रीय विमर्श को नई दिशा दी। बिहार ने अनेक बार देश की राजनीति को नई राह दिखाई है। इसलिए यहां के चुनावी संकेतों को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से देखा जाता है।

बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम यह भी बताता है कि लोकतंत्र में मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक हो चुका है। आज का मतदाता केवल नारों या भावनात्मक अपील से प्रभावित नहीं होता, बल्कि वह सरकारों के कामकाज, जनप्रतिनिधियों की उपलब्धता, विकास कार्यों, प्रशासनिक निर्णयों और सामाजिक वातावरण का भी मूल्यांकन करता है। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और बढ़ती राजनीतिक जागरूकता ने मतदाताओं को पहले की तुलना में अधिक सूचनासंपन्न बना दिया है। यही कारण है कि आज जनता किसी भी दल को स्थायी समर्थन देने के बजाय प्रत्येक चुनाव में नए सिरे से उसका मूल्यांकन करती दिखाई देती है।

यह चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए भी एक संदेश है कि लोकतंत्र में अहंकार की कोई स्थायी जगह नहीं होती। जनता विश्वास करती है तो सत्ता देती है और यदि वही जनता स्वयं को उपेक्षित या असंतुष्ट महसूस करती है तो लोकतांत्रिक माध्यम से सत्ता को चेतावनी भी देती है। सत्ता का वास्तविक उद्देश्य जनसेवा है, न कि केवल राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना। इसलिए प्रत्येक दल को जनता के प्रति उत्तरदायी बने रहना होगा।

हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि किसी एक उपचुनाव के आधार पर पूरे राज्य या देश की आगामी राजनीति का अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। विधानसभा चुनाव का स्वरूप, मुद्दे, गठबंधन और मतदाताओं का व्यवहार उपचुनाव से भिन्न हो सकता है। फिर भी लोकतंत्र में छोटे चुनाव भी बड़े संकेत देते हैं और बांकीपुर का परिणाम भी उसी श्रेणी में देखा जा सकता है।

भाजपा आने वाले समय में जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता को और मजबूत करने के लिए क्या रणनीति अपनाती है, यह उसका राजनीतिक विषय है। वहीं प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी के सामने भी चुनौती कम नहीं है। एक सीट जीतना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन पूरे बिहार में स्थायी राजनीतिक विकल्प बनना कहीं अधिक कठिन कार्य है। जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि वह निरंतर प्रदर्शन और जनसरोकारों पर आधारित राजनीति की अपेक्षा करती है।

अंततः बांकीपुर उपचुनाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है। संविधान ने अंतिम शक्ति मतदाता को दी है और वही समय-समय पर अपने मत के माध्यम से सत्ता को दिशा भी देता है और चेतावनी भी। जो राजनीतिक दल जनता की अपेक्षाओं, संवेदनाओं और विश्वास का सम्मान करेगा, वही लंबे समय तक जनसमर्थन बनाए रख सकेगा। बिहार की इस एक सीट ने देश की राजनीति को इतना अवश्य याद दिला दिया है कि लोकतंत्र में कोई भी दल जनता से बड़ा नहीं होता।


अशोक कुमार झा