सार्वलौकिक व सार्वकालिक ग्रन्थ है भगवद्गीता

पवन कुमार अरविंद

रूस की अदालत ने भगवद्गीता के रूसी भाषा में अनूदित संस्करण ‘भगवत् गीता एस इट इज’ पर रोक लगाने और इसके वितरण को अवैध घोषित करने की याचिका 28 दिसम्बर को खारिज कर दी। इसके अनुवादक इस्कान के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद हैं। इसके प्रकाश में आने के बाद से ही कुछ ईसाई संगठनों ने खिलाफत का झंडा उठा लिया था। रूस के शक्तिशाली आर्थोडॉक्स चर्च का कहना था कि यह जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘मीन कांफ’ से कम नहीं है। चर्च से जुड़े एक संगठन ने जून में इसके खिलाफ साइबेरिया प्रांत के तोमस्क शहर की अदालत में याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि यह उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देती है। अदालत ने महीनों चली सुनवाई के बाद 19 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने 28 दिसम्बर के रूसी अदालत के फैसले पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि रूसी अदालत में दायर याचिका कुछ सनकी लोगों की दिमागी उपज थी। विगत दिनों इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में काफी हंगामा हुआ था। रूसी अदालत के फैसले की सूचना भारत सरकार ने भी लोकसभा को दी। लोकसभा में नेता सदन एवं वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने अधिकृत रूप से 29 दिसम्बर को बताया कि रूसी अदालत ने भगवद्गीता के अनूदित संस्करण पर प्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया है। प्रणव की सूचना का सभी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर स्वागत किया।

दरअसल, भगवद्गीता में विरोध लायक कुछ नहीं है। रूस में जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, उनकी पृष्ठभूमि सर्वविदित है। भगवद्गीता के संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास ने इसे मानवमात्र का धर्मशास्त्र कहा है। उन्होंने इसे सारे वेदों के प्राण और उपनिषदों का भी सार बताया है। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादार है फिर भी यह किसी सम्प्रदाय या मजहब का ग्रन्थ नहीं बन सका; क्योंकि सम्प्रदाय किसी न किसी रूढ़ि से जकड़े हैं। यह किसी विशिष्ट व्यक्ति, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, पन्थ या देश-काल का ग्रन्थ नहीं है बल्कि यह सार्वलौकिक व सार्वकालिक है। विश्व मनीषा की अमूल्य धरोहर है।

इसका प्रादुर्भाव महाभारत युद्ध के दौरान हुआ। युद्धक्षेत्र ‘कुरुक्षेत्र’ में कौरव और पाण्डव पक्ष की सेना लड़ने को तैयार थी और अपने-अपने सेनापतियों के शंख फूँकने की प्रतीक्षा कर रही थीं। ठीक उसी समय पाण्डव पक्ष का मुख्य योद्धा अर्जुन अपना ‘गाण्डीव’ रथ के पिछले हिस्से में रखकर बैठ जाता है और कृष्ण से कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। युद्ध में अपने ही प्रियजनों, सगे-संबंधियों को मारकर खून से सने राज्य का भोग करने से बेहतर भिच्छा का अन्न ग्रहण करना होगा। इसलिए हे भगवन् ! कोई दूसरा उपाय बताइए। क्योंकि अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर मेरे हाथ-पांव कांप रहे हैं।

कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करने के निमित्त उपदेश दिये थे। इस उपदेश का संकलन ही भगवद्गीता है। दरअसल, कृष्ण ने इस उपदेश का माध्यम अर्जुन को बनाया, लेकिन उनका उद्देश्य समूचे जगत को अमूल्य शिक्षा देने से था। यह युद्धक्षेत्र में दिया गया अहिंसा का अद्वितीय संदेश है।

गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसमें संजय-धृतराष्ट्र और कृष्णार्जुन के संवाद हैं। अज्ञान से आवृत्त धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के माध्यम से वह हस्तिनापुर राजमहल में बैठकर महाभारत युद्ध देखता व सुनता है। उसकी बातों में चिन्ता है, लेकिन पश्चाताप् का भाव नहीं है। उसको पश्चाताप् तब होता है जब सारा खेल खत्म हो जाता है। उसका रुख केवल प्रश्नवाचक है और संजय से बार-बार पूछता है कि कुरूक्षेत्र का ताजा समाचार क्या है?

भगवद्गीता का मूल श्रीकृष्णार्जुन संवाद है। इसमें वैश्विक सृष्टि के सारे निहितार्थ समाहित हैं। यह समाधानकारक ग्रन्थ है, साथ ही वैज्ञानिक भी। यह स्वयं में एक सम्पूर्ण ग्रन्थ है। इसमें कहीं भी हिंदू-मुस्लिम या अन्य मत-पंथ सम्प्रदायों की चर्चा नहीं है। इसमें प्रबंधन की शिक्षा और पर्यावरण परिरक्षण का पाठ है। त्याग है, तपस्या है। सदाचार के पाठ भी समाहित हैं। घर और परिवार के संचालन की शिक्षा है। समाज में बड़ों के साथ व्यवहारगत शिक्षा का समावेश है।

गीता का विरोध करने वाले याचिकाकर्ता ने सबसे बड़ा आरोप यह लगाया कि यह युद्ध के लिए प्रेरित करती है। हालांकि, कोई व्यक्ति क्या कहता है या क्या कहना चाहता है, इसका केवल शब्दों से ही अर्थ नहीं निकाला जा सकता। श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे? मनोगत भाव पूर्ण रूप से केवल वाणी द्वारा ही व्यक्त नहीं किये जा सकते। वाणी द्वारा कुछ तो व्यक्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक होते हैं। इसे कोई पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमश: चलकर उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि इसको समझने के लिए किसी योग्य पुरुष का सानिध्य आवश्यक है।

इस पर प्रतिबंध की मांग करने वाले याचिकाकर्ता ने गीता को समझने के लिए क्या किसी योग्य पुरुष की शरण ली, या फिर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ही सारे आरोप लगा दिए? हालांकि, भगवद्गीता में आस्तिकता-नास्तिकता और आस्था-अनास्था का प्रश्न ही नहीं है। यह तो समाज के सभी क्षेत्रों के प्रबंधन का पाठ है। यह देववाणी का संकलन है। यह कालजयी ग्रन्थ है। इस कारण इसकी प्रासंगिकता हर कालखण्ड में है। पूर्वाग्रह ही इसके विरोध की मूल प्रेरणा है।

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