भाषाई एकीकरण और क्षेत्रीय राजनीति

दुलीचंद कालीरमन

 किसी भी राष्ट्र के सांस्कृतिक एकीकरण में भाषा का महत्वपूर्ण स्थान होता है. भारत के मामले में हिंदी भाषा सांस्कृतिक एकीकरण की कड़ी बन सकती है. हिंदी भाषा के इस गुण को बहुत पहले की आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी ने पहचान लिया था. संविधान निर्माताओं ने भी हिंदी के इसी गुण को देखते हुए इसे राजभाषा का दर्जा दिया था.

 एक सच्चाई यह भी है कि भारत विविधताओं का देश है. कोई भी क्षेत्र अपनी क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान खोना नहीं चाहता. भाषा संस्कृति का महत्वपूर्ण अवयव है. वर्तमान में  भारत में  22 भाषाएं संविधान द्वारा अनुसूचित है. इतनी भाषाई विभिन्नता एक  समृद्ध सांस्कृतिक  विरासत की परिचायक है. लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हमें अपनी पहचान वैश्विक स्तर पर बनानी है तो किसी एक भाषा को भारतीय पहचान बनना पड़ेगा. 

 जब जब इस प्रकार के प्रयास किए गए तो क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने इसका सबसे ज्यादा विरोध किया. दक्षिण भारत में विशेषकर तमिलनाडु में हिंदी विरोध तमिल राजनीति की धुरी बन गई है. जब “त्रिभाषा-फार्मूला” लागू किया गया तब भी इसका विरोध हुआ. वर्तमान में एनडीए सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट जारी किया गया तब इसका दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों ने सबसे ज्यादा विरोध किया.  नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में स्कूली शिक्षा में छात्रों को हिंदी, अंग्रेजी व एक स्थानीय भाषा पढ़ाए जाने का प्रस्ताव था. लेकिन तमिलनाडु के विरोध के बाद केंद्र सरकार को यह प्रावधान हटाना पड़ा.  इससे पहले भी वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों, विभागों, निगमों और बैंक के अधिकारियों को यह निर्देश दिए थे की वे अपने ऑफिशियल नेटवर्किंग साइट्स पर हिंदी के प्रयोग को प्राथमिकता दें लेकिन इस बार भी विरोध के स्वर सबसे पहले दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों की तरफ से ही आए और केंद्र सरकार इस भारी विरोध के बाद अपने निर्णय से पीछे हट गई.

 भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो जब-जब राष्ट्रीय दलों की सरकार केंद्र में कमजोर हुई है, तब-तब क्षेत्रीय दल सांझा सरकारों के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को ताक पर रखकर अपनी क्षेत्रीय राजनीति को जीवित रखने के लिए राष्ट्रीय हितों से खिलवाड़ करते रहे हैं. हिंदी भाषा का विरोध भी इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए. केंद्र की कमजोर गठबंधन सरकारें  मूकदर्शक बनी यह सब बेचारगी से देखती रहती थी. 

 वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद देश में जिस तरह से आम आदमी के हित में फैसले लिए गए. उनसे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जनाधार लगातार खिसकने लगा है.  पहली बार देश में यह महसूस किया कि एक मजबूत राष्ट्र के रूप में हम विश्व में तभी अपनी पहचान बना सकते हैं जब केंद्र में राष्ट्रीय दल की मजबूत सरकार हो. क्षेत्रीय दलों की राजनीति सांस्कृतिक और भाषाई एकीकरण में आड़े आती है.  क्षेत्रीय दलों के अवसान का एक दूसरा कारण बढ़ता शिक्षा स्तर तथा संचार माध्यम भी हैं. आज देश का हर  पढ़ा-लिखा नागरिक राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में सोचता है इसलिए क्षेत्रीय दलों की नकारात्मक राजनीति के समर्थक लगभग हर राज्यों में घट रहे हैं.

 यह भी एक सच्चाई है कि किसी भी राष्ट्र और समाज में सब चीजें नियोजित और स्थाई नहीं होती. हिंदी भाषा के विरोध के साथ भी यही हुआ है. आज हिंदी बाजार की भाषा बन गई है. देश में संचार क्रांति के बाद  24 घंटे के समाचार व अन्य चैनलों के माध्यम से विज्ञापनों का एक संसार वजूद में आया है. इनका मुख्य उद्देश्य तो निजी व्यापारिक लाभ है लेकिन अपरोक्ष रूप से यह विज्ञापन हिंदी भाषा का विस्तार भी कर रहे होते हैं. यही हाल हिंदी फिल्मों को लेकर है. गुजरात से अरुणाचल तथा कश्मीर से लेकर  केरल तक हिंदी फिल्मों का विस्तार हिंदी भाषा के प्रति प्रेम को बढ़ावा दे रहा है. यहां तक कि पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों में भी हिंदी बोलने और समझने वाली नई पीढ़ी आ चुकी है. भारतीय हिंदी फिल्में देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी खासी लोकप्रिय हैं. कितने ही विदेशी नागरिक जब किसी हिंदी गीत को गुनगुनाते हैं तो सुखद अनुभूति होती है. चीन,  मध्य-एशिया तथा उत्तर पूर्व के देशों में भी भारतीय फिल्मों के माध्यम से हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है. विश्व के कोने कोने में बसने वाले भारतीय  नागरिक भी इसमें अपना योगदान दे रहे हैं. रोजगार के लिए पलायन भारत में एक सच्चाई है. उत्तर-पूर्व के लोगों का उत्तर-भारत में, बिहार तथा उत्तर प्रदेश से दक्षिण भारत में रोजगार के लिए पलायन भाषाई दूरियों को दूर कर रहा है. भाषा को लेकर पूर्वाग्रह मिटते जा रहे हैं.

 सूचना तकनीक के साथ शुरू में हिंदी भाषा ठीक से कदमताल नहीं कर सकी. शुरुआती दौर में अमूमन सारा कार्य व्यापार कंप्यूटर पर अंग्रेजी भाषा में ही होता था. हिंदी के फोंट को लेकर भी समस्या थी. केवल कुछ ही वेबसाइट अपनी हिंदी की सामग्री को कंप्यूटर पर उपलब्ध करा रहे थे. जिनमें ‘वेबदुनिया’, ‘तहलका डॉट कॉम’ मुख्य थी. लेकिन हिंदी टंकण में फोंट की समस्या का निदान होते ही हिंदी का इंटरनेट पर 94% की दर से विस्तार हो रहा है. 

 दक्षिण भारत में भी “दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा” के प्रयासों से तथा व्यक्तिगत जरूरतों को लेकर हिंदी परीक्षा में बैठने वालों की संख्या में पिछले 5 सालों में 22% की बढ़ोतरी हुई है. वैश्विक जुड़ाव और क्षेत्रीय भाषाओं के सहयोग से हिंदी शब्दकोश निरंतर समृद्ध हो रहा है. हिंदी निदेशालय के सरकारी शब्दकोश में पिछले 20 वर्षों में शब्दों की संख्या 20 हजार से बढ़कर 1 लाख 50 हजार हो गई है.  विश्व के लगभग 170 देशों में हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र संघ  ने हिंदी में समाचार सेवा प्रारंभ की है. जो वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता को दर्शाता है.

 लेकिन बाहर से पहले हमें अपने घर पर ध्यान देना होगा. क्षेत्रीय भावनाओं को नजरअंदाज किए बिना हमें सकारात्मक राजनीतिक इच्छाशक्ति के बलबूते हिंदी को वह मुकाम हासिल करने से रोकने  के सभी नकारात्मक प्रयासों को  असफल करना होगा.  बाकी कार्य हिंदी खुद कर  लेगी.

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