बिहार को तय करना होगा विकास का नया पैमाना

हाल ही में, नीति आयोग द्वारा जारी सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) इंडिया इंडेक्स में राज्यों की सूची में केरल राज्य ने पहले की मानिंद इस बार फिर विकास में अपना वर्चस्व स्थापित किया है। केरल अपने 75 अंकों के साथ शीर्ष पर काबिज है।‌ हालांकि केंद्र शासित प्रदेशों में चंडीगढ़ केरल से 4 अंकों की बढ़त यानी 79 अंकों के साथ शीर्ष पर है। यह रैंकिंग शिक्षा में गुणवत्ता, स्वास्थ्य, साफ पानी, स्वच्छता सहित कई मानकों पर आधारित है। बता दें कि सतत विकास लक्ष्य इंडिया इंडेक्स में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय मानकों पर प्रगति का आकलन‌ किया जाता है। इस सूचकांक की शुरुआत आज से तीन वर्ष पहले दिसम्बर 2018 में हुई थी। इसके पहले संस्करण 2018-19 में 13 ध्येय, 39 लक्ष्यों और 62 संकेतकों को शामिल किया गया था। जबकि इस बार के तीसरे संस्करण में 17 ध्येय, 70 लक्ष्यों और 115 संकेतकों को शामिल किया गया है।

एसडीजी इंडिया इंडेक्स में राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को उनके अंकों के आधार पर चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है।‌ इसमें 0 से 49 अंकों के मध्य स्कोर करने वाले को प्रतियोगी यानी एस्पीरेंट कहा जाता है। वहीं, 50 से 64 के बीच अंक प्रदर्शन करने वाला यानी परफॉर्मर कहलाता है। सबसे आगे चलने वाला फ्रंट रनर 65 से 99 अंकों के बीच स्कोर करने वाला होता है। पुरे 100 अंक अर्जित करने वाले को एचीवर कहा जाता है। इस इंडेक्स में स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा व्यवस्था, लैंगिक समानता, गरीबी हटाने का लक्ष्य, सभी को भोजन, ऊर्जा, आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर, समानता और आधारभूत बुनियादी सुविधाओं आदि को आधार मानकर रैंकिंग ‌का निर्धारण किया जाता है। यदि हम इस बार 2020-21 के एसडीजी इंडिया इंडेक्स में टॉप पांच राज्यों की बात करें, तो इसमें जैसा कि 75 अंकों के साथ केरल शीर्ष पर है, 74 अंकों के साथ तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश शीर्ष से दूसरे स्थान पर बने हुए है। वहीं, 72 अंकों के साथ आंध्रप्रदेश, गोवा, कर्नाटक एवं उत्तराखंड तीसरे स्थान पर काबिज है। शीर्ष से चौथा स्थान सिक्किम को प्राप्त है, जिसे 71 अंक मिले हैं। 70 अंकों के साथ महाराष्ट्र पांचवे स्थान पर है। जबकि हम नीचले स्तर के प्रदर्शन की बात करें, तो‌ इसमें बिहार 52 अंकों के साथ सबसे नीचले पायदान पर है। यह प्रदर्शन वाकई किसी भी राज्य के लिए बेहद चिंताजनक है। ऐसे में, बिहार को अपने इस खस्ताहाल पर चिंतन और मंथन की सख्त दरकार है।

आजादी के बाद से ही बिहार की बदहाली आंकड़ों में लगातार देखी जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं।‌ यदि हम बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें, तो बिहार को सदा खुशहाल पाएंगे। बिहार उस भूमि को दिया जाने वाला नाम है, जिसने लोकतंत्र, शिक्षा, धर्म, राजनीति एवं ज्ञान विज्ञान में नया अध्याय लिखने के लिए सदैव मार्गदर्शन का काम किया है।‌ शिक्षा जगत में नालंदा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय के योगदान को कभी भूला बिसरा नाम की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। लेकिन, आज बिहार का दुर्भाग्य ही है कि उपजाऊ भूमि और खनिज के अपार भंडारों को गर्भ में धारण किए होने के बावजूद बिहार की गिनती मौजूदा वक्त में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक राज्य के रूप में होती है।‌

बिहार के पिछड़ेपन और खस्ताहाल के लिए कई कारण उत्तरदायी है। बिहार राज्य की प्रति व्यक्ति आय की बात करें, तो बिहार अपने सभी पड़ोसी राज्यों से कम प्रति व्यक्ति आय रखता है। बिहार की प्रतिव्यक्ति आय 2015-16 में रुपयों में 26801 आंकी गई है। यह भारत की तुलना में एक तिहाई है। आज बिहार की बहुत बड़ी आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भरता रखती है। बिहार की कार्यकारी जनसंख्या का 76 फीसदी कृषि कार्यों में लगा हुआ है। वर्तमान औद्योगिकीकरण और तकनीकी दौर में भी कृषि क्षेत्र में जनसंख्या का अत्यधिक होना उसके पिछड़ेपन का ही परिचायक है। आंकड़ों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि बिहार कृषि प्रधान प्रदेश है। बिहार के कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद भी उत्पादकता में कोई विशेष योगदान नहीं है। इसके पीछे का मुख्य कारण बिहार की कृषि का पिछड़ी होना है। भूमि सुधार का न होने एवं हरित क्रांति के प्रभाव से अछूता रहने के कारण बिहार में उत्पादन का स्तर कृषि क्षेत्र में निम्न स्तर का है। राज्य में कुल जोत का महज 49 फिसदी भूमि सिंचित है। जिस वजह से बिहार की कृषि पिछड़ी अवस्था में है। इधर बिहार की भूमि सिंचाई का अभाव झेल रही है, उधर हर वर्ष आने वाली बाढ़ ने बिहार की भौतिक अवस्था को बिगाड़ कर रख दिया है। बता दें कि बिहार की कुल भूमि का 73.06 फीसदी यानी दो-तिहाई भाग बाढ़ से ग्रसित है। हर वर्ष बाढ़ आने से बिहार की अर्थव्यवस्था पर बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बाढ़ के चलते विभिन्न प्रकार की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होने के साथ-साथ जल जमाव की समस्या भी खड़ी हो जाती है। देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का 17 फीसदी हिस्सा केवल बिहार में है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में बाढ़ से होने वाली क्षति का लगभग 12 फीसदी बिहार में होता है। यदि बिहार में बिजली उत्पादन की बात करें, तो बिहार की बिजली उत्पादन क्षमता न्यून है। किसी भी प्रदेश की कृषि हो या फिर उद्योग, इनका बिना ऊर्जा के संचालन संभव नहीं है। बिहार का विभाजन भी बिहार के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह बनकर उभरा है।‌ स्वतंत्रता के समय बिहार औद्योगिक रूप से अन्य राज्यों की तुलना में काफी आगे था, लेकिन बिहार के विभाजन के बाद सभी प्रमुख उद्योग झारखंड में चले गए और बिहार औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा राज्य बन गया। आंकड़े बताते हैं कि आज के बिहार के सात जिलों में एक भी औद्योगिक इकाई नहीं है। आज बिहार अपने आर्थिक पिछड़ेपन के कारण कई प्रकार के दुष्प्रभाव झेलने को मजबूर है। आज के बिहार की स्वास्थ्य सेवाएं में दिखती लड़खड़ाहट, लैंगिक समानता में असंतुलन, गरीबी, भूखमरी और बेकारी के आंकड़ों में बेतहाशा वृद्धि जग जाहिर है।

ऐसे में, बिहार को आर्थिक विकास का नया पैमाना तय करने की जरूरत है। बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के बावजूद भी बिहार में विकास की असीम संभावनाएं हैं। जिन्हें उचित प्रबंधन द्वारा दूर किया जा सकता है। इसके लिए सरकारी प्रयासों की सख्त आवश्यकता है। इसके अंतर्गत कृषि एवं ऊर्जा क्षेत्र में विकास, प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग, प्रशासनिक तंत्र में सुधार, संचार व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाना, कृषि आधारित उद्योग की स्थापना, कुटीर उद्योग के सुदृढ़ीकरण, पर्यटन उद्योग को बढ़ावा और कौशल विकास की दिशा में काम करने की जरूरत है। बिहार में कृषि विकास की असीम संभावनाएं हैं। इसलिए राज्य के विकास की प्राथमिकताओं में कृषि को महत्त्व देते हुए नीति बनाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय में इजाफा और लोगों के जीवन स्तर में सुधार की दिशा में कार्य का किया जाना निहायत जरूरी है।

  • अली खान

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