लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-सुरेश हिन्दुस्थानी-
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देश में लगातार हुए घोटालों से देश का आर्थिक विकास रुक गया है। विदेशों में खरबों रुपया कालेधन के तौर पर जमा है और इसे देश में वापस लाना जरूरी है। तभी समग्र विकास हो पाएगा। घोटालों से विकास के अवरुद्ध होने की बात बिल्कुल सही है। इससे भारत में सभी क्षेत्रों में बरबादी फैली हुई है। घोटालों और उसके कारण जमा हुआ कालाधन का दुष्परिणाम यह हुआ कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत आज खराब हो चुकी है। देश का विकास रुक गया है। मौजूदा हालात में काला धन वापस लाना जरूरी हो गया है।

केंद्र की नवगठित सरकार के कड़े और देश हितैषी फैसलों की पहल हो चुकी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ठोस योजना के फलस्वरूप काले धन के बारे में जो विशेष जांच समिति बनाई है, उसके सार्थक परिणामों की प्रतिध्वनि निनादित होने लगी है। देश को बर्बाद और बदनाम करने में जितना योगदान काले धन का है, उतना शायद ही किसी और बात का योगदान होगा। आज देश में जितनी भी अंतर बाह्य समस्याएं विद्यमान हैं, उसके मूल में यही कालाधान है।

देश की नई सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कालेधन के बारे में गठित की गई विशेष जांच समिति के परिणाम दिखाई देना शुरू हो गए हैं। इतना ही नहीं, पिछली केंद्र सरकार के अंतिम वर्ष में यह कालाधान 40 प्रतिशत बढ़ गया है। कालेधन के बारे यह संकेत मिलना स्वागतयोग्य कदम है। इससे देश की जनता में यह उम्मीद पैदा होती है कि वर्तमान सरकार कालेधन को लेकर ही मानेगी। देश के कई आर्थिक विश्लेषकों ने कई बार कालेधन के बारे में कहा है कि भारत की यह राशि इतनी ज्यादा है, कि अगर यह वापस आ जाये तो देश में कोई समस्या ही नहीं रहेगी। ऐसा नहीं है कि पूर्व की सरकारों के पास इसकी जानकारी नहीं मिली, उनको जानकारी अवश्य मिली थी, लेकिन न जाने वे कौन से कारण थे जिसके कारण उस सरकार ने जानकारी को उजागर नहीं होने दिया।

देश की अर्थव्यवस्था को चकनाचूर करने वाला कालेधन का यह खेल आम जनता के लिए कई प्रकार की विभीषिकाओं को जन्म दे रहा है। मसलन महंगाई और भ्रष्टाचार दलदल भी इसी खेल का दुष्परिणाम ही कहा जाएगा। क्योंकि देश में बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था को लाइन पर लाने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। इस पैसे को प्राप्त करने के लिए देश में तमाम तरह के कर लगा दिए जाते हैं और महंगाई में वृद्धि की जाती है। वर्तमान में इस बेतहाशा महंगाई के कम होने की उम्मीद तो पैदा की जा रही है, लेकिन जो कालाधन विदेशों में जमा है, उसे प्राप्त करने के सार्थक कदम उठाए जाने की भी आवश्यकता है। आज देश की अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कालेधन को प्राप्त करना बहुत ही आवश्यक है।

भारत में राजनीतिक दल सहित राष्ट्रभक्त संगठन इस बात के लिए हमेशा ही आवाज उठाते रहे हैं कि देश का कालाधान जो विदेशी बैंकों में जमा है, वह वापस आना चाहिए। योगगुरू बाबा रामदेव ने तो इस विषय को लेकर देश भर में आंदोलन की शृंखला ही खड़ी कर दी थी। बाबा रामदेव के इस अभियान को भारतीय जनता का व्यापक समर्थन हासिल हुआ। देश की नई केंद्र सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी ने भी चुनाव से पूर्व कालेधन के बारे में पूरे देश में घूमकर जनता के बीच प्रचार किया, इनको भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। इस समर्थन से एक बात तो साफ हो गई थी कि देश की जनता ऐसे लोगों के खिलाफ है जो देश के पैसे को कालेधन के रूप में विदेशी बैंकों की तिजोरियाँ भरता हो। आज देश मे कई ऐसे लोग हैं जिनका विदेशी बैंकों में पैसा जमा है, वह भी कलेधन के रूप में। अब यह तो साफ है कि यह पैसा अनीति पूर्वक कमाया हुआ धन है, जिसे धनाढ्य वर्ग के लोग छुपाकर रखना चाहते हैं। कालेधन के कारण ही आज देश में तमाम तरह की समस्याएं खड़ी हुई हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि कालाधन केवल भ्रष्टाचार के कारण ही आता है। जिस देश में जितना ज्यादा भ्रष्टाचार होगा, वह सब कालेधन की श्रेणी में ही आयेगा। हमारे देश में कई राजनेता तो ऐसे हैं जो राजनीति करने से पूर्व कुछ भी नहीं थे, यानि उनके पास चुनाव लडऩे तक को पैसे नहीं होते थे, लेकिन जैसे ही उन्हें कोई पद हासिल होता है, वह कमाई करने लग जाता है, सीधे शब्दों में कहा जाये तो वह राजनीति को व्यवसाय ही मानता है। देश की सरकारें व्यापार का केंद्र बन गई थीं। इस भ्रष्टाचार के कारण जहां नैतिक काम तो होते ही थे, साथ ही अनैतिक काम भी हो जाते थे। वर्तमान केंद्र सरकार ने राजनीति के व्यवसायीकरण को बंद करने का अच्छा रास्ता निकाला है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ तौर पर कहा है कि देश में कोई भी मंत्री या सांसद अपने निजी स्टाफ में अपने परिजनों की नियुक्ति नहीं कर सकता। क्योंकि वे जानते हैं कि परिजन ही ऐसे लोग होते हैं जिनकी बात कोई नहीं टाल सकता, यहाँ तक कि मंत्री या सांसद भी। नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के मन में एक उम्मीद तो पैदा की ही है कि इस सरकार के आने से देश में कुछ अच्छा ही होगा।

जिस राशि का लेन – देन अनैतिक तरीके यानि रिश्वत, तस्करी, रीयल स्टेट, घोटाले और जमाखोरी से कमाए गए पैसे को कालेधन के रूप में लाते हैं। चूंकि भारत में जितनी भी पैसा जमा करने वाली संस्था हैं, उन सभी में इन पैसों के आदान प्रदान करने वाले दस्तावेज प्रमाण के रूप में संलग्न किए जाते हैं, इसलिए इस धन के मालिक इन पैसों को जमा करने के लिए विदेशी बैंकों का सहारा लेते हैं। अप्रमाणित और गुप्त तरीके से जमा कराया गया धन ही कालेधन की श्रेणी में आता है। कहते हैं कि देश के गलत काम करने वाले लोग करोड़ों रुपये इसी प्रकार से कमाते हैं, उस कमाई को छुपाने के लिए ये लोग इस राशि को या तो तस्करी के धंधे में लगा देते हैं या फिर विदेशों में जमा कर देते हैं। विदेश की कई बैंकों में यह सुविधा है कि वह अपने यहाँ पर कई गुप्त खातों का संचालन करते हैं। इससे इन भ्रष्टाचारियों का वास्तविक चरित्र देश के सामने उजागर नहीं हो पाता। इस प्रकार के कारनामे से देश को बहुत बड़ा नुकसान होता है, इतना ही नहीं आयकर नहीं देने के बहाने लाखों करोड़ों की चपत देश को ही लगती है। अगर कर के रूप में यही पैसा देश को प्राप्त होने लगे तो देश को महंगाई और आर्थिक समस्या से मुक्त किया जा सकता है।

स्विस बैंक में सोनिया गांधी के अरबों डॉलर जमा होने की बात खुद स्विट्जरलैंड में ही उजागर हुई थी। यही वह देश है जहां दुनिया भर के भ्रष्टाचारी लूट का धन रखते हैं। स्विट्जरलैंड की एक प्रसिद्ध पत्रिका का स्वेजर इल्स्ट्रेट ने 19 नवंबर 1991 में एक रिपोर्ट प्रकाशित कर दावा किया था। इस दावे में विकासशील देशों के 13 बड़े नेताओं के नाम थे। जिनहोने भ्रष्ट तरीके से अर्जित क्ये गए पैसे को स्विस बैंकों में जमा किया था। राजीव गांधी का नाम भी इस पत्रिका की सूची में शामिल था। स्वेजर इल्स्ट्रेट कोई छोटी पत्रिका नहीं है, बल्कि इसकी दो लाख से ज्यादा प्रतियां बिकतीं हैं। केजीबी के रिकार्ड का हवाला देते हुए पत्रिका ने लिखा था कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी अपने नाबालिग बेटे राहुल गांधी ने नाम से एक गुप्त खाते का संचालन कर रहीं हैं। जिसमें ढाई अरब स्विस परफैंक यानि 2.2 अरब डॉलर हैं। राहुल गांधी 1988 के जून में बालिग हुए थे। इसलिए यह खाता निश्चित तौर पर इसके पहले ही खुला होगा। अगर इस रकम को आज के रुपए में बदला जाए तो यह 10,000 करोड़ रुपये के बराबर बैठती है।

स्विस बैंक अपने ग्राहकों के पैसे को दबा कर नहीं रखता है, बल्कि इसका निवेश करता है। सुरक्षित दीर्घ अवधि वाली योजनाओं में निवेश करने पर यह रकम 2009 तक बढ़कर 9.41 अरब डालर यानी 42,345 करोड़ रुपये हो जाती है। अगर इसे अमेरिकी शेयर बाजार में लगाया गया होगा तो यह 58,365 करोड़ रुपए हो गई होगी। यदि घूस की इस रकम को आधा दीर्घावधि निवेश योजनाओं में और आधा शेयर बाजार में लगाया गया होगा, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह रकम 50,355 करोड़ रुपए हो जाती है। अगर इस पैसे को शेयर बाजार में लगाया गया होता तो 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से पहले यह रकम 83,900 करोड़ रुपए होती। किसी भी तरह से हिसाब लगाने पर 2.2 अरब डालर की वह रकम आज 43,000 करोड़ रुपए से 84,000 करोड़ रुपए के बीच ठहरती है।

दुनियाभर के कई देश ऐसे हैं जो अपने यहां पर कालेधन की जमाखोरी करते हैं। विश्व के अनेक लोगों का उनके नाम या निक नाम से पैसा जमा है, भारत के बारे में भी यही राय है कि देश का बहुत बड़ी मात्रा में कालाधान इन बैंकों में जमा है। इसके तहत सबसे पहले तो स्विट्जरलैंड का ही नंबर आता है, स्विट्जरलैंड की बैंकों में केवल भारत का ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों का पैसा जमा है। इसके अलावा जर्मनी, मारीशस, सिंगापुर, बहमास, सेंट किट्स, कैमेन और आइलैंड की बैंक कालाधान जमा करने के प्रमुख अड्डे हैं। सवाल यह आता है कि यह बैंक अपने यहां पैसा जमा क्यों करती हैं तो इसके पीछे मुख्य कारण यही है कि यह बैंक इस रकम को दीर्घावधि के लिए जमा करवाती है, बैंक उस पैसे को दीर्घावधि योजना में निवेश करतीं हैं। जिससे बैंकों को कई गुना फायदा होता है। उस लाभ का अच्छा खासा प्रतिशत जमाकर्ता को भी मिलता है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो 10 हजार की राशि 20 साल में 50 हजार करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। इसमें बैंक का लाभ शामिल नहीं है।

भारत के लोगों द्वारा विदेशी बैंकों मे जमा कराये गए कालेधन के बारे में देश विदेश की संस्थाओं ने अपने अपने मत दिये हैं। भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि देश का जो कालाधान विदेशी बैंकों में जमा है, वह 30 लाख करोड़ से 85 लाख करोड़ तक हो सकता है। इसी प्रकार फिक्की नामक संस्था ने इस कालेधन को 45 लाख करोड़ तक बताया है। ग्लोबल फाइनेंस इंटेग्रिटी का कहना है कि यह धन 28 लाख करोड़ हो सकता है। ये आंकड़े सभी विदेशी बैंकों के हैं। स्विस बैंकों का कहना है कि हमारे यहां भारत का 14 हजार करोड़ का कालाधान जमा है। एक अनुमान के अनुसार देश की सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी का 40 प्रतिशत से ज्यादा कालाधान है। इसके आधार पर अनुमान यही है कि देश के अंदर ही 300 लाख करोड़ का कालाधान है। कालेधन के रूप में इतनी बड़ी रकम के चलते यह सहज ही पता चल जाता है कि देश को कितनी हानि पहुंचाई जा रही है। क्योंकि कालेधन की स्पष्ट परिभाषा है जो धन बिना कर चुकाए छुपाकर रखा जाता है।

भारत देश की सरकार अगर कालेधन के बारे में माफी योजना को लागू करती है तो देश में कालेधन को लाया जा सकता है, लेकिन इसमें सरकार और देश को ज्यादा लाभ नहीं मिलता, उल्टे जमाकर्ताओं को जबर्दस्त लाभ मिलता है, सरकार का लाभ केवल कर तक ही सीमित रहता है। माफी योजना अमेरिका, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया में काफी सफल रही थी। इसके अलावा एक और योजना है, जिसका नाम एमनेस्टी स्कीम है, इसके तहत वर्ष 1997 में सरकार की और से की गई कार्यवाही के परिणामस्वरूप भारत सरकार को 7800 करोड़ रुपए कमाई के रूप में मिले थे, वर्ष 2014 के बारे में अनुमान लगाया जाये तो इस योजना के अंतर्गत 70000 करोड़ से 100000 करोड़ की राशि सरकार को प्राप्त हो सकती है।

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