‘बॉम्बे टू इंडिया’ में क्षेत्रीयता की बू

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

क्षेत्रीयता, जातिवाद, भाषावाद और संकिर्ण राष्ट्रीयता एक ऐसे विषय हैं जो मानवता को कलंकित करते हैं। यह इसलिए संभव हो सका है कि समाजद्रोहियों को समाज ही सिर पर चढ़ा लेता है और वे समाज के नेता/मार्ग दर्शक बन जाते हैं। देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्रांतवाद की जो लौ समय-समय पर दिखाई पड़ती है। उसी को केंद्र में रखकर फिल्म का निर्माण किया गया है तथा यह दिखाने का प्रयास किया गया कि क्षेत्रवाद, जातिवाद, नस्लवाद, प्रांतवाद, भाषावाद और संकिर्ण राष्ट्रीयता ये ऐसे अनछूए पहलू है जो मानवता को कलंकित हीं नहीं करते बल्किं मानवीय-मूल्यों की हत्या करते हैं। आज जब संपूर्ण विश्व एक ”विश्वग्राम” बन गया है। एक देश की रिति-नीति, मूल्य, प्रथा, परंपरा दूसरे देशों में पहूंच रहे हैं तथा मनुष्य-मनुष्य के भेदों को समाप्त कर रहे हैं ऐसे समय में ये छोटे-छोटे बुलबुले मानवीय मूल्यों पर कुठाराघात करें तो स्वाभाविक रूप से हमारा ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो हीं जाएगा। इन विषयों को केंद्र में रखकर फिल्म का निर्माण करना एक सार्थक एवं उद्देश्य परक पहल है जिसे स्वीकार करके एक मजबूत समाज एवं भारत का निर्माण हो सकता है।

मुंबई में घटित घटना को केंद्र में रखकर फिल्म ‘बॉम्बे टू इंडिया’ बनाने का प्रयास किया है। राहुल राज (अमित) बिहार से कॅरियर बनाने के लिए मुंबई आता है। यहां पर तो बिहारी-मराठी अस्मिता को लेकर जगह-जगह हुड़दंग है। वह बार-बार इस बात पर विचार करता है कि क्या करें? फिर बस का अपहरण एवं अपहरण में यात्रियों की दुर्दशा का चित्रण ने फिल्म में शक्ति भर दिया है। किस प्रकार इस स्थिति में बसों-विमानों के यात्री महसुस करते हैं। जब उनको पता चलता है कि बस-विमान में बम है या अपहरण हो चुका है।

राहुल राज (अमित) की भूमिका में तथा शरबानी मुखर्जी प्रेमिका की भूमिका में ठीक-ठाक हैं। कुल मिलाकर इस फिल्म को ठीक-ठाक कहा जा सकता है। इस फिल्म को वे दर्शक पसंद करेंगे जो रोजी-रोटी व कॅरियर की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करते है तथा नाना समस्याओं से उन्हें रू-ब-रू होना पड़ता है।

कलाकार : अमित, रोहित, शरबानी मुखर्जी, राजेश त्रिपाठी वगैरह। निर्माता : संगीत सिवन। निर्देशक : महेश पांडेय। गीत : अमाल। संगीत : समीर टंडन।

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