आर्थिकी

विश्व बैंक-IMF को BRICS की चुनौती

सनोज राणा

विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। बीते कुछ वर्षों में BRICS केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रहा बल्कि वैश्विक आर्थिक शासन में सुधार की मांग करने वाला एक प्रभावशाली मंच बनकर उभरा है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या BRICS विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाओं का वास्तविक विकल्प बन सकता है? इसका उत्तर अभी पूरी तरह “हाँ” नहीं है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि BRICS ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को नई दिशा देने की मजबूत शुरुआत कर दी है।

विश्व बैंक और IMF की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक पुनर्निर्माण और वित्तीय स्थिरता के उद्देश्य से हुई थी। पिछले आठ दशकों में इन संस्थाओं ने अनेक देशों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन समय के साथ इन पर पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोप, के अत्यधिक प्रभाव के आरोप भी लगते रहे। विकासशील देशों का मानना है कि इन संस्थाओं में मतदान अधिकारों का वितरण असमान है तथा ऋण देने के साथ लगाई जाने वाली कठोर शर्तें कई बार उनकी आर्थिक नीतियों और संप्रभुता को प्रभावित करती हैं। यही असंतोष BRICS जैसे वैकल्पिक मंच के उदय का प्रमुख कारण बना।

आज BRICS केवल अपने पाँच संस्थापक सदस्यों—ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—तक सीमित नहीं है। संगठन का विस्तार इसकी बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हो चुके हैं। नए सदस्यों के जुड़ने से BRICS की जनसंख्या, ऊर्जा संसाधन, बाजार और आर्थिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह विस्तार स्पष्ट संकेत देता है कि वैश्विक दक्षिण के अनेक देश पश्चिम-प्रधान वित्तीय व्यवस्था के समानांतर एक अधिक संतुलित और प्रतिनिधिक मंच की तलाश में हैं।

BRICS की आर्थिक शक्ति उसके व्यापारिक प्रदर्शन से भी स्पष्ट होती है। वर्ष 2003 की तुलना में BRICS देशों का वस्तु व्यापार 13 गुना से अधिक बढ़ चुका है। वर्ष 2024 में इन देशों का कुल निर्यात लगभग 1.17 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। इस वृद्धि में चीन सबसे बड़ा प्रेरक बना हुआ है, जबकि भारत, ब्राज़ील, इंडोनेशिया, रूस और संयुक्त अरब अमीरात ने भी निर्यात और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को नई गति दी है। ये आँकड़े बताते हैं कि BRICS अब केवल राजनीतिक विमर्श का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और निवेश की एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति बन चुका है।

इसी बढ़ती आर्थिक क्षमता को संस्थागत रूप देने के लिए वर्ष 2014 में न्यू डेवलपमेंट बैंक  की स्थापना की गई। इस बैंक का उद्देश्य विकासशील देशों में आधारभूत संरचना, स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, जल प्रबंधन और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संस्थापक सदस्यों को अपेक्षाकृत समान निर्णयकारी अधिकार दिए गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में NDB ने भारत सहित कई देशों में ऊर्जा, सड़क, रेल और हरित विकास से जुड़ी परियोजनाओं को वित्तपोषित किया है। इससे विकासशील देशों के सामने वित्तीय सहायता का एक नया विकल्प उपलब्ध हुआ है।

इसके साथ ही BRICS ने आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था(CRA) के रूप में 100 अरब डॉलर का एक साझा सुरक्षा कोष भी बनाया है। इसका उद्देश्य भुगतान संतुलन या विदेशी मुद्रा संकट की स्थिति में सदस्य देशों को तत्काल वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है। इसे IMF के विकल्प के रूप में देखा जाता है। हालांकि अब तक इसका वास्तविक उपयोग नहीं हुआ है, इसलिए इसकी प्रभावशीलता की अंतिम परीक्षा अभी शेष है।

BRICS की एक अन्य महत्वपूर्ण पहल अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का विकास और सदस्य देशों के बीच वित्तीय सहयोग बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है। हाल के वर्षों में भारत, रूस, चीन और ब्राज़ील ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय वित्त में डॉलर की स्थिति अभी भी अत्यंत मजबूत है। इसलिए निकट भविष्य में डॉलर का विकल्प तैयार करना आसान नहीं होगा।

BRICS के सामने अनेक चुनौतियाँ भी हैं। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध, सदस्य देशों की अलग-अलग आर्थिक प्राथमिकताएँ और नए सदस्यों के विविध हित सामूहिक निर्णयों को जटिल बनाते हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की सफलता उसके उद्देश्यों से अधिक उसके सदस्यों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और आपसी विश्वास पर निर्भर करती है। BRICS के लिए भी यही सबसे बड़ी कसौटी होगी।


फिर भी BRICS की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने वैश्विक दक्षिण के देशों को एक नया विकल्प दिया है। पहले आर्थिक सहायता और विकास परियोजनाओं के लिए विश्व बैंक और IMF ही प्रमुख संस्थाएँ थीं, जबकि अब विकासशील देशों के पास NDB जैसे वैकल्पिक मंच भी उपलब्ध हैं। इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और पारंपरिक संस्थाओं पर भी अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक बनने का दबाव पड़ेगा।

भारत के लिए BRICS का महत्व विशेष है। भारत एक ओर विश्व बैंक, IMF और G-20 जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर BRICS के माध्यम से वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को भी स्वर दे रहा है। भारत की यह संतुलित कूटनीति उसे उभरती हुई विश्व व्यवस्था में एक विश्वसनीय और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

स्पष्ट है कि BRICS अभी विश्व बैंक और IMF का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाया है। उसकी वित्तीय क्षमता और संस्थागत अनुभव अभी सीमित हैं। फिर भी यह कहना उचित होगा कि BRICS ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन की एक नई प्रक्रिया शुरू कर दी है। यदि सदस्य देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर आर्थिक सहयोग, संस्थागत मजबूती और वित्तीय नवाचार पर ध्यान देते हैं, तो आने वाले वर्षों में BRICS विश्व व्यवस्था का एक सशक्त स्तंभ बन सकता है।

ऐसे समय में BRICS 2026 की भारतीय अध्यक्षता विशेष महत्व रखती है। भारत का लक्ष्य संगठन को अधिक समावेशी, प्रभावी और भविष्य उन्मुख बनाना है। भारत ने अपनी अध्यक्षता का विषय “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास” निर्धारित किया है, जो सदस्य देशों के बीच लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक स्पष्ट दृष्टि प्रस्तुत करता है। भारत की प्राथमिकताओं में वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को और मजबूत करना, संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग को आगे बढ़ाना, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता , स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार सहयोग को नई गति देना शामिल है। वर्ष भर विदेश, वित्त, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, ऊर्जा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित अनेक मंत्रिस्तरीय और विशेषज्ञ स्तर की बैठकों का आयोजन होगा, जिनका समापन BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन में होगा।

भारत के लिए यह केवल एक कूटनीतिक अवसर नहीं बल्कि अपनी वैश्विक नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का भी महत्वपूर्ण मंच है। एक ओर भारत विश्व बैंक, IMF और G-20 जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर BRICS के माध्यम से वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को नई दिशा देने का प्रयास कर रहा है। यदि भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान सदस्य देशों के बीच सहमति, संस्थागत सुधार और व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाने में सफल रहता है, तो BRICS केवल एक आर्थिक समूह नहीं, बल्कि 21वीं सदी की अधिक संतुलित, समावेशी और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। आज BRICS एक उभरती हुई संभावना है, लेकिन आने वाले वर्षों में यह वैश्विक वित्तीय शासन के सबसे प्रभावशाली स्तंभों में से एक बन सकता है।