बौद्ध धर्म और तिब्बती परम्पराएँ

आदिम मनुष्य में आज से लगभग सत्तर हजार साल पहले बोध शक्ति (cognitive power)
का विकास हुआ। तब से वह उत्सुकता, कौतूहल और जिज्ञासा से अपने आपको, अपने अनुभवों को, और अपने परिवेश
को समझने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। सूरज, चाँद का नियम से निश्चित अन्तराल पर उगना और डूबना,
बादल, बारिश तथा मौसम उसे विह्वल किया करते। दूसरी ओर आकस्मिक दुर्घटनाएँ, काकतालीय और आसामयिक
घटनाएँ उसे भय और आशंकाओं से विभिन्न व्याख्याओं के लिए प्रेरित करतीं। विभिन्न प्रजातियों के जानवर , पेड़
और पौधे पहेलियों की तरह उसे ललकारते रहते। समय के साथ जानकारियाँ इकट्ठी होती गईं। इन जानकारियों की
व्याख्या करने के प्रयास में भगवान और भूत का आविष्कार हुआ। अब इन जानकारियों से आदमी अपने सवालों के
जवाब पाने लगा और जीने की दिक़्क़तों का सामना करना वह सीखता रहा। ये जानकारियाँ इकट्ठी होकर परम्पराएँ
बनीं। परम्पराएँ मानव समुदायों के लिए मार्ग दर्शन और आचार संहिता उपलब्ध कराने का साधन बनीं। जीना अब
शृखलाबद्ध होने लग गया।
आदमी सृष्टि के प्रारम्भ से ही सुख की तलाश करता रहा है। कवियों, दार्शनिकों और विद्वानों का कहना
रहा है कि यह जीवन आनन्द-यज्ञ का आयोजन है। अरस्तु ने सुख को ‘आत्मा की मौलिक क्रिया’ के रूप में परिभाषित
किया है। इस दृष्टि से सुख/आनन्द विश्व में सर्वोत्तम तथा सर्वाधिक श्रेय उपलब्धि है ।
पर सुख मरीचिका की भाँति बस उसे लुभाता ही रह रहा है। जहाँ सुख की तलाश की जाती है, अक्सर
यह वहाँ न होकर अन्यत्र छिपा हुआ रहा करता है । इसलिए सुख की तलाश सारे अभियानों में सर्वाधिक नाजुक
होती है। मनीषियों ने बताया है कि प्रवृतियाँ सुख का प्रलोभन देकर सर्वनाश की ओर उन्मुख करती हैं, इसलिए
सुख की चाह रखने वालों को चाहिए कि प्रवृति को प्रश्रय न दें । दूसरी ओर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने प्रवृति को
गौरवान्वित करते हुए लिखा है कि प्रवृति को प्रश्रय न देकर आप सफल और सुखी तो शायद हो सकते हैं पर
उस स्थिति में आपको जीवन की अनन्त सम्भावनाओं के उन्मोचन और उपभोग के आनन्द से तो वंचित होना
ही पड़ेगा ।
सुख की तलाश में विभिन्न काल में विभिन्न परम्पराओं में मनीषियों का प्रादुर्भाव होता रहा। इन्होंने अपने
चिन्तन और मनन से स्वतंत्र मतों का प्रवर्तन किया। इन मतों को धर्म की संज्ञा दी गई है। ऐसा समझा जाता है
कि इनकी वाणी ग्रन्थों में उपलब्ध कराई गई हैं। इनका दावा था कि संसार की जो कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ है, वे
उनकी वाणी में उपलब्ध हैं। मनीषियों की वाणी धर्मग्रन्थों में संयोजित हुईं। ये धर्मग्रन्थ सारे सवालों के जवाब
भंडार-घर (repository) हो गए। इनके अध्ययन से हम अपने लिए मार्गदर्शन पाने लग गए।
भारतीय मूल के धर्मों में हिन्दु मत के अलावे बौद्ध, जैन और सिख मत प्रमुख हैं। इन सबों में
बौद्ध मत इस मायनी में अनूठा है कि भारत के बाहर श्रीलंका, तिब्बत, थाईलैंड, इण्डोनेशिया, प्रभृति दक्षिणीपूर्वी
एशियाई देश के अलावे जापान जैसे विभिन्न एशियाई देशों के प्रमुख मत के रुप में जाना जाता है। इन देशों की
संस्कृति प्रकृति के साथ संगति रखते हुए बौद्ध मत की स्थानीय परम्पराएँ विकसित और अभिव्यक्त हुई हैं। इन

परम्पराओं में तिब्बती परम्परा अत्यन्त समृद्ध रही है। पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के चीनी एवम् तिब्बती भाषा
विभाग के अध्य़क्ष एवम् बौद्ध अध्ययन एवम् तिब्बती भाषा के प्रोफेसर डॉ विजय कुमार सिंह की पुस्तक “ बौद्ध
धर्म और तिब्बती परम्पराएँ” हिन्दी के पाठकों के लिए इस विषय पर उपयोगी और प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध करती
है। बौद्ध धर्म के भारत में उद्भव से लेकर तिब्बत की आत्मा में इसके एकीकरण के साथ विभिन्न तिब्बती धाराओं
का सम्यक् विवरण प्रस्तुत किया गया है।
लेखक इस विषय के अधिकारी विद्वान हैं। वे बौद्धअध्ययन के प्राचीन केन्द्र नालन्दा के निवासी हैं
और उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म की तिब्बती परम्परा की शिक्षा लामा गेशे गेलेक ग्यात्सो का
विद्यार्थी और शिष्य होने का सौभाग्य मिला है। लामा गुरुजी ने प्राचीन गुरुकुल की परम्परा को सार्थक करते हुए
उन्हें प्रेमचन्द की उक्ति प्रासंगिक है – शिक्षक की सेवा करने से ज्ञान मिलता है न कि उनके पास पाठ ग्रहण करने
से।
लेखक अपने शिक्षक और गुरु डॉ गेशे गेलेक ग्यात्सो (गेशेला) के साथ अपने प्रथम सम्पर्क का स्मृतिचारण करते
हुए कहते हैं– जब मेंने उन्हें बताया कि मैंने तिब्बती अध्ययन का चुनाव किया है तो उन्होंने बस अपनी पलकें
झपकाई और मुझे अपनी अटपटी हिन्दी में कहा— “ठीक है, देखेगा।”
दिन बीतते रहे, एक भी वर्गाध्यापनऔपचारिक रुप से नहीं हुआ। मेरी दिनचर्या रोज अपने शिक्षक के कमरे में
पहुँचने के साथ शुरु होती । वे मुझे या तो चाय लाने को कहते या अपने साथ कला निकाय के लॉन में साथ में ले
जाते। वहाँ सबों को चीनाबादाम और चाय का दौर चलता। गेशे ला तिब्बती कहानियाँ और दन्त कथाएँ सुनाते रहते।
एक भी वर्गाध्यापन या पुस्तक-पाठ नहीं होता वहाँ। अन्त में मेरा धीरज जवाब देने लग गया। बौद्ध अध्ययन मेरे
लिए अजूबा था, तिब्बती अध्ययन की तो कोई बात ही नहीं। पर वे तो बस लामाओं की विद्वता, महानता और सन
1969 में दलाई लामा के साथ भारत आने के अपने साहसिक अभियान की कहानियां सुनाया करते।
वार्षिक परीक्षाएँ शुरु हो गईं। जिन चार पेपर्स का उत्तर मुझे देना था, वे सबके सब आश्चर्य़जनक रुप से तिब्बती
अध्य़यन से सम्बन्धित थे। मैं जैसे जैसे प्रश्नपत्र पढ़ता गया, उनसे सरोकार रखनेवाली तिब्बती कहानियाँ मुझे याद
आती गईं। मैं उन्हें लिखता गया। मैंने आधे घंटे पहले ही परचा पूरा कर लिया। बाहर आने पर मेरे कुछ साथी आए
और उन्होंने कहा कि परचा काफी कठिन था, मैंने उन्हें जवाब सुनाए तो उन्होंने कहा कि तुम तोगेशेला की तरह
बोलने लगे हो।। बाद के दिनों में बाकी परचे भी मेरे ठीक गए। अब मैं अपने आपमें परिवर्तन महसूस करने लग
गया था। मित्रों ने कहा कि तुम तो अपने गुरु की तरह आचरण करने लगे हो। परीक्षा परिणाम घोषित हुए, मैं
विश्वविद्यालय में तीसरे स्थान पर सफल हुआ था. मुझे समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे मुमकिन हुआ था।
मेरा कायान्तरण हो चुका था। अब मैं कीड़े से तितली बन चुका था। विभाग के शिक्षक मेरी मदद लेने लग गए। मैं
गेशेला की आवाज अंगरेजी और हिन्दी में विशेषज्ञ की हैसियत से अनुवादित करने लग गया। सबसे बड़ी सराहना

मेरे शिक्षक एच.पी. गंगनेगी से मिली, उन्होंने कहा कि तुम गेशे ला के मुझसे बेहतर विद्यार्थी हो। गेशे अब हर
जगह तुम्हें मनोनीत कर रहे हैं।

गौतम की अन्तर्दृष्टि के अनुसार मनुष्य चाहे जैसा भी उसका अनुभव हो, उसका मन सामान्यतः और
अधिक की चाह से भरता रहता है. और चाह में असन्तोष निहित रहता है. जब कभी मन कुछ ऐसा अनुभव करता है
जो अप्रिय हो तो वह उससे छुटकारा पाना चाहता है. जब कभी मन को आनन्द की अनुभूति होती है, तो वह इस
अनुभूति के कायम रहने और तीव्र होने की कामना करता है। नतीजा होता है कि मन हमेशा ही बेचैन और
असन्तुष्ट रहता है।

जेम्स हिल्टन के उपन्यास लॉस्ट हॉरिज़न(Lost Horizon) में शांग्रीला नामक एक काल्पनिक स्थान का
वर्णन किया है। रहस्यों से भरी यह सामंजस्यपूर्ण घाटी तिब्बत के पश्चिमी छोर पर कुनलुन पर्वतों के अवस्थित है। शांग्रीला
किसी भी पार्थिव स्वर्ग, खासकर हिमालयीय यूटोपिया के सामानार्थक है– ऐसा क्षेत्र जहाँ के वासी स्थाई रुप से सुखी होते हैं। वे
अमर और चिर युवा होते हैं।शांग्रीला पूरब के अनूठेपन का विम्ब भी प्रस्तुत करता है।
तिब्बती बौद्ध धर्म जिसको लामावाद भी कहा जाता है, ये महायाना बौद्ध धर्म, हिन्दुई वज्रयान जैसे कई सारे परम्पराओं के
मिलने के वजह से बना है जिसमें आध्यात्मिक शक्ति हासिल करने के लिए तंत्र-मंत्र का प्रयोग जैसे गूढ़ प्रथाओं का प्रयोग भी
किया गया है और इसमें शमनी बॉन धर्म भी शामिल है जिसका प्रभाव ईरान जैसे संस्कृति से लेकर भारत तक बौद्ध सोच के
एक अद्वितीय अभिव्यक्ति के रूप में है जो थेरवाद नामक ज्यादातर सबसे प्रामाणिक और रूढ़िवादी बौद्ध सोच से बिलकुल
अलग है | बौद्ध धर्म का ये रूप दार्शनिक अटकलों से ज्यादा अभ्यास और साकार करने पर ध्यान देता है और इसका प्रमुख
उद्देश्य और लक्ष्य आत्मज्ञान के लिए एक फ़ास्ट ट्रैक देना है जिससे एक ही जीवन काल में निर्वाना प्राप्त किया जा सके |
तिब्बती बौद्ध धर्म जिसकी जड़ें उसकी सभी परम्पराओं व उप सम्प्रदायों सहित
भारतीय संस्कृति मे गहरी पैठी हुई हैं। आज एक तिब्बती प्रवज्जित भिक्षु को विचित्र निगाहों से देखा जाता
है और उनकी पूजा परम्पराओं को ऐसा समझा जाता है मानो वे किसी और ग्रह से हों। उनके प्रार्थना चक्र,
चट्टानों पर उकेरे गए तिब्बती भाषा के मंत्र, हाथ में डमरू और की अन्य वस्तुएँ मानों एक विचित्र और
अनजानी प्रथा का संकेत करती हों। जो भी हो वास्तिकता यही है कि इन सबका मूल भारत ही है। ज्यों
ज्यों हम भारत के हिमालयी क्षेत्र की निकटवर्ती संस्कृतियों को जानने लगते हैं, बौद्ध समाज का जीवंत
स्वरूप परिलक्षित होने लगता है।

मनुष्यों को अपने दुखों की निवृत्ति अथवा मुक्ति के लिए स्वयम् ही प्रयत्न करना पड़ता है। बुद्ध केवल मार्ग दिखलाते हैं

बौद्ध मत वस्तुतः परम्पराओं तथा कर्मकाण्डों से युक्त धर्म न होकर एक जीवनशैली की भाँति है जिसका
प्रारम्भिक स्वरूप तत्कालीन समाज की नैतिक व्यवस्था के उत्थान अप्रासंगिक रीति रिवाज़ों तथा कुरीतियों को
दूर करना था।
बुद्ध द्वारा उपदिष्ट मत वस्तुतः एक सामाजिक और सांस्कृतिक क्रान्ति का प्रारम्भ था जिसका उदय उस
समय की समाजिक परिस्थितियों में अनिवार्य हो चला था।
बुद्ध के मत में धर्म एक साधन ही था, साध्य नहीं। साध्य तो दुःख निवृत्ति के पश्चात् निर्वाण की
अवस्था ही रही। कुछ भी नहीं ,यहाँ तक कि धर्म भी नहीं। एच जी वेल्स ने बुद्ध के संबन्ध में कहा है कि इस
पृथ्वी पर उन जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और उन जैसा ईश्वर विरोधी व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है। –So God
like and so Godless.

3 thoughts on “बौद्ध धर्म और तिब्बती परम्पराएँ

  1. बुद्ध यों तो भारत की थाती के रूप में ही जाने जाते हैं पर यथार्थ यह है कि उनका जन्म नेपाल में हुआ था और संसार भर में फैले उनके अनुयायी उनके व्यक्तित्व को वैश्विक ही मानते है। उनकी मूर्तियां स्थानीय प्रभाव से आप्लावित होती हैं तथा भारत को बुद्ध को बोधि प्राप्त करने का स्थान मात्र माना जाता है। इस पुस्तक में तिब्बती गुरु से शिक्षा प्राप्त कर तिब्बती परम्परा से बौद्ध धर्म का विवेचन किया गया है। गंगानन्द जी ने इसकी समीक्षा करते हुए धर्म के वय्वहारिक स्वरूप को हमारे समक्ष रखा है जो समसामयिक भी है, समीचीन भी। साधुवाद।

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