लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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papaलालता प्रसाद जी ने कार रुकते ही गेट का दरवाजा खोला और अपना ब्रीफ केस लेकर बाहर निकल् आये| रोज के विपरीत आज उनके घर के ड्राइंग रूम का दरवाजा खुला था और बाहर तीन चार जोड़ी फटे पुराने चप्पल जूते पड़े थे|उन्हें कुछ समझ में नहीं आया कि ये गंदे चप्पल जूते किसके हो सकते हैं||किसकी हिम्मत पड़ी कि उनके साफ स्वच्छ पोर्च में गंदगी फैलाये|भीतर गये तो वहां का दृश्य देखकर तो वे सन्न रह गये|चार मज़दूर किस्म के आदमी उनके शानदार इंपोर्टेड सोफे पर बैठे जलपान कर रहे थे| सेंटर टेबिल पर केले के छिलके बिखरे पड़े थे| कुछ नमकीन मीठे के टुकड़े भी पड़े थे|लालता प्रसाद का पारा आसमान की ओर अग्रसर होने लग

 

“यह क्या हो रहा डेज़ी,यह कौन लोग हैं और यहां क्या कर रहे हैं और तुम इनके साथ ……..?”उनकी आवाज़ गुस्से के मारे कांपने लगी| उनके तेवर देखकर उन आदमियों की घिग्घी बंध गई हड़बड़ा कर उठे और अच्छा डेज़ी बाबू हम चलते हैं ,कहकर कमरे से बाहर निकल गये|

“डेज़ी तुमने जबाब नहीं दिया,किसने हमारा सोफा गंदा करने की इन्हें इजाजत दी| किसने इन्हें भीतर आने दिया?”

“किंतु आपने ही तो कल अपने भाषण में कहा था कि मज़दूर् समाज की रीढ़ हैं,मज़दूर् समाज के वाहक हैं और मज़दूरों से ही दुनियाँ चल रही है|मज़दूर ही सड़क बनाते हैं मज़दूर ही पुल बनाते हैं और मज़दूर ही मकान और बड़ी हवेलियां बनाते हैं| मज़दूर न हों तो संसार चलना ही मुश्किल हो जाये|पिताजी आप ही तो कह रहे थे कि यदि कामवाली बाईयां, कपड़े धोने वाला और बगीचे का माली यदि समय से न आये तो घर के सारे काम ठप हो जाते हैं| झाड़ू पोंछा बर्तन कौन करेगा, चाय कौन बनायेगा, खाना कैसे बनेगा|आप ही ने कहा था न की मज़दूरों से समानाता क व्यवहार करना चाहिये|आप ही ने तो बड़ी बुलंद आवाज़ में कहा था कि वे उस दिन का बड़ी उत्सुकता से स्वागत करेंगे, जब मज़दूर और तथा कथित बड़े और अमीर लोग एक ही टेबिल पर बैठकर खाना खायेंगे|

“बस बस बहुत् हो गया,अपनी बकवास बंद करो|देखते नहीं घर कैसा गंदा हो गया है|टेबिल पर केले के छिलके पड़े हैं यह जूठन यह रसगुल्लों का शीरा….छी छी |”

“मगर पिताजी कल ही तो डगलस अंकल ने इसी टेबिल आपके साथा खाना खाते हुये टेबिल पर ही बियर की बोतलॆ औंधी कर दी थे ,चिकिन की बोटियां बिखरा दीं थीं|”

“वे लोग बड़े लोग हैं हमारा उनसे करोड़ो का फायदा होता है,उनसे हमें चंदा मिलता है वे हमें ठेके दिलवाते हैं|इन मज़दूरों से कैसी बराबरी|”

“किंतु भाषण में वह समानता का अधिकार,बराबरी का हक…..”

” चुप रहो,वह भाषण था और भाषण केवल भाषण होता है हाथी के दिखाने के दांत|”मज़दूर हमेशा मज़दूर रहेंगे मालिक नहीं बन सकते|”

“किंतु पिताजी वह मार्क्सवाद ,मजदूर एकता जिंदाबाद,मज़दूर हमारी शान हैं, दुनियां के भगवान हैं ,इनका भी सम्मान करो ये भी तो इंसान हैं|वह नारे तो आपने ही लगवाये थे|”

“नारे ही तो लगवाये थे ये तो नहीं कहा था कि अपने घर में ही इनका प्रयोग करो|”

किंतु पिताजी……………..”

डेज़ी आगे कुछ न कह सका|

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4 Responses to “किंतु पिताजी”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ये पिताजी तो हमारे भारत के राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिनिधत्व करते है. यही तो है हमारा हिपोक्रेटिक करेक्टर जिसे मैं नैतिक दोगलापन कहता हूँ.

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  2. अरुण कान्त शुक्ला

    अरुण कान्त शुक्ला

    कहानियां कहा जाता है पठन योग्य बनाने के लिए थोड़ा अतिरेक लिए हुए होती हैं | पर, आपकी इस कहानी का मूलभाव एकदम सच है और पूरी कहानी अतिरेक से दूर है| अपने ट्रेड यूनियनी जीवन के दौरान ऐसे मजदूर नेता मैंने देखे हैं और आज भी मैं ऐसे कई नेताओं को जानता हूँ, जो इस दोगलेपन के साथ जी रहे हैं| एक बहुत ही सच्चे और अच्छे विषय को शानदार ढंग से प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद|

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  3. mahendra gupta

    हमारे माननीय नेताओं का यह दोगलापन बेचारा आम आदमी नहीं समझ पता, और हर चुनाव में धोखा खा जाता है.कितने कुत्सित होते हैं यह लोग?

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