लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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भारतीय चिंतन के प्रख्यात व्याख्याकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, भारतीय मजदूर संघ सहित दर्जनों संगठनों के संस्थापक मजदूर नेता स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी की स्मृति में नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में स्वदेशी जागरण मंच द्वारा 22 जनवरी को व्याख्यान माला का आयोजन किया गया।

‘चीन की चुनौती और हम’ विषयक इस संगोष्टी के मुख्य वक्ता के रूप में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक भगवती शर्मा एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी शोध प्रतिष्ठान के निदेशक तरूण विजय ने मुख्य रूप से संबोधित किया।

अपने संबोधन में पांचजन्य के पूर्व संपादक श्री तरूण विजय ने चीन के साथ मित्रता बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने यह दावा भी किया कि सन् 2020 तक तो किसी हालत में चीन भारत पर हमला नहीं करेगा।

अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कहा कि चीन की रणनीति अमेरिका से आगे निकलने की है। वह भारत से युद्ध मोल ले कर अपने लक्ष्य से विरत होना नहीं चाहेगा।

भारत और चीन के हजारों वर्ष पुराने संबंधों की याद दिलाते हुए श्री विजय ने उपस्थित श्रोताओं का आह्वान किया कि चीन को गहराई से समझने की जरूरत है। चीन के संदर्भ में समूचे देश में स्थान-स्थान पर थिंक टैंक बनने चाहिए। शोध केंद्र स्थापित होना चाहिए। अधिकाधिक लोगों को यूरोप की बजाए घूमने और पर्यटन के लिए चीन जाना चाहिए।

भारत-चीन सम्बंधों के इतिहास का वर्णन करते हुए श्री विजय ने अपनी चीन यात्रा का रोचक विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि देश में चीन को शत्रू मानने वाला एक वर्ग है, वहीं दूसरी ओर इस बात के भी प्रबल पक्षधर हैं कि चीन के साथ विवाद के विषय एक तरफ रखकर सम्बंध स्थापिन होने चाहिए। जहां विवाद है वहां बातचीत का रास्ता निकाला जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि चीन के साथ हमारा 9-10हजार साल पुराना नाता है। यह नाता सभ्यतामूलक और संस्कृतिमूलक रहा है। 1962 के पूर्व भारत और चीन के बीच कभी युद्ध नहीं हुआ। दो महानतम सभ्यताओं के रूप में दुनिया ने भारत और चीन को जाना-पहचाना है। दोनों के मध्य संबंधों का सिलसिला अति प्राचीन है।

उन्होंने कहा कि चीन का प्राचीन साहित्य बताता है कि भारत के संतों-महात्माओं की वहां विशेष पूछ रही है। बीजिंग के इतिहास में कुमारजीव प्रथम राजगुरू थे जिनके पिता कश्मीर के और माता चीन के शिंजियांग प्रांत की थीं। कुमार जीव के साथ-साथ भारत के ऋषि कश्यप, ऋषि मातंग, सामंद भद्र का भी उल्लेख चीनी साहित्य और इतिहास में सम्मानपूर्वक होता आया है।

कुमारजीव का विशेष उल्लेख करते हुए श्री तरूण विजय ने बताया कि उन्होंने भारतीय ज्ञान-विज्ञान का चीनी भाषा में अनुवाद किया और वे अनुवाद करने में अति प्रवीण थे। उन्हें सत्रह प्रकार की अनुवाद कला का अनुभवजन्य ज्ञान था।

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार चीन से ह्ववेनसांग जैसे यात्री भारत में आए जिन्होंने भारत का प्रामाणिक इतिहास लिखा।

अपने चीन प्रवास का जिक्र करते हुए श्री विजय ने कहा कि भारत और चीन के मध्य संबंध के लिए सरकार द्वारा वह दो बार सम्बंधित समितियों में नामित रहे हैं। दोनों देशों को देखकर अनुभव में यही आता है कि चीनी सामान जिस प्रकार से भारतीय बाजार में अपनी पकड़ बना चुका है उससे चीन भारत के हर घर में पहुंच गया है। इसी प्रकार भगवान बुद्ध के कारण भारत चीन के हर घर में पहुंचा हुआ है।

श्री विजय ने कहा कि चीन ने वेटिकन को अपने देश में मान्यता नहीं दी है। यह बड़ी बात है। इसी प्रकार चीन ने अपने देश में असंतोष को पनपने नहीं दिया। शिंजियांग में उइगर मुसलमानों का दमन कर चीन ने वहां का मूल चीनीयों अर्थात हान वंशियों को बसाकर वहां का जनसंख्या अनुपात ही बदल दिया ।

उन्होंने कहा कि चीन में आज बाजारवाद के साथ राष्ट्रवाद प्रबल है। चीन ने भगवान बुद्ध को भी चीनीकरण कर इस प्रकार उन्हें प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है कि मानो बुद्ध भारत की बजाए चीन में ही जन्में थे। उन्हें सिर्फ अपने देश की परवाह है बाकी दुनिया के हितों के बारे में वे नहीं सोचते।

श्री विजय ने कहा कि भारत के प्रति चीन के सामान्य जन में अपार श्रद्धा है। अगला जन्म भारत में हो, यह वहां के लोगों का स्वप्न है।

उन्होंने कहा कि भारत के साथ चीन के सम्बंध तब बिगड़ने शुरू हुए जब मार्क्सवाद चीन पहुंचा। माओत्सेतुंग के उभार के साथ भारत और चीन के सम्बंध बिगड़ने लगे। लेनिन और माओ के विचार ने चीन में भारत को कमजोर किया।

उन्होंने कहा कि माओत्सेतुंग की सांस्कृतिक क्रांति ने चीन में 4 करोड़ निरपराध लोगों का संहार किया। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने गांव-गांव को रौंद डाला। भारत और चीन के वैचारिक सम्बंध को माओ ने समाप्त किया।

माओवाद के खतरे को रेखांकित करते हुए श्री तरूण विजय ने कहा कि इसका आतंक नक्सली रुपी धरकर देश में फैल रहा है। नेपाल, बिहार, उप्र. से लेकर आन्ध्र प्रदेश तक लाल गलियारा इसी की देन है। नागालैण्ड में एनसीएन को सारी मदद यही मुहैया करा रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत की जीडीपी से चीन तीन गुना ज्यादा समृद्ध है। प्रति वयक्ति के लिहाज से वह 2.2 गुना ज्यादा धनी है। पिछले 100 सालों में जहां भारत का भूगोल सिकुड़कर आधा रह गया है वहीं चीन का भूगोल बढ़कर दोगुना हो गया है। चीन आज एशिया ही नहीं विश्व में नंबर दो बन गया है और आगे चलकर वह नंबर एक बनने की दिशा में अमेरिका को मात करने वाला है। सामरिक, आर्थिक, कूटनीतिक हर मोर्चे पर चीन भारत से ज्यादा मजबूत है।

श्रीविजय ने कहा लेकिन एक बात है जिसे चीन के विद्वान स्वीकार कर रहे हैं जिसमें भारत चीन को मात कर रहा है। और वह बात है कि अराजक राजनीति और तमाम कलह, भेद होने के बाद भी भारत दुनिया का महान लोकतंत्र दिन प्रति दिन मजबूत हो रहा है। यही एक बात है जिसके कारण चीन भारत से आशंकित है। भारत की सभ्यतामूलक, संस्कृतिमूलक चीजें चीन को डराती हैं। इसी के साथ भारत के युवाओं के कमाल के कारण सूचना प्रोद्योगिकी, अंतरिक्ष आदि क्षेत्रों में देश की कमाल की उन्नति को भी वह संशय से देखता है।

भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन पर भी चीन की निगाह है। चीन भारत में राष्ट्रवाद और लोकतंत्र की शक्ति को पहचानने के लिए अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आंदोलन का अध्ययन भी करवा रहा है। वह यह जानने का इच्छुक है कि भारत का असली ताकत क्या है। भारत कैसे सफल लोकतंत्र बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि चीन के गांव बदहाल हैं। लोग गरीबी से तंग हैं। मजदूरों का जमकर शोषण हो रहा है। यही कारण है कि चीनी माल दुनिया में सस्ता बिक रहा है। इसी के साथ चीन की कम्युनिष्ट पार्टी भ्रष्टाचार के मामले में भी रिकार्ड तोड़ रही है। हर दिन स्कैण्डल होता है। मीडिया की वहां कोई आवाज नहीं है। सरकारी मीडिया है जो सिर्फ सरकार और कम्युनिष्टों के गीत गाती है। इस प्रकार चीन ने तानाशाही के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये हैं। बच्चों को स्कूलों में पहले दिन से कम्युनिष्ट विचार और चीनी राष्ट्रवाद की शिक्षा दी जा रही है।

श्री विजय ने कहा कि प्रखर राष्ट्रवाद ही चीन का समाधान है। भारत की हिमालयी सीमा पर उसकी दृष्टि गड़ी है, उसे असफल करने के लिए जन-जन में देशभक्ति की भावना जगाना जरूरी है।

श्री विजय ने कहा कि जहा तक चीन के हमले का सवाल है तो हमें डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमले में चीन का नुकसान है। चीन अपने आर्थिक विकास पर ध्यान लगाए बैठा है और वह सन् 2020 तक भारत पर हमले की गल्ती नहीं करेगा।

श्री भगवती शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि चीन की गतिविधियां सन् 62 के समान संधिग्ध हो गई हैं। वह भारत पर हमले की जुगत में है। भारत की चौतरफा घेरबंदी उसने पूर्ण कर ली है।

9 Responses to “2020 तक तो चीन हमला नहीं करेगाः तरुण विजय”

  1. abhijeet

    चीन का मतलब हान जाति का साम्राज्यवाद है , जो अपने ओद्योगिक मतलबों के लिए संसाधन जुटाने की आसुरी प्रवृति का प्रतीक है.

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  2. Abhijeet

    जिस चीनी माॅडल का इतना हल्ला है, वह वास्तव में आज पतन के एक महान खतरे से जूझ रहा है। आज दुनिया 19वीं सदी के उसी खेल का दोहराया जाना देख रही है जहां तमाम बड़ी ताकतें अपने पूंजीवादी औद्योगीकरण के लिए बेहद अनिवार्य ऊर्जा संसाधनों को हड़प लेने की साजिशों में जुटी हैं।

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  3. रवि शंकर

    भारत सरकार का रवैय्या चीन के प्रति नपुंसकता और दब्बूपन का है। इससे आम भारतीय का सम्मान आहात हो रहा है।

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  4. मन ओ. सोमक्रिया

    आपकी इस भविष्यवाणी को स्वीकार कर पाना बहुत मश्किल है किन्तु जिस प्रकार दिन-प्रतिदिन चीन सरकता हुआ सीमाप्रांतिय भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा कर रहा है और उस पर सब कुछ जानकर भी भारतीय सरकार चुप बैठकर समस्या को विकराल रुप धरने में मदद कर रही है तो देर नहीं कि वर्तमान दल के सत्ता से बाहर होते ही किसी अन्य दल को चीन का विरोध करना पड़ा तो युद्ध संभव है, संभवतः 2015-2019 के बीच ही! वर्तमान चीनी शासन एक धोखेबाज एवं मक्कार भारतीय पड़ोसी मुखिया है (The existing Chinese Governance is CROOK and SLICKER) और वर्तमान भारतीय शासन दयालु, भीरू और निर्बल है। (The existing Indian Governance is KIND-HEARTED, FAINT-HEARTED AND NERVOUS)

    चीन के प्रति वर्तमान भारतीय सरकार के नरम रुख का कारण भारत के ही पूर्वप्रधानमंत्री हैं जिन्होंने समय रहते दयालुतावश चीनियों को कई भारतीय एवं तिब्बती इलाकों में अतिक्रमण करने दिया फिर चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी रही हों।

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  5. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    “अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति” की पाठ्य पुस्तकके अनुसार (१) विश्वके विशाल राष्ट्रहि “विश्व शक्ति” बननेमे सफल होनेकी संभावना समझी जाती है।(२) चीन, भारत, अमरिका, रुस (और एक भूल रहा हूं), इत्यादि इस दौडमे प्रतिस्पर्धी समझे जाते हैं।(३) प्रत्येक राष्ट्र (देश) अपने हितोंकी दृष्टिसेहि परदेश नीति सुनिश्चित करता है।(४)फिर सिद्धांतोंके अलंकरणसे निर्णयोंको सजाकर प्रस्तुत किया जाता है।(५) परंतु, सिद्धांतोसे (sorry अहिंसावादीयों) परराष्ट्र नीति कहींभी निर्णायक नहीं होती।(६) किंतु हमारा मानस:–> हम अपनेहि सिद्धांतोंसे सेल्फ हिप्नोटाइज्ड हो जाते हैं। इस “सेल्फ हिप्नोसीस”से बाहर होकर तटस्थ अवलोकन करनेकी आवश्यकता है।(७)चीनमे माओवादी शासन क्रूर है।(८)अपने (शासनके) हितमे, वह दमन, नरसंहार और युद्ध, करनेमेभी केवल लाभ की दृष्टिसेहि सोचेगा।(९) अपनी ४ करोड जनताको मारनेवाला चीन,अकालके समय परदेशी सहायता नकारकर और ३ करोड जनताको मरने देनेवाला चीन, “एक कुटुंब एक बालक” वाला चीन, तिब्बतपर क्रूरतासे शासन दृढ और स्थायी करनेमे जुटा हुआ चीन, “किसीभी सिद्धांतोंके कारण, या जनताके भारतके प्रति कृतज्ञताके कारण निर्णय नहीं लेगा। चीन का शासन विस्तारवादी(expansionist), और आक्रमणवादी, घुसपैठवादी, होनेका परिचयभी दे रहा है। और हम संकुचनवादी (?),और (Defensive) सुरक्षावादी पहचान बना बैठे हैं। हम अपनेहि सिद्धांतोंसे सेल्फ हिप्नोटाइज्ड हैं। इससे बाहर निकलनेके लिए पोखरण निर्णय लेने जैसी, या वल्लभ भाई पटेल की हैदराबाद ऍक्शन जैसी व्यवहारवादी, वास्तविकतावादी मानसिकता की आवश्यकता है।मानसिकताकी वकालत कर रहा हूं।
    ढायी वर्ष पहले मैने १६-१७ दिनकी चीन यात्रा की थी। वहां कोई बूढा व्यक्ति कमही दिखायी दिया, गाइड खुलकर(राजनैतिक)कोई उत्तर नहीं देता था, पालतु जानवर कुत्ता-बिल्ली-गाय कहीं राहमें दिखे नहीं। यात्राके सारे डिटेल्स(डायरी-और भेंट्कर्ता, फोन) विसा मिलनेसे पहलेसे देने पडे। बुद्ध मंदरोंका उपयोग म्युज़ियम की भांति टिकट लगाकर मुद्रा कमानेके लिए किया जाता था। प्रतिभावान कलाकार भी वहां एक मज़दूरकी भांति फ़ैक्ट्रीमे काम करते देखे।और मेरी मान्यता है, कि चीनी लिपिभी बहुतहि क्लिश्ट( नागरीसे कई गुना) होनेसेभी, चीनीयोंका ज्ञान और जानकारी मर्यादित(?) हो जाती है। जो सही निर्णय लेनेमें बाधाहि है।ऐसे निर्णय शंका कुशंकाओंसे(?) लिए जाते हैं।

    तरूण जी की तरह –मेराभी निरिक्षण है, —-” कि चीन के गांव बदहाल हैं। लोग गरीबी से तंग हैं। मजदूरों का जमकर शोषण हो रहा है। यही कारण है कि चीनी माल दुनिया में सस्ता बिक रहा है।”–चीन अपने गालपर तमाचा मार कर गुलाबी दिखाने लालायित है। — और— यह एक कल (lever) हमारे हाथमे है।जिसका उपयोग कर, भारत चीनी मालको प्रतिबंधित करे,(कमसे कम घोषणा करे) तो चीन कुछ संयमित हो सकता है।आगे, विजयजी(सहमत हूं, पर देख नहीं पाया।) का कथन, “इसी के साथ चीन की कम्युनिष्ट पार्टी भ्रष्टाचार के मामले में भी रिकार्ड तोड़ रही है। हर दिन स्कैण्डल होता है। मीडिया की वहां कोई आवाज नहीं है। सरकारी मीडिया है जो सिर्फ सरकार और कम्युनिष्टों के गीत गाती है। इस प्रकार चीन ने तानाशाही के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये हैं। बच्चों को स्कूलों में पहले दिन से कम्युनिष्ट विचार और चीनी राष्ट्रवाद की शिक्षा दी जा रही है।”—-यह बहुत चिंता का बिंदु है।

    सुझाव: चीनके व्यवहारको को हर तरहसे मात करनेके लिए और उसकी विस्तारवादी नीति को लगाम लगानेके लिए (Priorities) वरीयताएं सुनिश्चित कर क्रमशः क्रियान्वित करनेकी कडी से कडी आवश्यकता आज है। कल शायद देर हो चुकी होगी। चीनकी नीति माओवादी तय करते हैं, नागरिक नहीं। तिब्बतका इतिहास और चीनकी हमारी सीमापर गतिविधियां यही पाठ पढा रही है। इसकी ओर दुर्लक्ष्य भविष्यका भारतका भूगोल बदल सकता है।इतिहास बदल सकता है।हिमालयकी इस ओर शत्रु भारतका पतन समान है। हमे पाक, बंगला, और चीन? — भारत सावधान ! “A stitch in time saves nine” दीर्घ टिप्पणीके लिए क्षमस्व।

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  6. Jeet Bhargava

    भारत ने चीन को भगवान् दी, लेकिन चीन ने भारत को शैतान (कम्युनिस्ट) दिए है.

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  7. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    ॥दत्तोपंतजी की प्रेरणासे॥
    निम्न कविता दत्तोपंतजीके अवसानपूर्व लिखी थी।
    पर उन्हे पहुंचानेमें असफल रहा।
    “त्रिवेणी तनय” (डॉ. मधुसूदन उवाच) की कविता

    ॥अस्वीकार॥
    =====
    मिट्टी में गड जाता दाना,
    पौधा ऊपर तब उठता है।
    पत्थर से पत्थर जुडता जब,
    नदिया का पानी मुडता है॥१॥
    ॥१॥
    दाना ’अहं’ (अहंकारका)का गाड दो,
    राष्ट्र बट ऊपर उठेगा।
    कंधे से कंधा जोडो,
    इतिहासका स्रोत मुडेगा॥२॥
    ॥२॥
    अहं का बलिदान बडा ,
    देह के बलिदान से-
    रहस्य को जान लो,
    सौरभ मय जीवन बनेगा।
    ॥३॥
    इस अनंत आकाश में,
    पृथ्वी का बिंदु कहां?
    अरू पृथ्वी के बिंदुऊपर,
    “अहं” का जन्तु कहां?
    फिर, बहुत नाम पाए, तो क्या पाए?
    और ना पाए तो क्या खोए?॥४॥
    -॥४॥
    अनगिनत अज्ञात वीरो ने,
    जो, चढाई आहुतियां–
    आज उनकी समाधि पर–
    दीप भी लगता नहीं।
    अरे! समाधि भी तो है नहीं।
    -॥५॥
    उन्हीं अज्ञात वीरो ने,
    आकर मुझसे यूं कहा-
    कि छिछोरी अखबारी,
    प्रसिद्धि के चाहने वाले,
    न सस्ते नामपर -नीलाम कर,
    तू अपने जीवन को।
    ॥६॥
    पद्मश्री, पद्म विभूषण,
    रत्न भारत, उन्हे मुबारक,
    बस, माँ भारती के चरणो पडे,
    हम सुमन बनना चाहते थे।
    ॥।७॥
    जब भी हम हारे,
    अहं रोडा बना है,
    या कहींपर कंधेसे-
    कंधा ना जुडा है।
    जयचंदहि पराजयचंद
    कहलाया गया है।
    किसीके “अहं”(स्वार्थ) हित,
    देशको बेचा गया है।
    ॥८॥
    दाना अहंका गाड दो,
    तो, राष्ट्र सनातन ऊपर उठेगा।
    और, कंधेसे कंधा जोडो,
    तो, इतिहास पन्ना पलटेगा।
    इतिहास पन्ना पलटेगा।
    इतिहास पन्ना पलटेगा।
    ॥९॥

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  8. Jeet Bhargava

    तरुण जी बात कुछ हद तक सही हो सकती है लेकिन चीनी बहुत रहस्यमयी होते हैं. साथ ही भारत में बसे उनके मानस-पुत्रो यानी कम्युनिस्टो का अतीत भी काला और देशविरोधी ही रहा है. ऐसे में चीन के साथ रिश्तो में ‘चीनी कम’ जैसी स्थिती बनी हुई है. फिर भी दोस्ती बने तो अच्छी बात है लेकिन थोड़ा संभलकर.

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  9. Sanjayvipul

    चीनियों के भगवन भारत के हैं , और भारत में इनकी आत्मा बस्ती है तो हमे और चीन को और अछे पडोसी बंधू की तरह रह कर बाकि दुनिया से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, क्योंकि की विस्वा के बाकि देशों हम एशियन को एक ही माना जाता है. ये बातें दोनों सर्कार को समझ कर सकारात्मक कदम उठान चिहिये.

    संजय
    लागोस , पश्चिमी अफ्रीका.

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