अपने सहयोगियों को दरकिनार करना भाजपा को पड़ा महंगा

                                         

  • मुरली मनोहर श्रीवास्तव

झारखंड में सरकार बदलने की तस्वीरें पहले से ही दिखने लगी थीं। इसकी मुख्य वजह उसको अपने केंद्रीय चुनाव में प्रचंड बहुमत के बाद झारखंड में फिर से रिपिट होने की निश्चिंतता थी। तभी तो उसने अपने सहयोगी दलों से अलग होकर अकेले मैदान में चुनाव लड़ने का अंतिम समय में फैसला लिया। जिस वक्त पार्टी अपने रुठे नेताओं को मनाने का काम करती है उस समय भाजपा अपने कदावर नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा रही थी। भाजपा के ओवर कॉन्फिडेंस का नतीजा रहा कि महाराष्ट्र के बाद अब झारखंड से हाथ धोना पड़ा। झारखंड की 81 सीटों के लिए झारखंड में भाजपा का ये नारा की अबकी बार 65 पार उसके ही गले की फांस बन गई और परिणाम आपके सामने है। हलांकि भाजपा को झारखंड में पटखनी खाने के बाद अब स्थानीय स्तर पर मंथन करने की जरुरत है।

सहयोगियों को भाव नहीं देना पड़ा महंगाः

वर्ष 2017 में भाजपा गुजरात में सिंगल लार्जेस्ट पार्टी के रुप में उभरकर सामने आयी और सरकार बनायी थी। उसके बाद देश के विभिन्न प्रांतों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपने सहयोगी दलों पर आश्रित होकर ही सरकार बनानी पड़ी। महाराष्ट्र में ही देख लीजिए अपने 30 वर्षों के भाजपा-शिवसेना के रिश्ते को मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए भेंट चढ़ा तो दिया रिश्तों में भी दरार आ गयी और उसका फायदा उठाते हुए कांग्रेस और एनसीपी शिवसेना के साथ आकर भाजपा को बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब झारखंड में ही देख लीजिए भाजपा को भरपुर समय मिला यानी सफल पांच वर्ष काम करने का मौका मिला। मगर रघुवर सरकार जमीन पर काम करने की बजाए हवा हवाई में ही रही इसी का नतीजा रहा कि लाख कोशिशों के बाद भी सरकार बनाने की राहें मुश्किल हो गई। झारखंड के पड़ोसी राज्य बिहार में एनडीए की सरकार है और इस सरकार में जदयू के साथ भाजपा और लोजपा साथ है वही हालात केंद्र सरकार में भी है, लेकिन झारखंड में भाजपा अपने पुराने सहयोगी इतना विश्वास में थी कि आजसू को भी अलग कर दिया और लोजपा, जदयू भी इसके खिलाफ ही जोर आजमाईश किए, जिसकी वजह से ऐसे हालात पैदा हुए। दिल्ली ने झारखंड की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर तालमेल के लिए आजसू को कोई तवज्जो नहीं दी।

कार्यकर्ताओं को दरकिनार करना पड़ा मंहगाः

चुनाव के दौरान बिछड़े यार और नाराज साथियों को भी मना लिया जाता है। मगर झारखंड की रघुवर सरकार ने पहले तो ग्राउंड रिपोर्ट से आलाकमान को अवगत नहीं कराया और कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया। नाराज कार्यकर्ता भले ही सामने नहीं आए मगर अंदर ही अंदर अगर सेंध लगाने में विपक्षियों की सारी गतिविधियों को देखते हुए भी कोई ध्यान नहीं दिया और ना ही रघुवर सरकार ने उनकी सुधि ली, परिणाम रघुबर हाथी से उतरकर पैदल हो गए।

2014 में भाजपा को मिली थी बहुमतः

झारखंड में 30 नवंबर से 20 दिसंबर तक पांच चरणों में मतदान हुआ। 81 सदस्यों वाली झारखंड में 2014 में विधानसभा चुनाव में भाजपा को 37 सीटें और सहयोगी आजसू को 5 सीटें मिली थीं। जबकि झामूमो को 19, कांग्रेस को 6 और बाबू लाल मरांडी के नेतृत्व वाली झारखंड विकास मोर्चा को 8 सीटें मिली थीं। जबकि बाद में जेवीएम के 6 विधायक पाला बदलकर भाजपा के समर्थन में आ गए थे वहीं अन्य को भी 6 सीटें मिली थीं। बिहार से अलग होकर झारखंड बने 19 साल गुजर गए हैं लेकिन रघुबर दास ही ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे।

रघुबर की खिलाफत से वाकिफ थी प्रबंधनः

झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने नारा दिया था, ‘अबकी बार 65 पार।’ भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने आईएएनएस को बताया था, ‘हम जानते हैं कि राज्य इकाई भी दास के खिलाफ है। इस बात से अमित शाह भी वाकिफ थे लेकिन मुख्यमंत्री बदलने का जोखिम भाजपा नहीं उठा सकती थी। उसे इस बात का भय सता रहा था कि चेहरा बदलने का उसे और भी नुकसान हो सकता है। एक बात और सामने उभरकर आयी की गैर आदिवासी मुख्यमंत्री को अपनाना भी मुश्किल तो था ही रघुबर दास की विश्वसनीयता भी कई मायनों में सवालों के घेरे में बनी रही। झारखंड में जहां विपक्षी दल एकजुट होकर मैदान में थे, वहीं भाजपा अकेले मैदान में उतरी थी। उसे विश्वास था कि वो इस बार भी अपना परचम लहराएगी। लेकिन आजसू से सीट बंटवारे में बनी दूरी भी इस नुकसान की वजह बनी।

मुद्दों से भटक गए सरकारः


झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा के बड़े नेता स्थानीय मुद्दों को छोड़कर राष्ट्रीय मुद्दों पर ही बोलते रहे। चुनावी प्रचार में एनआरसी जैसे मुद्दे जहां छाए रहे वहीं राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने की भी बातें अधिकांश रैली में छायी रही। सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन का नुकसान भी भाजपा को उठाना पड़ा। वहीं दूसरी तरफ एकजुट होकर महागठबंधन चुनाव प्रचार के दौरान लगातार स्थानीय मुद्दों और आदिवासी हितों की रक्षा की बातें करते रहे।

रोजगार के मुद्दे को भूल गई सरकारः

वर्ष 2014 में हुए चुनाव में भाजपा राज्य में ज्यादा से ज्यादा निवेश खींचकर सूबे में रोजगार पैदा करने के इरादे से सत्तारुढ़ हुई थी। मगर पिछले पांच वर्षों में निजी निवेश में झारखंड में भारी कमी आयी। एक रिपोर्ट सेंटर ऑफ मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी के प्रोजेक्ट ट्रेकिंग डेटाबेस के अनुसार वर्ष 2018-19 में झारखंड में 44 फीसदी निवेश परियोजनाएं रुक गईं, जिसका सीधा असर भाजपा के इस चुनाव पर पड़ा।

जमीन अधिग्रहण बना बड़ा विवादः

झारखंड में जंगल के आस-पास की जमीन के अधिग्रहण का मामला राज्य में लंबे समय से विवादित मुद्दा बना रहा। वहीं वर्ष 2016 में सूबे की सरकार ने राज्य के काश्तकारी कानून में बदलाव की कोशिश की और 2017 में जमीन अधिग्रहण से जुड़े नियमों में नरमी लायी। इस बदलाव से जमीन अधिग्रहण तो आसान हो गया लेकिन इन फैसलों से दक्षिणी झारखंड के संथाल परगना और छोटानागपुर आदिवासी बहुल इलाकों में सरकार के खिलाफ रोष पैदा हो गई। झारखंड में आए परिणाम से देश में भाजपा के विपक्षियों के जहां हौसले बुलंद हुए हैं वहीं भाजपा के लिए विचारणीय दौर है।

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