इक़बाल हिंदुस्तानी
एक बार फिर हम राष्ट्रीय पर्व यानी 15 अगस्त मनाने की रस्म अदायगी करेंगे। स्कूलों में बच्चे प्रभात फेरी निकालेंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। नारे लगेंगे। कुछ लोग भाषण देंगे। राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगा झंडा फहराया जायेगा। बाद में सबको मिठाई और वीआइपी लोगों को बढि़या नाश्ता परोसा जायेगा। लो जी हो गया स्वतंत्राता दिवस।
अगर स्कूलों में बच्चो के लिये 15 अगस्त और 26 जनवरी पर जाना और ऐसे प्रोग्राम करना ज़रूरी न हुआ करता तो शायद हमें पता भी न लगा करता कि कब नेशनल फैसिटवल आये और कब चले गये। हर बार ऐसे मौकों पर एक काम और होता है कि हमारा मीडिया ऐसे ज़ोर शोर से जश्न मनाता है मानो पूरा देश और उसका हर बाशिंदा सब काम छोड़कर तन मन ध्न से 15 अगस्त मना रहा है। सच यह है कि जब राष्ट्रीय गान सिनेमा हालों में फिल्म के अंत में होता था तो अधिकांश लोग उसके सम्मान में खड़ा होना तो दूर रुकना भी गवारा नहीं करते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि इस बेहतरीन परंपरा को बंद कर दिया गया। यही हाल हमारे राष्ट्रीय पर्वों का हो चुका है।
हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि इस रस्म अदायगी को भी बंद कर दिया जाये। हम तो यह जानना चाहते हैं कि वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से आम आदमी ही नहीं अधिकांश लोगों का 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे पर्वों से मोहभंग हो गया है। हम अभी यहां जानबूझकर 2 अक्तूबर यानी गांधी जयंती की चर्चा नहीं कर रहे चूंकि उसको भाव देने वाले तो और भी कम हैं। हमारे देश में तो यह विडंबना ही है कि एक तरफ हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहलाते हैं और दूसरी तरफ कर्इ जमात बाकायदा ऐसी है जो उनको खुलेआम न सही मन ही मन राष्ट्रपिता तक स्वीकार नहीं करती और हद तो यह है कि गांधी जी की कटु आलोचक और निंदक ही नहीं बेहद नापसंद और घृणा भी करती हैं।
हम बात कर रहे थे आज़ादी की। ऐसा क्या हुआ कि 15 अगस्त 1947 को जो सपना इस देश के लोगों ने मिलकर देखा था कि जब गोरे अंग्रेज़ इस देश से चले जायेंगे तो हम सब मिलकर एक आदर्श भारत बनायेंगे । उसको बिखरने में कुछ ही साल लगे। सच यह है कि वही कहावत चल निकली कि भाग रे गुलाम फौज आर्इ और गलाम कहता है कि मैं भाग कर क्या करूंगा मैं तो अब भी गुलाम और तब भी गुलाम। शायद ऐसा ही कुछ हमारे देश के अधिकांश लोगों के साथ हुआ है। खुद सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि देश के 80 प्रतिशत लोग 20 रुपये रोज़ से कम पर गुज़ारा कर रहे हैं। आम आदमी की मौत कुत्ते बिल्ली की तरह हो जाती है। सरकारी कार्यालयों में उसका कोई काम बिना चक्कर कटाये, दुत्कारे और जेब गर्म किये बिना नहीं होता जिससे उसे आज़ादी का मतलब समझ में नहीं आता। रोज़गार के नाम पर केवल ग्रामीण क्षेत्रों मे महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना ज़रूर शुरू हुयी है जिसका न होने से बेहतर कुछ न कुछ लाभ ज़रूर मिलता दिखार्इ दे रहा है। साथ साथ यह देखा जाना भी ज़रूरी है कि क्या गांवों में ही रोज़गार की ज़रूरत है? क्या केवल एक आदमी को साल में सौ दिन ही जिंदा रहना होता है जो केवल सौ दिन की बंदिश लगाई गयी है। साथ ही पहले यह राशि केवल सौ रुपयों तक सीमित रखी गयी थी अब इसमें कुछ बढ़ोत्तरी की गयी है। उधर बाज़ार में खाने पीने के सामान के रेट सबसे अधिक और सबसे तेज़ी से बढ़ रहे हैं जिससे मनरेगा की दिहाड़ी महंगार्इ के इंडेक्स से जोड़े जाने में क्या बुरार्इ है? साथ ही कुछ उद्योगपति और विशेष रूप से पंजाब आदि के बड़े किसान और शहरों में निर्माण के काम में मज़दूर न मिलने से मनरेगा की आलोचना भी करने लगे हैं लेकिन क्या संविधन में सभी को रोज़गार का बुनियादी अधिकार नहीं दिया गया है जो कृषि और निर्माण में मज़दूर न मिलने या कम मिलने या महंगे मिलने के बहाने लोगों को बिना रोज़गार के लबे दम रखा जाये? ऐसे तो विदेशों में भी अगर यही तर्क दिया जाने लगा तो फिर भारतीयों को मिलने वाले आउटसोर्सिंग और सस्ते श्रम, डाक्टर व इंजीनियर के देश से कई गुना अधिक मिल रहे दामों का क्या होगा?
ऐसा नहीं है कि देश ने आज़ादी के बाद से कोई प्रगति और विकास ही न किया हो लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस उन्नति में सबको बराबर की भागीदारी नसीब नहीं हो सकी है जिससे दो देश यानी एक अमीर लोगों का ‘संचित इंडिया और गरीब लोगों का ‘वंचित इंडिया बन गया है। दरअसल यह पूंजीवादी नीतियों का बायप्रोडक्ट है। आप न भी चाहें तो भी यह बायडिफाल्ट होना ही था। चीन ने इस समस्या को पहले ही समझ लिया था जिससे उसने अपनी शर्तों पर विदेशी निवेश को अपने यहां आने दिया है । हालांकि चीन की व्यवस्था एक बंद व्यवस्था है और वहां हमारी तरह लोकतंत्र और अभिव्यकित की स्वतंत्राता नहीं है जिससे हमारे यहां की परिसिथतियों का मुकाबला वहां के हालात से कुल मिलाकर नहीं किया जा सकता लेकिन अगर पूर्वाग्रह न रखकर देखा जाये तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि हमारे यहां विदेशी और देशी पूंजी को जिस तरह से एल पी जी यानी लिबरल, प्राइवेट और ग्लोबल के नाम पर खुलकर खेलने का मौका दिया गया है उससे यही होना था जो आज हो रहा है। गरीब को रोटी कपड़ा और मकान भी मयस्सर नहीं है जबकि शिक्षा और चिकित्सा की तो बात ही बाद में आती है। आज शिक्षा और चिकित्सा सबसे महंगे होते जा रहे हैं जिससे गरीब आदमी को यह शक नहीं अब विश्वास हो चला है कि एक सोची समझी रण्नीति के तहत यह सब किया जा रहा है जिससे समाज के एक वर्ग विशेष की इन क्षेत्रों में मोनोपोली बनी रहे। न गरीब का बच्चा योग्य होने के बावजूद अच्छी और ऊंची तालीम ले पायेगा और न ही गंभीर बीमार ही नहीं साधरण बीमारी में भी निजी नर्सिंग होम और प्राइवेट हासिपटल में वह अपने परिवार का इलाज करा पायेगा।
सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार जैसे कुछ कानून ज़रूर सामने आये हैं जिनसे एक आशा की किरण जगी है, लेकिन इनके इस्तेमाल में अभी शिक्षा और जागरूकता के साथ नैतिक साहस की ज़रूरत पड़ेगी जिसमें अभी समय लग सकता है। यातायात के हिसाब से देखें तो अंग्रेज़ जितनी रेलवे लाइनें और पुल बना गये थे उनको आज़ादी के 64 साल बाद बढ़ाने में हमारी स्पीड काफी कम है। यही हालत कमोबेश हमारी सड़कों और बिजली उत्पादन की है। हरित क्रांति के बाद भी हम जितना खरगोश की तरह आराम कर चुके हैं वह भी बैकगियर में जाने लगी है। भ्रष्टाचार का पानी नाक के ऊपर पहुंचने के बावजूद जिस तरह से सरकार ने 43 साल बाद बेमन से एक लूला लंगड़ा लोकपाल लाने और अन्ना हज़ारे की टीम को हड़काने का अभियान छेड़ा हुआ है उससे नहीं लगता कि अभी हम आज़ादी का मतलब समझ पा रहे हैं। बहरहाल अन्ना को आंदोलन करने से रोकने की मंशा सरकार ने जताकर यह साबित कर दिया है कि विनाशकाल विपरीत बुधिद की कहावत वह चरितार्थ करने को तैयार है। 1947 को आज़ादी मिली सत्ता मिली और 1950 को संविधन मिला लेकिन चंद हाथों में क़ैद होकर रह गये जिससे आज तो यही कहना पड़ता है कि –
0 क़तरा गर एहतजाज करे भी तो क्या करे
दरिया तो सब के सब समंदर से जा मिले।
हर कोई दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,
फिर यह भी चाहता है मुझे रास्ता मिले।।