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आर्थिकी राजनीति

तेज गति से बढ़ रहा है भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार

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भारतीय अर्थव्यवस्था आज लगभग 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से विकास की राह पर आगे बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था के आकार में विस्तार से उस देश के नागरिकों की आय में वृद्धि दर्ज होती है इससे गरीब वर्ग के हाथों में भी पैसा पहुंचता है इससे, विभिन्न उत्पादों की मांग बढ़ती है एवं रोजगार के नए अवसर निर्मित होते हैं और अंततः गरीब वर्ग की संख्या में कमी होकर देश में मध्यम वर्ग की संख्या बढ़ती है। नीति आयोग के एक प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2015-16 में भारत के शहरी क्षेत्रों में गरीब वर्ग की संख्या 24.85 प्रतिशत थी जो वर्ष 2020-21 में घटकर 14.90 प्रतिशत रह गई है। इसमें 9.95 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीब वर्ग की संख्या 32.59 प्रतिशत थी जो वर्ष 2020-21 में घटकर 19.28 प्रतिशत रह गई है। अतः भारत में गरीब वर्ग की संख्या कम हुई है। इसी कारण से वैश्विक रेटिंग संस्थान भारत की रेटिंग को बढ़ाते जा रहे हैं। स्टैंडर्ड एंड पुअर रेटिंग संस्थान ने भारत की विकास दर को वर्ष 2023-24 के लिए 6 प्रतिशत रखा है तो वर्ष 2024-25 के लिए 6.9 प्रतिशत की बात की है। साथ ही इसी संस्थान का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2030 तक 7 लाख 30 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाने वाला है। वर्ष 2023 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था 26 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के साथ प्रथम स्थान पर है। दूसरे नम्बर पर चीन आता है जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार 18 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। तीसरे स्थान पर जापान है जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार 4 लाख 20 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर है। चौथे स्थान पर जर्मनी है जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार भी लगभग 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। इस प्रकार भारत अपनी बढ़ी हुई लगभग 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की विकास दर के साथ शीघ्र ही जापान एवं जर्मनी को पछाड़ कर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। फिच नामक रेटिंग संस्थान ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के अपने पूर्व के अनुमान में सुधार करते हुए इसे वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए 6.2 प्रतिशत कर दिया है, पहिले इस वृद्धि दर के 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। मूडीज नामक रेटिंग संस्थान ने भी भारत की विकास दर को वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान 6.7 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की है। भारत तेजी से विकास कर रहा है यह त्यौहारों के दौरान बाजारों में उत्पादों की खरीद के लिए उमड़ रही भीड़ से भी साफ दिखाई दे रहा है। भारत24 चैनल पर प्रस्तुत एक कार्यक्रम में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद (अर्थात कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्र में कुल उत्पादन) वर्ष 2022-23 में 282.83 लाख करोड़ रुपए के स्तर पर आ गया है। अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद पूरे विश्व में पहिले नम्बर पर है जो 2121.19 लाख करोड़ रुपए का है। इसीलिए अमेरिका पूरी दुनिया का सबसे अमीर एवं ताकतवर देश कहा जाता है। दूसरे नम्बर पर चीन का सकल घरेलू उत्पाद 1497.31 लाख करोड़ रुपए का है। जापान का सकल घरेलू उत्पाद 407.60 लाख करोड़ रुपए का है। जर्मनी का सकल घरेलू उत्पाद 341.05 लाख करोड़ रुपए का है। इस दृष्टि से भारत दुनिया का 5वां सबसे बड़ा अमीर देश है। वर्ष 2013-14 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 113.55 लाख करोड़ रुपए का था और वर्ष 2013-14 में भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरे विश्व में 10वां नम्बर था। वर्ष 2013-14 में अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद 1459.88 लाख करोड़ रुपए का था। चीन का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2013-14 में 871.77 करोड़ का था। जापान का सकल घरेलू उत्पाद 2013-14 में 349.37 लाख करोड़ रुपए का था। जर्मनी का सकल घरेलू उत्पाद 323.59 लाख करोड़ रुपए का था। अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद इस दौरान 50 प्रतिशत, चीन का 80 प्रतिशत, जापान का 30 प्रतिशत, जर्मनी का 5 प्रतिशत बढ़ा है जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 150 प्रतिशत बढ़ा है। इसी गति से भारत आर्थिक प्रगति करता रहा तो निश्चित ही वर्ष 2030 के पूर्व ही भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।  मेक इन इंडिया योजना के अंतर्गत भी बहुत काम होता दिखाई दे रहा है और भारत में निर्मित वस्तुओं का निर्यात लगतार बढ़ रहा है। वर्ष 2022-23 में भारत ने 36 लाख करोड़ रुपए का निर्यात किया है। जबकि वर्ष 2014 में 19.05 लाख करोड़ रुपए का निर्यात हुआ था। यह लगभग दोगुना हो गया है। वर्ष 2023-24 में भारत सरकार ने पूंजीगत व्यय को 10 लाख करोड़ रुपए पर पहुंचा दिया है। इससे रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित हो रहे हैं। वर्ष 2014-15 में भारत में 97,000 किलो मीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग थे, जो 9 वर्ष बाद वर्ष 2023-24 में बढ़कर 145,155 किलोमीटर हो गए हैं। इस दौरान लगभग 50,000 किलोमीटर के नए राष्ट्रीय राजमार्ग निर्मित हुए हैं। अब तो गुणवत्ता के मामले में भारत के राजमार्ग  अमेरिका के राजमार्गों से टक्कर लेते हुए दिखाई दे रहे हैं। बेहतरीन राजमार्ग विकसित देश के लिए जरूरी हैं। अच्छे राजमार्गों से बाजार और रोजगार दोनों बढ़ते हैं।  आज भारत अपने घर में उत्पादित वस्तुओं के उपयोग को भी लगातार बढ़ा रहा है। “वोकल फोर लोकल” का नारा अब बुलंद हो रहा है एवं भारतीय नागरिक अब चीन में निर्मित उत्पादों का उपयोग कम करते हुए भारत में ही निर्मित वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी भी भारतीय नागरिकों को लगातार अपील कर रहे हैं कि भारत में ही उत्पादित वस्तुओं का उपयोग करें। इसका असर होता दिख भी रहा है। चीन से विभिन्न उत्पादों के आयात में इस त्यौहारी मौसम में कमी आई है और एक अनुमान के अनुसार इस वर्ष लगभग एक लाख करोड़ रुपए के उत्पादों का आयात चीन से कम हुआ है। चीनी दिवाली लाइट्स के आयात में 32 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है। वहीं दूसरी ओर भारत में बनी लाइट्स की बिक्री में 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। इसका सबसे अधिक फायदा गरीब वर्ग को हो रहा है। हम समस्त भारतीय नागरिकों को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि सड़क के एक किनारे बैठकर कुछ वस्तुएं बेचने वाले गरीब व्यक्ति से अधिक मोलभाव ना करते हुए उनसे वस्तुएं खरीदें ताकि यह वर्ग भी अपनी आय को बढ़ा सके। वैसे भी, जब हम लोग माल से वस्तुएं खरीदते हैं तो कोई माल भाव थोड़ी करते हैं। सकल घरेलू उत्पाद जब बढ़ता है तो लोगों की आय भी बढ़ती है। जब लोगों की आय बढ़ती है तो लोग बाजार में सामान खरीदते हैं। इससे बाजार में उत्पादों की मांग बढ़ती है। उत्पादों की मांग एवं आपूर्ति से उत्पादों की बाजार कीमतें तय होती है। जब किसी भी उत्पाद की मांग तुलनात्मक रूप से अधिक तेजी से बढ़ती है और उस उत्पाद की आपूर्ति बाजार में समय पर नहीं हो पाती है तो उस उत्पाद की बाजार में कीमतें बढ़ने लगती है। जब खर्च करने की क्षमता बढ़ती है तो आप सामान के दाम अधिक देने को भी तैयार रहते हैं। भारत में न केवल आर्थिक विकास में गति आ रही है बल्कि मुद्रा स्थिति भी नियंत्रण में है। यह केंद्र सरकार एवं भारतीय रिजर्व  बैंक द्वारा संयुक्त रूप से किए जा रहे उपायों के चलते सम्भव हो पा रहा है। भारत की वित्तीय नीतियां महंगाई को रोकने के साथ साथ विकास को भी बढ़ावा दे रही हैं। खाने पीने की वस्तुओं की बाजार कीमतों में कमी होने से अक्टोबर 2023 माह में खुदरा महंगाई की दर में गिरावट आई है और यह चार महीने के निचले स्तर 4.87 प्रतिशत पर पहुंच गई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई जानकारी के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति की दर सितंबर 2023 माह में पिछले तीन माह के निचले स्तर 5.02 प्रतिशत पर थी। भारत में आम आदमी का सबसे अधिक खर्च खाने पीने और स्वास्थ्य सेवाओं पर हो रहा है। केंद्र सरकार द्वारा बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर 89 000 करोड़ रुपए के व्यय का प्रावधान किया गया है। डॉक्टरों की संख्या में 4 लाख से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत में आज 13 लाख से अधिक एलोपेथिक डॉक्टर हैं। इसके अतिरिक्त, 5.65 लाख आयुर्वेदिक डॉक्टर भी उपलब्ध हैं। इस प्रकार भारत में प्रत्येक 834 नागरिकों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। गरीब नागरिकों को  मुफ्त  इलाज प्रदान करने के लिए आयुषमान स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किए गए हैं। इसी प्रकार किसानों के लिए मोदी सरकार ने प्रति क्विंटल गेहूं पर 775 रुपए से, चावल पर 730 रुपए से न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है। वर्ष 2012-13 में भारत के किसानों की औसत मासिक आय 6,426 रुपए पाई गई थी जो वर्ष 2018-19 में बढ़कर 10,248 रुपए हो गई है। यूएनडीपी के एक प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि भारत में मिडल क्लास अर्थात मध्यम वर्ग की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। वैश्विक स्तर पर मिडल क्लास की बढ़ रही संख्या में भारत का योगदान 24 प्रतिशत का है। विश्व के कई वित्तीय संस्थानों का मत है कि वर्ष 2027 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसका मतलब यह भी है कि देश में प्रति व्यक्ति आय में और अधिक तेज गति से वृद्धि की सम्भावना है। साथ ही, भारत आज प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर भी बन रहा है। प्रहलाद सबनानी 

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दीपावली त्यौहार ने दी है भारत को आर्थिक ताकत

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इस वर्ष दीपावली त्यौहार के धनतेरस के दिन भारतीयों ने विभिन्न उत्पादों की जमकर खरीद की है। भारतीय अर्थव्यवस्था को तो जैसे पंख लग गए हैं एवं भारतीय अर्थव्यवस्था अब बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी कारण से वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में भारत की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर वित्तीय वर्ष 2023-24 के वृद्धिगत सकल घरेलू उत्पाद में भारत की भागीदारी  15 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। भारत ने अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। भारत में आज आम आदमी की आमदमी बढ़ रही है, आम आदमी की तरक्की जारी हैं एवं इसे और अधिक बेहतर बनाने के प्रयास लगातार हो रहे हैं। इसी के चलते भारतीय बाजारों में दीपावली के पावन पर्व पर भारी भीड़ एवं रौनक दिखाई दे रही है। भगवान धन्वन्तरि भारतीय नागरिकों पर जैसे धन की वर्षा करते नजर आ रहे हैं। भारत में धनतेरस के दिन किसी भी प्रकार के उत्पाद की खरीददारी को शुभ माना जाता है। विशेष रूप से बर्तन, गहने, वाहन एवं मकान आदि भारी मात्रा में खरीदे जाते हैं। इस वर्ष भारतीय बाजारों में एक और शुभ संकेत दिखाई दे रहा है कि भारतीय नागरिक “वोकल फोर लोकल” एवं “आत्म निर्भर भारत” जैसे विचार से सहमत होते हुए केवल भारत में निर्मित वस्तुओं की जमकर खरीद कर रहे हैं। रीयल एस्टेट सेक्टर, कार डीलर्स, जौहरियों एवं किराना व्यवसायीयों की तो जैसे लॉटरी ही लग गई है। इस वर्ष दीपावली त्यौहार में बाजारों में उमड़ रही भीड़ अपने आप में भारत की आर्थिक शक्ति बनने की कहानी कह रही है। भारतीय ग्राहकों में उत्साह दिख रहा है। ग्राहकों का उत्साह देखकर कारोबारी एवं व्यापारी भी खुश नजर आ रहे हैं। कन्फेडरेशन आफ ऑल इंडिया ट्रेडर्ज एसोसीएशन के अनुसार, इस वर्ष दीपावली के त्यौहारी मौसम में देश में 3.75 लाख करोड़ रुपए का व्यापार हुआ है। इस खरीद की विशेष  बात यह रही है कि उपभोक्ताओं में चीन में निर्मित माल के स्थान पर भारत में ही निर्मित स्वदेशी सामान की जबरदस्त मांग देखने को मिली है। जबकि षठ पूजा एवं भैया दूज समेत अभी कई त्यौहार आना शेष है, इस प्रकार आगे आने वाले अन्य त्यौहारों के शुभ अवसर पर 50,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यापार होने की सम्भावना भी व्यक्त की गई है। उक्त संस्थान ने “भारतीय उत्पाद – सबका उस्ताद” नामक एक कैम्पेन भी भारत में, हाल ही में प्रारम्भ हुए त्यौहारी मौसम के दौरान, चलाया था, जिसका भारतीय नागरिकों पर जबरदस्त प्रभाव दिखाई दिया है। साथ ही इस वर्ष के त्यौहारी मौसम में चीन को लगभग एक लाख करोड़ रुपए के व्यापार का नुक्सान हुआ है। क्योंकि, इसके पहिले चीन में बनी वस्तुओं की भारतीय बाजारों में 70 प्रतिशत तक बिक्री होती थी परंतु इस वर्ष भारतीय बाजारों में स्वदेशी वस्तुओं की मांग इतनी अधिक थी कि चीन में निर्मित वस्तुओं की बिक्री बहुत ही कम हो गई है। इस वर्ष भारत में दीपावली से सम्बंधित सामान का चीन से आयात नहीं के बराबर हुआ है। एक अनुमान के अनुसार, इस 3.50 लाख करोड़ रुपए के व्यापार में 13 प्रतिशत खाद्य सामग्री एवं किराना की, 9 प्रतिशत ज्वेलरी की, 12 प्रतिशत टेक्स्टायल एवं गारमेंट की, 4 प्रतिशत ड्राई फ़्रूट, मिठाई एवं नमकीन की, 3 प्रतिशत होम डेकोर की, 6 प्रतिशत कास्मेटिक्स की, 8 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मोबाइल की, 3 प्रतिशत भोजन सामग्री एवं पूजा वस्तुओं की, 3 प्रतिशत रसोई एवं बर्तन उपकरण की, 8 प्रतिशत गिफ्ट सामान की, 4 प्रतिशत फर्निशिंग एवं फर्निचर सामान की एवं 25 प्रतिशत ऑटोमोबील, हार्डवेयर सामान, खिलौने सहित अन्य अनेकों वस्तुओं एवं सेवाओं की भागीदारी रही है।  भारत में मकानों की बिक्री सम्बंधी आंकड़ों से भी आभास होता है कि भारत में मिडल एवं अपर मिडल क्लास वर्ग की संख्या बढ़ी है। रीयल एस्टेट से जुड़े कारोबारियों का मानना है कि इस वर्ष 1.5 लाख से अधिक लक्जरी और एफोर्डेबल घरों की बिक्री का रिकार्ड बन गया है। वर्ष 2023 की दीपावली के ठीक पूर्व के समय में 1.50 लाख घरों की बिक्री प्रदर्शित करती है कि भारत के नागरिकों की आय में तेज गति से वृद्धि हो रही है। वर्ष 2022 की दीपावली के पूर्व 1.47 लाख घरों की बिक्री हुई थी और वर्ष 2021 में यह आंकड़ा 1.14 लाख रहा था। जनवरी 2023 से सितम्बर 2023 तक की अवधि में भी भारत में 2.30 लाख लक्जरी और एफोर्डेबल  घरों की बिक्री हुई थी, जो पिछले साल के मुकाबले 5 प्रतिशत अधिक है। रीयल एस्टेट में बूम का मतलब है कि भारत तेज गति से तरक्की कर रहा है। भारत में आम लोगों की जेब तक पैसा पहुंच रहा है। त्यौहारी सीजन में उछाल सिर्फ रीयल एस्टेट सेक्टर में ही नहीं है, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी लगभग इसी प्रकार का त्यौहारी वातावरण दिखाई दिया है। माह अकटोबर 2023 में भारत में 3.90 लाख चार पहिया वाहनों की बिक्री हुई है। जबकि 19 लाख के करीब दोपहिया वाहन भी बिके हैं। नवम्बर 2023 के त्यौहारी मौसम में 4.25 लाख चार पहिया वाहन एवं 20 लाख दो पहिया वाहन बिकने का अनुमान लगाया गया है। इसी प्रकार, एक अन्य अनुमान के अनुसार धनतेरस 2023 के दिन भारत में 50,000 करोड़ रुपए के सोने के आभूषणों की बिक्री हुई है। पिछले वर्ष धनतेरस के दिन 45,000 करोड़ रुपए के सोने के आभूषणों की बिक्री हुई थी। इस प्रकार इस वर्ष सोने के आभूषणों की बिक्री में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। भारत में  प्रत्येक क्षेत्र में विकास स्पष्टत: दिखाई दे रहा है। नागरिकों की जेब में पैसा पहुंचा है तभी तो भारत में उक्त वर्णित समस्त क्षेत्रों में भारी तादाद में बिक्री सम्भव हो पा रही है।  शादी के मौसम की शुरुआत एवं नवरात्रि त्यौहार के शुरू होने के साथ ही भारत में त्यौहारी मौसम की शुरुआत हो जाती है। दिनांक 8 अकटोबर से ऑनलाइन खुदरा बिक्री के साइट, फ्लिपकार्ट एवं अमेजोन, पर उत्पादों की बिक्री का विशेष त्यौहारी अभियान प्रारम्भ किया गया था और केवल चार दिन में ही केवल उक्त दो कम्पनियों की साइट पर 40,000 करोड़ रुपए का व्यापार कर लिया गया है।  भारत के विकास की कहानी की यह तो शुरुआत भर है, आगे आने वाले समय में विकास की इस कहानी को और अधिक गति मिलने की सम्भावना है क्योंकि अभी तक तो केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे पूंजीगत खर्चों का प्रभाव ही इस विकास की कहानी पर दिखाई दे रहा है (केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में 7.50 लाख करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय किया था और वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए 10 लाख करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय करने का लक्ष्य निर्धारित किया है) जबकि निजी क्षेत्र भी अब अपने पूंजीगत खर्चों में वृद्धि करने जा रहा है क्योंकि विभिन्न कम्पनियां अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग कर रही है, अतः उन्हें विनिर्माण के क्षेत्र में नई इकाईयों की स्थापना निकट भविष्य में करना ही होगी। साथ ही, विदेशी कम्पनियों के भी भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना किये जाने के सम्बंध में सहमति पत्र लगातार प्राप्त हो रहे हैं। इस प्रकार, आगे आने वाले समय में भारत में रोजगार के करोड़ों नए अवसर निर्मित होने जा रहे हैं जिससे मिडल क्लास की संख्या में और अधिक तेज गति से विस्तार होगा और भारत में ही निर्मित उत्पादों की मांग और अधिक तेज होने जा रही है।  प्रहलाद सबनानी 

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आर्थिकी लेख

भारत में बैंक ऋण का उपयोग उत्पादक कार्यों हेतु दक्षता के साथ हो रहा है

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भारत में तेज गति से हो रही आर्थिक प्रगति के चलते व्यवसाईयों, कृषकों, उद्यमियों, उद्योगों, सेवाकर्मियों एवं नागरिकों की, उनकी आर्थिक एवं अन्य गतिविधियों के लिए, पूंजी की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान केंद्र सरकार ने इस ओर ध्यान देते हुए विशेष रूप से सरकारी क्षेत्र की बैंकों को तैयार किया है कि वे देश के समस्त नागरिकों को ऋण के रूप में धन अथवा पूंजी आसान शर्तों पर उपलब्ध कराएं ताकि देश के आर्थिक विकास को बल मिल सके। ऋण का उपयोग यदि उत्पादक कार्यों के लिए किया जाता है एवं इससे यदि धन अर्जित किया जाता है तो बैकों से ऋण लेना कोई बुरी बात नहीं है। बल्कि, इससे तो व्यापार को विस्तार देने में आसानी होती है और पूंजी की कमी महसूस नहीं होती है। भारतीय नागरिक तो वैसे भी सनातन संस्कृति के अनुपालन को सुनिश्चित करते हुए अपने ऋण की किश्तों का भुगतान समय पर करते नजर आते हैं इससे बैकों की अनुत्पादक आस्तियों में कमी दृष्टिगोचर हो रही है, जून 2023 को समाप्त तिमाही में भारतीय बैंकों में सकल अनुत्पादक आस्तियों का प्रतिशत केवल 3.7 प्रतिशत था। इससे अंततः बैकों की लाभप्रदता में वृद्धि होती है और इन बैकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात में सुधार होता है। जून 2023 को समाप्त तिमाही में भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 17.1 प्रतिशत था जो अमेरिकी बैंकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात से भी अधिक है। साथ ही, वर्तमान ऋण की, समय पर अदायगी से बैकों की ऋण प्रदान करने की क्षमता में भी वृद्धि होती है। अभी हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि भारत में वित्तीय वर्ष 2014 से वित्तीय वर्ष 2023 के बीच बैंकों की कुल सम्पति/देयताओं में वृद्धि, वित्तीय वर्ष 1951 से वित्तीय वर्ष 2014 के बीच की तुलना में 1.3 गुणा अधिक रही है। वित्तीय वर्ष 2051 से 2014 के बीच के 63 वर्षों के दौरान भारत की समस्त अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों की सम्पति एवं देयताओं में 142 लाख करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज की गई थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2014 से 2023 के बीच के 9 वर्षों के खंडकाल में यह वृद्धि 187 लाख करोड़ रुपए की रही है। बैकों द्वारा अधिक मात्रा में प्रदान की जा रही ऋणराशि के चलते ही बैकों की आस्तियों में अतुलनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 22 सितम्बर 2023 को समाप्त पखवाड़े के दौरान बैकों द्वारा प्रदान की गई ऋण राशि में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, इससे बैकों का ऋण जमा अनुपात 78.58 हो गया है। भारत के बैकों की ऋण राशि में हो रही अतुलनीय वृद्धि के बावजूद, भारत में ऋण:सकल घरेलू उत्पाद अनुपात अन्य देशों की तुलना में अभी भी बहुत कम है। हालांकि हाल ही के समय में विनिर्माण इकाईयों की उत्पादन क्षमता का उपयोग बहुत तेजी से बढ़ा है, वित्तीय वर्ष 2022-23 के चौथी तिमाही में विनिर्माण इकाईयों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता का 76.3 प्रतिशत उपयोग किया जा रहा था,  जिसके कारण उद्योग जगत को ऋण की अधिक आवश्यकता महसूस हो रही है। बढ़े हुए ऋण की आवश्यकता की पूर्ति भारतीय बैंकें आसानी से करने में सफल रही हैं। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि विकसित देशों में भी प्रायः यह देखा गया है कि बैंकों द्वारा प्रदत्त ऋण में वृद्धि के साथ उस देश के सकल घरेलू उत्पाद में भी तेज गति से वृद्धि दृष्टिगोचर हुई है। भारत में भी अब यह तथ्य परिलक्षित होता दिखाई दे रहा है। भारत में आर्थिक गतिविधियों में आ रही तेजी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में भी  ऋण की मांग लगातार बढ़ रही है। फिर भी, भारत में कोरपोरेट को प्रदत ऋण का सकल घरेलू उत्पाद से प्रतिशत वर्ष 2015 के 65 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2023 में 50 प्रतिशत हो गया है। इसका आशय यह है कि इस दौरान कोरपोरेट ने अपने ऋण का भुगतान किया है एवं उन्होंने सम्भवत: अपनी लाभप्रदता में वृद्धि दर्ज करते हुए अपने लाभ का पूंजी के रूप में पुनर्निवेश किया है। साथ ही, कुछ कोरपोरेट का आकार इतना अधिक बढ़ा हो गया है कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजार से कम ब्याज की दर पर डॉलर में ऋण प्राप्त करने में सफलता पाई है। हालांकि इस बीच भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी बढ़ा है जो वर्ष 2013 में 2200 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023 में 4600 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। विभिन्न बैंकों द्वारा प्रदत्त लम्बी अवधि के ऋण सामान्यतः आस्तियां उत्पन्न करने में सफल रहे हैं, जैसे गृह निर्माण हेतु ऋण अथवा वाहन हेतु ऋण, आदि। इस प्रकार के ऋणों के भविष्य में डूबने की सम्भावना बहुत कम रहती है। बैकों द्वारा खुदरा क्षेत्र में प्रदत्त ऋणों में से 10 प्रतिशत से भी कम ऋण ही प्रतिभूति रहित दिए गए हैं जैसे सरकारी कर्मचारियों को पर्सनल (व्यक्तिगत) ऋण, आदि। पर्सनल ऋण प्रतिभूति रहित जरूर दिए गए हैं परंतु चूंकि यह सरकारी कर्मचारियों सहित नौकरी पेशा नागरिकों को दिए गए हैं, जिनकी मासिक किश्तें समय पर अदा की जाती हैं, अतः इनके भी डूबने की सम्भावना बहुत ही कम रहती है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि भारत में अब बैकों द्वारा ऋण सम्बंधी व्यवसाय बहुत सुरक्षित तरीके से किया जा रहा है। इसी कारण से हाल ही के समय में यह पाया गया है कि भारतीय बैंकों की अनुत्पादक आस्तियों की वृद्धि पर अंकुश लगा है। यह भी संतोष का विषय है कि हाल ही के समय में भारतीय बैकों से प्रथम बार ऋण लेने वाले नागरिकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। इसका आशय यह है कि भारतीय नागरिक जो अक्सर बैकों से ऋण लेने से बचते रहे हैं वे अब बैकों से ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं क्योंकि इस बीच बैंकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋण सम्बंधी शर्तों को आसान बनाया गया है। सिबिल द्वारा जारी की गई जानकारी के अनुसार, भारत में वित्तीय वर्ष 2023 को समाप्त अवधि के दौरान प्रदान किए गए कुल पर्सनल ऋणों में 98 प्रतिशत ऋण 50,000 रुपए से अधिक की राशि के थे और केवल 2 प्रतिशत ऋण ही 50,000 रुपए की कम राशि के थे। यह भारत के नागरिकों की आय में लगातार हो रही वृद्धि को दर्शा रहा है। क्योंकि, पर्सनल ऋण सामान्यतः व्यक्ति की किश्त अदा करने की क्षमता के आधार पर प्रदान किया जाता है। इसी प्रकार, भारत में नागरिकों द्वारा क्रेडिट कार्ड के उपयोग में भी वृद्धि दर्ज की गई है और कई नागरिकों द्वारा क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध भी ऋण राशि का उपयोग किया जा रहा है। परंतु, इस दृष्टि से भी यह संतोष का विषय है कि भारत में प्रति क्रेडिट कार्ड औसत ऋण की राशि में लगातार कमी दर्ज हो रही है। इसका आशय यह है कि क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वाले नागरिकों द्वारा ऋण की राशि का भुगतान समय पर हो रहा है एवं इस क्षेत्र में चूक की दर अन्य देशों की तुलना में भारत में बहुत कम है। अमेरिका में तो क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध लिए गए ऋणों में चूक की दर बहुत अधिक है एवं बैंकों की एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि इस मद पर बकाया है। कुल मिलाकर भारत के संदर्भ में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि भारतीय नागरिकों में सनातन संस्कृति के संस्कार होने के कारण बैकों से ऋण के रूप में उधार ली गई राशि का समय पर भुगतान  किया जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह माना जाता है, जिसके कारण भारतीय बैंकों के अनुत्पादक आस्तियों की राशि अन्य देशों की बैंकों की तुलना में कम हो रही है। प्रहलाद सबनानी 

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आर्थिकी लेख

भारत में निर्मित होने लगे हैं रोजगार के करोड़ों अवसर

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भारतीय सनातन संस्कृति के बारे में विवेचन करते हुए, भारत में रचित वेद, पुराण एवं परम्पराओं के अनुसार, राजा का यह कर्तव्य माना गया है कि उसके राज्य में निवास कर रही प्रजा में प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध हो, राजा ऐसी व्यवस्था करे। जब तक भारतीय सनातन संस्कृति का भारत में पालन होता रहा, तब तक लगभग समस्त नागरिकों को रोजगार उपलब्ध होता रहा। प्राचीन भारत में  विशेष रूप से गावों में ही रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध रहते थे एवं शहरों की ओर पलायन भी बहुत कम होता था। बेरोजगारी की समस्या के बारे में तो भारत के प्राचीन शास्त्रों में वर्णन ही नहीं मिलता है। समस्त नागरिकों को रोजगार उपलब्ध रहता था एवं वे अपने परिवार के समस्त सदस्यों का भरण पोषण करने में सक्षम रहते थे एवं परिवार के समस्त सदस्यों के साथ प्रसन्नत्ता एवं उत्साह के साथ रहते थे। जब कि आज की परिस्थितियों के बीच, वैश्विक स्तर पर, बेरोजगारी की समस्या एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर रही है। भारतीय सनातन संस्कृति का पालन करते हुए भारत आज आर्थिक प्रगति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था पूरे विश्व की लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे तेज गति से प्रगति करने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है। वर्ष 2014 में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में 10वें स्थान पर थी जो आज 5वें स्थान पर पहुंच गई है एवं भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति को देखते हुए अब उम्मीद की जा रही है कि वर्ष 2027-28 के पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगी एवं यह अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगी। भारत में केंद्र सरकार द्वारा लगातार यह प्रयास किया जा रहा है कि न केवल देश की अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़े बल्कि भारत में युवाओं के लिए अधिक से अधिक रोजगार के नए अवसर निर्मित हों। इस दृष्टि से भारत में अब अच्छी खबर आई है। भारत में अगस्त 2023 माह में 46.21 करोड़ नागरिकों को रोजगार मिला हुआ था जबकि अगस्त 2022 में 43.02 करोड़ नागरिकों को ही रोजगार प्राप्त था, इस प्रकार एक वर्ष के दौरान 3.19 करोड़ नागरिकों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा वर्ष 2017 के बाद से प्रतिवर्ष देश में (जुलाई-जून वार्षिक अवधि के बीच) श्रम शक्ति सर्वेक्षण, यह जानने के लिए किया जाता है कि भारत के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी एवं रोजगार की कैसी स्थिति है। हाल ही में जुलाई 2022 से जून 2023 की अवधि के बीच यह सर्वेक्षण कार्य सम्पन्न हुआ है। इस सम्बंध में जारी किए गए प्रतिवेदन में भारत में रोजगार की स्थिति के बारे में कई अच्छे तथ्य उभरकर सामने आए हैं।  भारत में 15 वर्ष एवं इससे अधिक की आयु वाले नागरिकों के बीच श्रम शक्ति भागीदारी की दर (Labour Force Participation Rate) में लगातार अतुलनीय रूप से सुधार हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम शक्ति भागीदारी की दर वर्ष 2017-18 में 50.7 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 60.8 प्रतिशत हो गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह वर्ष 2017-18 में 47.6 प्रतिशत से बढ़कर 50.4 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार, पुरुषों में यह दर वर्ष 2017-18 में 75.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 78.5 प्रतिशत एवं महिलाओं में यह दर वर्ष 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 37 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार, भारत में 15 वर्ष एवं अधिक की आयु के नागरिकों के बीच कर्मचारी जनसंख्या अनुपात (Worker Population Ratio) में भी अतुलनीय सुधार दृष्टिगोचर है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कर्मचारी जनसंख्या अनुपात वर्ष 2017-18 के 48.1 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 59.4 प्रतिशत हो गया है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात वर्ष 2017-18 के 43.9 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 47.7 प्रतिशत हो गया है। पुरुषों के बीच यह अनुपात वर्ष 2017-18 के 71.2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 76 प्रतिशत हो गया है और महिलाओं में यह अनुपात वर्ष 2017-18 के 22 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 35.9 प्रतिशत हो गया है।  जब देश में श्रम शक्ति भागीदारी की दर एवं कर्मचारी जनसंख्या अनुपात में लगातार सुधार दिखाई दे रहा है तो स्वाभाविक रूप से भारत में बेरोजगारी की दर में भी कमी दृष्टिगोचर हो रही है। उक्त सर्वेक्षण के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 में 5.3 प्रतिशत थी जो वर्ष 2022-23 में घटकर 2.4 प्रतिशत रह गई है। वहीं शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 7.7 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2022-23 में 5.4 प्रतिशत पर आ गई है। पुरुषों के बीच बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 6.1 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2022-23 में 3.3 प्रतिशत हो गई है तो वहीं महिलाओं के बीच बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 5.6 प्रतिशत से वर्ष 2022-23 में घटकर 2.9 प्रतिशत हो गई है।  भारत में आज भी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में यदि रोजगार के नए अवसर अधिक मात्रा में निर्मित हो रहे हैं तो यह एक बहुत अच्छा सुधार है। इसी प्रकार, भारत में पुरुषों के बीच यदि बेरोजगारी की दर काफी कम हो रही है तो भारतीय महिलाओं को श्रम बाजार में उतरना ही होगा, और ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है, अतः यह भी एक उत्तम सुधार है। भारत में महिला शक्ति यदि श्रम बाजार में उतरती है तो भारत में मजदूरी की दरों को भी संतुलित रखा जा सकता है जिससे उत्पादों की लागत में तेज वृद्धि को रोका जा सकेगा और भारत में निर्मित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लम्बे समत तक प्रतिस्पर्धी बने रह सकेंगे।  प्रहलाद सबनानी

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आर्थिकी लेख

वैश्विक वित्तीय संस्थान भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान को बढ़ा रहे हैं

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वैश्विक स्तर पर विभिन्न देश आर्थिक समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं। साथ ही, रूस यूक्रेन के बीच युद्ध अभी थमा भी नहीं था कि आतंकवादी संगठन हमास ने इजराईल पर हमला कर दिया, जिससे अब इजराईल एवं हमास के बीच युद्ध छिड़ गया है और अब तो एक तरह से लेबनान भी इस युद्ध में कूद गया है। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत में अप्रैल-जून 2023 तिमाही में उम्मीद से अधिक खपत का हवाला देते हुए वित्त-वर्ष 2023-24 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.3 प्रतिशत कर दिया है। आईएमएफ की ओर से किया गया यह बदलाव भारत के आंकड़ों में किए गए कई बदलावों में सबसे नया है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्वानुमानों के अनुसार वित्त-वर्ष 2023-24 के लिए भारत की विकास दर 6.5 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। आईएमएफ के अनुसार आने वाले समय में भारत सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। आईएमएफ के पूर्व विश्व बैंक द्वारा भी एक ताजा प्रतिवेदन में यह अनुमान जताया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2023-24 में 6.3 प्रतिशत की दर से विकास करेगी। विकास की वजह देश में लगातार बढ़ रहा निवेश और घरेलू मांग का बढ़ना बताया गया है। विश्व बैंक की इंडिया डेवलपमेंट अपडेट (आईडीयू) प्रतिवेदन में कहा गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था में लचीलापन कायम है। इस कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में रफ्तार बनी रहेगी।  इसी प्रकार, आर्थिक विकास एवं सहयोग संगठन (ओईसीडी) द्वारा जारी किए गए एक अन्य प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2023 में भारत की विकास दर 6.3 प्रतिशत एवं वर्ष 2024 में 6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। यह दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सबसे अधिक वृद्धि दर रहने वाली है। जबकि इसी अवधि के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर क्रमश: 3 प्रतिशत एवं 2.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। जी-20 समूह में शामिल विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर वर्ष 2023 में 1.5 प्रतिशत और वर्ष 2024 में 1.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। एक अन्य वैश्विक निवेश बैंक मार्गन स्टेनली द्वारा वित्तीय वर्ष 2023-24 की अप्रैल-जून तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में तेज वृद्धि दर के बाद पूरे वित्तीय वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान को बढ़ाया गया है। मार्गन स्टेनली ने अब पूरे वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। इससे पहले मार्गन स्टेनली ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर को 6.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। निवेश बैंक ने कहा है कि मजबूत घरेलू मांग के चलते भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में संशोधन किया गया है। अप्रैल-जून 2023 में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही है, जो मार्गन स्टेनली के पूर्व अनुमान 7.4 प्रतिशत से अधिक है। चीन की विस्तारवादी नीतियों के चलते अब विश्व के कई देशों का चीन पर विश्वास लगातार कम हो रहा है, जिसके कारण विकसित देशों की कई कम्पनियां चीन से अपनी विनिर्माण इकाईयों को अन्य देशों में स्थानांतरित कर रही हैं। इससे चीन में कई आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो रही है। इस बीच भारत ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयां स्थापित करने हेतु आकर्षित करने उद्देश्य से उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना लागू की है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी विनिर्माण इकाईयों को अब भारत में स्थापित कर रही हैं। विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, स्मार्ट फोन उत्पादन, फार्मा, टेक्सटाइल, सुरक्षा उपकरणों के निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना की जा रही है।  भारत की लगातार बढ़ती आर्थिक विकास दर के चलते अब भारत में बेरोजगारी की दर भी कम हो रही है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण वार्षिक प्रतिवेदन 2022-2023 के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों के लिए भारत में बेरोजगारी की दर जुलाई 2022 से जून 2023 के खंडकाल के दौरान छह वर्ष के निचले स्तर अर्थात 3.2 प्रतिशत पर आ गई है। एनएसएसओ के अनुसार, एक वर्ष पहले की समान अवधि में यह 7.6 प्रतिशत थी। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों के लिए वर्तमान साप्ताहिक स्थिति में श्रमबल भागीदारी भी बढ़ी है। अप्रैल-जून 2023 में साप्ताहिक स्थिति में श्रमबल भागीदारी बढ़कर 48.8 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो एक वर्ष पहले 47.5 प्रतिशत थी। हर्ष का विषय यह भी है कि अब भारत में औपचारिक रोजगार की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक तेज गति से बढ़ रही है। औपचारिक रोजगार में कर्मचारियों को सरकारी नियमों के अंतर्गत समस्त प्रकार की सुविधाएं (प्रॉविडेंट फंड, पेंशन, मेडिकल सुविधा, आदि) नियोक्ताओं द्वारा प्रदान की जाती हैं। जबकि अनौपचारिक रोजगार की श्रेणी के कर्मचारियों को केवल मजदूरी अथवा वेतन ही प्रदान किया जाता है। इस प्रकार भारत में अब कर्मचारियों एवं मजदूरों की औसत आय में वृद्धि भी दृष्टिगोचर है।  भारत में अब तो त्यौहारी मौसम भी प्रारम्भ होने जा रहा है। नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, क्रिसमस दिवस, नव वर्ष, महाशिवरात्रि, होली, आदि  जैसे बड़े त्यौहार आने वाले हैं, जिन्हें भारत के नागरिक बड़े ही उत्साह के साथ मानते हैं एवं इन त्यौहारों का भारतीय अर्थव्यवस्था में भारी योगदान रहता है। साथ ही, भारत में अब धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन भी बहुत तेज गति से बढ़ रहा है, जिससे निश्चित ही भारत के आर्थिक विकास को बल मिलेगा। अतः वैश्विक स्तर पर विभिन्न वित्तीय संस्थानों द्वारा भारत के आर्थिक विकास के अनुमान के संदर्भ में जारी किये जा रहे संशोधित अनुमान निश्चित ही सही साबित होंगे। 

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आर्थिकी राजनीति

भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल निकालने में मिल रही है सफलता

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भारतीय सनातनी वेदों एवं ग्रंथो में इस बात के कई प्रमाण मिलते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि भारत सदैव ही आर्थिक रूप से सम्पन्न देश रहा है एवं भारत के समस्त नागरिकों के लिए रोजगार के भरपूर अवसर उपलब्ध रहे हैं। मुद्रा स्फीति, आय की असमानता, बेरोजगारी एवं ऋण के भारी बोझ के तले दबे रहना जैसे शब्दों का तो प्राचीन भारत के आर्थिक इतिहास में वर्णन नहीं के बराबर मिलता है। भारत के समस्त नागरिकों की पर्याप्त मात्रा में आय होती थी जिससे वह अपने परिवार का आसानी से गुजर बसर कर पाते थे एवं समाज में समस्त नागरिक प्रसन्नता पूर्वक रहते थे। दरअसल प्राचीन भारत के उस खंडकाल में नागरिकों में उद्यमशीलता अपने चरम पर थी। परिवार के जमे जमाए व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी सफलतापूर्वक आगे चलते रहते थे एवं परिवार के सदस्यों के आय अर्जन का मुख स्त्रोत बने रहते थे। इस दृष्टि से नागरिकों को सामान्यतः नौकरी के लिए परिवार के पारम्परिक व्यवसाय के बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। इस प्रकार उस खंडकाल में बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न ही नहीं होती थी।  भारत पर आक्रांताओं के आक्रमण एवं इसके तुरंत बाद अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय नागरिकों की उद्यमशीलता को समाप्त कर उनमें नौकरी करने की भावना को विकसित किया गया क्योंकि अंग्रेजों को अपने शासन को सुचारू रूप से संचालन के लिए नौकरों की आवश्यकता थी। अंग्रेजों के शासनकाल में भारत की शिक्षा पद्धति को भी कुछ इस प्रकार से परिवर्तित किया गया कि  भारतीय नागरिक अपनी पढ़ाई समाप्त करने के पश्चात अंग्रेजों के संस्थानों में केवल नौकरी कर सके। दीर्घकाल में इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय नागरिक केवल नौकरी को ही रोजगार का साधन मानने लगे और उन्हें यदि नौकरी नहीं मिल पाती तो वे अपने आप को बेरोजगार मानने लगे। भारतीय नागरिकों में उद्यमशीलता तो जैसे समाप्त ही हो गई थी। परंतु, पिछले लगभग 10 वर्षों के दौरान भारतीय नागरिकों में उद्यमशीलता को पुनः पैदा करने के अथक प्रयास किये गए हैं, जिनमे सफलता भी मिलती दिखाई दे रही है और भारत में अब पुनः बहुत बड़ी मात्रा में उद्यमों को स्थापित किया जा रहा है, जिससे भारतीय नागरिक अब धीरे धीरे नौकर नहीं बल्कि नौकरी देने वाले बनते जा रहे हैं।  पिछले एक दशक के दौरान केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों ने भारतीय नागरिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कई नई योजनाएं प्रारम्भ की हैं। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) प्रारम्भ की गई थी। इस योजना को प्रारम्भ करने का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं को सुरक्षित बेहतर आजीविका प्राप्त करने के लिए उद्योग-प्रासंगिक कौशल प्रशिक्षण लेने में सक्षम बनाना था। वर्ष 2016 में स्टार्ट-अप इंडिया योजना देश में लागू की गई थी। इस योजना को लागू करने का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा तंत्र विकसित करना था, जो पूरे देश में उद्यमिता का पोषण और प्रचार करता हो। वर्ष 2016 में ही स्टैंड अप इंडिया योजना प्रारम्भ की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और एससी/एसटी उधारकर्ताओं को 10 लाख रुपये तक के बैंक ऋण की सुविधा तथा ग्रीनफील्ड उद्यम स्थापित करने के लिए 1 करोड़ रु. तक का ऋण प्रदान करना था। इसके पूर्व, वर्ष 2014 में राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन की स्थापना ‘कौशल भारत’ एजेंडे को ‘मिशन मोड’ में चलाने के लिए की गई थी ताकि मौजूदा कौशल प्रशिक्षण पहलों को एकजुट किया जा सके और कौशल प्रयासों के पैमाने और गुणवत्ता को गति के साथ जोड़ा जा सके। इन योजनाओं के साथ ही भारतीय नागरिकों और राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक कल्याण को सम्बोधित करने के लिए भारत सरकार द्वारा कई अन्य योजनाएं (पीएमगरीब कल्याण योजना, आयुषमान भारत, प्रसाद योजना, आदि) भी प्रारम्भ की गई हैं। विभिन्न सरकारों के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे कुछ सांस्कृतिक संगठनों ने भी भारत में रोजगार के अवसर निर्मित करने के उद्देश्य से कई अन्य सामाजिक संस्थाओं को साथ लेकर भी कुछ प्रयास प्रारम्भ किया गए। संघ ने तो अपने कुछ अनुशांगिक संगठनों को यह जिम्मेदारी सौंपी कि वे इस क्षेत्र में विशेष प्रयास करें। इन सामाजिक, आर्थिक एंड सांस्कृतिक संगठनों ने मिलकर समाज में विशेष रूप से युवा नागरिकों के उद्यमशीलता को पुनः विकसित करने के सफल प्रयास किए हैं एवं अब एक बार पुनः भारत में उद्यमों को बढ़ावा मिलता दिखाई दे रहा है।  वित्तीय वर्ष 2022-23 में कर्मचारी भविष्यनिधि संस्थान में रजिस्टर हुए नए सदस्यों की संख्या वित्तीय वर्ष 2018-19 में 61 लाख थी जो वित्तीय वर्ष 1920-21 में 77 लाख, वित्तीय वर्ष 2021-22 में 122 लाख एवं वित्तीय वर्ष 2022-23 में बढ़कर 139 लाख हो गई है। इस संख्या में लगातार सुधार से आश्य यह है कि देश में युवाओं को फोर्मल रोजगार बड़ी संख्या में मिल रहे हैं। यहां इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि इस दौरान विश्व के अन्य देशों में कई कम्पनियों में कर्मचारियों की छटनी की गई है। इसी प्रकार पीरिओडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार जनवरी 2022 से भारत में बेरोजगारी की दर में लगातार कमी देखने को मिल रही है। जनवरी 2022 में देश में बेरोजगारी की दर 8.2 प्रतिशत थी जो अप्रेल-जून 2022 तिमाही में घटकर 7.6 प्रतिशत तो वहीं जुलाई-सितम्बर 2022 तिमाही में 7.2 प्रतिशत, अकटोबर-दिसम्बर 2022 तिमाही में 7.2 प्रतिशत से घटाकर जनवरी-मार्च 2023 तिमाही में 6.8 प्रतिशत पर आ गई है। सीएमआईई द्वारा जारी एक अन्य जानकारी के अनुसार, भारत में बेरोजगारी की दर मार्च 2023 में घटकर 7.6 प्रतिशत हो गई है जो मार्च 2022 में 8 प्रतिशत एवं मार्च 2021 में 10 प्रतिशत थी। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं (15 वर्ष और उससे अधिक) में बेरोजगारी की दर जनवरी-मार्च 2023 तिमाही में घटकर 9.2 प्रतिशत पर आ गई है, जो कि एक वर्ष पहिले इसी तिमाही में 10.1 प्रतिशत थी। वहीं, पुरुषों में शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर इस वर्ष पहली तिमाही में कम होकर 6 प्रतिशत रही, जो एक वर्ष पूर्व 2022 की जनवरी-मार्च तिमाही में 7.7 प्रतिशत थी। देश में राज्यवार बेरोजगारी का विश्लेषण करने पर ध्यान में आता है कि 10 प्रतिशत से अधिक बेरोजगारी की दर वाले राज्य हैं, हरियाणा में 37.4 प्रतिशत, राजस्थान में 28.5 प्रतिशत, दिल्ली में 20.8 प्रतिशत, बिहार में 19.1 प्रतिशत, झारखंड में 18 प्रतिशत, जम्मू कश्मीर में 14.8 प्रतिशत, त्रिपुरा में 14.3 प्रतिशत एवं सिक्किम में 13.6 प्रतिशत है। जबकि 5 प्रतिशत के कम बेरोजगारी की दर वाले राज्य हैं ओड़िसा में 0.9 प्रतिशत, गुजरात में 2.3 प्रतिशत, कर्नाटक में 2.5 प्रतिशत, मेघालय में 2.7 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 3.1 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 3.2 प्रतिशत, छतीसगढ़ में 3.4 प्रतिशत,  तेलंगाना में 4.1 प्रतिशत, उत्तराखंड में 4.2 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 4.3 प्रतिशत,  तमिलनाडु में 4.7 प्रतिशत, आसाम में 4.7 प्रतिशत एवं पुडुचेरी में 4.7 प्रतिशत। विशेष रूप से मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश राज्य, जो कुछ वर्ष पूर्व तक बीमारु राज्य की श्रेणी में शामिल थे, में बेरोजगारी की दर में अतुलनीय रूप से कमी दृष्टिगोचर हुई है। जनवरी-मार्च 2023 अवधि में देश में 45.2 फीसदी नागरिकों को रोजगार मिला हुआ है जो इससे पहले की तिमाही में 44.7 फीसदी पर था। उल्लेखनीय है कि पिछले एक दशक के दौरान भारत ने आर्थिक मोर्चे पर एक बड़ी छलांग लगाई है। स्पष्ट है कि सरकार ने अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचकर उसे भी संबल प्रदान करने की तमाम कोशिशें की हैं। जिसके परिणामस्वरूप, भारत में अगस्त 2023 माह में 46.21 करोड़ नागरिकों को रोजगार मिला हुआ था जबकि अगस्त 2022 में 43.02 करोड़ नागरिकों को ही रोजगार प्राप्त था, इस प्रकार एक वर्ष के दौरान 3.19 करोड़ नागरिकों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। प्रहलाद सबनानी 

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