कविता बेटी जब पैदा नहीं होगी,तब बहू कहाँ से लाओगे ? November 15, 2019 / November 15, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment बेटी जब पैदा नहीं होगी,तब बहू कहाँ से लाओगे ? बहु जब घर नहीं आयेगी,तब परिवार कैसे बढाओगे ? आज की बेटी कल बहू बनेगी, सारी सृष्टि इसी तरह चलेगी | बेटा और बेटी है दोनों जरुरी, वर्ना सृष्टि हो जायेगी अधूरी || भाई को बहन कहाँ से मिलेगी,जब बेटी की भ्रूण हत्या होगी | […] Read more » तब बहू कहाँ से लाओगे ? बेटी जब पैदा नहीं होगी
कविता किस्सा कुर्सी का November 8, 2019 / November 8, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment जब चुनाव सयुक्त रूप से लड़ा था,फिर सत्ता में सयुक्त क्यों नही रहते हो ?दोनों ही सी एम की कुर्सी के भूखे हो ,फिर जनता को क्यों बेवकूफ़ बनाते हो ? केवल किस्सा एक सी एम कुर्सी का है ,दोनों ने महाराष्ट में महासंग्राम मचाया है |अपनी आपनो ढपली लेकर तुमने,दोनों ने बेसुरा अलाप ही […] Read more » kissa kursi ka किस्सा कुर्सी का
कविता तुमने अभी हठधर्मिता देखी ही कहाँ है November 8, 2019 / November 8, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment तुमने अभी हठधर्मिता देखी ही कहाँ है अंतर्मन को शून्य करने का व्याकरण मुझे भी आता है अल्पविराम,अर्धविराम,पूर्णविराम की राजनीति मैं भी जानती हूँ यूँ भावनाशून्य आँकलन के सिक्के अब और नहीं चलेंगे स्त्रियों का बाजारवाद अब समझदार हो चुका है खुदरे बाजार से लेकर शेयर मार्किट तक में इनको अपनी कीमत पता है तुम्हारी […] Read more » हठधर्मिता
कविता रात रोता है मेरा,सवेरा रोता है मेरा November 5, 2019 / November 5, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment रात रोता है मेरा,सवेरा रोता है मेरा तेरे बगैर यूँ ही गुज़ारा होता है मेरा तुम थे तो ज़िंदगी कितनी आसाँ थी अब हर काम दो-बारा होता है मेरा किस- किस पल को हिदायत दूँ मैं हरेक पल ही आवारा होता है मेरा तुझे नहीं तेरा साया ही तो माँगा था फ़कीरी किन्हें गवारा होता […] Read more » रात रोता है मेरा सवेरा सवेरा रोता है मेरा
कविता हम राजा हैं November 5, 2019 / November 5, 2019 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment हम राजा हैं Read more » तुम घोड़ा बन जाओ भैया मैं बैठूंगी पीठ पर
कविता यह खेल खतरनाक है,खेल को समझिए जरा November 4, 2019 / November 4, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment यह खेल खतरनाक है,खेल को समझिए जरा कत्लों -गाह का ग़र तजुर्बा है तो उतरिए ज़रा बाकायदा खून की बू आपको पसंद आती हो तब ही इन सियासती गलियों से गुजरिए ज़रा कभी अपनों के लाश देखो और गौर से देखो फिर अपने किए झूठे वायदों से मुकरिए ज़रा ये चीख, ये चिल्लाहट ,ये झुंझलाहट, […] Read more » यह खेल खतरनाक है
कविता कुछ देर में ये नज़ारा भी बदल जाएगा November 4, 2019 / November 4, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment कुछ देर में ये नज़ारा भी बदल जाएगा ये आसमाँ ये सितारा भी बदल जाएगा कितना मोड़ पाओगे दरिया का रास्ता किसी दिन किनारा भी बदल जाएगा दूसरों के भरोसे ही ज़िंदगी गुज़ार दी वक़्त बदलते सहारा भी बदल जाएगा झूठ की उम्र लम्बी नहीं हुआ करती ये ढोल ये नगाड़ा भी बदल जाएगा गिनतियों […] Read more » कुछ देर में ये नज़ारा भी बदल जाएगा
कविता वो इस कदर बरसों से मुतमइन* है November 4, 2019 / November 4, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment वो इस कदर बरसों से मुतमइन* है जैसे बारिश से बेनूर कोई ज़मीन है साँसें आती हैं, दिल भी धड़कता है सीने में आग दबाए जैसे मशीन है आँखों में आखिरी सफर दिखता है पसीने से तरबतर उसकी ज़बीन* है अपने बदन का खुद किरायेदार है खुदा ही बताए वो कैसा मकीन* है ज़िंदगी मौत […] Read more »
कविता मैंने तुम्हें अभी पढ़ा ही कहाँ है November 3, 2019 / November 3, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment मैंने तुम्हें अभी पढ़ा ही कहाँ है सिर्फ जिल्द देखकर सारांश तो नहीं लिखा जा सकता अध्याय दर अध्याय,पन्ने दर पन्ने किरदारों की कितनी ही गिरहें खुलनी अभी बाकी हैं उपसंहार से पहले प्रस्तावना और प्रस्तावना से पहले अनुक्रमिका सब कुछ जानना है मेरी नियति की रचना सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि […] Read more »
कविता साहित्य जंगल की दीवाली November 1, 2019 / November 1, 2019 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment जंगल में मन रही दीवाली, बिना पटाखों बिन बम वाली। शेर सिंह ने दिए जलाए। हाथी हार फूल ले आए। भालू लाई बताशे लाया। चीतल पंचा मृत ले आया। सेई लाई पूजा की थाली। हिरण ढेर फुलझडियां लाए। नेवलों ने लड्डू बंटवाए। गेंडा ढोल बड़ा ले आया। बांध गले में खूब बजाया। ना ची बंदर […] Read more »
कविता भूख लगे तो रोटी की जात नहीं पूछा करते November 1, 2019 / November 1, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment भूख लगे तो रोटी की जात नहीं पूछा करतेपेट को लगेगी बुरी,ये बात नहीं पूछा करते 1 ये धरती बिछौना ,ये आसमाँ है शामिआनाबेघरों से बारहाँ दिन -रात नहीं पूछा करते 2 मालूम है कि एक भी पूरी नहीं हो पाएगीबेटियों से उनके जज्बात नहीं पूछा करते 3 क्यों बना है बेकसी का ये आलम […] Read more »
कविता साहित्य ये चाक जिगर के सीना भी जरूरी है November 1, 2019 / November 1, 2019 by सलिल सरोज | Leave a Comment ये चाक जिगर के सीना भी जरूरी हैकुछ रोज़ खुद को जीना भी जरूरी है ज़िंदगी रोज़ ही नए कायदे सिखाती हैबेकायदे होके कभी पीना भी जरूरी है सब यूँ ही दरिया पार कर जाएँगे क्यासबक को डूबता सफीना भी जरूरी है जिस्म सिमट के पूरा ठंडा न पड़ जाए साल में जून […] Read more »