लेख समाज सरकारी नौकरी के लिए वैवाहिक रिश्ते दांव पर September 2, 2025 / September 2, 2025 by अमरपाल सिंह वर्मा | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा हमारा समाज रिश्तों और विश्वास की नींव पर खड़ा है। हम विवाह को एक संस्था और वैवाहिक बंधन को सात जन्मों का बंधन मानते हैं लेकिन अब विवाह का यह बंधन लालच की सीढ़ी बन रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग कागजों पर शादी और […] Read more » Marital relations are at stake for government job सरकारी नौकरी के लिए वैवाहिक रिश्ते दांव पर
लेख खतरनाक मौसम में भी स्कूल खुले क्यों? September 2, 2025 / September 2, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment “बच्चों की सुरक्षा बनाम औपचारिकता का सवाल: जर्जर स्कूल भवन, प्रशासन की संवेदनहीनता और बाढ़-गंदगी के बीच पढ़ाई नहीं, जीवन की रक्षा पहली प्राथमिकता – आपदा में भी आदेशों की राजनीति क्यों?” बारिश और बाढ़ की स्थिति में बच्चों और शिक्षकों को स्कूल बुलाना उनकी जान से खिलवाड़ है। जर्जर इमारतें, गंदगी, जलभराव और यातायात […] Read more » Why are schools open even in dangerous weather? खतरनाक मौसम में भी स्कूल
लेख पंजाब में बाढ़ आखिर क्यों – क्या प्रकृति रुष्ट है? September 1, 2025 / September 1, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment “प्रकृति चेतावनी देती है, रुष्ट नहीं होती – असली वजह इंसानी लापरवाही और असंतुलित विकास” पंजाब में बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा कहना सही नहीं होगा। नदियों का स्वरूप, असामान्य बारिश और जलवायु परिवर्तन तो कारण हैं ही, लेकिन असली दोषी अनियोजित निर्माण, अवैध खनन, ड्रेनेज की उपेक्षा और धान-प्रधान कृषि पद्धति भी है। प्रकृति […] Read more » Why is there flood in Punjab – पंजाब में बाढ़ आखिर क्यों
लेख खनिज उत्खनन से होगा रोजगार का हल September 1, 2025 / September 1, 2025 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव दुनिया तकनीकी प्रकृति चाहे जितनी कर ले, अंततः उसकी आर्थिक उन्नति, प्रगति एवं विकास के हल प्राकृतिक संपदा में ही निहित हैं। भारत हो या कोई अन्य देश खनिज और कृषि के बूते ही उन्नति के शिखर छूते हैं। इस दृष्टि से भारत भूमि को कुदरत ने अटूट प्राकृतिक संपदा दी हुई है। […] Read more » रोजगार का हल
लेख सड़क हादसेः बेसुध प्रशासन, लाचार सरकार September 1, 2025 / September 1, 2025 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment संदर्भ -सड़क परिवहन मंत्रालय ने तेज गति पर फोड़ा सड़क हादसों का ठीकरा प्रमोद भार्गव देश में सड़क दुर्घटनाओं को लेकर 2023 की नई रिपोर्ट आई है, लेकिन हाल वही पुराना है। बीते वर्श की तुलना में 4.2 प्रतिशत हादसे बढ़ गए, इनमें जान गवांने वालों की संख्या भी बढ़ गई। षासन और प्रशासन ने […] Read more » helpless government Road accidents: Insensitive administration सड़क हादसेः
Health लेख न्यायालय की फटकार और डॉक्टरों की लिखावट September 1, 2025 / September 1, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment “जहाँ पर्ची के हर अक्षर स्पष्ट होंगे, वहीं मरीज का जीवन और अधिकार सुरक्षित रहेंगे।” “पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का हालिया आदेश एक मील का पत्थर है। अदालत ने डॉक्टरों को साफ और स्पष्ट पर्ची लिखने का निर्देश देकर सीधे मरीज के जीवन और अनुच्छेद 21 से इसे जोड़ा है। यह आदेश केवल लिखावट की औपचारिकता नहीं, […] Read more » The court's rebuke and the doctors' writings डॉक्टरों की लिखावट
लेख लोक मेले बचा सकते हैं ग्रामीण कुटीर उद्योगों की सांसें August 27, 2025 / August 28, 2025 by अमरपाल सिंह वर्मा | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा राजस्थान सरकार ने हाल ही में ‘विकसित राजस्थान 2047’ विजन डॉक्यूमेंट को मंजूरी दी है। इसमें राज्य को 2047 तक 4.3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य न केवल बड़े औद्योगिक निवेश बुनियादी ढांचे के निर्माण पर निर्भर करेगा बल्कि ग्रामीण समाज की भागीदारी पर भी इसमें महत्वपूर्ण है। सरकार गांवों के उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाने की इच्छुक है। यह सोच निश्चित ही दूरदर्शी है लेकिन बड़ा सवाल है कि इसे जमीन पर उतारने का व्यावहारिक रास्ता क्या है?अगर सरकार की सोच धरातल पर उतरती है तो गांवों में रोजगार को खूब बढ़ावा मिल सकता है। गांवों की महिलाएं बुनाई, कताई और कढ़ाई में माहिर हैं। हजारों परिवार पीढिय़ों से खादी, हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी की कलाकृतियां या अन्य घरेलू उद्योग चला रहे हैं. उनकी बिक्री न के बराबर है। गांवों के कुटीर उद्योग केवल रोजगार का साधन नहीं थे, वे हमारी संस्कृति और आत्म निर्भरता की पहचान थे लेकिन बाजार की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण कुटीर उद्योग कमजोर पड़ रहे हैं। बड़ी तादाद में लोग बेरोजगारी और आय की कमी के कारण गांव छोडक़र शहरों का रुख कर रहे हैं। प्रश्न उठता है कि इस समाधान का क्या है? इस प्रश्न का उत्तर कहीं न कहीं राजस्थान मेला आयोजक संघ के सचिव जगराम गुर्जर के सुझाव में छिपा है। गुर्जर तीन दशक से लोक मेले आयोजित कर रहे हैं। उनका कहना है कि विभिन्न धार्मिक, पर्यटन महत्व के स्थानों सहित अकेले राजस्थान में ही सौ से अधिक लोक मेले हर साल आयोजित होते हैं और देश भर में इनकी संख्या हजारों में है। इन मेलों में हजारों लोग खरीदारी के लिए आते हैं। ऐसे में अगर राज्य के ग्रामीण कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, खादी और ग्रामोद्योग से जुड़े उत्पादों को मेलों में मंच दिया जाए तो कारीगरों को खरीदार और पहचान दोनों मिल सकते हैं।गुर्जर का यह सुझाव इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि ग्रामीण उत्पादों की सबसे बड़ी समस्या बाजार का अभाव है। अगर ग्रामीणों को इन लोक मेलों में जोड़ दिया जाए तो उन्हें उत्पाद बेचने के लिए बड़ा अवसर मिल सकता है। स्थानीय से वैश्विक तक का सफर इस जरिए से शुरू किया जा सकता है।सरकार को गांवों के उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए चरणबद्ध रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले जरूरी है कि किसी जिले के उत्पाद को उसी जिले में पहचान दिलाई जाए। उसके बाद बड़े मेलों के माध्यम से उसे अन्य जिलों तक पहुंचाया जाए। जब राज्य भर में ब्रांड वैल्यू बने तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया जाए और अंतत: उसी ब्रांड को वैश्विक बाजार में उतारा जाए, यानी वैश्विक पहचान का रास्ता स्थानीय पहचान से होकर ही जाता है।इस काम में सरकार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। केवल विजन डॉक्यूमेंट में बड़े लक्ष्य लिख देने से कुछ नहीं हो सकता। सरकार को जिला उद्योग केंद्रों के माध्यम से गांवों के हस्तशिल्पियों, कारीगरों और बुनकरों का सर्वे कराना चाहिए। उनकी सूची बनाकर उन्हें मेलों में भागीदारी के लिए प्रेरित और सहयोग करना चाहिए। राज्य में लगने वाले मेले महज उत्सव नहीं हैं, वे ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को गति देने का सर्वसुलभ बाजार साबित हो सकते हैं। गांवों के उत्पादों को ग्लोबल बनाने का संकल्प निश्चय ही सराहनीय है लेकिन यह सपना तभी साकार होगा जब सरकार और समाज मिलकर ग्रामीण उद्योगों को स्थानीय से वैश्विक तक की यात्रा तय करने में सहयोग दें। जगराम गुर्जर का मेला मॉडल इस यात्रा का सशक्त कदम हो सकता है। इससे न केवल कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है बल्कि राजस्थान के पारंपरिक कुटीर उद्योगों को भी नई पहचान मिलना संभव है। अमरपाल सिंह वर्मा Read more »
लेख अर्धनग्न मुजरे के दौर में गुम होती साहित्यिक स्त्रियाँ August 27, 2025 / August 28, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment “सोशल मीडिया की चमक-दमक के शोर में किताबों का स्वर कहीं खो गया है।” इंस्टाग्राम और डिजिटल मीडिया का दौर है। यहाँ आकर्षण और तमाशा सबसे ज्यादा बिकते हैं। लेकिन समाज की आत्मा को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि स्त्रियाँ फिर से साहित्य की ओर लौटें। इंस्टाग्राम का शोर कुछ समय बाद थम […] Read more » सोशल मीडिया की चमक-दमक के शोर में किताबों का स्वर
लेख समस्याएं अनेक, हल एक August 27, 2025 / August 27, 2025 by अशोक गुप्त | Leave a Comment अशोक गुप्त हमारे देश में बहुत ही समस्याएं हैं जिनकी संख्या और आकार बढ़ता ही जा रहा है. अधिकतर बढ़ती समस्याओं का कारण हमारी बढ़ती जनसंख्या और गरीबी है. गरीबी और कार्य के साधन सीमित होने के कारण गाँवों से महानगरों की ओर पलायन जारी है जिसके कारण शहरों में बिजली और पानी की कमी और बढ़ते प्रदूषण के साथ सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे और बढ़ती झुग्गियों की समस्याएं हो रही है. एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में 1000 से अधिक झुग्गी कालोनियां हैं जिनमें कई लाख लोग अमानवीय परिस्थितियों में रहते हैं. ये कालोनियां कहीं-कहीं तो नालों के किनारे या नालों के अंदर भी बसी हुई है. कई स्थानों पर तो नालों को पाट दिया गया है जिससे बरसाती पानी का भाव रुक जाता है और बारिश होने पर बाढ़ की समस्या पैदा हो जाती है और पानी का निकास नहीं हो पाता . इन समस्याओं को देखते हुए दिल्ली सरकार ने बहुत सी सरकारी जमीनों से अवैध कब्जे वाली झुग्गियां हटाई हैं पर इससे ये समस्याएं हल होने वाली नहीं हैं. ये समस्याएं तभी हल हो सकती हैं यदि ये लोग दिल्ली या ऐसे महानगरों में न रहकर अपने मूल स्थान पर रहें. पलायन रोकने हेतु जनसंख्या वृद्धि पर रोक बहुत आवश्यक है क्योंकि परिवार में बच्चों की अधिक संख्या गरीबी बढ़ाती है पर यह गरीब लोग यह समझ नहीं पाते और उनके प्राय तीन-चार बच्चे होते हैं. इसके लिए आवश्यक है कि सरकारी योजनाओं जैसे फ्री राशन आदि का लाभ उन्हीं गरीबों को मिले जिनका एक ही बच्चा हो और जो अपने मूल स्थान पर रहते हों. दूसरा बच्चा होते ही यह सुविधा वापस ले ली जानी चाहिए. यदि हम अपने आसपास देखें तो पाएंगे कि हमारे संपर्क में आने वाले अधिकतर निम्नवर्गीय लोगों के प्राय तीन-चार बच्चे होते हैं. यह वर्ग परिवार नियोजन हेतु गंभीर नहीं होता जबकि अधिकतर पढ़े लिखे मध्यवर्गीय परिवारों में एक से अधिक बच्चा नहीं होता क्योंकि एक बच्चे को ही अच्छे स्कूल में पढ़ाना बहुत महंगा हो चुका है. ऐसे परिवार मजबूरी में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा कर अमानवीय परिस्थितियों में रहते हैं पर कम बच्चे पैदा कर अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने को तैयार नहीं हैं. केवल लालच ही इन्हें के लिए प्रेरित कर सकता है इन्हें परिवार नियोजन हेतु प्रेरित करने के लिए सरकार यह नियम बना सकती है कि फ्री राशन जैसी सुविधा केवल उन्हीं गरीब परिवारों को मिले जिन परिवारों में केवल एक बच्चा हो. सरकार उन्हें प्रोत्साहन राशि के रूप में ₹1000 प्रति मास से ₹12000 प्रति वर्ष की राशि दे सकती है यदि यह अपने मूल स्थान पर रहते हैं. दूसरा बच्चा पैदा होने पर उनकी यह सुविधा छीन ली जानी चाहिए. इसके अतिरिक्त फ्री राशन जैसी सुविधा भी केवल उन्हें परिवारों को दी जानी चाहिए जो अपने मूल स्थान पर रहते हैं और जिनका एक ही बच्चा हो . यदि यह योजना ठीक से लागू हो पाए तो अगले कुछ वर्षों में जहां गांव से महानगरों में पलायन की समस्या पर लगाम लगेगी, वहीं गरीब जनता के जीवन स्तर में सुधार होगा, उनके बच्चे अच्छा पोषण और अच्छी शिक्षा पा सकेंगे और देश के संसाधनों पर दबाव कम होगा. इसके अतिरिक्त दिल्ली जैसे महानगरों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर भी लगाम लगेगी और बिजली पानी की समस्याओं व अवैध कब्जे की समस्याओं से धीरे-धीरे मुक्ति मिल पाएगी . इसके अतिरिक्त अवैध कब्ज़ों पर सरकार को नो टॉलरेंस नीति अपनानी चाहिए। हटाई गई झुग्गियों के स्थान पर पुनः झुग्गियां बनने या नई झुग्गी बनने पर पुलिस अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि अवैध बसने वालों को प्रोत्साहन न मिले. Read more » Problems many solution one समस्याएं अनेक हल एक
पर्यावरण लेख पर्यावरण कानून और उत्तर प्रदेश राज्य: एक समग्र दृष्टिकोण August 27, 2025 / August 27, 2025 by पवन शुक्ला | Leave a Comment “प्रकृति स्वयं धर्म है, उसका संरक्षण ही हमारा कर्तव्य है।” यह कथन आधुनिक समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ विकास की परिभाषा केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और संसाधनों के सतत उपयोग के साथ जुड़ गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत की लगभग 77% जनसंख्या […] Read more » Environmental Law and the State of Uttar Pradesh: A Holistic Approach पर्यावरण कानून पर्यावरण कानून और उत्तर प्रदेश राज्य
महिला-जगत लेख लड़की की मौत और हमारी घातक धारणाएँ August 27, 2025 / August 27, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment “हर लापता बेटी के साथ हमारी सोच की परीक्षा होती है — अफ़वाह नहीं, संवेदनशीलता ज़रूरी है” हर लापता लड़की के साथ हमारी संवेदनशीलता और सिस्टम की परीक्षा होती है। अफ़वाहें, ताने और लापरवाह पुलिस जाँच अपराधियों के लिए सबसे बड़ी मददगार बन जाती हैं। जब तक पुलिस हर गुमशुदगी को गंभीर अपराध मानकर तुरंत […] Read more » लड़की की मौत और हमारी घातक धारणाएँ
लेख पंख और उड़ान – भारत की स्वतंत्रता और आत्मविकास August 25, 2025 / August 25, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment बोधार्थी रौनक़ भारत की आज़ादी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक चेतना है — वह चेतना जिसने सदियों की पराधीनता के अंधेरे को चीरकर इस राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा होने का साहस दिया। 15 अगस्त 1947 का वह प्रभात केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि स्वतंत्र आत्मा का जागरण था। यह दिन […] Read more »