लेख शिक्षक ज्ञानवान ही नहीं, चरित्रवान पीढ़ी का निर्माण करें September 4, 2025 / September 4, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment राष्ट्रीय शिक्षक दिवस – 5 सितम्बर 2025 पर विशेष– ललित गर्ग –शिक्षक ही सभ्यता और संस्कृति के असली शिल्पी होते हैं। विज्ञान, तकनीक और राजनीति चाहे जितनी प्रगति कर लें, यदि शिक्षा और शिक्षक दिशा न दें तो मानवता दिशाहीन हो जाती है। इसी कारण 5 सितम्बर को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा आरंभ […] Read more » राष्ट्रीय शिक्षक दिवस - 5 सितम्बर
लेख शिक्षक का विकल्प नहीं ए.आई. September 3, 2025 / September 3, 2025 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल 5 सितंबर को हर वर्ष देश भर में भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है और हर शिक्षक दिवस पर ही शिक्षक के अस्तित्व और उसके महत्व पर कई प्रश्न खड़े किए जाते हैं। एक और जहां आज का दिन शिक्षक के सम्मान का दिन […] Read more » शिक्षक का विकल्प नहीं ए.आई.
लेख शख्सियत गुरुजी शिबू सोरेन : झारखंड की आत्मा, अस्मिता और संघर्ष के प्रतीक September 3, 2025 / September 3, 2025 by अशोक कुमार झा | Leave a Comment अशोक कुमार झा झारखंड की धरती संघर्षों, बलिदानों और असंख्य जनांदोलनों की साक्षी रही है। यहां के पहाड़ों, नदियों और जंगलों ने बार-बार उस पुकार को सुना है जिसमें आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और अस्तित्व की रक्षा की गूँज रही है। इस संघर्ष की सबसे ऊँची आवाज़ और सबसे दृढ़ संकल्पित व्यक्तित्व रहे गुरुजी शिबू सोरेन।गुरुजी का नाम झारखंड की […] Read more » गुरुजी शिबू सोरेन
लेख समाज अतिथि शिक्षकों की यह कैसी मेहमाननवाजी September 3, 2025 / September 3, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment ओ पी सोनिक ऐसा माना जाता है कि भारतीय समाज के व्यवहार में अतिथि को देवता के समान मानने की भावना समाहित है। पिछले कई वर्षों से भारत की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों के लिए प्रयुक्त अतिथि शब्द जितना ट्रेंड करता रहा है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया। जब शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा विभिन्न माननीय न्यायालयों में सरकारों के गले की फांस बनने लगा तो सरकारों द्वारा शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए एक ऐसा अस्थाई जुगाड़ ईज़ाद कर लिया जिससे देश की डगमगाती शिक्षा व्यवस्था फिर से चलने लगी। सरकारी शिक्षण संस्थानों में नियमित शिक्षकों की अपेक्षा अतिथि शिक्षकों की बढ़ती संख्या को देखकर लगता है कि फिर से चलने वाली व्यवस्था अब लंगड़ी व्यवस्था का रूप ले रही है। विभिन्न राज्यों में ऐसे शिक्षकों को अतिथि शिक्षक, शिक्षा मित्र, संविदा शिक्षक, पारा शिक्षक, शिक्षक सेवक और विद्या वालंटियर्स जैसे भावनात्मक नामों से जाना जाता है। काम चाहें चुनाव का हो या मतदाता सूचियों का या किसी अन्य गैर शैक्षिणिक गतिविधि का, आमतौर पर नियमित शिक्षक उक्त गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने का ज्यादा दायित्व अतिथि शिक्षकों के कंधों पर टिका होता है। अधिकांश राज्यों में शिक्षकों के प्रति राजनीतिक उदासीनता ने उन्हें मजदूरों के स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। मजदूरों को भी कार्य दिवसों के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता है और अतिथि शिक्षकों को भी। जिन राज्यों में मासिक आधार पर निर्धारित धनराशि देने का प्रावधान है भी तो वह अपर्यात है। मजदूरों और अतिथि शिक्षकों में बस फर्क सिर्फ इतना रह गया है कि अतिथि शिक्षकों को मजदूरों की तरह काम के लिए चौराहों पर खड़ा नहीं होना पड़ता। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में मजदूरों को वर्ष में 100 दिनों के रोजगार की सरकारी गारंटी है, लेकिन सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में काम करने वाले अतिथि शिक्षकों को वर्ष में कितने दिन का काम मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लाला जी की दुकान पर काम करने वालों और घरों में काम करने वाली महिलाओं को महीने की तय धनराशि के आधार पर काम पर रखा जाता है। आमतौर पर इन्हें सप्ताह में एक दिन छुट्टी मिलती है जिसके पैसे नहीं कटते। और इन कार्यो को करने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता भी निर्धारित नहीं है, जो मानवीय पहलू के सकारात्मक पक्ष को दर्शाता है। शैक्षणिक योग्यता प्राप्त अतिथि शिक्षक विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। अधिकांश राज्यों में उन्हें कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों के पैसे काट लिए जाते हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने वाले देश में क्या राज्य सरकारें आर्थिक रूप से इतनी कमजोर हो गयी हैं कि अतिथि शिक्षकों को रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों के पैसे देने में असमर्थ हैं। अतिथि शिक्षकों पर कभी भी कार्यमुक्त होने का खतरा मंडराता रहता है। ऐसे शिक्षकों के रोजगार की अनिश्चितता शोले फिल्म के उस डायलाग की याद दिलाती है जिसमें गब्बर सिंह बसंती को डांस करने को मजबूर करता है और फिर कहता है, कि जब तक तेरे पैर चलेंगे, तब तक उसकी यानी वीरू की सांसे चलेंगी। अतिथि शिक्षकों की नौकरी भी तभी तक लगातार चल पाती है जब तक कि उस पोस्ट पर कोई नियमित शिक्षक नहीं आ जाता। नियमित शिक्षक के आने पर अतिथि शिक्षक स्वतः ही कार्यमुक्त हो जाते हैं। उन्हें शिक्षक के रूप में फिर से काम करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों एवं कस्बों की ओर आए बेरोजगार युवक निराश होकर वापस गांव लौट जाते हैं। अतिथि शिक्षकों को उनके निवास से इतनी दूर के स्कूलों में नियुक्त कर दिया जाता है कि उनका अधिकांश समय आने जाने में ही व्यतीत हो जाता है। जब भी कभी अतिथि शिक्षकों का कोई आंदोलन सक्रिय होता है तो गिद्ध की दृष्टि लगाए बैठी राजनीति आंदोलन का राजनीतिक अपहरण कर उसको निष्प्रभावी बनाने का काम करती है। देश की राजधानी दिल्ली में अतिथि शिक्षकों के ऐसे कई आंदोलन राजनीतिक अपहरण का शिकार हो चुके हैं। यही वजह है कि दिल्ली में अतिथि शिक्षकों को पक्का करने की खोखली घोषणाएं कच्ची साबित हुई हैं। ऐसी घोषणाओं के लगे पोस्टर कई स्कूलों में आज भी देखे जा सकते हैं। अतिथि शिक्षकों की कुंठा एक ऐसी असमंजसता में फंसी है जो उन्हें न तो रोजगार में होने की अनुभूति होने देती है और न ही बेरोजगार होने की। भारत में हर वर्ष परीक्षा पर चर्चा होती है पर नौकरियों के लिए आयोजित उन प्रतियोगी परीक्षाओं पर चर्चा नहीं होती जिनमें पेपर लीक होने के कारण नियुक्तियों की प्रक्रिया को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है। समय समय पर देश के कई राज्यों में अतिथि शिक्षकों के मामले माननीय न्यायालयों में सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ जाते हैं। भारत में सरकारी क्षेत्र में बढ़ती ठेकेदारी प्रथा ने एक अलग तरह के सामन्तवाद को जन्म देने का काम किया है। शिक्षा से संबंधित संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में शिक्षकों के करीब दस लाख पद खाली पड़े हैं। चौंकाने वाली यह भी है कि केन्द्रीय सरकार द्वारा संचालित केन्द्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों में रिक्त पद अपेक्षाकृत अधिक हैं। उक्त आंकड़ों के आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूर दराज के क्षेत्रों में शिक्षकों के रिक्त पदों की हालत क्या होगी। उक्त संसदीय समिति ने जल्द ही खाली पदों को भरने को कहा है ताकि शिक्षा व्यवस्था की सुचारूता को सुनिश्चित किया जा सके। भारत जिस शिक्षा व्यवस्था के दम पर विश्व गुरू बनने के सपने देख रहा है, वह अभी कोसों दूर नजर आता है। जब शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों को पढ़ाने वाले पर्याप्त संख्या में नियमित गुरू ही नहीं होंगे तो भारत विश्व गुरू कैसे बन पाएगा। अतिथि शिक्षकों की यह कैसी मेहमाननवाजी है जो उन्हें बेरोजगारी से जूझने को विवश कर रही है। चंद राज्यों ने अस्थाई शिक्षकों के हित के लिए सराहनीय प्रयास भी किए हैं पर यह समस्या राष्ट्रीय स्तर की है तो इसके समाधान भी राष्ट्रीय स्तर के होने चाहिए। बेहतर होगा कि अतिथि या अस्थाई शिक्षकों के लिए स्थाई रोजगार की व्यवस्था पर अधिक ध्यान दिया जाए। ओ पी सोनिक Read more » What kind of hospitality is this from guest teachers अतिथि शिक्षक
लेख BE और MSc: शिक्षा के स्तर नहीं, सोच के आईने हैं September 3, 2025 by महिमा सामंत | Leave a Comment महिमा सामंत यहाँ उल्लिखित MSc से आशय भौतिकी, रसायनशास्त्र, गणित आदि शुद्ध विज्ञान विषयों की स्नातकोत्तर डिग्री से है। कुछ लोग BE (स्नातक डिग्री) और इस प्रकार की MSc (स्नातकोत्तर डिग्री) की ग़लत तुलना करके, MSc करने वालों को BE करने वालों से कम महत्त्व का समझते हैं। इस लेख में उसी ग़लत धारणा के […] Read more » BE and MSc: They are not levels of education they are mirrors of thinking
पर्यावरण लेख जल प्रलय के सन्देश ? September 2, 2025 / September 2, 2025 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफ़रीभारत के पंजाब राज्य को सबसे उपजाऊ धरती के राज्यों में सर्वोपरि गिना जाता है। इसका मुख्य कारण यही है कि यह राज्य खेती के लिये सबसे ज़रूरी समझे जाने वाले कारक यानी पानी के लिये सबसे धनी राज्य है। सिंधु नदी की पांच सहायक नदियाँ सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम इसी पंजाब […] Read more » जल प्रलय के सन्देश
बच्चों का पन्ना लेख स्वास्थ्य-योग स्कूली बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य: एक सामूहिक जिम्मेदारी September 2, 2025 / September 2, 2025 by उमेश कुमार सिंह | Leave a Comment डॉ. मनोज कुमार तिवारी वरिष्ठ परामर्शदाता एआरटीसी, एस एस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी आज के दौर में स्कूली बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और उस पर ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। बच्चे हमारे समाज और राष्ट्र का भविष्य हैं, और एक स्वस्थ भविष्य की नींव उनके शारीरिक और मानसिक कल्याण पर ही टिकी होती है। जिस प्रकार […] Read more » Mental health of school children स्कूली बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य स्कूली बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य: एक सामूहिक जिम्मेदारी
लेख सच्चे शिक्षक वही जो सोंचने के लिए प्रेरित करें September 2, 2025 / September 2, 2025 by शम्भू शरण सत्यार्थी | Leave a Comment शम्भू शरण सत्यार्थी भारत ज्ञान और गुरुकुल परंपरा का देश रहा है। यहाँ शिक्षक का स्थान सर्वोच्च माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु और गुरु महेश्वर हैं। अर्थात गुरु ही सृष्टि का निर्माण करने वाले, उसे सँभालने वाले और अज्ञान का नाश करने वाले होते हैं। यही […] Read more » शिक्षक शिक्षक का महत्व
लेख समाज सरकारी नौकरी के लिए वैवाहिक रिश्ते दांव पर September 2, 2025 / September 2, 2025 by अमरपाल सिंह वर्मा | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा हमारा समाज रिश्तों और विश्वास की नींव पर खड़ा है। हम विवाह को एक संस्था और वैवाहिक बंधन को सात जन्मों का बंधन मानते हैं लेकिन अब विवाह का यह बंधन लालच की सीढ़ी बन रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग कागजों पर शादी और […] Read more » Marital relations are at stake for government job सरकारी नौकरी के लिए वैवाहिक रिश्ते दांव पर
लेख खतरनाक मौसम में भी स्कूल खुले क्यों? September 2, 2025 / September 2, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment “बच्चों की सुरक्षा बनाम औपचारिकता का सवाल: जर्जर स्कूल भवन, प्रशासन की संवेदनहीनता और बाढ़-गंदगी के बीच पढ़ाई नहीं, जीवन की रक्षा पहली प्राथमिकता – आपदा में भी आदेशों की राजनीति क्यों?” बारिश और बाढ़ की स्थिति में बच्चों और शिक्षकों को स्कूल बुलाना उनकी जान से खिलवाड़ है। जर्जर इमारतें, गंदगी, जलभराव और यातायात […] Read more » Why are schools open even in dangerous weather? खतरनाक मौसम में भी स्कूल
लेख पंजाब में बाढ़ आखिर क्यों – क्या प्रकृति रुष्ट है? September 1, 2025 / September 1, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment “प्रकृति चेतावनी देती है, रुष्ट नहीं होती – असली वजह इंसानी लापरवाही और असंतुलित विकास” पंजाब में बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा कहना सही नहीं होगा। नदियों का स्वरूप, असामान्य बारिश और जलवायु परिवर्तन तो कारण हैं ही, लेकिन असली दोषी अनियोजित निर्माण, अवैध खनन, ड्रेनेज की उपेक्षा और धान-प्रधान कृषि पद्धति भी है। प्रकृति […] Read more » Why is there flood in Punjab – पंजाब में बाढ़ आखिर क्यों
लेख खनिज उत्खनन से होगा रोजगार का हल September 1, 2025 / September 1, 2025 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव दुनिया तकनीकी प्रकृति चाहे जितनी कर ले, अंततः उसकी आर्थिक उन्नति, प्रगति एवं विकास के हल प्राकृतिक संपदा में ही निहित हैं। भारत हो या कोई अन्य देश खनिज और कृषि के बूते ही उन्नति के शिखर छूते हैं। इस दृष्टि से भारत भूमि को कुदरत ने अटूट प्राकृतिक संपदा दी हुई है। […] Read more » रोजगार का हल