लेख जब ट्रेनें बन जाएँ डर की सवारी: राप्तीसागर एक्सप्रेस पर पथराव, व्यवस्था पर बड़ा तमाचा May 20, 2025 / May 20, 2025 by अशोक कुमार झा | Leave a Comment अशोक कुमार झा 18 मई 2025 की रात देश की प्रतिष्ठित लंबी दूरी की राप्तीसागर एक्सप्रेस पर जब सीवान-छपरा रेलखंड के बीच पत्थरों की बरसात हुई तो एक बार फिर देश की रेल सुरक्षा व्यवस्था, सामाजिक तंत्र और प्रशासनिक संवेदनशीलता कठघरे में खड़ी हो गई।मुजफ्फरपुर के युवा यात्री विशाल कुमार के सिर पर पत्थर लगने से बहता लहू केवल उनकी […] Read more » a big slap on the system When trains become rides of fear: Stone pelting on Rapti Sagar Express राप्तीसागर एक्सप्रेस पर पथराव
लेख दूरसंचार क्रांति : कबूतर से की-बोर्ड तक का “सफर” May 17, 2025 / May 17, 2025 by प्रदीप कुमार वर्मा | Leave a Comment विश्व दूरसंचार दिवस 17 मई पर विशेष… प्रदीप कुमार वर्मा प्राचीन काल में कोई संदेश या कोई चिट्ठी भेजने के लिए कबूतरों या फिर दूत और संदेशवाहक की परंपरा देखने को मिलती है। डाक सेवा के शुरू होने के बाद में पोस्टमैन से यह काम करते थे लेकिन समय के साथ बदलते दौर में अब सूचना और संदेश के भेजने की प्रकृति तथा जरिया भी बदल चुका है। आज इंटरनेट की वजह से संदेश पहुंचाना आसान हो गया है। आज का युग सूचना का युग है। इसी वजह है कि बदले जमाने में “दूरसंचार” ने पृथ्वी और आकाश की सम्पूर्ण दूरी को मिटा दिया है। दूरसंचार क्रांति के माध्यम से ना केवल देश,अपितु विश्व के कोने-कोने में सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्र गति से हो रहा है। यही वजह है कि आज फोन, मोबाइल और इंटरनेट लोगों की प्रथम आवश्यकता बन गये हैं। दूरसंचार क्रांति का ही असर है कि अब सूचना का सफर कबूतर से लेकर कीबोर्ड तक आ चुका है। दूरसंचार का उदेश्य था कि देश दुनिया के हर आदमी तक सूचना पंहुचे ओर संचार सुलभ हो। इसलिए विश्व दूरसंचार दिवस के दिन सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के फायदों के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा की जाती है। यह दिन अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ की स्थापना और साल 1865 में पहले अंतर्राष्ट्रीय टेलीग्राफ समझौते पर हस्ताक्षर होने की याद में मनाया जाता है। मार्च 2006 में एक प्रस्ताव को अपनाया गया था, जिसमें कहा गया है कि हर साल 17 मई को विश्व सूचना समाज दिवस मनाया जाएगा। विश्व दूरसंचार दिवस मनाने की परंपरा 17 मई 1865 में शुरू हुई थी लेकिन आधुनिक समय में इसकी शुरुआत वर्ष 1969 में हुई। तभी से पूरे विश्व में इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भारत में दूरसंचार क्रांति के अतीत के बारे में पता चलता है कि वर्ष 1880 में दो टेलीफोन कंपनियों ‘द ओरिएंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ और ‘एंग्लो इंडियन टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ ने भारत में टेलीफोन एक्सचेंज की स्थापना करने के लिए भारत सरकार से संपर्क किया। इस अनुमति को इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया गया कि टेलीफोन की स्थापना करना सरकार का एकाधिकार था और सरकार खुद यह काम शुरू करेगी। इसके बाद वर्ष 1881 में सरकार ने अपने पहले के फैसले के ख़िलाफ़ जाकर इंग्लैंड की ‘ओरिएंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ को कोलकाता, मुंबई, मद्रास (चेन्नई) और अहमदाबाद में टेलीफोन एक्सचेंज खोलने के लिए लाइसेंस दिया। इससे 1881 में देश में पहली औपचारिक टेलीफोन सेवा की स्थापना हुई। इसी क्रम में 28 जनवरी, 1882 भारत के टेलीफोन इतिहास में ‘रेड लेटर डे’ है। इस दिन भारत के तत्कालीन गवर्नर-जनरल काउंसिल के सदस्य मेजर ई. बैरिंग ने कोलकाता, चेन्नई और मुंबई में टेलीफोन एक्सचेंज खोलने की घोषणा की। कोलकाता के एक्सचेंज का नाम ‘केंद्रीय एक्सचेंज’ था। केंद्रीय टेलीफोन एक्सचेंज के 93 ग्राहक थे। मुंबई में भी 1882 में ऐसे ही टेलीफोन एक्सचेंज का उद्घाटन किया गया था। इसके बाद में संचार क्रांति में बदलाव आया और 2जी के बाद 3जी, 4जी तथा 5 जी स्पेक्ट्रम के जरिए मोबाइल सेवा अस्तित्व में आई। दूरसंचार के क्षेत्र में इंटरनेट के जरिये हमें घर में मोबाइल , कंप्यूटर, लैपटॉप,या टीवी में देखने में मिलता है। वर्तमान समय में दूरसंचार का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंटरनेट है। इसमें कोई शक नहीं है कि जिन लोगों की पहुंच इंटरनेट तक है, उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। दूरसंचार की सहायता से हम ऑनलाइन मोबाइल के द्वारा बिजली एवं नल का बिल, डिस्क रिचार्ज, बैंकिंग, बीमा तथा अन्य काम अपने घर में बैठे-बैठे ही पूरा कर सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा फायदा महिला, बच्चे तथा बुजुर्गों को मिलता है। जिनके लिए यह सभी काम बहुत आसान और आरामदायक बन जाते है। इंटरनेट के जरिए हम असंख्य सूचनाओं को पलक झपकते ही मात्र कुछ चंद सेकेंड में प्राप्त कर लेते हैं। इंटरनेट सिर्फ सूचनाओं के लिहाज से ही नहीं, बल्कि सोशल नेटवर्किग के लिए अब अहम बन चुका है। गूगल के ई-मेल, अन्य सोशल मीडिया के माध्यम जैसे फेसबुक, स्नैपचैट, इंस्टाग्राम, थ्रेड तथा अन्य सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए से हजारों किलोमीटर की दूरियां सिमट कर अब चंद सेकेंड के फासले में बदल गयी हैं। पहले जहाँ किसी से संपर्क साधने के लिए लोगों को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, वहीं आज मोबाइल और इंटरनेट ने इसे बहुत ही आसान बना दिया है। आज इंटरनेट ने हमारे जीवन को सरल बनाने में अहम योगदान दिया है, उसी तरह इसने कई ऐसी समस्याएँ भी उत्पन्न कर दी हैं, जिससे कहीं न कहीं हमारा समाज दूषित हो रहा है। देखें तो आज इंटरनेट पर काम कम और इसका दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। पोर्नोग्राफी जैसी समस्या इंटरनेट के हर हिस्से में पहुंच चुकी है। देखने में यह आया है कि नासमझ लोग अपने यार-दोस्तों की तस्वीरें इंटरनेट पर डाल देते हैं, लेकिन अश्लीलता परोसने वाली वेबसाइट्स उन्हें चुराकर उनका दुरुपयोग करना शुरू कर देती हैं। इसके सामने एक और बड़ी चुनौती साइबर अपराध भी है, जिसकी आड़ में लोग अफवाह फैला कर देश में साइबर युद्ध जैसे हालात पैदा करने की कोशिश करते रहते हैं। इन सब नकारात्मक तथ्यों के बावजूद भी दूरसंचार तकनीक आज भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देशों में समृद्धि के लिए सहायक सिद्घ हो रही है। प्रदीप कुमार वर्मा Read more » Telecommunication Revolution Telecommunication Revolution: The "Journey" from Pigeon to Keyboard विश्व दूरसंचार दिवस 17 मई
लेख चलती चिता बनती बसें: निजी परिवहन की अंधी दौड़ और बेबस यात्रियों की चीखें May 16, 2025 / May 16, 2025 by अशोक कुमार झा | Leave a Comment अशोक कुमार झा 15 मई 2025 की वह सुबह लखनऊ के लिए एक और मनहूस सुबह बनकर आई, जब बिहार के बेगूसराय से दिल्ली की ओर जा रही एक प्राइवेट स्लीपर बस (संख्या: UP17 AT 6372) लखनऊ के मोहनलालगंज क्षेत्र में किसान पथ पर आग का गोला बन गई। इस भीषण हादसे में पांच निर्दोष यात्रियों की ज़िंदा जलकर मौत हो […] Read more » Buses turning into moving pyres: The blind race of private transport and the cries of helpless passengers चलती चिता बनती बसें चलती चिता बनती बसें: निजी परिवहन की अंधी दौड़ और बेबस यात्रियों की चीखें
लेख समाज साक्षात्कार सार्थक पहल गणि राजेन्द्र विजयः दांडी पकडे़ गुजरात के उभरते हुए ‘गांधी’ May 16, 2025 / May 16, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment गणि राजेन्द्र विजयजी के 51वें जन्म दिवस: 19 मई 2025 -ललित गर्ग – प्राचीन समय से लेकर आधुनिक समय तक अनेकों संत-मनीषियों, धर्मगुरुओं, ऋषियों ने भी अपने मूल्यवान अवदानों से भारत की आध्यात्मिक परम्परा को समृद्ध किया है, इन महापुरुषों ने धर्म के क्षेत्र में अनेक क्रांतिकारी स्वर बुलंद किए। ऐसे ही विलक्षण एवं अलौकिक संतों में […] Read more » गणि राजेन्द्र विजय
मीडिया लेख सार्थक पहल सोशल मीडिया पर देह की नुमाइश: सशक्तिकरण या आत्मसम्मान का संकट ? May 16, 2025 / May 16, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment “लाइक्स की दौड़ में खोती पहचान: नारी सशक्तिकरण का असली मतलब” सोशल मीडिया पर नारी देह का बढ़ता प्रदर्शन क्या वाकई सशक्तिकरण है या महज़ लाइक्स और फॉलोअर्स की होड़? क्या हम सच्ची आज़ादी की ओर बढ़ रहे हैं या एक डिजिटल पिंजरे में कैद हो रहे हैं? क्या आत्मसम्मान की जगह केवल देह की […] Read more » सशक्तिकरण या आत्मसम्मान का संकट सोशल मीडिया पर देह की नुमाइश
लेख क्यों जरूरी है हर विषयों पर लिखना… May 15, 2025 / May 15, 2025 by मनोज कुमार | Leave a Comment मनोज कुमार एक दौर था जब जवानी इश्क में डूबी होती थी लेकिन एक यह दौर है जहाँ जवानी लेखन में डूबी हुई है. विषय की समझ हो या ना हो, लिखने का सऊर हो या ना हो लेकिन लिखना है, वह भी बिना तथ्य और तर्क के. ऐसे लेखकों की बड़ी फौज तैयार हो […] Read more » Why is it necessary to write on every topic
लेख संयुक्त परिवार : मात्र समझौता नहीं, आज की “जरूरत” May 15, 2025 / May 15, 2025 by प्रदीप कुमार वर्मा | Leave a Comment अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस 15 मई पर विशेष… प्रदीप कुमार वर्मा कहते हैं कि परिवार से बड़ा कोई धन नहीं। पिता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं। मां के आंचल से बड़ी कोई दुनिया नहीं। भाई से अच्छा कोई भागीदार नहीं। और बहन से बड़ा कोई शुभ चिंतक नहीं। यही वजह है कि परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है। किसी भी देश और समाज की परिवार एक सबसे छोटी इकाई है। परिवार एक सुरक्षा कवच है और एक मानवीय संवेदना की छतरी भी। एक अच्छा परिवार बच्चे के चरित्र निर्माण से लेकर व्यक्ति की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार से इतर व्यक्ति का बजूद नहीं है। इसलिए परिवार के बिना अस्तित्व के बिषय में कभी सोचा नहीं जा सकता। लोगों से परिवार बनता हैं और परिवार से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व बनता हैं। परिवार के इसी महत्व को जान और समझकर लोग आप संयुक्त परिवार को एक बार फिर से अपनाने लगे हैं। देश और दुनिया में परिवार के दो स्वरूप मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। इनमें पितृसत्तात्मक एवं मातृ सत्तात्मक परिवार शामिल है। किसी भी सशक्त देश के निर्माण में परिवार एक आधारभूत संस्था की भांति होता है, जो अपने विकास कार्यक्रमों से दिनोंदिन प्रगति के नए सोपान तय करता है। कहने को तो प्राणी जगत में परिवार एक छोटी इकाई है। लेकिन इसकी मजबूती हमें हर बड़ी से बड़ी मुसीबत से बचाने में कारगर है। बीते सालों में यह देखने में आया है कि संयुक्त परिवार की जगह अब एकल परिवारों ने ले ली है। समाज के इस नए चलन न केवल परिवारों को बिखराव दिया है, वहीं, समूचे सामाजिक ताने-बाने पर भी संकट छा गया है। हालात ऐसे हैं कि एकल परिवारों के सदस्य अब रिश्तों के नाम तक भूलने लगे हैं, निभाने की बात तो और है। एकल परिवारों में लोग एकाकी जीवन जीने को मजबूर है और इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है । इसी चिंता और देश और दुनिया में परिवार के महत्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 1980 के दशक के दौरान परिवार से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना शुरू किया। इसके बाद वर्ष 1983 में आर्थिक और सामाजिक परिषद सामाजिक विकास आयोग ने विकास प्रक्रिया में परिवार की भूमिका पर अपने संकल्प की सिफारिश की और महासचिव से निर्णय लेने वालों और जनता के बीच जागरूकता बढ़ाने का अनुरोध किया। इसके साथ ही जनता को परिवार की समस्याओं और आवश्यकताओं के साथ-साथ उनकी जरूरतों को पूरा करने के प्रभावी तरीकों से अवगत कराया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 दिसंबर 1989 के अपने संकल्प 44/82 में परिवार के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष की घोषणा की और 1993 में महासभा ने फैसला किया कि 15 मई को हर साल अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सामाजिक संरचना के तौर पर परिवार का विवेचन करें तो परिवार जन्म, विवाह या गोद लेने से संबंधित दो या अधिक व्यक्तियों का समूह है, जो एक साथ रहते हैं। ऐसे सभी संबंधित व्यक्तियों को एक परिवार के सदस्य माना जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक वृद्ध विवाहित जोड़ा, उनका बेटा ओर बहू,पोता-पोती और वृद्ध जोड़े का भतीजा सभी एक ही घर या अपार्टमेंट में रहते हैं। तो वे सभी एक ही परिवार के सदस्य माने जाएंगे। परिवारों की प्रकृति की व्याख्या करें तो ऐतिहासिक दृष्टि से अधिकांश संस्कृतियों में परिवार पितृसत्तात्मक यानि पुरुष-प्रधान परिवार ही देखने में आते हैं। इनमें परिवार के सबसे बड़े पुरुष द्वारा ही परिवार के सभी कार्यों का संचालन अथवा निर्णय लिए जाते हैं। इसके साथ ही आदिवासी समाज सहित कुछ अन्य समाजों में मातृ सत्तात्मक परिवारों की पृष्ठभूमि देखने को मिलती है। ऐसे परिवारों में परिवार की बुजुर्ग महिला की प्रधानता रहती है तथा परिवार एवं समाज के सभी निर्णय लेने में बुजुर्ग महिलाएं मुख्य भूमिका निभाती है। यह सभी परिवार संयुक्त परिवार का एक रूप है जहां तीन पीढ़ियां एक साथ रहती हैं। लेकिन समय के साथ संयुक्त परिवारों की यह संकल्पना अब धूमिल हो रही है। औद्योगीकरण के साथ-साथ शहरीकरण ने जीवन और व्यावसायिक शैलियों में तीव्र परिवर्तन लाकर पारिवारिक संरचना में कई परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। लोग,विशेषकर युवा,खेती छोड़कर औद्योगिक श्रमिक बनने के लिए शहरी केंद्रों में चले गए। इस प्रक्रिया के कारण कई बड़े परिवार बिखर गए। इसके साथ ही युवाओं में अपने निर्णय खुद लेने की प्रवृत्ति तथा रोजी रोजगार के चलते अपने परिवार से दूर रहने के कारण भी एकल परिवार की संख्या बढ़ रही है। परिवार नियोजन के चलते हुए परिवार के सदस्यों की संख्या कम हो रही है। जिसके चलते भी परिवारों को आकर संयुक्त परिवार के सिकुड़ कर अब एकल परिवार के रूप में सामने आया है। यही नहीं बुजुर्गों की टोका-टाकी तथा अपना निर्णय खुद लेने की चाहत के चलते भी युवाओं की चाहत अलग अपना संसार बसाने की है। जिसके चलते भी परिवारों में बिखराव है और एकल परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है। एकल परिवार के दुखद पहलू के रूप में एकाकीपन तथा परिवार के सदस्यों की सहायता नहीं मिलने से कामकाजी महिला पुरुष अब यह सोचने पर मजबूर हो गए कि अगर वह संयुक्त परिवार का हिस्सा होते तो उनके कामकाज पर रहने के दौरान परिवार के बुजुर्ग तथा अन्य सदस्य उनके बच्चों का ध्यान रखते और बच्चों को डे-केअर सेंटर में छोड़ने की मजबूरी न सामने आती। इसके साथ ही जब एकल परिवार में रहते हैं तो बच्चों को उनके माता-पिता के अलावा और किसी रिश्ते की जानकारी होती है और ना ही अनुभव। देश की भावी पीढ़ी को ना दादा-दादी की कहानी सुनाने को मिलती हैं और ना ही चाचा और बुआ का दुलार। यही नहीं घर के कामकाज में ना तो महिला को अपनी सास और ननद की मदद मिलती है और ना ही पुरुष को अपने पिता और भाई की सहायता। इसके चलते भी एकल परिवार में रहने वाले महिला और पुरुष खुद को असहाय और अकेला महसूस करते हैं। हालात ऐसे हैं की दादी-दादी से लेकर चाचा चाचा बुआ फूफा मामा मामी तथा भैया भाभी के रिश्तो से यह नई पीढ़ी अनजान है। यही वजह है कि देर से ही सही लोग अब फिर से संयुक्त परिवारों की ओर लौट भी लगे हैं। जिसके चलते संयुक्त परिवार की संकल्पना अब धीरे-धीरे ही सही लेकिन वापस अपने मुकाम पर आने लगी है। इसके साथ ही अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि संयुक्त परिवार अपने हितों के लिए मजबूरी में किया गया समझौता भर नहीं है। संयुक्त परिवार आज की जरूरत भी है। प्रदीप कुमार वर्मा Read more » a "need" of today Joint Family: Not just a compromise अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस 15 मई संयुक्त परिवार
लेख मानव सभ्यता का शिखर एवं रिश्तों का स्वर्ग है परिवार May 13, 2025 / May 13, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस, 15 मई 2025 ललित गर्ग वैश्विक परिवार दिवस दुनिया भर के लोगों में प्यार, सद्भाव, एकता को प्रोत्साहित करने के लिए समर्पित विश्व उत्सव है। संयुक्त राष्ट्र ने परिवारों के महत्व और उनके सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए इस दिन की स्थापना की। परिवार हमें एकसूत्रता […] Read more »
लेख माँ का आँचल – प्रेम की छाँव, बलिदान का गीत” May 11, 2025 / May 11, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन की पहली गुरु, मार्गदर्शिका और सबसे करीबी मित्र है। उसकी ममता जीवनभर हमें सुरक्षा, सुकून और संस्कार देती है। माँ का आशीर्वाद किसी कवच से कम नहीं, जो हर मुश्किल में हमें संबल देता है। मदर्स डे पर उसे सम्मान देना मात्र एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उसके […] Read more » mothers day माँ का आँचल
लेख मां धरती पर विधाता की प्रतिनिधि यानी देवतुल्य है May 8, 2025 / May 8, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment विश्व मातृ दिवस- 11 मई, 2025 -ललित गर्ग-‘मदर्स डे’ या मातृ दिवस एक ऐसा महत्वपूर्ण एवं संवेदनात्मक दिन है जो हमें अपनी माताओं के प्यार और बलिदान के लिए धन्यवाद देने और उन्हें सम्मान देने का अवसर देता है। जननी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का तथा मातृशक्ति की अभिवंदना का यह एक स्वर्णिम अवसर है। माँ […] Read more » International Mother's Day - 11 May विश्व मातृ दिवस- 11 मई
लेख शख्सियत समाज साक्षात्कार कालजयी सृजक रवींद्रनाथ टैगोर May 6, 2025 / May 6, 2025 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल ‘गुरुदेव’ के नाम से विख्यात कवि लेखक संगीतकार एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी तथा राष्ट्रगान जन गण मन के रचयिता और भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने साहित्य, शिक्षा, संगीत, कला, रंगमंच और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी बहुमुखी प्रतिभा से वह स्थान प्राप्त किया है जो विरले ही […] Read more » Timeless creator Rabindranath Tagore कालजयी सृजक रवींद्रनाथ टैगोर
लेख ये कैसा ट्रोल, जिसका नहीं है कोई मोल ? May 6, 2025 / May 6, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment जम्मू-कश्मीर के पहलगाम हमले में (22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में) अपने पति, भारतीय नौसेना के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल को खोने वाली हिमांशी नरवाल को हाल ही में ट्रोल्स ने निशाना बनाया। दरअसल, वह लगातार शांति की अपील कर रही थी और उन्होंने पत्रकारों के सामने यह बात कही थी कि-‘हम नहीं चाहते कि […] Read more »