व्यंग्य ब्रज नही बचो कान्हा के समय जैसों January 2, 2020 / January 2, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment (ब्रजदर्शन के बाद ) जे वृन्दावन धाम नहीं है वैसो, कान्हा के समय रहो थो जैसो समय बदलते सब बदले हाल वृन्दावन हुओ अब बेहाल। कान्हा ग्वालो संग गईया चराई, वो जंगल अब रहो नही भाई निधि वन सेवाकुंज बचो है, राधाकृष्ण ने जहाॅ रास रचो है। खो गयी गलियाॅ खो गये द्वारे, नन्दगाॅव की […] Read more » कान्हा
व्यंग्य डर दा मामला है December 30, 2019 / December 30, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment “सबसे विकट आत्मविश्वास मूर्खता का होता है ,हमें एक उम्र से मालूम है –हरिशंकर परसाई”। फिल्मों की “द फैक्ट्री “चलाने वाले निर्देशक राम गोपाल वर्मा महोदय ने डर के लेकर दिलचस्प प्रयोग किये।वो अपनी किसी फेम फिल्म में डर फेम शाहरुख़ खान को तो नहीं ला पाये ,लेकिन डर को लेकर उन्होंने विभिन्न प्रयोग किये […] Read more » डर दा मामला है
व्यंग्य खुदाई मेरा राष्ट्रीय दायित्व है ! December 29, 2019 by प्रभुनाथ शुक्ल | Leave a Comment प्रभुनाथ शुक्ल खुदाई हमारी संस्कार में रची बसी है। हमारे पुरखों की यह विरासत रही है। खुदाई की वजह से हमने ऐतिहासिक सभ्यताएं हासिल की हैं, जिनका महत्व हमारी इतिहास की मोटी-मोटी किताबों मंे दर्ज है। खुदाई से निकली ऐसी सभ्यताओं पर […] Read more » Digging is my national responsibility
व्यंग्य आपको क्या तकलीफ है December 24, 2019 / December 24, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | 1 Comment on आपको क्या तकलीफ है रिपोर्टर कैमरामैन को लेकर रिपोर्टिंग करने निकला।वो कुछ डिफरेंट दिखाना चाहता था डिफरेंट एंगल से ।उसे सबसे पहले एक बच्चा मिला ।रिपोर्टर ,बच्चे से-“बेटा आपका इस कानून के बारे में क्या कहना है”?बच्चा हँसते हुये-“अच्छा है,अंकल इस ठण्ड में सुबह सुबह उठकर स्कूल नहीं जाना पड़ता “।रिपोर्टर -आपकी सरकार से क्या डिमांड है ?बच्चा -सरकार […] Read more » आपको क्या तकलीफ है
व्यंग्य “कौआ कान ले गया “ December 19, 2019 / December 19, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment “हुजूर ,आरिजो रुख्सार क्या तमाम बदनमेरी सुनो तो मुजस्सिम गुलाब हो जाए ,गलत कहूँ तो मेरी आकबत बिगड़ती है जो सच कहूँ तो खुदी बेनकाब हो जाए”इधर सताए हुए कुछ लोगों के जख्मों पर फाहे क्या रखे गए उधर धर्म को अफीम मानने वाले लोगों ने लोगों को राजधर्म याद दिलाने की कवायद शुरू कर दी।नागरिकता […] Read more » कौआ कान ले गया
व्यंग्य पापा नहीं मानेंगे December 11, 2019 / December 11, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment “खुदा करे इन हसीनों के अब्बा हमें माफ़ कर दें, हमारे वास्ते या खुदा , मैदान साफ़ कर दें ,” एक उस्ताद शायर की ये मानीखेज पंक्तियां बरसों बरस तक आशिकों के जुबानों पर दुआ बनकर आती रहीं थीं ,गोया ये बद्दुआ ही थी ।इन मरदूद आशिकों को ये इल्म नहीं था कि खुदा किसी […] Read more » Father will not ask papa will not agree पापा नहीं मानेंगे
व्यंग्य “ये कैसे हुआ” December 5, 2019 / December 5, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment फ़ांका मस्ती ही हम गरीबों की विमल देखभाल करती है एक सर्कस लगा है भारत में जिसमें कुर्सी कमाल करती है “।उस्ताद शायर सुरेंद्र विमल ने जब ये पंक्तियां कहीं थी तब उन्होंने शायद ये अंदाज़ा लगा लिया था कि इस देश की जनता की साथी उसकी फांकाकशी ही रहने वाली है ।वी द पीपुल तो […] Read more » किसानों की आर्थिक स्थिति
व्यंग्य स्वर्ग में ऑखों देखी हिंसा भी नहीं छपवा पाये पत्रकार November 21, 2019 / November 21, 2019 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीवस्वर्ग में लोकतंत्र नहीं राजतंत्र है। इन्द्र वहॉ के लोकपाल है जिनके राजकाज में कोई भी स्वर्गवासी या देवता दखल नहीं देते सभी खुश है, आनन्द से है मानो ब्रम्हानन्दी हो गये है। होशंगाबाद के पत्रकार प्रश्न कर चुके थे कि अगर सब आनंन्दमय है तो […] Read more » स्वर्ग में ऑखों देखी हिंसा
व्यंग्य स्वर्गलोक में पत्रकारो का हँगामा November 21, 2019 / November 23, 2019 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव पत्रकार की सारी नस्ले जो दुनिया में कहीं नहीं है, होशंगाबाद में मिल जायेगी इसलिये नर्मदातट पर बसा होशंगाबाद नगर भूलोक का अजीब शहर बन गया है। यहॉ के लोग दुनिया में सबसे अनूॅठे है। नेताओं का तो क्या कहना, बड़े बिरले है जिन्हें म्युजियम मे होना चाहिये वे होशंगाबाद में […] Read more » स्वर्गलोक में पत्रकारो का हँगामा
मनोरंजन व्यंग्य सिनेमा तो क्यों धन संचय November 18, 2019 / November 18, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment हाल ही में एक ट्वीट ने काफी सुर्खियां बटोरी ,”पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय” जिसमें अमिताभ बच्चन साहब ने सन्तान के लिये धन एकत्र ना करने का उपदेश दिया है लोगों ने इस वाक्य को आई ओपनर की संज्ञा दी है ।लोग बाग़ ये अनुमान लगा रहे हैं […] Read more » पूत कपूत तो क्यों धन संचय पूत सपूत तो क्यों धन संचय
व्यंग्य मन का रावण October 27, 2019 / October 27, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment हा, तुम्हारी मृदुल इच्छाहाय मेरी कटु अनिच्छा था बहुत माँगा ना तुमने ,किंतु वह भी दे ना पाया ।था मैंने तुम्हे रुलाया ,,ये एक तसल्ली भरा सन्देश है उन लोगों की तरफ से जिन्होंने इस बार मन के रावण को पुष्पित -पल्लवित नहीं होने दिया ।इस बार का दशहरा बहुत फीका फीका रहा।,फेसबुक के कॉलेज से […] Read more »
व्यंग्य गोली नेकी वाली October 21, 2019 / October 21, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment “ये दौरे सियासत भी क्या दौरे सियासत है चुप हूँ तो नदामत है ,बोलूँ तो बगावत है” आम वोटर चुनाव के वक्त ऐसे ही सोचता है कि वो क्या बोले ,सब कुछ तो बोल दिया है नेताजी ने।नेताजी जवान हैं ,स्टाइलिश कपड़े पहनते हैं ,कभी मीडिया के लाडले हुआ करते थे ,सबको कान के नीचे बजाने की […] Read more »