व्यंग्य साहित्य आज़ादी की तान पर नाचे बलूचिस्तान September 27, 2016 / September 27, 2016 by अमित शर्मा (CA) | 1 Comment on आज़ादी की तान पर नाचे बलूचिस्तान भारत के रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान को नरक कहाँ था , मतलब बलूचिस्तान नर्क से आज़ादी चाहता है लेकिन बलूची लोगो को समझना होगा की नरक से आज़ादी मिलने में समय लगता है , हमें भी यूपीए के शासनकाल से 10 साल के बाद ही मुक्ति मिली थी। Read more » Featured sattirical article on baluchistan बलूचिस्तान
व्यंग्य साहित्य वाकई ! इस चमत्कार को नमस्कार है !! September 26, 2016 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि कोई बिल्कुल आम शहरी युवक बमुश्किल चंद दिनों के भीतर इतनी ऊंची हैसियत हासिल कर लें कि वह उसी माहौल में लौटने में बेचारगी की हद तक असहायता महसूस करे, जहां से उसने सफलता की उड़ान भरी थी। मैं बात कर रहा […] Read more » Featured
व्यंग्य साहित्य विश्व शांतिदूत कबूतर की रिहाई September 21, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment एम एम चन्द्रा कबूतर-1 हर साल होने शांति दिवस को लेकर शांति दूत कबूतरों की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है कोई भी हमारी सुनने वाला नहीं है. सबके सब कबूतरबाजी में लगे है और पतंगबाजी में यकीन करने लगे .जब यह दुनिया शांतिदूत कबूतरों की नहीं हो सकती तो हमें शांतिदूत होने […] Read more » कबूतर की रिहाई विश्व शांतिदूत
राजनीति व्यंग्य ऑपरेशन झाड़ूमार September 18, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment जीभ की लम्बाई, चौड़ाई या मोटाई के बारे में तो हमने अधिक बातें नहीं सुनीं, पर उसकी चंचलता के किस्से जरूर प्रसिद्ध हैं। कहते हैं एक बार दांतों ने हंसी-मजाक में जीभ को काट लिया। जीभ ने कुछ गुस्सा दिखाया; पर वह ठहरी कोमल और अकेली, जबकि दांत थे कठोर और पूरे बत्तीस। उसके गुस्से […] Read more » Featured ऑपरेशन झाड़ूमार
राजनीति व्यंग्य साहित्य क्यों भई चाचा, हां भतीजा September 17, 2016 by विजय कुमार | 1 Comment on क्यों भई चाचा, हां भतीजा बचपन में स्कूल से भागकर एक फिल्म देखी थी ‘चाचा-भतीजा।’ उसमें एक गीत था, ‘‘बुरे काम का बुरा नतीजा, क्यों भई चाचा.., हां भतीजा।’’ फिल्म के साथ यह गाना भी उन दिनों खूब लोकप्रिय हुआ था। आजकल भी ये गाना उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में जूतों की ताल पर खूब बज रहा है। इस […] Read more » Akhilesh yadav Featured Shivpal Yadav चाचा भतीजा शिवपाल
व्यंग्य साहित्य पूंजी-राजनीति एकता जिंदाबाद September 17, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment एम. एम. चन्द्रा पूरी दुनिया के बड़े व्यापारी, पूंजीपति और वित्तीय संस्थान जी -5, जी 8, जी-20 और शक्तिशाली देशों की मीटिंग चल रही थी. विकासशील देश बाहर धरना दे रहे थे. हमें भी इन संस्थाओं में शामिल किया जाये. इन संस्थाओं ने मिलजुलकर यह तय किया कि जब तक बाहर खड़े देशों को यह […] Read more » एकता पूंजी पूंजी-राजनीति एकता राजनीति
व्यंग्य हिंदी दिवस या हिन्दी विमर्श September 15, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment एम् एम्. चन्द्रा हिंदी दिवस पर बहस चल रही थी. एक वर्तमान समय के विख्यात लेखक और दूसरे हिंदी के अविख्यात लेखक. हम हिंदी दिवस क्यों मानते है? कोई दिवस या तो किसी के मरने पर मनाया जाता है या किसी उत्सव पर, तो ये हिंदी दिवस किस उपलक्ष में मनाया जा रहा है. अविख्यात […] Read more » हिंदी दिवस हिन्दी विमर्श
व्यंग्य साहित्य शाहबुद्दीन के नाम एक खत September 15, 2016 by संजय चाणक्य | Leave a Comment संजय चाणक्य ” लिखू कुछ आज यह वक़्त का तकाजा है ! मेरे दिल का दर्द अभी ताजा-ताजा है !! गिर पडते है मेरे आसू ,मेरे ही कागज पर ! लगता है कि कलम मे स्याही का दर्द ज्यादा है !!,, मै काफी उलझन में था सोचता हू खत की शुरूआत कहा से और कैसे […] Read more » Featured शाहबुद्दीन के नाम एक खत
राजनीति व्यंग्य साहित्य खाट का खटराग September 9, 2016 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment राजनीति में नए नए प्रयोगों के आदी रहे राहुल गांधी ने खाट-चर्चा के जरिए कांग्रेस को ठेठ आम लोगों के बीच चर्चा में ला दिया है। खाट-चैपाल चर्चा में आनी ही थी, क्योंकि खाट का अपना एक शास्त्रीय राग भी होता है, जो शास्त्रीय संगीत में तो शामिल नहीं है, लेकिन लोक में लोकश्रुतियों की […] Read more » Featured खाट खाट का खटराग
राजनीति व्यंग्य साहित्य खाट सभा और टाट सभा September 8, 2016 / September 8, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment कल शाम शर्मा जी के घर गया, तो वे माथे पर हाथ रखे ऐसे बैठे थे, जैसे सगी सास मर गयी हो। हर बार तो मेरे आने पर वे हंसते हुए मेरा स्वागत करते थे, पर आज उनमें कोई हलचल ही नहीं थी। भाभी जी भी घर पर नहीं थी। इसलिए मैंने रसोई से एक […] Read more » Featured खाट सभा टाट सभा
राजनीति व्यंग्य साहित्य खटिया लूटेरी जनता September 8, 2016 / September 8, 2016 by अश्वनी कुमार, पटना | Leave a Comment जब लोकतंत्र जनता के लिए है, चुनाव जनता के लिए हैं, रैलियों का इंतजाम जनता के लिए है तो खटिया क्यूँ नहीं? उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से खटिया लूटने के शुरुआत बताती है की अब चुनाव के वक्त जनता को ठगने का जो टैलेंट नेताओं में पहले था वो अब जनता में आने लगी […] Read more » Featured khat sabha of Rahul Gandhi खटिया लूटेरी जनता
व्यंग्य साहित्य इतने लोग हड़ताल नहीं इन्कलाब करते है September 5, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment एम. एम.चन्द्रा भाई! गाड़ी की सर्विस करानी है सर! अभी तो 9 भी नहीं बजे और पुलिस को देखकर आपको क्या लगता है? क्या आज कोई काम हो पायेगा ? सर यदि आप अपनी गाड़ी को बचाना चाहते हो तो आज यहाँ से गाड़ी ले जाओ और किसी ओर दिन सर्विस करा लेना. भाई! ये पुलिस वाले हड़ताल […] Read more » इन्कलाब