राजनीति व्यंग्य एक पाती राहुल बबुआ के नाम December 22, 2013 by विपिन किशोर सिन्हा | 3 Comments on एक पाती राहुल बबुआ के नाम स्वस्ति श्री लिखीं चाचा बनारसी के तरफ़ से राहुल बबुआ को ढेर सारा प्यार, दुलार, चुम्मा। इहां हम राजी-खुशी हैं और उम्मीद करते हैं कि तुम भी अरविन्द-नमो के झटके से उबरने की कोशिश कर रहे होगे। बचवा, राजनीति में हार-जीत तो लगी ही रहती है। तुम्हारी दादी को भी राजनारायण ने […] Read more » एक पाती राहुल बबुआ के नाम
व्यंग्य व्यंग्य बाण : अथ श्री महा-गारत कथा December 22, 2013 by विजय कुमार | 1 Comment on व्यंग्य बाण : अथ श्री महा-गारत कथा पिछले कई दिन से शर्मा जी सुबह-शाम टहलने नहीं आ रहे थे। ठंड में बुजुर्गों को स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए कई तरह के सुझाव और सावधानियां बरतने को कहा जाता है। मुझे लगा कि शायद इसी कारण उन्होंने टहलने का अपना नियमित कार्यक्रम स्थगित किया है; पर जब उनसे मिले कई दिन हो गये, […] Read more » व्यंग्य बाण : अथ श्री महा-गारत कथा
व्यंग्य भैया! पापुलर तो नेपाल वाले प्रचंड भी कम नहीं हुए थे!! December 21, 2013 / December 21, 2013 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment झूठी उम्मीद, कोरा आश्वासन और दोषारोपण। गरीब देश हो अथवा समाज या आदमी। इनकी जिंदगी नियति के इसी तिराहे पर भटकते हुए खत्म हो जाती है। गरीब कोई नहीं रहना चाहता। लेकिन भारतीय संस्कृति व समाज में गरीबी की महिमा अपरंपार है। एक उम्र गुजारने के बाद हमें मालूम हुआ कि धार्मिक आयोजनों में नर – […] Read more » भैया! पापुलर तो नेपाल वाले प्रचंड भी कम नहीं हुए थे!!
व्यंग्य व्यंग्य बाण : वर्षा प्रचार एवं सर्वेक्षण संस्थान November 22, 2013 by विजय कुमार | Leave a Comment विजय कुमार पिछले कई महीने से शर्मा जी कष्ट में हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ? नौकरी करते हुए तो पूरा दिन कार्यालय में फोकट की चाय पीते, मेज के ऊपर और नीचे से कुछ लेते-देते तथा फाइलों को दायें-बायें करते बीत जाता था; पर अवकाश प्राप्ति के बाद से […] Read more »
व्यंग्य अस्सी वाले स्वतंत्र बाबा कहीन– विचारधारा November 16, 2013 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | Leave a Comment सिद्धार्थ मिश्र ”स्वतंत्र आजकल इ ससुरी विचारधारा के नाम पर बड़ी मारामारी है । उ विचारधारा मजदूरों की उ अमीरों फलानी विचारधारा भगवा है और ढमाकी पाकिस्तानी । का है इ विचारधारा जिसके नाम पर सारे गुरू घंटाल दिन रतियै हल्ला मचाते रहते हैं ? हमको तो समझ नहीं आता……कहां का विचार अउर कउन सी […] Read more » अस्सी वाले स्वतंत्र बाबा कहीन-- विचारधारा
व्यंग्य वंदना करते हैं हम..!! November 12, 2013 / November 12, 2013 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment रेडियो सिलोन पर तब यही गीत बजा करता था। जीवन संघर्ष की शुरूआत में रेडियो पर इस प्रार्थना- गीत में मेरे जैसे प्राथमिक स्कूली छात्रों के लिए एक खास संदेश छिपा होता था। उनके लिए यह अलार्म का काम करता था। जिसका मतलब होता था – स्कूल जाने का समय हो गया है। आज की […] Read more »
व्यंग्य डौडियाखेड़ा से लौटकर November 10, 2013 / November 10, 2013 by विजय कुमार | 3 Comments on डौडियाखेड़ा से लौटकर हमारे प्रिय शर्मा जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। कभी उनके भीतर का कवि जाग उठता है, तो कभी अभिनेता। कभी वे समाजसेवी बन जाते हैं, तो कभी पाकशास्त्री। इन दिनों उनके मन में छिपे पत्रकारिता के कीटाणु प्रबल हैं। वे हर घटना और दुर्घटना का एक अनुभवी और सिद्ध पत्रकार की तरह विश्लेषण करने लगते […] Read more » डौडियाखेड़ा से लौटकर
व्यंग्य खोदा पहाड़ और निकली चुहिया October 30, 2013 / October 30, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment 1000 टन सोने की तलाश मे खुदाई शुरू की गई थी और हाथ लगीं कुछ काँच की चूड़ियाँ, लोहे की कीलें पत्थर के छोटे से शेर,मिट्टी चीज़े और कुछ बीड़्स। अब पुरातत्व विभाग ने इतना खोज लिया काफी है, अब होता रहेगा इन पर शोध पर सोना तो एक ग्राम भी नहीं मिला जिसका सपना […] Read more » खोदा पहाड़ और निकली चुहिया
व्यंग्य व्यंग्य/ कुर्सी का व्यावहारिक पक्ष October 29, 2013 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ कुर्सी का व्यावहारिक पक्ष अषोक गौतम हे स्वर्गवासियो ! मेरा देश एक कुर्सी प्रधान देश है। वैसे तो यहां पर अनादि काल से कुर्सी की जय जयकार होती रही है लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से इस देष में कुर्सी की पूजा ईश्वर से अधिक होने लगी है। कुर्सी के प्रति तुच्छ से तुच्छ जीवों के इस लगाव को […] Read more »
व्यंग्य एक और सीक्वल October 26, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment ये मेरा तीसरा सीक्वल है। सबसे पहले मैंने एक गंभीर विषय पर लेख लिखा था ‘हिन्दी किसकी है?’ उसका सीक्वल था ‘‘हिन्दी सबकी है’’।‘’कवि और कल्पना’’ व्यंग लिखने के बाद ‘’कवि और कल्पना -2’’ भी लिखा। ‘आजकल सीक्वल फिल्मों की बाढ सी आगई है इसलिये मैंने सोचा अपने व्यंग ’तुम्हारा नाम क्या है?’’, जो बहुत […] Read more » एक और सीक्वल
व्यंग्य व्यंग्य बाण : बंदर जी के तीन गांधी October 24, 2013 by विजय कुमार | 2 Comments on व्यंग्य बाण : बंदर जी के तीन गांधी विजय कुमार शर्मा जी ऊपर से चाहे जो कहें; पर सच यह है कि दिल्ली में रहने के बावजूद गांधी जी की समाधि पर जाने में उनकी कोई रुचि नहीं है। वे साफ कहते हैं कि जब मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूं, तो फिर दिखावा क्यों करूं ? पर इस दो अक्तूबर को […] Read more »
व्यंग्य अक्ल बड़ी या भैंस…. October 15, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment देश भर की भैंसो ने अपना संगठन मज़बूत किया है , उनका कहना है कि वो मनुष्य को गायों से कंहीं ज़्यादा दूध उपलब्ध कराती हैं इसलियें उन्हे भी गायों के बराबर दर्जा और सुविधायें चाहियें इसके लियें उन्होने अलग अलग शहरो मे आंदोलन शुरू कर दिया है। बेचारी भैंसे… आदमी की फितरत नहीं जानती […] Read more »