विधि-कानून

एक जज का मुअत्तिल होना!

ओ.पी. मिश्रा नामक इस जज को इसलिए मुअत्तिल किया गया है कि उसने उप्र के एक पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को जमानत पर छोड़ दिया था। प्रजापति आजकल जेल में है। उस पर कई अपराधिक मुकदमे तो चल ही रहे हैं लेकिन जज मिश्रा ने उसे बलात्कार के एक बहुत चर्चित मामले में जमानत दे दी थी। अमेठी से विधायक रहे इस प्रजापति पर आरोप है कि उसने और उसके दो साथियों ने एक औरत के साथ बलात्कार किया और बेटी के साथ भी जोर-जबर्दस्ती की।

“समान नागरिक संहिता” क्यों आवश्यक है…?

“समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो। जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किया जाने का कुप्रचार किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 70 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है , तभी तो उच्चतम न्यायालय “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।

बाबासाहेब – एक अनुकरणीय व्यक्तित्व

पूना पैक्ट की पीठ तक की यात्रा तक में बाबा साहेब भारत की एक बड़े दलित राजनैतिक केंद्र और संस्था के रूप में स्थापित हो चुके थे. ब्रिटिशर्स और गांधी दोनों के ही प्रति जातिगत व्यवस्थाओं में परिवर्तन को लेकर उदासीनता को लेकर वे खिन्नता प्रकट करते थे. दलितों और अछूतों की स्वतंत्र राजनैतिक परिभाषा और पहचान को लेकर वे संघर्ष को तीक्ष्ण कर रहे थे उस दौर में बाबा साहेब ने गांधी के प्रति यह नाराजगी भी प्रकट किया था कि वे दलितों को हरिजन कहनें के पीछे जिस प्रकार का भाव प्रकट करते हैं उसमें दलित देश में एक करुणा मात्र की वस्तु बन कर रह गएँ हैं.

नवसंवत्सर एक नये सफर की शुरूआत

नवसंवत्सर ‘न्यू ईयर’ जैसे केवल 12 महीने का समय नापने की एक ईकाई न होकर खगोलीय घटनाओं के आधार पर भारतीय समाज के लिए सामाजिक सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक तरीके से जीवन पद्धति का पथ प्रदर्शक है।
यह केवल एक नए महीने की एक नई तारीख़ न होकर पृथ्वी के एक चक्र को पूर्ण कर एक नए सफर का आरंभ काल है। यह वह समय है जब सम्पूर्ण प्रकृति पृथ्वी को इस नए सफर के लिए शुभकामनाएँ दे रही होती है। जब नए फूलों और पत्तियों से पेड़ पौधे इठला रहे होते हैं , जब मनुष्य को उसके द्वारा साल भर की गई मेहनत का फल लहलहाती फसलों के रूप में मिल चुका होता है ( होली पर फसलें कटती हैं ) और पुनः एक नई शुरुआत की प्रेरणा प्रकृति से मिल रही होती है।

सरकारी भर्तियां: नींद कब खुलेगी?

इस नीति के विरुद्ध कुछ प्रबुद्ध सांसदों ने कल राज्यसभा में आवाज उठाई है। उनमें से कुछ सांसद मेरे पुराने साथी हैं। उन्हें मैं बधाई देता हूं। अब से लगभग 25 साल पहले मैंने इस भाषा नीति के विरुद्ध एक जोरदार आंदोलन चलाया था।