विविधा जसवंत सिंह की पुस्तक इतिहास लेखन पर कलंक – राकेश उपाध्याय August 23, 2009 / December 27, 2011 by राकेश उपाध्याय | 13 Comments on जसवंत सिंह की पुस्तक इतिहास लेखन पर कलंक – राकेश उपाध्याय जसवंत सिंह अब भारतीय जनता पार्टी में नहीं हैं। उनके जिन्ना प्रेम ने अंतत: उन्हें अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर में लाकर खड़ा कर दिया। जिन्ना के प्रति उनकी भक्ति कैसे जगी इसे वो खुद ही कई मर्तबा बयान कर चुके थे। 2005 में ‘लालजी’ के साथ जिन्ना प्रकरण को लेकर जो हुआ […] Read more » Jaswant Singh जसवंत सिंह
विविधा जसवंत सिंह! इतिहास से मत खेलो August 19, 2009 / December 27, 2011 by राकेश उपाध्याय | 17 Comments on जसवंत सिंह! इतिहास से मत खेलो गजब बानगी देखने को मिल रही है। सन 2005 में जो कवायद श्री लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू की उसे अब जसवंत सिंह ने किताबी शक्ल के बौद्धिक ढांचे में लाकर यूं प्रस्तुत कर दिया है कि मानो जिन्ना जैसा अवतारी पुरूष बीती सदी में भारत में दूसरा नहीं जन्मा। क्या आज देश में कोई और […] Read more » Jaswant Singh जसवंत सिंह
विविधा Das ka Bharam : दश का भरम August 3, 2009 / December 27, 2011 by इसरार अहमद | Leave a Comment प्रिय पाठको, यह लेख लिखने का विचार मेरे मन मे टीवी पर आने वाले एक रियलिटी शो देखकर आया जिसको पेश कर रहे है हर जवा दिलो के प्यारे या यू कह सकते है हर जवा लड़की और लड़को के दिलो की धड़कन – सलमान खान . आखिर यह DAS KA BHARAM या दस की […] Read more » Das ka Bharam
विविधा फरेब का सामना- अनिका अरोड़ा July 29, 2009 / December 27, 2011 by अनिका अरोड़ा | 1 Comment on फरेब का सामना- अनिका अरोड़ा कुछ सवाल जिसके सही-गलत जवाब पर कोई नारको, या मोमेंट्स ऑफ ट्रुथ जांचने वाली मशीन अपना फैसला नहीं सुना पाएगा। हमें किसी प्रोग्राम के ब्रॉडकास्ट होने या न होने पर सवाल करने का हक नहीं है। लेकिन हमें देखना होगा कि हमारी किसी भी सार्वजनिक गतिविधि से समाज का भला हो रहा है या नहीं। […] Read more » Anika Arora अनिका अरोड़ा
विविधा कमला नगर मार्केट व ‘चाचे-दी-हट्टी’ July 9, 2009 / December 27, 2011 by ब्रजेश कुमार झा | Leave a Comment दिल्ली में छोला-भटूरा उतना ही लोकप्रिय है, जितना मुंबई में ‘बड़ा-पाव’ या फिर दक्षिण भारत में ‘इड्ली-सांभर’। दिल्ली के जिस किसी स्थान पर जाएंगे, वहां छोला-भटूरा बड़े सहज रूप में मिल जाएगा। पर, राजधानी में छोला-भटूरा की इक ऐसी भी दुकान है, जहां यदि विलंभ से गए तो इस लजीज व्यंजन का लुत्फ नहीं उठा […] Read more » Kamla nagar market कमला नगर मार्केट
टॉप स्टोरी विविधा कंवल के मनिन्द खिला तेरा चेहरा देखा July 8, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | 2 Comments on कंवल के मनिन्द खिला तेरा चेहरा देखा गुबार भरे राहों में खुस्क फ़िज़ा की बाहों में कंवल के मनिन्द खिला तेरा चेहरा देखा गुनचों में उलझी लटें हवा के इशारे पर आंखो पे झुक पलकों मे उलझ चेहरे पर बिखर रहीं खाक की आंधी में इक महज़बी देखा बलिस्ते भर थी दूरियाँ धड़कने करीब थीं सांसो की महक होठों की चमक चांदनी […] Read more » Manind khila मनिन्द खिला
विविधा ज़िन्दगी तो तभी जी ली, जब साथ-साथ खेलें है : kanishka July 3, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | Leave a Comment उपर दूर आसमां तन्हा सामने गुजरगाह तन्हां जिस्म तन्हा, जां तन्हा आती हुई सबा तन्हा पहले भी हम थे तन्हा आज भी अकेले हैं सुना हर यूं लम्हा क्यूं? मेरा मुकद्दर तन्हा क्यूं? खुद को पल-पल ढूंढ रहा मेरे चारो तरफ़ मेले हैं और जीने की चाह कहां? बुझने की परवाह कहां? ज़िन्दगी तो तभी […] Read more » Love ज़िन्दगी
विविधा सच न घटता है न बढ़ता है- अमलेंदु उपाध्याय June 18, 2009 / December 27, 2011 by अमलेन्दु उपाध्याय | Leave a Comment बी4एम पर प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोषी के एक अभियान, जिसमें उन्होंने चुनाव के दौरान कुछ समाचारपत्रों द्वारा धन लेकर खबरें छापने पर ऐतराज जताया है, पर कई नामी गिरामी पत्रकार अपनी भड़ास निकाल चुके हैं। यहां मैं अपनी बात प्रारंभ करने से पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं ना तो प्रभाष जी का प्रवक्ता […] Read more » True सच
विविधा कनिष्क कश्यप: उस रेत पे अपना नाम लिख ता-उम्र निशानी दे चलो June 17, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | Leave a Comment मुझे ख्वाहिसों की कस्ती पे सागर के पार ले चलो ज़हां हर लहर लिख जाती रेत पर एक नयी कहानी कुछ बरसते बादल और हवाएं मिटा देते उनकी निसानी उस रेत पर अपना नाम लिख ता-उम्र निशानी दे चलो है पार सागर के अपना जहां किसी को है इंतज़ार वहां इस भंवर से निकल आँखों […] Read more » Love रेत
विविधा क्यों गए हबीब ? June 17, 2009 / December 27, 2011 by ब्रजेश कुमार झा | Leave a Comment हबीब तनवीर रंगमंच की दुनिया का वह चेहरा था, जिससे आंदोलन की ताप अंत समय तक महसूस होती रही। अब वे नहीं रहे। हालांकि, वे अभी जीना चाहते थे। अपने संघर्ष के दिनों को किताब की शक्ल देने में जुटे थे। सुना है इक भाग लिखा भी है, पर किताब पूरी न हो सकी। आखिर […] Read more » Habeeb हबीब
विविधा सहारे कब तक दिया करोगी? June 17, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | 1 Comment on सहारे कब तक दिया करोगी? इतनी चाहत क्युं है मुझसे ख्वाबों में हरपल आती हो मुझे हंसाती, मुझे मनाती आस के मंजर बनाती बाहों के दरमियान रौशनी बन सिमटी जाती कब तक मेरे ख्वाहिसों की गुलामी तुम किया करोगी सहारे कब तक दिया करोगी? आखें बस तुम्हे ढुढंती हैं जुबां बस तुम्हे पुकारती जगते हुए तुम्हे हीं देखता सपने भी […] Read more » Love Life
कविता विविधा कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में June 10, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | 3 Comments on कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में अक्श बिखरा पड़ा है आईने में मैं जुड़ने कि आस लिए फिरता हूँ कदम तलाशते कुछ जमीं हाथों पर आकाश लिए फिरता हूँ कठोर हकीक़त है है मेरा आज कल खोया विस्वास लिए फिरता हूँ कदम उठते पर पूछते कुछ सवाल क़दमों का उपहास लिए फिरता हूँ कामयाबियां खुशी नहीं दे पाती ऐसी कमी का […] Read more » Mirror आईने