लेखक परिचय

कनिष्क कश्यप

कनिष्क कश्यप

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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गुबार भरे राहों में
खुस्क फ़िज़ा की बाहों में
कंवल के मनिन्द
खिला तेरा चेहरा देखा

गुनचों में उलझी लटें
हवा के इशारे पर
आंखो पे झुक
पलकों मे उलझ
चेहरे पर बिखर रहीं
खाक की आंधी में
इक महज़बी देखा

बलिस्ते भर थी दूरियाँ
धड़कने करीब थीं
सांसो की महक
होठों की चमक
चांदनी के रिद्ध में
चांद को संवरते देखा
gal hair face

2 Responses to “कंवल के मनिन्द खिला तेरा चेहरा देखा”

  1. sada

    गुनचों में उलझी लटें
    हवा के इशारे पर
    आंखो पे झुक
    पलकों मे उलझ
    चेहरे पर बिखर रहीं
    खाक की आंधी में
    इक महज़बी देखा
    बहुत ही सुन्‍दर रचना बधाई ।

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