लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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गजब बानगी देखने को मिल रही है। सन 2005 में जो कवायद श्री लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू की उसे अब जसवंत सिंह ने किताबी शक्ल के बौद्धिक ढांचे में लाकर यूं प्रस्तुत कर दिया है कि मानो जिन्ना जैसा अवतारी पुरूष बीती सदी में भारत में दूसरा नहीं जन्मा। 

क्या आज देश में कोई और मुद्दे नहीं हैं जिस पर हम बहस करें और इसके द्वारा समस्या का समाधान तलाशें। गरीबी, बेरोजगारी, विकास के वर्तमान ढांचे की विसंगतियां, विकट होता पर्यावरण, यूरोपीय अमेरिकी बौद्धिक दादागिरी और उनसे निपटने के उपाय, भारतीय विकल्प, पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रणीत एकात्म मानव दशर्न की व्यावहारिक व्याख्या, हिंदुत्व का राजनीतिक दशर्न, महात्मा गांधी, जेपी और लोहिया की भावभूमि और उनके विचार दशर्न के अनुरूप वैकल्पिक विकास पथ और भी दर्जनों मुद्दे हो सकते हैं जिन पर चिंतन चर्चा कर कुछ ऐसा समाधानपरक विकल्प निकल सकता  है जिनसे देश के वर्तमान और भविय का मार्ग सुधारने और प्रशस्त करने में युवा पी़ढी को मदद मिल सकती है। लेकिन जसवंत सिंह के पास इन मुद्दों के लिए लेखन, चिंतन और प्रबोधन की फुरसत नहीं है। 

मोहम्मद अली जिन्ना के जीवन पर आधारित बीजेपी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह की किताब जिन्ना: इंडिया-पार्टीशन इंडीपेंदेंस हाल ही में प्रकाशित हुई है. पुस्तक पर बीजेपी, संघ परिवार सहित देश के समूचे बौद्धिक जगत में एक बहस छिड गई है, प्रवक्ता के अनुरोध पर युवा पत्रकार राकेश उपाध्याय ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए तीन कड़ियों में ये आलेख लिखा है. इसके पूर्व वे लोकमान्य तिलक पर भी एक सीरीज़ लिख चुके हैं जिसे हमारे पाठकों ने काफी सराहा. आशा है की जिन्ना और भारतीय राजनीति की असलियत का परत दर परत विवेचन करने वाली यह जिन्ना सीरीज़ भी हमारे पाठकों को पसंद आएगी, प्रस्तुत है आलेख की पहली किश्त

– संपादक

देश विभाजन के लिए गांधीनेहरू और पटेल जिम्मेदार थे। इस एक पुरानी और भोथरी हो चुकी ‘थीसिस’ को जसवंत ने फिर से हवा दी है। देश विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था, जिन्ना महान था या नहीं था, जिन्ना सेकुलर था या नहीं था, इन प्रश्नों के जवाब के पूर्व जसवंत सिंह को खुद के अंतःकरण में झांककर देखना चाहिए था कि कंधार विमान प्रकरण के लिए कौन जिम्मेदार था? इस पर तो जसवंत सामूहिक निर्णय की बात कर गोलमोल हो जाते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में जब इस मामले ने तूल पकड़ा तो पीएम इन वेटिंग श्री लालकृष्ण आडवाणी की चादर बेदाग बताते हुए आखिर वे बोल ही पड़े और वह भी इतना भर कि आडवाणीजी कंधार ले जाकर आतंकवादियों को छोड़ने के सवाल पर सहमत नहीं थे। आज जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई अपनी अस्वस्थता के कारण लगभग पूरे तौर पर सार्वजनिक जीवन से हट चुके हैं तो जसवंत सिंह को ये कहने में संकोच नहीं होता कि कंधार प्रकरण तो प्रकारांतर से अटलजी के नेतृत्व की असफलता थी। 

खैर यहां सवाल जिन्ना का है। जिन्ना महान था तो इस बारे में जसवंत सिंह के तर्कों के बारे में तो पुस्तक पॄने पर ही पता चलेगा लेकिन ऊपरी तौर पर उन्होंने अंग्रेजी मीडिया को जो वक्तव्य दिया उसे देखनेपने से जिन्ना की महानता के पीछे की उनकी दीवानगी समझ आ जाती है। जाहिर तौर पर इस पर टिप्पणी करना अभी मुनासिब नहीं है लेकिन यह विश्लेषण करने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती कि जसवंत सिंह किस पृष्ठभूमि से सोच रहे हैं। हाल ही में बजट पर चर्चा के दौरान जसवंत सिंह ने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को आयकर छूट सीमा में मामूली वृद्धि पर जो सलाह दी वह इस लिहाज से गौर फरमाने लायक है। वित्तमंत्री से जसवंत सिंह ने कहा था कि आयकर की वर्तमान सीमा में 10000रूपये की छूट का क्या मतलब है इतने में तो कायदे से एक व्हिस्की की बोतल भी बाजार में नहीं मिल पाती है। 

देश के बाजार में आम आदमी की दाल रोटी भी इस समय जब जेब की औकात से बाहर हो गई है तब यदि कोई राजनेता व्हिस्की के जरिए महंगाई जैसे गंभीर मुद्दे को स्पशर करता है तो उसके राजशाही ठाट का अंदाज लगाया जा सकता है। खैर यही कुछ शौक जसवंत के महान पुरूष जिन्ना के भी थे। वह जिन्ना जो कभी इतिहास में हिंदू-मुस्लिम एकता का अग्रदूत कहा जाता था और जो बाद में मानवता का खुंखार कातिल बनकर उभरा। जसवंत सिंह ने जिन्ना के इतिहास के बारे में लगता है कि कुछ ज्यादा ही शोध किया होगा लेकिन वह कुछ भी करें, इतिहास की संकरी गलियों में से भी सच बाहर आकर ही रहता है। 

पहली बात तो ये किताब उस प्रतिकि्रया की उपज है जिसने श्री जसवंत के प्रिय नेता श्रीआडवाणी को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद से हटने को विवश कर दिया था। श्री आडवाणी ने उसके बाद अपनी जो जीवनी लिखी उसमें जिन्ना प्रकरण पर एक पूरा अध्याय ही समाहित किया हऔई हैव नो रीग्रेट्स। ठीक उसी तर्ज पर चलकर जसवंत सिंह ने इस नो रीग्रेट्स को किताब की शक्ल में व्याख्यायित करते हुए ॔ग्रेट डिबेटेबल आइटम’ में तब्दील कर दिया है। 

जिन्ना के बारे में जसवंत हिंदुस्तान के लोगों को क्या नया बताना चाहते हैं जो देश के बौद्धिक वर्ग को पहले से मालूम नहीं है। जिन्ना राष्ट्रवादी था, लोकमान्य तिलक पर सन 1908 में जब देशद्रोह का मुकदमा अंग्रेज सरकार ने ठोंका तो जिन्ना उस मुकदमे की पैरवी में तिलक के साथ खड़ा होता था। दादाभाई नरौजी जब कोलकाता कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तो जिन्ना उनके निजी सहायक के रूप में काम कर रहा था। ये लोकमान्य तिलक और दादाभाई नरौजी की ही देन थी जो उसे कांग्रेस की राजनीति में कुछ स्थान मिला। तिलक की प्रेरणा से वह हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए भी काम करता था। कांग्रेस की राजनीति में गरमपंथ और नरमपंथ दोनों ही धड़ों में उसने अच्छे मधुर संबंध बना कर रखे थे और फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले के साथ भी जिन्ना की अच्छा तारतम्य बैठने लगा था। लेकिन! हां लेकिन इन सबके बीच उसके अंदर राजनीति का वह कीड़ा भी बैठा हुआ था जो किसी व्यक्ति को तुच्छ स्वार्थों की खातिर इंसान से हैवान और नायक से खलनायक बना देने में एक पल की देरी नहीं लगाता है। भारत के अनेक राष्ट्रवादी नेता जिसके शिकार आज भी होते दिखाई दे रहे है। 

लोकमान्य को सन 1908 में 6साल की सजा हुई। केसरी में प्रकाशित एक संपादकीय को आधार बनाकर तिलक पर देशद्रोह का मुकदमा थोपा गया। संपादकीय का जो अनुवाद न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया गया वह अनुवाद ही मूलतः गलत था। जिन्ना तेज तर्रार वकील था लेकिन इस त्रुटि को पकड़ नहीं सका या यूं कहें कि अंग्रेज सरकार तिलक को जेल भेजने पर आमादा ही थी। तिलक को न तो कांग्रेस का नरमपंथी धड़ा ही पचा पा रहा था और न अंग्रेज कारिंदे। सो सजा तो होनी ही थी, इसलिए कह सकते हैं कि तिलक के मुकदमे में जिन्ना को सफलता न मिल सकी। इधर तिलक जेल गए उधर जिन्ना का राष्ट्रवाद काफूर हो गया। 1913 आते आते जिन्ना उस मुस्लिम लीग की गोद में जा बैठा जिस मुस्लिम लीग का उसने बंग भंग के सवाल पर 1906 में जमकर विरोध किया था। उल्लेखनीय है कि मुस्लिम लीग की गठन 1906 में ढाका में हुआ था। 

1915 में महात्मा गांधी का पदार्पण हिंदुस्तान की राजनीति में होता है। इधर जिन्ना मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों नावों की सवारी कर रहा था और उसके मन में एक कल्पना यह भी थी कि एक दिन कांग्रेस उसकी मुट्ठी में होगी। गांधी का आगमन इस लिहाज से उसके लिए अच्छा नहीं रहा क्योंकि गांधी दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के बाद से ही देश की आम जनता में लोकनेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। 

कुछ लोग कहते हैं कि जिन्ना ने तो खिलाफत आंदोलन का विरोध किया, वह कट्टरवाद के खिलाफ था और खिलाफत के सवाल पर कांग्रेस के आंदोलन का भी उसने विरोध किया। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। जिन्ना सिर्फ अपना नेतृत्व चाहता था और वह भी बिना किसी लोकतांत्रिक पद्धति के पालन के वह खुद को सबसे ऊपर रखने की चाहत रखता था। उसकी ऐंठ नवाबी थी। भारत की गरीबी देखकर जब गांधी ने अपना ब्रिटिश चोला उतार फेंका और पूरे तौर पर देसी खादी की शरण में आ गए तो उनके साथ समूची कांग्रेस ने ही खादी का अनुसरण करना प्रारंभ कर दिया। गांधी राजनीति को धर्माधिठत करना चाहते थे, आचरण की पवित्रता के भी वे आग्रही थे। लेकिन कांग्रेस की राजनीति में जिन्ना को ये पच नहीं रहा था। इसलिए जिन्ना ने गांधी को ढोंगी आदि कहना शुरू कर दिया। और तो और वह कांग्रेस की बैठकों में भी अपनी सिगरेट व सिंगार की सुलग बनाए रखता था। पीने और पहनने की जिन्ना की जो षौकीनी थी उसमें से गांधी को समझ आ गया कि इस आदमी में न तो भारत के लोकजीवन के प्रति आदर है और ना ही मुसलमानों का सच्चा हितैशी हो सकता है। इधर जिन्ना गांधी की लोकप्रियता से इतना जलभुन गया कि उसने हर मोर्चे पर गांधी का विरोध शुरू किया। 

दिसंबर, 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन ने गांधी और जिन्ना दोनों को झकझोर कर रख दिया। अधिवेशन में सभी के लिए जमीन पर ही बैठने की व्यवस्था की गई। सभी के लिए एक प्रकार से खादी का वस्त्र अनिवार्य हो गया। और तो और इस अधिवेशन में गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को चरखा चलाकर सूत कातने का काम भी सिखाना शुरू किया। गांधी की प्रेरणा से समूची कांग्रेस ने विदेशी कपड़ों की होली जलाना शुरू किया। जिन्ना से यह सब ना देखा गया। समूचे अधिवेशन में वही एकमात्र व्यक्ति था जिसने ना तो विदेशी कपड़े उतारे ना तो सार्वजनिक रूप से सिगरेट फूंकना बंद किया। आखिर जिन्ना भारत की राजनीति में नेतृत्व का कौन सा आदर्श प्रस्तुत करना चाहते थे? 

जिन्ना की मृत्यु के समय पाकिस्तान में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त श्री प्रकाश की ये टिप्पणी जिन्ना पर बिल्कुल ही सटीक बैठती है॔नंगे सिर और नंगे पैर मैं उस कमरे में गया जहां जमीन पर जिन्ना साहब का शरीर पड़ा हुआ था। मैं उसके चारों ओर घूमा। मेरे ह्दय में दुःख हुआ कि ऐसे पुरूष को भी मृत्यु नहीं छोड़ती जिसकी चाल ढाल से हमेशा ऐसा प्रतीत होता था कि वे पृथ्वी को ही अपने टहलने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं समझते। इन्हें भी कफन से के हुए पृथ्वी पर एक दिन चित्त पड़ना ही होता है।’

 

जिन्ना ने पाकिस्तान की संविधान सभा में अपना पहला भाषण क्या दिया था इस पर श्री आडवाणी जी ने भी अपनी टिप्पणी दी थी और इस संदर्भ में स्वामी रंगनाथानंद का हवाला दिया था। इस भाषण को तो हमारे जसवंत सिंह ने भी हाथों हाथ लिया है। लेकिन इस भाषण की सच्चाई क्या थी आज इतिहास के अध्येताओं से छुपी नहीं है। जहां तक मेरी जानकारी है भारत के प्रख्यात पत्रकार और हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक बीजी वर्गीज इस भाषण की सच्चाई के एक पहलू से पर्दा उठाते हैं। वर्गीज के अनुसार, इस भाषण को जिन्ना ने अपने जीवित रहते ही रद्द कर दिया था या यूं कहें कि वापस ले लिया था।’ जिन्ना का पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के प्रति रवैया क्या था इसका एक उदाहरण और देखने को मिलता है। देश विभाजन के पूर्व गवर्नर जनरल लार्ड वेवेल ने एक्जीक्यूटिव काउंसिल के लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों को निमंत्रित किया था। पहले तो इसमें मुस्लिम लीग ने आना स्वीकार नहीं किया लेकिन बाद में उनका पांच सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल काउंसिल के लिए नामित किया गया। इसमें चार मुसलमान और एक हिंदू प्रतिनिधि शमिल किया गया था। हिंदू प्रतिनिधि के रूप में जोगेंद्र नाथ मण्डल नियुक्त किए गए थे। जोगेंद्र नाथ मण्डल जाति से हरिजन थे। उन्हें शमिल कर जिन्ना ने संकेत किया था कि उनके भावी राज्य का स्वरूप सेकुलर रहने वाला है। जोगेंद्र नाथ मण्डल पाकिस्तान के पहले मंत्रिमण्डल में भी शमिल किए गए लेकिन यही जोगेंद्र मण्डल विभाजन के बाद पाकिस्तान से भागकर रहने के लिए कलकत्ते आ गए थे। ये सारा कुछ जिन्ना की जानकारी में था। मण्डल ने भारत के पाकिस्तान में उच्चायुक्त श्रीप्रकाश को अपनी जान पर मंडराते खतरे की जानकारी दी थी। श्रीप्रकाश के अनुसार, उन्हें जान से मारने के लिए मुस्लिम लीग के लोगों ने ही भाड्यंत्र रच दिया था। पता नहीं कि मण्डल का प्रकरण जसवंत सिंह को ध्यान में आया कि नहीं। 

जिन्ना एक झूठा इंसान था, वह कई मायनों में फरेबी था। उसने हिंदुओं के साथ, अपनी मातृभूमि के साथ धोखा किया ही, मुसलमानों के साथ भी उसने कम गद्दारी नहीं की। यही कारण है कि अपने अंत समय में एक कुटिल व्यक्ति की जो दुर्दशा होती है वही दशा जिन्ना की भी हुई। वह अंतिम समय तक लोगों पर अविश्वास करता रहा, एक बेचैन आत्मा, एक अशांतविक्षिप्त मनोदशा में उसने अपना शरीर छोड़ा। श्रीप्रकाश अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान के प्रारंभिक दिन’ में लिखते हैं संसार के इतिहास में जिन्ना उन कतिपय व्यक्तियों में एक थे जिन्होंने एक नए देश की स्थापना की और पृथ्वी के मानचित्र पर उसे अंकित किया। लेकिन उनके अंतिम दिन सुखी नहीं थे। वे नितांत एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे किसी को अपनी बराबरी का नहीं मानते थे इस कारण उनका कोई मित्र नहीं था। कानून शास्त्र के विशेष ज्ञाता होने के कारण विभाजन के बाद के दृश्यों से वे दुखी थे लेकिन बड़े अभिमानी होने के कारण वे इसे स्वीकार भी नहीं करते थे।’ 

किस बात का अभिमान था जिन्ना को? इसकी परत दर परत यदि खोली जाए तो वह विबेल अपनी जीभ लपलपाए हमारे सामने आ जाती है जिसने आज समूचे संसार को आतंकवाद के खून खराबे से त्रस्त कर रखा है। वही आतंकवाद जिन्ना ने हिंदुस्तान में आजादी के पूर्व ही पैदा कर दिया था। गांधी, नेहरू और पटेल जिसे येन केन प्रकारेण समझा बुझा कर, कहीं कहीं कुछ तुष्टीकरण के द्वारा भी रास्ते पर लाने का प्रयास कर रहे थे, उस समुदाय के अंदर जिन्ना ने जलजला पैदा कर दिया। किस बात का जलजला पैदा किया था। यही न कि मुस्लिम कौम शसन करने वाली कौम है, वो भला किसी के अंतर्गत कैसे रह सकती है। जिन्ना की गांधी और नेहरू से चि का मूल कारण यही था कि गांधी और नेहरू धीरे धीरे हिंदुस्तान में लोकप्रियता के उस शिखर पर पहुंच गए जहां पहुचने का स्वप्न जिन्ना रह रह कर देखा करते थे। 

ये किस हद तक खतरनाक दर्जे तक पहुंच चुकी थी उसका एक उदाहरण श्रीप्रकाश के हवाले से मिलता है। महात्मा गांधी के निधन के उपरांत पाकिस्तान की विधानसभा में गांधी के प्रति श्रद्घांजलि प्रस्ताव आया। उस समय श्री प्रकाश खुद उस सभा में उपस्थित थे। सभा की कार्रवाई के बारे में श्रीप्रकाश लिखते हैंपाकिस्तान की विधानसभा में गांधीजी की मृत्यु के सम्बंध में शोक प्रदशर्न किया गया। मैं इस अधिवेशन में दशर्क के रूप में गया था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाबजादा लियाकत अली खां, सिंध के मुख्यमंत्री जनाब खुरो साहब और अन्य वक्ताओं ने गांधीजी की बड़ी प्रशंसा की और उनके बारे में ‘महात्मा’ शब्द से बार बार निर्देश करते रहे। इस सभा की अध्यक्षता जिन्ना साहब कर रहे थे। जैसा की प्रथा थी अंत में वे भी बोले। उन्होंने एक बार भी गांधीजी का नाम नहीं लिया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि वे ‘महात्मा’ शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहते थे। गांधीजी के नाम के साथ महात्मा शब्द जोड़ना उन्हें पसंद नहीं था। गांधीजी का नाम संकेत उन्होंने ‘उन’ और ‘वह’ से ही किया और कहा कि ‘उन्होंने अपनी जाति वालों और अपने धर्मावलंबियों की सेवा यथाबुद्धि और यथाशक्ति की। उन्होंने बार बार जोर देकर कहा कि ‘उन्होंने अपने संप्रदाय और धर्म वालों की सेवा की।’ नियमानुसार जिन्ना साहब के हस्ताक्षर से शोक प्रस्ताव भारत सरकार को जाना था लेकिन उस प्रस्ताव को जिन्ना साहब ने अपने हस्ताक्षर से नहीं भेजा।….. आश्चर्य की बात कि गांधीजी की मृत्यु का समाचार सुनने के बाद से ही जिन्ना का स्वास्थ्य भी गिरता गया। वे अधिकांश समय कराची की बजाए क्वेटा और जियारत में ही बिताने लगे। जब वे कराची कभी कभी आते तो बड़े धूमधाम से उनकी सवारी निकलती। उन्हें देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि महात्माजी के उठ जाने के बाद उन्हें ऐसा लगता था कि संसार में मेरे बराबर का अब कोई रह ही नहीं गया जिससे प्रतिद्वंद्विता की जाए। संसार में तो मेरा काम ही समाप्त हो गया। गांधी जी की मृत्यु के बाद जिन्ना सिर्फ सा़ सात महीने ही जीवित रहे।’

 

जिन्ना गांधीजी के प्रति प्रारंभ से ही पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। इसका आभा अनेक अंग्रेज अफसरों ने बार बार अपने वक्तव्यों में दिया था। ऐसा ही एक अंग्रेज था लुईस जो असम में इंडियन ऑयल कंपनी का मुख्य अधिकारी थी। लुईस के अनुभवों को जानकर श्रीप्रकाश ने लिखा कि एक बार देश की राजनीतिक स्थिति पर उससे बात होने लगी। मैंने बातों ही बातों में कहा कि जाने क्यों जिन्ना साहब के मन में गांधीजी के प्रति विकार घर गया? तो उसने तपाक से जो उत्तर दिया उससे मैं स्तब्ध रह गया। उसने कहाक्यों न हो? आखिर गांधी ने ये क्यों कहा कि जिन्ना समाप्त हो गया। और जब गांधी ने ये कहा तो जिन्ना के लिए ये जरूरी था कि वो दिखावे कि वो समाप्त नहीं हुआ है।….. जिन्ना तो लंदन में बसने का निश्चय कर लिया था। वहां वकालत करने के लिए कार्यालय और मकान का प्रबंध भी उसने कर लिया था। जब उन्हें ये समाचार मिला कि गांधी कहते हैं कि मैं समाप्त हो गया और इसी कारण लंदन आया हूं तो स्वाभाविक था कि वे भारत वापस आए और गांधी को दिखाया कि वे समाप्त नहीं हुए हैं।’ 

इस प्रसंग पर श्रीप्रकाश आगे लिखते हैं, बहुत से अंग्रेजों से मेरी बातचीत हुई और सभी ने कांग्रेस के विरूद्ध जिन्ना और पाकिस्तान का पक्ष लिया। वे तो भारत का पक्ष ही सुनने को तैयार नहीं थे। एक अंग्रेज ने तो दांत पीसकर मुझसे कहा कि मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम विशालकाय राक्षस की तरह हो जो छोटे से बेचारे पाकिस्तान को पीस कर रख देना चाहते हो।… आखिर मेरे पास इनकी सुनने के अतिरिक्त क्या उपाय था। जहां तक गांधी जी को मैं जानता था उन्होंने जिन्ना के बारे में कभी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जैसा कि अंग्रेज अफसर बताया करते थे।’

जारी…

17 Responses to “जसवंत सिंह! इतिहास से मत खेलो”

  1. ashokemehta

    जसवंत सिंह इतिहास के बारे मैं ज्यादा ज्ञान नहीं रखते हैं .वो सिर्फ बेकार की बकवास कर दिए हैं .उनको जिन्ना के नेशनल मुस्लिम गार्ड्स और डायरेक्ट एक्शन के बारे मैं कुछ भी नहीं मालूम होगा . नेशनल मुस्लिम गार्ड्स कायदे आजम के खुफिया हिदायत के मोताबिक सारे भारत मैं डायरेक्ट एक्शन के लिए सभी मजदूर युनिओन के मुस्लमान कर्मचरियों को ड्यूटी के बाद लाठी चलाना , कुश्ती करना और जुमे की नमाज के बाद कलकत्ता और बमबई की मस्जिदों में छुरा चलाना और बंदूख चलाना सिखाया जाता था. सारी मस्जिदों में यह तैय्यारियाँ १९४७ से की जा रही थी. सभी मुसलमानों का मस्जिद जाना अनिवार्य कर दिया गया था और नेशनल मुस्लिम गार्ड्स के केप्टेंस को हर हफ्ते अपनी सारी रिपोर्ट मुस्लिम लीग के ऑफिस में देनी होती थी .
    इन सब बातों की पूरी रिपोर्ट माउंट प्लेजेंट, बंगला नंबर १०, मालाबार हिल्स, बम्बई जहाँ मुस्लिम लीग का हेड ऑफिस था में भेज दी जाती थी. इन सब बातों का एक ही मकसद था कि जहाँ पाकिस्तान बनना है उस इलाके को हिन्दुओं से खाली करा लिया जाये . इसके लिए जरुरी था कि हिन्दुओं को मार पिट कर ,डरा धमका कर वहां से भगा दिया जाये या उन सब को मुस्लमान बना दिया जाये और पाकिस्तान के लिए दो शहर बहुत जरुरी थे लाहोर और कलकाता . इसके आलावा भी बहुत सी बातें जो इतिहास कि परतों में खो गयी हैं और इन सब के पीछे सिर्फ एक ही कुराफाती दिमाग था जिन्ना का जिसे कभी नहीं भूलना चाहिए .

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  2. satish mudgal

    Rajneesh Yaane Osho apni Ek pustak mein ek kissa bayaan kartein hain :
    Ek vyakti ne vichaar kiya ki kyon na pichhle thus hazar verson ka pura va sachcha itihaas ek pustak mein sameta jaaye.
    Kaphi prayas va lagbhag thus verson ki mehnat ke baad vah aadha bhaag hi poora ker paaya. Ek din jab vah apna lekhan karya ker raha tha to achank usne apne office ke peechhe kuchh shor suna. Usne apne ek aadmi ko satya ka pataa lagaane ke liye bheja. Vah Aadmi kaphi der baad vaapis aaya.
    Poochhne per usne bataya ki kam se kam dus aadmiyon se puchhne per bhi koi ek eisa ghatnakram nahin pata lagaa paaya jise hum sahi kah sakein. Sabne alag-alag kahani bataai. Koi kisi ko doshi kaha raha tha to koi kisi aur ko.
    Itnaa sunte hi us itihaaskaar ne kitaab likhna band kiya aur us aadmi se kaha ye jo kuchh maine likha hai is sub ko aag lagaa do. Jab main apne office ke peeche apne jeevan kaal mein ghati ghatna ki sachchai ko hi na jaan paaya to pichhle thus hazar saalon ke itihaas ki sachchai ko kaise jaan sakta hoon.
    Theek eisa hi prayas Mr. Jaswant Singh ji kar rahein hai. Bhai Saheb jo kuchh likha hua hai yaa logon ke dilon dimaag mein chhap chuka hai, kya vah jhootha aur jo aap likh rahein hai vah sab sahi. Kya ye aaklan theek hai Mr. Jaswant Singh Ji.
    Satish

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  3. satish mudgal

    If any person accepts Mr. Jaswant’s writings, it means he also accepts that Partition was a mistake of Mr. Jinnah, Mr. Nehru, Mr. Patel and Mr. Gandhi.
    I will also appreciate their view, if they want to make India & Pakistan into one powerfull country ( Akhand Bharat )that too without any terror.

    Only by showing this intention, they can prove their statements of accepting Mr. Jaswant Singh as a true writer, as a true one otherwise he is showing himself what he is not.

    satish

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  4. Dixit

    The root cause of terrorism was Gandhi and Nehru? Why India started war with Pakistan in Kashmir? Gandhi gave a good amount of money to Pakistan as a reward for the massive scale genocide of Sindhis, Punjabis, Bengalese and Gujraties and to meet the war expenses’ in Kashmir. He vehemently opposed to go to war with Pakistan. It was Sardar Patel who disobeyed Gandhi and made entire Pakistan army to surrender. Nehru jumped in fever of Pakistan and created a line of actual control and took that case to UN why? What happened to Sardar Patel& Shyama Prasad Mukharji? THIS IS THE REAL HISTORY OF NEHRU DYNASTY IN INDIA

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  5. Dixit

    Jo gaddri Nehru ne ki haiuski bhi charcha kijiye; I appreciate your feelings but are people of this country proud to be enslaved for more than thirteen hundred years and very happy to retain enslaved culture as their heritage? And such chosen dynastic culture to govern them.Why, when India was divided and millions were butchered, raped and made homeless India was rejoicing under Nehru’s rule? Why Sindhie’s, Punjabi’s, Gujarati’s and Bengali‘s who suffered most were not even remembered? Why history is is fabricated and those facts distorted? Why Netaji Subash Chandra Bose was declared a traitor by Nehru’s’ government? And why Hindu’s have no right to get back their holy places which was destroyed and captured by the invaders’? Nehru kept more Muslims in India then in Pakistan and sent many applications to get the membership in the Muslim organization, many times on the ground that he has protected more Muslims in India than in Pakistan but was out right rejected every single time. This is a proof of his secularism? Isn’t it?

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  6. रामेन्द्र मिश्रा

    ramendra mishra

    नमस्कार् सर !“जसवंत सिंह! इतिहास से मत खेलो” प‌द्क‌र इस मुद्दॆ प‌र् ब‌हुत् अधिक् जान्कारि मिली है !ज‌स्व‌न्त् सिङ्ह् नॆ जॊ ग‌ल्ती की है उसॆ वॊ शाय‌द् क‌भी ना सुधार् पायॆ .जिन्ना जैसा आदमी जिसका स‌छ् आप्नॆ लॆख् मॆ दिय‌ है उस्कि तारीफ ज‌सवनत सिङ्ह् की सॊछ् द‌र्शाती है ! इतनी गूध ज‌न्कारि कॆ लियॆ ध‌न्य‌वाद् !

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  7. नारायण चौधरी

    बहुत बढ़िया शुरुआत है। आजकल एक ट्रेंड सा चल पड़ा है कि पिछले जो आदर्श हैं उनका पुनर्विश्लेण किया जाय। कोई बुरी बात नहीं है। रामायण में रावण खलनायक था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम की कहानी में जिन्ना! पर क्या रावण सचमुच खलनायक था? क्या उसमें विवेक-बुद्धी नहीं थी? एक पढ़े-लिखे वर्ग को क्या यह सवाल नहीं पूछना चाहिए अपने-आप से?

    एक वस्तुनिष्ठ सोच के लिए जरूरी है हरेक चीज को उसी के तराजू में तौल के उसकी परख की जाय। जिन्ना को जानने के लिए हमें जरुरी है हम उसे उसके प्रतिद्वंद्वीयों को भी अपने परिदॄश्य में लाकर रखें। इससे उस व्यक्ति को उसकी संपूर्णता में देखा जा सकता है। जिस महत्वाकांक्षा वाली बीमारी क शिकार जिन्ना थे उससे नेहरू-पटेल मुक्त तो नही थे?

    नेहरू-पटेल को जो राजनैतिक शक्ति मिली उसमें महात्मा गांधी का बहुत बड़ा हाथ था। यह हाथ कभी जिन्ना को तो नहीं मिला? गांधी ने बहुतों का हृदय परिवर्तन किया, पर जिन्ना पर उनकी कृपा दृष्टि क्यों नहीं पड़ी?

    गांधी-नेहरू-पटेल की दुहाई देते फिरते भारत का पहला राजनीतिक परिवार (या कहिए तो वर्तमान भारत का सबसे बड़ा राजवंश) आज भी सत्ता-सुख भोग करता है, अपने आप को ’ओरीजिनल’ गांधी कहलवाता फिरता है। क्या जनता को इस बात की सच्चाई का पता नहीं लगना चाहिए?

    जसवंत ने जो किया है वह हो सकता है कि समय की मांग न हो, पर हमारी समझ से, यह कतई गलत नहीं है। अपनी चितन शक्ति को हम क्यों किसी पुर्वाग्रह से जोड़कर रखें?

    समय की मांग है कि हम आज ये सोचें कि भारत के वे लोग जो अपने स्वार्थ के लिए किसी को सांप्रदायिक कहने में किसी मापदंड का इस्तेमाल नहीं करते उनका आदर्श क्या है। पाकिस्तान का जन्म एक बहुत बड़ी राजनीतिक भूल है जिसका खामियाजा महज़ पाकिस्तान के साथ-साथ भारत ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व भुगत रहा है।

    राकेश उपाध्याय जी के आलेख की अगली किश्त का ईतज़ार रहेगा। एवमस्तु।

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  8. punita singh

    राकेश उपाध्याय के बिचार पढें।जिन्ना का भूत एक बार फिर बोतल से बाहर आकर हमारे नेताओं के सिर पर चढकर बोलने लगा है।देश में समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है उन पर इन लोंगों का ध्यान नहीं जाता ना ही कलम चलती है।सुर्खियों मे. आने का यह अच्छा तरीका है।जिन्ना कितने देश भक्त थे यह किसी भी जागरुक भारतीय को बताने की जरुरत नहींहै। नेहरु और जिन्ना की अति महत्ताकांक्षाओं ने देश को जो जख्म दिये वो आज भी नासूर बने हुये हैं। ऎसी बिबादास्पद पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों के लिये कडे. दंड का प्रावधान होना चाहिये। इतिहास से छेड्छाड कर जनता की भावनाओं से खेलने का इन्हें कोई हक नहीं है। राकेशजी को मेरी हार्दिक शुभकांमनायें। अगली किश्त का इन्तजार रहेगा।

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  9. Samanwaya

    भाई साहब

    कुछ लोग अपनी निजी स्वार्थ के लिए इतिहास के साथ छेड छाड करने का प्रयास करते हैं । उनका एक विशेष उद्देश्य रहता है । हाल ही में कई लेखकों ने जिन्ना को महान बताने के लिए प्रयास कर रह रहे हैं । इस तरह के 2-3 पुस्तकें भी आ चुकी हैं । लेकिन प्रश्न यह है कि इस तरह के प्रयास क्यों किये जा रहे हैं । क्या इसके पीछे कोई विशेष उद्देश्य है इसकी जांच करने की आवश्यकता है । आपने पाठकों को इस मामले में सच्चाई से अवगत करना के लिए जो प्रयास किया है वह निश्चित रुप से सराहनीय है । आशा है आगे भी पाठकों को आपसे मार्गदर्शन मिलता रहेगा .

    समन्वय

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  10. rakesh upadhyay

    इस आलेख में प्रूफ की अनेक त्रुटियां हैं, पाठकों से निवेदन है कि जहां जहा गलतियां हैं वहां स्वविवेक से इसे ठीक कर लें। फांट परिवर्तन के समय ये अशुद्धियां हुईं हैं जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए था..

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  11. डा. रजनीश शुक्ल

    जिना पर चर्चा की दिशा क्या हॊनी चाहियॆ, इस पर भाजपा नॆता किस विभ्रम कॆ शिकार है इन सभी बातॊ पर विस्तार सॆ चर्चा कॆसाथ ही ऎतिहासिक तथा वर्तमान सन्दर्भ मॆ जिन्ना कॊ समझनॆ और समझानॆ का उत्तम प्रयास है| साथ ही स्वतन्त्रता तथा विभाजन कॆ जिम्मॆदार लॊगॊ कॆ सम्बन्ध मॆ नव इतिहास लॆखन करनॆ वालॊ का भी इतिहास उचित तरीकॆ सॆ प्रस्तुत हुआ है, राकॆशजि इस उत्तम लॆखन कॆ लियॆ साधुवाद कॆ पात्र है|

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  12. gyan

    I have read a news broadcasted by IANS related this issue that advani took the decision to expel jaswant. IT IS A Totally baseless MANIPULATED news. why advani will take this decision, even he can not imagine to support such action. dont forget that in the supporters of Jinnah advani is also included. we are unable to understand that similar thing done by advani in 2005 could not make hime out of party but jaswant became scapegoat. It is advani to whome jaswant supported by writing this book. regarding Jinnah advani stand is no regreateble as jaswant is saying after membership termination.
    IN his autobiography advani reiterate that he has no regreats on jannah’s related statement given in pakistan in june,2005, so the statement is of jaswant. why the bjp is not taking action against advani who instigated this all episode?

    PLEASE WRITE ON THIS ISSUE ALSO. THIS IS MY PERSONAL REQUEST TO YOU.

    GYAN SHANKAR

    This decision has been taken in pressure of anti advani camp, led by Murli Manohar Joshi, Vinay Katiyar, Ashok Singhal and others sangh pariwar constituent.

    dont write false desk report as it is being read by all persons, in which decision makers are also included.

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  13. aarti

    नमस्कार सर
    आपके इस आलेख के माध्यम से भारत के युवाओ को जो इस भरम में है कि जिन्ना महान था! उनकी आँखें खोल रहा है
    जिन्ना के चरित्र ओर विचारो के बारे में विस्तृत जानकारी आपके इस आलेख के माध्यम से हमें हो पा रही है जिसके लिए आपको धन्यवाद देते हुए आपके अगले संस्करण का इन्तेज़ार कर रही हू

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  14. kapildev singh

    you have started to write jinna series and other side jaswant ali jinna has been terminated from bjp’s primary membership. इस शानदार आगाज़ के लिए बधाई..आडवाणी को अध्यक्ष पद छोडना पडा और जसवंत का पार्टी से ही पत्ता साफ हो गया…वाह जिन्ना वाह..हिन्दुस्तान की राजनीति पर मरने के 60 साल भी तुम्हारा जिन्न सवार है..
    कपिल देव सिंह

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  15. kapildev singh

    Good, you have started to write this Jinnah series and other side Jaswant Ali Jinnah has been terminated from the BJP’s primary membership. ऐसे शानदार आगाज़ के लिए बधाई…आडवाणी अध्यक्ष पद से विदा हुए और जसवंत का पार्टी से ही पत्ता साफ हो गया, वाह भाई जिन्ना, धन्य तुम्हारी महिमा…

    कपिलदेव सिंह

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