लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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84डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री 

तीर्थ यात्राएँ और परिक्रमा भारत की पुरानी परम्परा है । जम्मू कश्मीर में अमरनाथ की यात्रा के लिये देश के कोने कोने से लोग आते हैं । आन्ध्रप्रदेश में तिरुपति बाला जी , अमृतसर में स्वर्ण मंदिर , असम में कामाख्या देवी , ओडीशा में जगन्नाथ पुरी , गया जी में बौद्ध मंदिर  इत्यादि की यात्राएँ साल भर चलती ही रहती हैं । इसी प्रकार परिक्रमाओं की परम्परा है । ब्रज में गोवर्धन परिक्रमा , वाराणसी की छह कोसी परिक्रमा , कैलाश मानसरोवर में कैलाश परिक्रमा , जिसे तिब्बत के लोग कैलाश कोरा कहते है , सर्व विदित हैं । प्राचीन काल में तो बर्मा से , थाईलैंड होते हुये कम्बोडिया के अंगकोर विष्णु मंदिर तक , स्थल मार्ग से यात्रा की परम्परा थी । गुरु नानक देव तो अपने कुछ शिष्यों को लेकर प्राय यात्रा पर ही रहते थे । वे अपनी इन यात्राओं में रामेश्वरम से होते हुये श्री लंका तक गये । उधर बग़दाद तक भी जा पहुँचे थे । राहुल सांकृत्यायन ने तो मध्य एशिया के बाकू तक में एक पंजाबी साधु की यात्रा और दुर्गा मंदिर में धूना लगाने की कथा लिखी है । इन यात्राओं और परिक्रमाओं , में से कुछ के लिये तो समय भी निर्धारित है । जैसे देश भर में भगवान शंकर के भक्तों की कांवड यात्रा के लिये सावन मास निश्चित है । लेकिन अनेक यात्राएँ व परिक्रमाएँ साल भर भक्त अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं ।जब से यातायात के साधन बढ़े हैं , यात्राओं व परिक्रमाओं का विस्तार हुआ है , तब से जो परिक्रमा या यात्रा पहले साल में केवल निश्चित दिनों में होती थी , वे प्राय साल भर होने लगीं हैं । अरुणाचल प्रदेश में लोहित ज़िला में परशुराम कुंड की यात्रा पहले वैशाख मास में होती थी और उसमें भी स्थानीय लोग ही आते थे , लेकिन अब तो वर्ष भर वहाँ श्रद्धालु जाते रहते हैं । लद्दाख में सिन्धु दर्शन यात्रा का पिछले कुछ वर्षों में ही विस्तार हुआ है । ये यात्राएँ व परिक्रमाएँ एक प्रकार से पूरे देश को जोड़ने का काम करती हैं । परिक्रमाएँ देश की एकात्मता का स्वर हैं । शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों की पैदल यात्रा कर सारे देश को एक सूत्र में पिरोया था । जम्मू कश्मीर में राजौरी के बन्दा बहादुर महाराष्ट्र में अपना आश्रम बना कर बैठे थे । 
                      लेकिन इन सभी परिक्रमाओं में सब से बड़ी परिक्रमा है , अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा । आज की गणना के हिसाब से चौरासी कोस का अर्थ २५० किलोमीटर है । वैसे तो आजकल सीता राम केदलिया जी भारत परिक्रमा कर रहे हैं । देश के एक कोने से दूसरे कोने को अपने पैरों से नापते हुये । साधु संतों के लिये हर दिन यात्रा का दिन ही होता है । लेकिन अभी हाल ही में इन यात्राओं को लेकर एक नई समस्या खड़ी हो गई है । २५ अगस्त को साधु संत अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा कर रहे हैं । उत्तर प्रदेश के एक मंत्री रामपुर के मोहम्मद आज़म खान का कहना है कि अयोध्या की यात्रा से मुसलमानों की भावनाएँ आहत हो रही हैं । पिछले दिनों विश्व हिन्दु परिषद के मार्गदर्शक अशोक सिंहल मुलायम सिंह यादव से मिले थे । बाद में आज़म खान को इस का पता चला तो उन्होंने बताया कि इससे मुसलमानों में ग़लत संदेश जायेगा । वैसे तो वक़्त वक़्त की बात है कि रामपुर के आजमखान , राम की अयोध्या की परिक्रमा में ही मुसलमानों में ग़लत संदेश देख रहे हैं । जिस रामपुर से राम परिक्रमा शुरु होनी चाहिये थी , उसी रामपुर से उसका विरोध हो रहा है । यदि मध्यकाल में हिन्दुस्तान अरबों , तुर्कों , अफगानों व मध्य एशिया के इस्लामी मंगोलों से न पराजित होता तो कम से कम रामपुर से यह आवाज़ नहीं आ सकती थी । लेकिन जैसा कि कहा गया है , वक़्त वक़्त की बात है । पर आजम खान इतना तो जानते होंगे कि अब तो भारतीय इतिहास का मध्यकाल नहीं है । यह इक्कीसवाँ शताब्दी है । इसके बावजूद वे मध्यकाल के मुग़लों की भाषा का प्रयोग क्यों कर रहे हैं ? 
                          पिछले दिनों जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री ने भी बताया था कि "अफ़ज़ल गुरु साहिब" को फाँसी देने से मुसलमानों की भावनाएँ आहत होंगी । कुछ लोग कसाब साहिब को फाँसी देने से भी मुसलमानों की भावनाएँ आहत होने का रोना रो रहे थे । जब शिया समाज के लोग , अन्याय से लड़ते हुये इमाम हुसैन के वीर गति को प्राप्त हो जाने की स्मृति में ताजिया निकालते हैं , तब भी मुसलमानों की भावनाएँ अत्याधिक आहत हो जाती हैं । भारत माँ को सिजदा करने से भी मुसलमानों की भावनाएँ आहत हो जाती हैं । पिछले दिनों संसद में एक मुसलमान की भारत माता को सिजदे का गीत बन्दे मातरम सुन कर ही भावनाएँ इतनी आहत हुईं की वह संसद छोड़ कर ही भागा । या खुदा , कहीं ग़लती से भी भारत माँ की स्तुति का एक शब्द भी कान में न पड़ जाये । पिछले दिनों बिहार के नवादा में तो एक ढावे के मालिक द्वारा केवल यह कह देने कि , श्रावन मास में यहां मांसाहारी भोजन नहीं बनता , मुसलमानों की भावनाएं भडक उठीं और दंगा तक हो गया । दीवाली के दीपक देख कर , मंदिर का संगीत सुन कर , होली का रंग देख कर , विजय दशमी का राम देख कर , कर्बला का हुसैन देख कर मुसलमानों की भावनाएँ आहत हो जातीं हैं । और अब ये अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा देख कर आहत हो रही हैं । 
                         समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव को शायद स्वयं पता नहीं चलता कि मुसलमानों की भावनाएँ किस किस चीज़ से आहत होती हैं । लेकिन वे ठहरे घुटे हुये राजनीतिज्ञ । उन्होंने यह महकमा मोहम्मद आज़म खान को दे रखा है । जैसे ही मुसलमानों की भावनाएँ आहत होने लगती हैं , वह तुरन्त जाकर मुलायम सिंह को कान में बता देते हैं । लेकिन लगता है चौरासी कोसी यात्रा से भावनाएँ आहत ही नहीं , उत्तेजित भी होने लगीं हैं , इसलिये इस बार वे कान में नहीं बल्कि चिल्ला कर बता रहे हैं । मुलायम सिंह ज़िन्दगी में और सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन मुसलमानों की भावनाएँ आहत होती नहीं देख सकते । इससे उनको कुछ कुछ होने लगता है । इसलिये उन्होंने पक्का बंदोबस्त कर दिया है । अयोध्या के आसपास भी कोई रामभक्त फटक नहीं पायेगा । सरयू नदी पर भी पहरा बिठा दिया है । कोई इसके पानी को छूकर तो देखे । इधर सरयू नदी के पानी में कोई रामभक्त उतरा नहीं उधर आज़म खाँ ने खाँसना शुरु किया नहीं । मुलायम सिंह आज़म खान की खाँसी की बीमारी से बहुत डरते हैं । उनका मानना है कि जब आज़म खाँ को खाँसी हो जाती है तो मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देते । मुसलमान वोट नहीं देंगे तो मुलायम सिंह का ख़ानदान सत्ता में नहीं आता । हिन्दोस्तान में यदि किसी को सत्ता प्राप्त करनी है तो वह मुसलमान के वोट से ही प्रप्त कर सकता है , ऐसा नेहरु के वक्त में ही निश्चित हो गया था । इसलिये आज़म खाँ की खाँसी का इलाज करना ज़रुरी है । ऐसा नहीं कि इसका इलाज केवल मुलायम सिंह ही करना चाहते हैं । सोनिया कांग्रेस से लेकर लालू यादव तक बरास्ता नीतिश कुमार तक सभी झोले में आज़म खानों की खाँसी के इलाज की गोलियाँ लेकर घूम रहे हैं । देखना है वे किसकी पुडियों को गटकते हैं ? वैसे सोनिया कांग्रेस का वश चले तो वह इस देश में सभी तीर्थ यात्राओं एवं परिक्रमाओं को ही प्रतिबन्धित कर दें । ऐसा हो जाये तो फिर किसी मुसलमान को खाँसी हो ही न । 
        लेकिन अगला प्रश्न ज़्यादा महत्वपूर्ण है । इस देश के सामान्य सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक क्रियाकलापों को देख कर मुसलमानों की भावनाएँ आहत क्यों होती हैं ? यह एक प्रकार की एलर्जी है । किसी तीर्थ यात्रा को देख कर या किसी ऐतिहासिक स्थान की परिक्रमा होते देख इस देश के मुसलमान एलर्जी का शिकार क्यों हो जाते हैं ? यह बीमारी कहां से आई ? यह इस देश के मुसलमानों की आनुवांशिक बीमारी तो हो नहीं सकती , क्योंकि इस देश के मुसलमानों के पुरखे  कुछ सौ साल पहले तक हिन्दु ही थे और इन्हीं तीर्थ यात्राओं और परिक्रमाओं में भजन गाते हुये भाग लेते थे । अत: अचानक ही उन की संतानों को इन्हीं तीर्थयात्राओं से एलर्जी हो सकती है , इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता । ये मुसलमान शत प्रतिशत भारतीय हैं और ईरान की भाषा में कहना हो तो "इन हिन्दी ए" । एक संभावना और हो सकती है । इस देश पर आक्रमण करने के लिये अलग अलग समय पर अरब , तुर्क , मुग़ल और अफ़ग़ान मुसलमान विदेशों से आये थे । स्वभाविक ही वे विदेशी थे , इसलिये तीर्थ यात्राओं और मंदिरों को देख कर उन्हें एलर्जी होती थी । एलर्जी तो एलर्जी है , लेकिन किसी शासक को हो जाये तो वह और भी ख़तरनाक हो जाती है । अब यही विदेशी मुसलमान इस देश के शासक हो गये थे । उनकी यह एलर्जी हिन्दोस्तान को बहुत भारी पड़ी । तीर्थ यात्राओं पर जज़िया टैक्स लगे और मंदिर तो तोड़ ही दिये गये ।अयोध्या का राम मंदिर बाबर की उसी एलर्जी का शिकार हुआ था । लेकिन  एलर्जी की यह बीमारी भारत में आ गये विदेशी मुसलमानों को थी , भारतीय मुसलमानों को नहीं । लेकिन बीमारी तो आख़िर बीमारी है । कुछ हिन्दोस्तानी मुसलमानों को भी लगी । जिन्नाह इसके शिकार हो गये थे । उनकी बीमारी इतनी बढ़ी की उन्होंने चिल्लाना शुरु कर दिया कि यहाँ का मतान्तरित मुसलमान भी यहाँ के लोगों के साथ नहीं रह सकता । डाक्टर का काम अंग्रेज़ कर रहे थे । उन्होंने जिन्ना की एलर्जी का इलाज करने के बजाय उसे और बढ़ा दिया । नतीजा जो हो सकता था , वही हुआ । देश खंडित हो गया । 
                अब फिर आज़म खानों ने कहना शुरु कर दिया है कि तीर्थ यात्रा से एलर्जी हो रही है और मुलायम सिंहों ने उसका इलाज भी अंग्रेज़ डाक्टर की तर्ज पर करना शुरु कर दिया है । ख़ुशी की बात इतनी है कि इन आज़म खानों के साथ मुसलमान-ए-हिन्द नहीं हैं । ये उन का नाम लेकर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं और उन्हीं की आड़ में शिकार मार रहे हैं । यदि मुलायम सिंह को मुसलमानों की वोटों की इतनी ही चिन्ता है तो उन्हें मुसलमानों से बिना दलालों की सहायता से सीधी बात करनी चाहिये । तब उनको पता चल जायेगा कि आम मुसलमान इस एलर्जी की बीमारी से ग्रस्त नहीं है और न ही अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा से उसकी भावनाएँ आहत होतीं हैं । क्योंकि उन की भावनाएँ भी वही हैं जो इस देश के तमाम अवाम की हैं । मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जो मुसलमानों की प्रतिनिधि तंजीम है , ने अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा का स्वागत किया है । 
            एलर्जी की बीमारी लगने से पहले अल्लामा इक़बाल ने जो कहा था , उस पर भी नज़र डाल ली जाये-
                     मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम-ए-हिन्द
                      है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज
                       अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द
इसलिये ज़रुरी है कि इस बीमारी का जल्द इलाज किया जाये , नहीं तो राजनीति के खाद पानी में फल फूल कर यह अहल-ए-हिन्द के मुसलमानों को भी लग सकती है ।

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