देश और समाज के विकास में बाधक : बाल श्रम


अनिल अनूप

हाल ही देश की राजधानी दिल्ली के एक संभ्रात इलाक़े (पॉश कॉलोनी) में एक नाबालिग नौकरानी के साथ यौन दुर्व्यहार की घटना ने एक बार फिर बाल श्रम कानून की पोल खोल दी है। पुलिस के अनुसार 12 साल की यह बच्ची झारखंड के एक ऐसे क्षेत्र से आती है जहां अब भी मोबाइल सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए अभी तक उसके माता-पिता से संपर्क नहीं हो पाया है। पुलिस का मानना है कि आर्थिक तंगी के कारण बच्ची के माता-पिता ने उसे एक गैर रजिस्टर्ड प्लेसमेंट एजेंसी के साथ भेजा था। जिसने दिल्ली लाकर इसे मानव तस्कर के हवाले कर दिया था। बड़े घरों में छोटे बच्चों को नौकर बना कर रखना और उनके साथ यौन शोषण की ऐसी घटनाएं आम हैं। कई बार इन घटनाओं का खुलासा हो जाता है लेकिन अक्सर इस तरह के मामले प्रकाश में नहीं आते हैं, जिसका फ़ायेदा मानव तस्कर उठाते हैं।

देश में लगभग 9 करोड़ से भी अधिक बाल श्रमिक हैं जिनमें से 2 करोड़ से अधिक लड़कियाँ हैं और इनमें से लगभग 43 लाख बाल श्रमिकों का जीवन काफ़ी संकट में है। विश्व में हमारा देश 14 साल से कम उम्र के सबसे ज़्यादा बाल श्रमिकों वाला देश बन गया है। बाल श्रमिक सबसे अधिक दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्य में हैं। बाल मजदूरों की संख्या में वृद्धि का कारण है जनसंख्या वृद्धि और बेरोज़गारी। बेरोज़गारी और कम मजदूरी मिलने के कारण देश के बहुत लोग ग़रीबी में जीवन-व्यापन कर रहे हैं और इनके बच्चे मजदूर बन रहे हैं। बाल श्रम में वृद्धि एक चिंता का विषय है। बच्चे देश की संपत्ति हैं। बच्चे भविष्य के निर्माता हैं। बच्चे ही हमारे देश के भविष्य हैं। बाल श्रम एक ऐसा अपराध है जो देश के समग्र विकास में बाधक है। बाल श्रमिक ही भविष्य में बड़े होकर अकुशल मजदूर बन जाते हैं और अपना संपूर्ण जीवन ग़रीबी में और बीमारी में गुज़ारते हैं। देश में बालश्रम की समस्या एक चुनौती बन गयी है। बाल श्रमिकों की संख्या कम होने की अपेक्षा बढ़ती ही जा रही है। देश में लगभग 54 फीसदी बाल मजदूर शोषण का शिकार होते हैं। यह देश के लिए बहुत ही दुखद और शर्मनाक है। करोड़ों बच्चे आज भी शिक्षा से वंचित हैं। सर्वशिक्षा के दावे करने वाले हमारे देश के कर्णधार भी इन्हें शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ नहीं पाए। पैसा कमाना इन बच्चों की मजबूरी है। बालश्रम एक कड़वी सच्चाई है। बालश्रम की समस्या हमारे देश के लिए एक चुनौती है। बालश्रम की समस्या विश्वव्यापी बनती जा रही है। बाल मजदूरी समाज पर एक कलंक है।

सरकार ने बालश्रम को अपराध घोषित किया है। सरकार ने बालश्रम (निषेध और संशोधन) अधिनियम, 2016 पारित किया जिसे 1 सितंबर 2016 से लागू किया गया। इस संशोधन के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोज़गार देना पूरी तरह से निषिद्ध है। हमारे देश में सरकार द्वारा क़ानून तो बना दिए जाते हैं लेकिन उनका पालन विधायिका और कार्यपालिका द्वारा नहीं करवाया जा रहा है इसलिए बाल श्रमिकों का शोषण करने वालों के हौसले बुलंद हैं। सरकार सिर्फ़ क़ानून बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 में बाल श्रम को प्रतिबंधित और गैर क़ानूनी कहा गया है। बाल श्रम को रोकने के लिए ढेर सारे क़ानून बना दिए गये हैं और इन क़ानूनों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़े दंड के प्रावधान होने के बावजूद भी कई ख़तरनाक उद्योगों में देश के मासूम बच्चे काम कर रहे हैं। देश में कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसमें बाल श्रमिकों को नहीं लगाया गया हो। ये लोग कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। बच्चों की प्रगति का सपना केवल कागज पर ही पूरा हो रहा हैं। क्या न्यू इंडिया का लक्ष्य इन बच्चों के प्रति उदासीन रवैया अपना कर हासिल होगा?

बाल मजदूरी हर दृष्टिकोण से बच्चों की वृद्धि और विकास में बाधक है। बाल मजदूरी बच्चों के मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक और सामाजिक हितों को प्रभावित करती है। यह गैर कानूनी कृत्य दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। अब सरकार को अपनी आँखें खोलनी होंगी और विधायिका एवं कार्यपालिका पर निगरानी और नियंत्रण बढ़ाना होगा। क्या सरकार वास्तव में इन बच्चों के प्रति संवेदनशील है? क्या कभी सरकार ने यह विचार किया क़ि आख़िर ये मासूम बच्चे मजदूरी करने के लिए क्यों मजबूर हो जाते हैं? सरकार के इतने अधिक कानून, योजनाएँ, कल्याणकारी कार्यक्रम, एनजीओ, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं प्रशासनिक गतिविधियों के चलते रहने के बावजूद भी देश में बाल श्रमिकों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

सरकार द्वारा सन् 1988 में बाल मजदूरी को ख़त्म करने के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना प्रारंभ की गई, इसके तहत बाल श्रम से सभी बच्चों को बाहर करना, उनका पुनर्वास करना और उन्हें शिक्षा की मुख्य धारा में शामिल करना था लेकिन लेकिन सरकार की यह योजना भी अन्य कल्याणकारी योजनाओं की तरह राज्य सरकार की विधायिका और कार्यपालिका के कारण बाल मजदूरों का कोई ख़ास भला नहीँ कर सकी है। केंद्र एवं राज्य सरकारों का सर्व शिक्षा अभियान मात्र एक ढकोसला बन कर रह गया है। राज्य सरकारें बाल मजदूरों की सही संख्या नहीं बताना चाहती हैं। राज्य सरकारों ने बाल मजदूरों के लिए विशेष स्कूल खोल दिए हैं लेकिन इन स्कूलों में बाल मजदूरों की संख्या बहुत कम रहती है। राज्य सरकारों द्वारा हर बच्चे को खानपान, चिकित्सा के लिए रूपये एक सौ का मासिक वज़ीफ़ा दिया जाता है। यह मासिक वज़ीफ़ा भी सिर्फ़ 14 वर्ष तक की उम्र तक ही दिया जाता है जबकि कम से कम यह वज़ीफ़ा 18 वर्ष तक की उम्र तक तो दिया ही जाना चाहिए। वैसे भी एक सौ रूपये मासिक वज़ीफ़ा भी बहुत कम है। इस समस्या के निदान के लिए देश के हर नागरिक को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। बाल मजदूरी से बच्चों को बचाने की ज़िम्मेदारी देश के हर नागरिक की है। इस बड़ी भारी समस्या के समाधान के लिए सभी की भागीदारी आवश्यक है। जब तक मजदूरों को उचित मजदूरी और संगठित क्षेत्र के मजदूरों के समान सुविधाएँ नहीं मिलेंगी तब तक यह समस्या ऐसे ही बनी रहेगी।

बहुत बार सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से बाल मजदूरों को मुक्त करवाया गया है। अब समय आ गया है कि सरकारी मशीनरी के साथ स्वयं सेवी संस्थाएँ और आमिर ख़ान, नाना पाटेकर जैसे सेलिब्रिटी बाल श्रम को रोकने के लिए आगे आएं क्योंकि जिन बच्चों को स्कूल में होना चाहिए वे बच्चे श्रमिक बनकर उद्योग-धंधों में काम कर रहे हैं और ये बाल श्रमिक किसी न किसी बीमारी जैसे तपेदिक, अस्थमा, त्वचा रोग, नेत्र रोग, स्नायु रोग, विकलांगता से ग्रसित हैं। सिर्फ़ कैलाश सत्यार्थी जो कि `बचपन बचाओं आंदोलन` के संस्थापक हैं, जैसे कुछ ही लोग अपने पूरे तन, मन और धन के साथ इन बाल मजदूरों को बाल श्रम से हटाकर उन्हें शिक्षित कर उन्हें प्रगति और विकास के पथ पर आगे बढ़ा रहे हैं। देश के प्रबुद्धजनों को एक संकल्प लेना होगा कि वे इन बाल मजदूरों को बाल श्रम से हटाकर शिक्षित करेंगे तभी इस कृत्य पर लगाम लगाई जा सकती है और देश का भविष्य बर्बाद होने से बच सकेगा।

भारत में बाल शोषण, बाल श्रम और बाल व्यापार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। आर्थिक तंगी और भुखमरी बाल व्यापार और बाल श्रम के लिए संजीवनी का काम करती है। यही कारण है कि बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से बाल तस्करी सबसे अधिक होती है। एक भयावह सच्चाई है कि इन राज्यों की मलिन बस्तियों में बसे दलित, महादलित, आदिवासी, पिछड़े, बेघर, बेबस और लाचार के पास घर में खाने को लाले पड़े होते हैं। काम न मिलने, काम के बदले कम पैसे मिलने अथवा समय पर मजदूरी न मिलने का सीधा असर इनके बच्चे और उसके भविष्य पर पड़ता है। बिहार और झारखण्ड के सूदूरवर्ती इलाके तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मजदूरी न मिलने के कारण बड़ी संख्या में दिल्ली, कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े महानगरों और आगरा, जयपुर, पंजाब, लखनऊ, कानपुर, मुरादाबाद, फ़रीदाबाद, बरेली और सूरत जैसे व्यापारिक और औद्योगिक शहरों में मजदूरों का लगातार पलायन हो रहा है। इनमें काफी संख्या में बाल मजदूर होते हैं। जिन्हें यहां की चूड़ी, बर्तन, कपड़े, चमड़े, बेकरी और कैमिकल की फैक्ट्रियों अथवा ढ़ाबों में बंधुआ मजदूर के तौर पर लगाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक विश्व में 21 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिक हैं। केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 2001 की जन गणना के अनुसार भारत में 25.2 करोड़ कुल बच्चों की आबादी की तुलना में, 5-14वर्ष के आयु समूह के 1.26 करोड़ बच्चे काम कर रहे हैं। इनमें से लगभग 12लाख बच्चे ऐसे ख़तरनाक व्यवसायों और उद्योगों में काम कर रहे हैं जो बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत निषेध है। शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या अत्याधिक, है जो कैंटीन में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामानों की फेरी लगाने में संग्लनहैं लेकिन इस संबंध में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं, जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं। कितने ही बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं, जिनकी ईंट की दीवार पर कालिख जमी रहती है और हवा विषैली होती है वे ऐसी भठियों के पास काम करते हैं, जो 1200 डिग्री सेल्सियस ताप पर जलती हैं। वे आर्सेनिक और पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं। इन बच्चों से कांच-धमन की इकाइयों मेंकाम कराया जाता है, जहां उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियां होती हैं लेकिन तब भी अपने मालिकों के आदेश पर उन्हें 12 से 15 घंटे लगातार काम करना पड़ता है। वहीँ दूसरी ओर कूड़े के ढेर में से रिसाइक्लिंग के लिए विभिन्न सामग्री इकट्ठा करने वाले बच्चों में समय से पूर्व ही कई खतरनाक और संक्रामक बिमारियां घर कर जाती हैं।

भारत में बालश्रम के प्रमुख कारणों में निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, कम आय की प्राप्ति आदि हैं जहां 40% से अधिक लोग गरीबी से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे बालश्रम करके अपना और माता-पिता का पेट भरते हैं। भारत में जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग अशिक्षित है, जिसके दृष्टिकोण में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक आवश्यक है धन कमाना, जिससे बालश्रम को बढ़ावा मिलता है। सरकारकी ओर से बालहिंसा, लैंगिक अपराध, बच्चों की तस्करी और बाल श्रम से जुड़े कई पहलुओं को ध्यान में रखकर कानून बनाने और उसपर सख्ती से अमल करने पर ज़ोर दिया जाता रहा है।

संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 30 तक एवं 32 से 35 में मौलिक अधिकारों का वर्णण किया गया है। जो शोषण के विरूद्ध अधिकार, मानव तस्करी, बेगार एवं जबरन श्रमिकों निषेध करता है। जबकि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक काम-धंधों में लगाना तथा मजदूरी कराने को अपराध की श्रेणी में रखा जाताहै। वर्ष 1949 में सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी श्रमिकों के कार्य करने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष निर्धारित की गई। भारत सरकार ने वर्ष 1979 में बाल श्रम समस्याओं से संबंधित अध्ययन हेतु गुरुपादस्वामी समिति का गठन किया, जिसके सुझाव पर बालश्रम अधिनियम 1986 लागू किया गया। यह पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों जैसे बीड़ी, कालीन, माचिस, आतिशबाजी आदि के निर्माण में रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाता है। बावजूद इसके हमारे देश में बालश्रमिकों कीसंख्या आज भी करोड़ों में है।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्य 8 के अंतर्गत 8.7 में भी 2025 तक बाल मजदूरी को पूरी तरह से ख़त्म करने का संकल्प लिया गया है। बाल श्रम के प्रति विरोध एवं जगरूकता फैलाने के मकसद से हर साल 12 जून को बालश्रम निषेध दिवस भी मनाया जाता है। लेकिन इन सबके बावजूद सच्चाई यही है कि बाल श्रम निरंतर जारी है। बाल श्रम को बच्चों के विरूद्ध हिंसा मानने वाले नोबल पुरुस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि सामूहिक कार्यों, राजनीतिक इच्छा शक्ति, पर्याप्त संसाधन और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से ही बालश्रम को समाप्त किया जा सकता है। जिस दिन हम एक गरीब के बच्चे के साथ भी अपने बच्चों की तरह व्यवहार करने लगेंगे, बाल श्रम स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

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