चोटी से नाक तक, वो काटा…   

 

इन दिनों महिलाओं की चोटी काटने या कटने की चर्चा से अखबार भरे हैं। यह सच है या झूठ, अफवाह है या मानसिक रोग, घरेलू झगड़ा है या कुछ और, ये शायद कभी पता न लगे।

कोई समय था जब मोटी और लम्बी चोटी फैशन में थी। तभी तो माता यशोदा बार-बार कान्हा को यह कहकर दूध पीने के लिए प्रेरित करती थीं कि इससे तेरी चोटी बढ़ जाएगी। कान्हा दूध पीकर चोटी देखते, पर उसे जैसे का तैसा पाकर शिकायत करते थे कि ‘‘मैया, मोरी कबहूं बढ़ेगी चोटी..’’। मैया क्या उत्तर देती थी, ये आप सूरदास जी से ही पूछिए।

किसी समय चोटी का बड़ा महत्व था। चाणक्य ने चोटी में गांठ लगाकर ही नंद वंश के नाश की शपथ ली थी। उन दिनों चोटी के विद्वान सर्वत्र सम्मानित होते थे; पर फिर यह पिछड़ेपन की प्रतीक मान ली गयी। अतः जो लोग किसी धार्मिक या घरेलू कारण से चोटी रखते थे, वे उसे टोपी या पगड़ी के नीचे छिपाने लगे; पर फिर टोपी और पगड़ी भी प्रचलन से बाहर हो गयी। ऐसे में लोग ‘अमिताभ कट’बड़े बाल रखने लगे। उसकी आड़ में छोटी सी चोटी दब जाती थी; पर फिर उसका भी रिवाज नहीं रहा। अतः आजकल चोटी वालों पर बड़ा संकट है। वे ‘एड़ी से चोटी तक’ का जोर लगा रहे हैं कि चोटी भी बची रहे और उनकी आधुनिकता भी।

यों तो पतंगबाजी का मजा हर मौसम में है; पर रक्षाबंधन, जन्माष्टमी या फिर स्वाधीनता दिवस की छुट्टी में पतंग लूटने के लिए सड़कों पर दौड़ते बच्चे और छतों पर ‘वो काटा…’ का शोर सुनायी देता है। भारत जैसे बड़े देश में पतंग कहीं मकर संक्रांति या वसंत पंचमी पर, तो कहीं गोवर्धन पूजा या करवा चौथ पर उड़ायी जाती हैं। इसकी लत के बारे में कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’भी खूब मजा देती है। नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में ‘पतंगबाजी महोत्सव’से ही करोड़ों रु. जुटा लिये थे।

लेकिन काट-पीट पंतगबाजी के अलावा और भी कई जगह होती है। हमारे गांव के पहलवान ‘रामू चचा’का दूर-दूर तक नाम था। बड़ी-बड़ी मूंछें उनके चेहरे को कुछ ज्यादा ही रौबीला बनाती थीं। एक बार चचा दंड पेल रहे थे कि खेलते हुए बच्चों की गेंद आंगन में जा गिरी। जब बच्चे उसे लेने गये, तो चचा ने उन्हें डांट दिया। बस, बच्चे भी भड़क गये। उन्होंने चचा को चेतावनी दे डाली कि तुम्हारी मूंछें नहीं काटी, तो हमारा भी नाम नहीं।

चचा ने बात हंसी में टाल दी। किसकी हिम्मत है, जो शेर के पास आ सके। बच्चे कुछ दिन तो शांत रहे; पर एक रात जब चचा छत पर सो रहे थे, तो दो बच्चे पिछली तरफ से सीढ़ी लगाकर वहां चढ़ गये। चचा गहरी और खर्राटेदार नींद में थे। बच्चों ने उनकी एक ओर की मूंछ काटी और चुपचाप नीचे उतर आये। सुबह उठने पर क्या हुआ होगा, आप समझ ही सकते हैं। तब से चचा ने कसम खा ली कि पहलवानों से ही भिड़ेंगे, बच्चों से नहीं।

जेबकटी के किस्से भी आपने बहुत सुने होंगे। परिश्रम, धैर्य, लगन, रोमांच और खतरे से भरे इस पेशे में आने के लिए पहले किसी बड़े जेबकतरे की शागिर्दी करनी पड़ती है। मजार पर चादर चढ़ाकर उस्ताद को पगड़ी और कुछ भेंट देनी पड़ती है। कहते हैं कि थानों की तरह बड़े मेलों-ठेलों में भी जेबकतरी के ठेके उठते हैं; पर एक बार ठेका उठने के बाद क्या मजाल जो कोई जेबकतरा दूसरे के क्षेत्र में घुस जाए। खटाई में मिठाई के सम्मिश्रण का कितना सुंदर उदाहरण है।

पिछले दिनों मेरे कवि मित्र सुनाम ‘झंझटी’का मोबाइल पार हो गया। अब इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, वहां का थानेदार भी काव्यप्रेमी था। अगले दिन एक कवि गोष्ठी में ‘झंझटी’ने चोरी की बात उसे कही, तो सबसे पहले उसने ये पूछा कि ये कांड हुआ कहां ? इसके बाद उसने शाम को ‘झंझटी’को थाने में बुलाया। वहां मेज पर 15-20 मोबाइल रखे थे। पास में ही चार युवक सिर झुकाए खड़े थे। थानेदार के कहने पर ‘झंझटी’ने अपना मोबाइल तो उठा लिया; पर चोर को वह नहीं पहचान सका। थानेदार ने सबको चार-छह डंडे मारकर इस चेतावनी के साथ भगा दिया कि फिर किसी कवि की तरफ नहीं देखना। तब से वे चारों बेरोजगार हैं। वे गरीब समझ नहीं पा रहे कि कवियों को कैसे पहचानें ? सुना है अब वे भी कवि गोष्ठियों में जाने लगे हैं, जिससे कवियों को छोड़कर बाकी की जेब साफ कर सकें।

कल शर्मा जी के घर जब ये गंभीर चर्चा हुई, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा – प्यारे वर्मा, पिछले दिनों गुजरात में एक भारी भरकम नेता की जो नाक कटी है, उसके बारे में तुम्हारा क्या विचार है ?

– मैं समझा नहीं शर्मा जी ?

शर्मा जी ने मुझे अखबार थमा दिया। उसमें मुखपृष्ठ पर राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल की जीत का समाचार था।

मैं चुपचाप उठा और घर की ओर चल दिया। मेरी पीठ पीछे शर्मा जी की हंसी गूंज रही थी। सड़क और छतों पर पतंगबाजी में मस्त बच्चों के स्वर गूंज रहे थे, ‘वो काटा…’।

– विजय कुमार,

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